रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
पृष्ठ 15, कुल 26 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामर्चनपद्धति ८१७
ततस्तथैव ॐ अं अनन्ताय नमः अ० । ॐ गं गरुडाय नमः अ० । ॐ विं
विष्वक्सेनाय नमः अ० । ॐ गं गजाननाय नमः अ० । ॐ जं जयत्सेनाय नमः
अ० । ॐ हं हरिवक्राय नमः अ० । ॐ कं कालप्रकृत्यै संज्ञिकायै नमः अ० । ॐ
सर्वेभ्योभगवत्परिजनपरिचरश्रीसुग्रीवाङ्गदविभीषणजाम्बवन्तनलनीलसुषेणगजगवयप्रभृ--
तिभ्यो नमः अ० । इति भगवत्परिजनानर्घ्यादिभिरभ्यर्च्येत ।
भगवान् के दिव्यायुधो के पूजन के बाद पूर्व मे बताये क्रम से ही ॐ अ अनन्ताय
नम इस मन्त्र को बोलकर अनन्त की अर्ध्यादि से पूजा करे । पुन ॐ ग गरुडाय नम इस
मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से गरुडजी की पूजा करे तथा ॐ वि विष्वक्सेनाय नम इस मन्त्र
को बोलकर विष्वक्सेन की पूजा करे। और ॐ गं गजाननाय नम इस मन्त्र को बोलकर गजा
नन की अर्ध्यादि से पूजा करे । तब ॐ ज जयत्सेनाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि
से जयत्सेन की पूजा करे । बाद मे ॐ ह हरिवक्राय नम इस मन्त्र को बोलकर हरिवक्र की
अर्ध्यादि से पूजा करे । अनन्तर मे ॐ क कालप्रकृत्यै सज्ञिकायै नम इस मन्त्र को बोलकर
अर्ध्यादि से कालप्रकृति की पूजा करने के बाद ॐ सर्वेभ्योभगवत्परिजनपरिचरश्रीसुग्रीवाङ्गदविभी-
पणजाम्बवन्तनलनीलसुषेणगजगवयप्रभृतिभ्यो नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान् के सभी परिजन
परिचर श्रीसुग्रीव श्रीअङ्गद श्रीविभीषण श्रीजाम्बवन्त श्रीनलनील सुषेण गजगवय आदि को अर्ध्यादि
से पूजा करे ।
ततस्तथैव भगवतः पूर्वे ॐ ऋक्षराजाय नमः अ० । ॐ नीलाय नमः अ० ।
दक्षिणे ॐ सुग्रीवाय नमःअ० । ॐ नलाय नमः अ० । पश्चिमे ॐ शत्रुघ्नाय नमः
अ०। ॐ अंगदाय नमः अ० । उत्तरे ॐ भरताय नमः अ०। ॐ बिभीषणाय नमः अ०।
भगवतोऽग्रे ॐ आञ्जनेयाय महाबलाय हुं हनुमते नमः अ० । ॐ सर्वेभ्योभगवद्
द्वारपालेभ्यो नमः अ० । इति भगवतोद्वारपालानर्घ्यादिभिरभ्यर्चैत् ।
पूर्वोक्त क्रम से परिजनादि कीपूजा के बाद उसी प्रकार से भगवान् के द्वारपालो की पूर्वादि
क्रम से पूजा करे ॐ ऋक्षराजाय नम इस मन्त्र को बोलकर भगवदपेक्षाया पूर्वदिशामे अर्ध्यादि
से श्रीऋक्षराजजी की पूजा कर तथैव ॐ नीलाय नम इस को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीनीलजी
की पूजा करे । पुन ॐ सुग्रीवाय नम इस मन्त्र को बोलकर दक्षिणादिशा मे अर्ध्यादि से श्रीसुग्री-
वजी की पूजा करके ॐ नलाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीनलजी की पूजा करे
फिर ॐ शत्रुघ्नाय नम इस मन्त्र को बोलकर पश्चिमभाग मे अर्ध्यादि से श्रीशत्रुघ्नजी की पूजा
कर ॐ अगदाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीअंगदजी की पूजा करे । पुन
ॐ भरताय नम इस मन्त्र को बोलकर उत्तरदिशा मे श्रीभरतजी की अर्ध्यादि से पूजा कर ॐ
विभीषणाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीविभीषणजी की पूजा करे । अनन्तर भग-
वान् के आगे ॐ आञ्जनेयाय महाबलाय हुं हनुमते नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्री
हनुमानजी की पूजा के बाद ॐ सर्वेभ्यो भगवद् द्वारपालेभ्यो नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान्
के सभी द्वारपालो की अर्ध्यादि से पूजा करे ।
१०३