रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१० गंगा सहिता
है । सुग्रीव नल नील गवय आदि प्रवान प्रधान लोग द्वारपाल के रूप मे स्थिर है । ऐसे श्रीराम
सेवापरायण श्रीरामभक्त तथा सर्वेश्वर श्रीरामजी के शरण मे मै हूँ यानी सपरिकर श्रीरामजी को
सादर प्रणाम करता हूँ ॥१॥ सम्पूर्ण कलुष कल्मष पाप के अपहरण करनेवाले वाम पाद् को
प्रसार्य-लम्बाकर लटकाकर तथैव सर्व पापताप संहारक दक्षिण पाद को मूढ़कर जानु के ऊपर रखकर
विराजमान तथा दिव्य दोनो कर कमलो से शत्रुकुल का दमन यानी नाश करनेवाले दिव्य धनुष
और बाण वारण किये हुए वे सर्वलोक प्रसिद्ध सर्वेश्वर श्रीरामजी जोकि कमल के बीच के भाग
के समान अरुण यानी लाल आख वाले प्रतिपक्षिवीरो को भय देने वाले यानी दमन करने वाले
दिव्य महिषी श्रीसीताजी तथा अनेक दिव्य आभूषणो से सुशोभित दिव्यधाम श्रीसाकेत लोक के
स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सब संसार को कल्याण प्रदान करे ॥२॥ इत्यादि पद्यों से ऊपर वर्णित
रूप से ध्यान वरकर सर्वेश्वरी श्रीसीताजी श्रीलक्ष्मणजी के सहित सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के चरणार
विन्दो मे हाथ मे ली हुई तुलसी आसन के रूप मे समर्पण करे ।
अथैवमासनं कल्पयित्वा ओमाधारशक्त्यै नमः इति आधार शक्त्यै अर्ध्या-
दीनि समर्पयामि । ओ प्रकृत्यै नमः इति प्रकृत्यै अर्ध्यादीनिसमर्पयामि । ओमखिलज-
गदाधाराय कूर्मरुपिणे नारायणाय नमः इति तस्मै अ०। ओंभगवतेऽनन्ताय नागराजाय
नमः इति तस्मै अ० । ॐ भूम्यै नमः इति तस्यै अ० । ॐ श्रीमाकेताय दिव्य नगराय
नमः इति तस्मै अ० । ॐ पुष्पकाय दिव्यविमानाय नमः इति तस्मै अ० । ॐ श्री
साकेतायदिव्यजनपदाय नमः अ० । ॐ आनन्दयायमदिव्यरत्नमण्डपाय नमः अ० ।
ॐ आस्तरणभूताय अनन्ताय नमः अ० ।
पूर्वोक्त क्रम से आसन की कल्पना करके निम्नप्रकार से आधार शक्ति आदि की पूजा करे-
ॐ आधार शक्त्यै नम अर्ध्या दीनि समर्पयामि इस मन्त्र को बोलकर आधार शक्ति की पाद्य
अर्घ्य आचमनीय आदि षोडशोपचार या यथा मिलितोपचार यांनी षोलह पदार्थों से या जितने
पदार्थ की शक्यता हो उतने ही पूजा की सामग्री से पूजा करे । अर्ध्यादि मे आदि शब्द से अन्य
पूजा द्रव्यो का ग्रहण करना चाहिये जो देश काल तथा शक्ति के अनुसार जुटाई गई हो।
ॐ प्रकृत्यै नम इति प्रकृत्यै अर्ध्यादीनि समर्पयादि ऐसा बोलकर यथोपचार सामग्री से प्रकृति की
पूजा करे । तथैव ॐ अखिल जगदाधाराय कूर्मरूपिणे नारायणाय नम ऐसा बोलकर निखिल
ब्रह्माण्ड के आधार भूत कूर्मजी की पूजा करे। ॐ भगवते अनन्ताय नारायणाय नम इस प्रकार
बोलकर सर्वोपचार से नागराज की पूजा करे । ॐ भूम्यै नम ऐसा बोलकर सर्वोपचारौद्रव्य से
भूमिकी पूजा करे । ॐ श्री साकेताय दिव्य नगराय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से
सर्वापेक्षयोपर रूप से स्थित दिव्य धाम श्रीसाकेत की पूजा करे । ॐ पुष्पकाय दिव्यविमानाय
नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यो से दिव्य पुष्पक विमान की पूजा करे । ॐ श्रीसाकेताय
दिव्य जनपदाय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यो से श्रीसाकेत नामक दिव्यजनपद की पूजा
करे । ॐ आनन्दमयाय दिव्यरत्नमण्डपाय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से आनन्दस्वरूप
दिव्यरत्नमण्डप की पूजा करे । ॐ आस्तरणभूताय अनन्ताय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यों
से आस्तर स्वरूप यानी ऊपर का बिछौनाके रूपमे अनन्त की पूजा करे । इसके बाद-