रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 26 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] श्रीराममार्चनपद्धति ८१९
ॐ मुक्त्यै नमःअ० । ॐ साङ्गसायुधसपरिवारसमहिषीकायदिव्यमङ्गलमूर्त्तये नमःअ० ।
पूर्व वर्णित क्रमसे सर्वेश्वर श्रीरामजी के अंगो की पूजा करने के बाद पूर्वोदित क्रम से ही
ॐ सर्वेभ्यो भगवद्गणाधिपेभ्यो नम इसे बोलकर भगवान् के सभी गणाधिपो की अर्ध्यादि से
पूजाकर के ॐ सर्वेभ्यो भगवत्परिजनेभ्यो नम इस मन्त्र से भगवान् के सभी परिजनो कीअर्घ्यादि
से पूजा करे । तब ॐ नीत्यै नम इस मन्त्र से नीति की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ मुक्त्यै
नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि से मुक्ति की पूजा करे । अनन्तर ॐ साङ्गायसायुधसपरिवारस-
महिषीकाय दिव्य मङ्गलमूर्तये नम इस मन्त्र से भगवान् के अगो आयुधो परिवारो परिकरो
आदि तथा सर्वेश्वरी श्रीमतीजी के साथ दिव्य मगल विग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की अर्ध्यादि
उपचारो से पूजाकरे।
अथत्थं पूर्वोक्तैः सहभगवन्तं श्रीराममभ्यर्च्य अञ्जलिनापुष्पाण्यादाय-
अनन्तर पूर्वोक्त विधिसे सर्वेश श्रीरामचन्द्रजी की अंग आयुध परिवार परिकर तथा श्रीसीताजी
के साथ पूजा करने के बाद अञ्जलि मे पुष्पो को लेकर निम्नश्लोको से प्रार्थना कर श्रीचर-
णारविन्दो मे पुष्पाञ्जलि समर्पण करे-
सुरासुरेन्द्रादिमनोमधुव्रतेर्निषेव्यमाणाङ्घ्रिसगेरुह प्रभो ।
असंख्यकल्याणगुणामृतोदधे? सुरेश? रामाद्भुतवीर्यमापते ॥१।
समस्त सुरासुर देवदानव इन्द्रप्रमुखो के मनरूपी भ्रमरो से सर्वदा स सेव्यमान चारणरूपी
कमलवाले सर्वसमर्थ हे प्रभु श्रीरामजी ? हे देवेश ? अत्यन्त अद्भुत लोकोत्तर चमत्कारकारी पराक्रम
शाली सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी ? असख्य अनन्त कल्याग गुणरूपी अमृत के महासमुद्ररूप हे श्री
रामजी ? आपके श्रीचरणो मे अनेक वार सादर दण्डवत प्रणाम हे ॥१॥
अपारसंसारमहार्णवप्लवं पदाम्बुजं तं प्रणतार्तिनाशनम् ।
निषेव्यमाण सगणेःशिवादिभिर्गतोऽस्म्यहं ते शरणंशरण्यम् ।२।
हे प्रणतार्तिनाशक श्रीरामजी ? अपार ससाररूपी महासमुद्र को पार करने के लिये सुदृढ
नौका रूप आपके शरण मे आकर प्रणाम-नमस्कार करनेवाले जनो के सर्व दुखो को सर्वदा के
लिये नाश करने वाले तथा अपने समस्त गण परिजन और परि करो के साथ श्रीशिवजी श्री
विष्णुजी और श्रीब्रह्माजी के द्वारासर्वदा ससेव्यमान यानी निरन्तर सेवित शरण्य अर्थात् सबो के
लिये शरण मे आने योग्य या शरण म आये जीवो को सर्वदा के लिये अभय करदेनेवाले उन
प्रसिद्ध तीनो लोको को पवित्रकरने वाले सर्वसमर्थ आपके श्रीचरणरूपी कमलो के शरण मे आया
हूँ प्रभो? ससार भय से अब मेरी रक्षा करे ॥२॥
विकचपद्मदलायतलोचना प्रणतकामदुघाङ्घ्रिसरोरुहाम् ।
अशरणः शरणां जनकात्मजे प्रतिदिनं भवतीमनुचिन्तये ॥३।
अच्छी तरह से विकशित-खीले हुये कमल पत्र के समान विशाल तथा अति मनोहर नेत्र-
वाली तथा आपके शरण मे आकर प्रणाम करनेवाले जनो के सब कामनाओ को पूर्ण करनेवाले
चरणरूपी कमल वाली और अशरण यानी अन्य रक्षक या आधार से रहीत जीवो को सर्वदा शरण