रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 26 में से
संदर्भ में पढ़ें८२० गङ्गा संहिता
प्रदान करनेवाली हे जनकनन्दिनी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी ? सबो को अभय प्रदान करनेवाली आपको
मै प्रतिदिन सादर चिन्तन यानी स्मरण के साथ नमन करता हूँ॥३॥
श्रीरामकैङ्कर्यपरायणम्मुहुर्मुहुश्च सीतेशनिदेशकारिणम् ।
तमेकवीरंशरदिन्दुकीर्तिं नमाम्यहं लक्ष्मणमप्रमेयम् ॥४॥
सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के कैंकर्य-सेवा मे सर्वदा तत्पर तथा बारबार किसी भी प्रकार के
सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञाओ को परिपालन करनेवाले शरदकालिन
चन्द्रमा के समान स्वच्छ कीर्तिवाले अनन्यवीर-अतिपराक्रमी शूर वीर बल तथा शौर्यादि मे अन्य
उपमा रहीत उन प्रसिद्ध वीर श्रीलक्ष्मणजी को मै नमस्कार करता हू ॥४॥
मणीन्दुगर्भं मुकुटाधिनाथं श्रीमत्किरीटं मणिकुण्डले च ।
श्रीकौस्तुभादीनिचदिव्यभूषणान्येतानिनित्यंप्रणमामिविष्णोः ।५।
मणि रूपी चन्द्रमा है गर्भ-वीच भाग मे जिसके ऐसे मुकुटो मे श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के
मुकुट संपूर्ण शोभा से युक्त श्री रामजी का किरीट तथा मणियो से शोभित दिव्य कुण्डल और
दिव्य श्रीकौस्तुभमणि आदि समस्त दिव्य आभूषणो को सर्वदा प्रणाम करता हूँ॥५॥
महाबलं वायुसुतं महामति प्रपन्नचामीकरचारुलोचनम् ।
श्रीरामपादाम्बुजनिविष्टमानसं द्विद्वन्तकं श्रीहनुमन्तमीडे ॥६॥
सन्तप्त अति तपाये हुये सोने के समान अति सुन्दर नेत्र वाले अति बलशाली और महा-
बुद्धिशाली तथा श्रीरामचन्द्रजी के चरणरूपी कमलो मे सर्वदा सन्निवेषित मनवाले और उपासक के
शत्रुओ का नाश करनेवाले वायुदेव के पुत्र सर्वैश्वर्य सम्पन्न श्री हनुमानजी की प्रार्थना यानी स्तुति
करता हू ॥६॥
प्रत्यूहव्यूहभङ्गं विदधदुरुबलश्शक्तिमान् सर्वकारी
भूरिश्रेयः प्रतापोमुनिवरनिकरैः स्तूयमानो विमानः ।
रक्षो दैत्यादिनाशी क्षुभितजलनिधिलोकजिल्लोकमान्यो
धन्योनोमङ्गलौघंसपदिसुकुरुताद्रामशस्त्रास्त्रसङ्घः ॥७॥
अति वेगवाला तथा महा सामर्थ्य से युक्त अघटित घटना आदि सब कुछ करने मे सर्वदा
समर्थ और अत्यन्त श्रेष्ठ तथा प्रतापी तथैव सर्वदा अभिमान से रहित और राक्षस तथा दैत्यादि
समूहो का नाश करनेवालो सर्वदा मननशील मुनिओ से अहर्निश संस्तुत, तथा अति अगाध समुद्र
को अपने अलौकिक तेजसे क्षुभित करनेवाला और सर्वलोको को जितने वाला एवं सर्वलोक
समान्य तथा अतिधन्य यानी सर्वविजयादि ऐश्वर्य सम्पन्न सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी का अस्त्र तथा
शस्त्र (जिसको मन्त्र के बिना चलाया जाता है उसे शस्त्र कहा जाता है, जैसे बाण खड्ग आदि ।
मन्त्र प्रयोग पूर्वक जिसका प्रयोग किया जाता है उसे अस्त्र कहते है, जैसे ब्रह्मास्त्र आग्नेयास्त्र
आदि) समूह है वह अति शीघ्र ही मेरे विघ्न समूहों का विनाश करता हुआ समस्त मंगल
सप्रदान करे ॥७॥