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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

८१४ गङ्गा संहिता
महामन्त्र से सर्वेश्वर श्रीरामजी का सर्वोपचारो से पूजा करे । तथैव श्रीरामजी के वामभाग मे ‘श्री
सीतायै स्वाहा’ इस मन्त्र से श्रीसीताजी की आवाहन तथा पूजा करे । श्रीसीताजी तथा श्री
रामजी के आसन से किञ्चित् न्यून नीचे श्रीरामजी के दक्षिण भाग मे ‘ल लक्ष्मणाय नम’ इस
मन्त्र से श्रीलक्ष्मणजी का आवाहन कर पूजा करे । यहा यह खयाल मे रखना चाहिये कि यदि
आचमनी एक ही हो तो उसे शुद्ध जल से प्रक्षालन धोकरही अर्घ्यपात्र से पाद्यपात्र मे तथा
पाद्यपात्र से आचमन पात्र मे डालना चाहिये । अलग अलग पात्रो के लिये अलग अलग
आचमनी की व्यवस्था हो तो अति उत्तम ।
तत उद्धरणीं शुद्धजलपात्रजलेन संप्रक्षाल्य ततस्तया पाद्यजलपात्रात् पाद्यजलमादाय
तदेव वाक्यं समुच्चार्य पाद्यं समर्पयामीति वदन् भगवतः पादौ प्रक्षाल्येव विभाव्य
तज्जलं पतनपात्रे द्विः प्रक्षिपेत् । शुद्धजलपात्रस्थजलेनोद्धरणी प्रक्षाल्य आचमन पात्रा-
त्ताज्वलमादाय तदेव वाक्यं समुच्चार्य आचमनं तस्मै समर्पयामीति वदन् भगवतो
मुखकमलसमीपे प्रदर्श्य तज्जलं पतनपात्रे त्रिः प्रक्षिपेत् ।
पुन शुद्धजल पात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन कर के आचमनी से पाद्य जलपात्र
से पाद्यजल लेकर ॐ श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाऽप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम
इस प्रकार बोलकर या पूर्वोक्त क्रमसे श्रीरामजी श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजी को अलग अलग
उन उन मन्त्रो का उच्चारण करते हुये भगवान के श्रीचरण कमलो को प्रक्षालन की भावना करके
पाद्यं समर्पयामि बोलकर श्रीचरणो मे दृष्टि रखकर पतन पात्र मे दो वार उस जल को गिरावे ।
फिर शुद्ध जलपात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन करके आचमनी मे आचमन पात्र से जल
लेकर ॐ श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाऽप्रमेयकृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस प्रकार
बोलकर श्रीमुखारविन्द के समक्ष दृष्टि करके आचमनीय जल को भी श्रीमुखकमल के समक्ष करके
मै भगवान को आचमन करा रहा हू ऐसी भावनाकर “आचमनीयं समर्पयामि” ऐसा बोलते हुए
आचमनीय जल को पतन पात्र मे तीन वार गिरादे ।
उद्धरणी पूर्ववदेव प्रक्षाल्य शुभ्रवस्त्रेण हस्तकमलमुख कमलेसंमृज्य, शाटिकोत्तरा-
ग्रेण पदौ च प्रत्येकं संमृज्य, षोडशोपचारान् समर्पयामीति पुष्पाञ्जलि प्रदाय,
उद्धरण्या पूर्णकुम्भात्सलिलमुद्धृत्यक्षीरफलगुडपूर्णध्यात्वा तदेव वाक्यं समुच्चार्य मधु-
पर्के समर्पयामीति वदन् निवेद्य पतनपात्रे प्रक्षिप्य पूर्ववदुद्धरणी प्रक्षाल्य पूर्ववदेवाचमनं
प्रदाय शाट्या पूर्ववत्संमृज्य स्नानार्थ पादुके समर्पयामीति पुष्पाञ्जलिं भगवते प्रदाय
पूर्ववदेवचार्घ्याद्युपचारान् प्रदाय स्नानशाटी मनसाध्यात्वा तुलसीकाष्ठेन तद्वाक्यो-
च्चारणपूर्वकं दन्तधावनमाचरन्निव विभाव्य स्वहस्तं प्रक्षाल्य शुद्धजलपात्रतोयेन मन्त्रो
च्चारणपूर्वकं गण्डूषं समर्पयामीति तज्जलं षट्कृत्वः पतनपात्रे प्रक्षिप्य पुनरपि तज्ज
लेनमुखशोधनं समर्पयामीति मुखाम्बुजशोधनमाचरन्निव विभाव्य तज्जलं पतनपात्रे
प्रक्षिप्य पूर्ववत्पाद्याचमने प्रदाय ताम्बूलं च प्रदाय अभ्यङ्गोद्वर्तनचूर्णं प्रदाय अभ्य-