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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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८०६ गङ्गा संहिता
श्रीवशिष्ठऋषिजी योगियो मे श्रेष्ठ श्रीपराशरजी वेदज्ञाता श्रीव्यासजी जितेन्द्रिय श्रीशुकदेवजी सर्वगुणो
के खजाने ऐश्वर्यशाली श्रीपुरुषोत्तमाचार्यजी बोधायन यतियो मे श्रेष्ठ श्रीगङ्गाधराचार्यजी आदि
समस्त पूर्वाचार्यों के साथ अपने गुरुदेव वरदाता श्रीमान् जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी का मै
आनन्दभाष्यकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य आश्रय लेता हूँ अर्थात् समस्त पूर्वाचार्यों को सादर
दण्डवत् प्रणाम करता हूँ ।
श्लोक के आदि शब्द से श्रीसदानन्दाचार्यजी श्रीरामेश्वरानन्दाचार्यजी श्रीद्वारानन्दाचार्यजी
श्रीदेवानन्दाचार्यजी श्रीश्यामानन्दाचार्यजी श्रीश्रुतानन्दाचार्यजी श्रीचिदानन्दाचार्यजी श्रीपूर्णानन्दाचार्यजी
श्रीश्रियानन्दाचार्यजी तथा श्रीहर्यानन्दाचार्यजी का ग्रहण होता है । क्योकि श्रीआचार्यजी के
परम्परा मे श्रीरामजी से लेकर उनके गुरुदेव जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी तक २१ आचार्य
है। अत आचार्य प्रवर आनन्दभाष्यकार श्रीरामानन्दाचार्यजी श्रीसम्प्रदाय (श्रीरामानन्द सम्प्रदाय)
के २२वे आचार्य है। इत्यादि श्रीगुरु परम्परादिक का अनुसन्धान करते हुये समाराधनीय भगवान
को सादर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर के पूजा के पात्रो को मलकर शुद्ध जल से धोकर स्वच्छ
करे अनन्तर समाराधनीय देव के दाहिने भाग मे बैठकर पहले दिन के चढे पुष्प चन्दन गन्ध
तुलसीदल माला आदि को वहाँ से हटाकर पीठ वाजोट-डाली आदि । रखकर एक तरफ कर दे।
अनन्तर अग्नि कोण से प्रारम्भ कर के प्रदक्षिणा क्रम से अर्घ्य पात्र पाद्यपात्र आचमनीयपात्र
स्नानीयपात्रो का स्थापन कर उनके मध्य मे शुद्ध जलपात्र का स्थापन करे ।
तत्रार्घ्यपात्रेसिद्धार्थक्षतकुशाग्रतिलयवगन्धफलपुष्प सहितं जलं निक्षिपेत् १ ।
दूर्वाविष्णुकर्णीपद्मश्यामाकसहित जलं पाद्यपात्रे निक्षिपेत् २ । एलालवङ्गकङ्कोलजा-
तिसहितं जलमाचमनपात्रे निक्षिपेत् ३ । कोष्ठमाजिष्ठहरिद्रामुस्ताशैलेयचम्पकवचाकर्पूर-
लामज्जकसहितं जलं स्नानपात्रेनिक्षिपेत् ४
अनन्तर अर्घ्यपात्र मे सरसो अक्षत कुशाग्र तिल यव गन्ध फल फूल सहित शुद्ध छना हुआ
जल डाले । पाद्यपात्र मे दुर्वा विष्णुकर्णी कमल तथा श्यामाक-सांवा सहित जल डाले । आच-
मनीय पात्र म इलायची लवंग, ककोल तथा जायफल सहित जल डाले । स्नानीयपात्र मे कूठ
मजीठ हल्दी मोथा छडीला चम्पा वच कपूर तथा लामज्जक-खस सहित जल डाले ।
तदेतदभावेतु तद्वाक्योच्चारणपूर्वकं तुलसीदलमेव तत्तत्तोयपात्रे निक्षिपेत् । श्री
मन्त्रराजेन प्रत्येकं तत्तत्पात्रं संमन्त्र्य सुरभिमुद्रां च प्रदर्श्य वामपार्श्वे पूर्णकुम्भं
निधाय अन्यानि पूजाद्रव्याणि दक्षिणपार्श्वे च निधाय मनसा स्वाचार्यमर्घ्यादिभिः
सम्पूज्य तद्धस्तेनैवाराधनं स्वीकार्यमिति भगवतेविज्ञाप्य प्राणायामत्रयं च कृत्वा भग-
वदुत्थापनाय भगवन्तं प्रार्थयेत् ।
पूर्वोक्त उन सभी वस्तुओ के अभावमे उन उन वस्तुओका नाम लेकर अर्घ्यादि पात्रों मे
केवल तुलसी सहित जलडाले । इसके बाद अर्घ्यादि सभी पात्रो को श्रीतारक मन्त्र से संमन्त्रित
करके सुरभिमुद्रा दिखाकर अपनी वाम भाग मे शुद्ध जल से भरा पात्र तथा अन्य पूजन की
समस्त सामग्री को अपनी दाहिने भाग मे रखकर अपने आचार्यजी की अर्ध्यादि से मानसिक