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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

श्रीरामार्जनपद्धति ८१५
ङ्गस्नानमाचरन्निव विभाव्यस्नानपात्रं मूर्ध्नि निधाय स्नानीयपात्रजलेन पुरुष-
सूक्तादिकमनुसंदधत् भगवन्तं स्नापयित्वा स्नानशाट्या संमृज्य सिंहासने स्थापयित्वा
तद्वाक्येनैव गन्धपुष्पधूपदीपादिकं समर्पयामीति वदन् गन्धादिकं भगवते समर्पयेत्।
अनन्तर पहले के समान ही आचमनी को शुद्धजल से प्रक्षालन कर स्वच्छ सफेद वस्त्र के
एक भाग से भगवान के हस्तकमल तथा मुखकमल पोछने की भावना करते हुये मुखारविन्द तथा
हस्तकमलो के समक्ष मे समुपस्थापित करे वस्त्र के अन्य भाग से श्रीचरणकमलो की पोछने की
भावना से श्रीचरणकमल के समक्ष समुपस्थापित करे । पुन हाथ मे तुलसी तथा पुष्पो को
लेकर-ॐ श्रीसीतालक्ष्मण सहितायाप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस मन्त्र को
वोलकर षोडशोपचारान् समर्पयामि ऐसा बोलकर षोडशोपचार की भावना से श्रीचरणकमलों मे
पुष्पाञ्जलि समर्पण कर दे । अनन्तर आचमनी से पूर्णकुम्भ से शुद्ध जल लेकर दूब फल तथा
गुड से पूर्ण है ऐसा ध्यान करके ॐ श्रीसीतालक्ष्मणसहितायाप्रमेयकृपा रत्नाकराय भगवते श्री
रामाय नम इस को बोलकर मधुपर्कं समर्पयामि ऐसा वोलकर पतन पात्र मे गिरा दे, पुन आच-
मनी को प्रक्षालन कर पूर्वके समान ही भगवान को आचमन कराकर पहले के समान ही शुभ्रवस्त्र
से हस्तकमल तथा मुखकमल और चरण कमलो को पोछने की भावन कर वस्त्र को भगवान् के
सम्मुख करे । अनन्तर हाथ मे पुष्प लेकर भगवान के स्नान के लिये पादुका का समर्पण करता
हूँ ऐसी भावना कर भगवान के श्रीचरणो मे पुष्पाञ्जलि समर्पण करे तब पूर्वके समान ही अर्घ्य
पाद्य समर्पण कर आचमन कराके स्नानार्थ शाटिका-पीताम्बर का मन से ही ध्यान कर पूर्व के
समान ही मन्त्र का उच्चारण करके दन्त धावनं समर्पयामि ऐसा बोलकर तुलसी काष्ठ से भगवान को
दन्तधावन करा रहे हो ऐसी भावना करके उस काष्ठ को पतनपात्र मे रखकर अपने हाथ को धोकर
शुद्ध जलमात्र से आचमनी से जल लेकर पूर्व के समान मन्त्र को बोलकर गण्डूषं समर्पयामि
ऐसा बोलकर जल को छ बार पतनपात्र मे गिरा दे । पुन आचमनी से शुद्ध जल लेर पूर्व
के समान ही मन्त्र को बोलकर मुखशोधनं समर्पयामि ऐसा बोलकर शुद्ध जल से मुखारविन्द प्रक्षा-
लन की भावना कर उस जल को पतनपात्र मे गिरा दे । पुन अर्घ्यपाद्य आचमन कराने के
वाद पूर्वके समान ही मन्त्र को पढकर ताम्बूलं समर्पयामि ऐसा बोलकर ताम्बूल समर्पण करने के
वाद अभ्यङ्ग स्नान के लिये तेल तथा उबटन आदि हाथ मे लेकर यह मानसिक भावना करेकि
श्रीभगवान् के दिव्य अङ्गोमे मै सुगन्धित द्रव्यादि लगा रहा हू । इसके बाद अभ्यङ्ग स्नान
सम्पादन करने की भावना से स्नान पात्र को मस्तक मे स्थापित कर उस शुद्ध जल से हरि ॐ
सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि पुरुष सूक्त के मन्त्रो को पढते हुए भगवान् को स्नान कराकर स्नान
शाटि-शुद्धशुभ्रवस्त्र से अच्छी तरह से पोछकर सिहासन मे विराजमान करा दे । अनन्तर ॐ
श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाप्रमेय कृपा रत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस मन्त्र को बोलकर
गन्धं समर्पयामि इस प्रकार बोलकर गन्ध का समर्पण करे । तथैव पुष्प समर्पयामि बोलते हुए
पुष्प तथा धूप-दीप नैवेद्य-तम्बूल-एला-लवङ्ग-सुगन्धद्रव्य आदि नामो को अलग-अलग बोलकर
यथामिलित सभी द्रव्य भगवान् को सादर समर्पण करे ।
ततः पात्रावशिष्टजलेन श्रीं श्रियै नमः लीं लीलायै नमः भूं भूम्यै नमः इति
मन्त्रोच्चारणेनार्घ्यादिकं प्रदाय ततः ॐ किरीटाय मुकुटाधिपतये नमः अ० । ॐ