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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

( ७६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

नहीं है जननीको वयजनाइ या जनायो कि तुमने ऐसे स्त्रीवधादि पराक्रम
करचौहैं अथवा गुरुदोषीजनायो ॥ ३६ ॥
मू०-परशुराम-विजयछन्द ॥ लक्ष्मणकेपुरिखान कियो
पुरुषारथसोनकह्योपरई । वेषबनाइकियोबनितानकोदेखत
केशव ह्योहरई । क्रूरकुठारनिहारितजैफलताकीयहैजो
हियोजरई । आजुतेकवलतोकोमहाधिकक्षत्रिनपैजोदयाक-
र्है ॥ ३७ ॥ गीतिकाछन्द ॥ तबएकविंशतिबेरमैं बिनक्षत्रकी
पृथिवीरची। बहुकुंडशोणित सोंभरेपितृतर्पणादिकियासची ॥
उबरेजेक्षत्रियक्षुद्रभूतलशोधिशोधिसंहारिहौं । अबबालवृद्धन
ज्वानछाँडहुँधर्मनिर्देय पारि हौं ॥ ३८ ॥
टी०-सरस्वतीउक्तार्थः लक्ष्मण के पुरिखान बडेन जो पुरुषारथ कियो है सो
कह्यो नहीं परत कहा पुरुषारथ कर्यो जिन बनितन को बेष बनायो अर्थ बनिता
रच्यो गौतम की स्त्रीको पाथर सों स्त्री बनायो जाको देखत हियो हरिजात है
अर्थ अति सुंदरी बनायो तौ या जनायो सृष्टि करिवे को समर्थ हैं याही विधि
दशरथ भगीरथादि के कृत गंगा ल्याइबो आदि जानो सो हेक्रूरकुठार ! तिनको
निहारि कै तजै कहै छोडै अर्थ इनके समीपेते अन्यत्र जाइ तौ नाको इनके
वियोग को यहै फल है जो हृदयजरई कहै जरतहै अर्थ अति सुंदररूप जे येहैं
तिनक वियोग सों हृदयजरत है इनके योगको यहै फल है तासों जो तेरो
इनको वियोग ह्वै है ता तैसे हियोजरिहै सोआजकेवल कहै एक तोको महा
अधिक कहै महाउत्तम है जो क्षत्रिन के ऊपर दया करु आजुतक क्षत्रिनको
वध करचो ता क्षत्र वर्णनमें ये ऐसे रूप गुण बलादि पूरित भये तासों अब
क्षत्र वर्णकी रक्षा करिवो तोहिं उचितहै तिनके निकट रहि सहायता करि क्षत्री-
वर्ण तोंकों रक्षणीय है ॥ ३७ ॥ सची कहै करी ॥ ३८ ॥
मू०-राम-दोहा ॥ भृगुकुलकमलदिनेशसुनि, ज्योति
सकलसंसार ॥ क्योंचलिहैइनशिशुनपै, डारतहौयशभार
॥ ३९ ॥ परशुराम-सोरठा ॥ रामसुबन्धुसँभारि, छोडत
हौंशरप्राणहर ॥ देहुहथ्यारनडारि, हाथसमेतिनबेगिदै ॥४०॥

सप्तमप्रकाशः ७. ( ७७ )
राम-पद्धटिकाछंद ॥ सुनिसकललोकगुरुजामदग्नि ।
तपविशिषअशेषनकीजोअग्नि ॥ सबविशिषछाँड़िसहि-
हौंअखंड । हरधनुषकरचोजिनखंडखंड ॥ ४१ ॥ परशुराम-
सवैया ॥ बाणहमारेनिकेतनत्राणविचारिबिचारिविरंचिकरेंहैं।
गोकुलब्राह्मणनारिनपुंसकजेजगदीनसुभावभरेंहैं ॥ रामकहा
करिहौतिनकोतुमबालकदेवअदेवधरेंहैं । गाधिकेनंदति-
हारेगुरूजिनतेऋषिबेषकियेउबरेहैं ॥ ४२ ॥
टी०-सकलसंसारको जीतिकै जो यश एकत्र कर्यो है सो इनसे लरिकै
हारिकै ता यशको बोझ इनबालनपै डारत हौं इनमें कैसे चलिहै इनसे लरिहौं
तौ हारिजैहौं इति भावार्थः ॥ ॥ ३९ ॥ रामचंद्र के सतर्क वचन सुनि परशु-
राम कोप करि बोले सो अर्थ खुलो है सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे हर महादेव !
इनके शर करिकै मैं प्राण छोड़तहौं अर्थ ये बाण सों मेरे प्राण हर्यो चाहतहैं
तासों बन्धुसहित जो कोपयुत रामचन्द्र हैं तिनको तुम सँभारि कहे सम्हारौ ये
अब तुम्हारेई सँभारन लायक हैं जासों ये हाथन मौ समेतन कहे सबन हथ्या-
रन को डारि देहिं जब तक ये हाथ में हथ्यारधरे रहिहैं तबतक हमारे भय
बन्यो है तासों तुम इनको कोप शांत करि हथ्यार उतरावो आगे महादेव
आयऊबे भये हैं ॥ ४० ॥ तपके जे अशेष विशिष बाण हैं विशिष पदतैं
शाप जानौ तिनकी अग्नि औ और सब बाणनको छाँड़ौ ते अखंड कहे
निर्विघ्न सहिहौं अर्थ हमारे ऊपर शाप औ बाण दुवो चलाओ हम सहि हैं
॥ ४१ ॥ सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे राम ! तिन बाणन को तुम कहा करिहौ अर्थ
कहा कियो चाहत हौ अर्थ इनको प्रभाव लोप कियो चाहतहौ तुम कैसेहौ
बालकताहीं में देव औ अदेव तुम को डरें हैं ॥ ४२ ॥
मू०-श्रीराम-षट्पद ॥ भगनभयोहरधनुषशालततुमको
अबशालै । वृथाहोइविधिसृष्टिईशआसनतेचालै ॥ सकल
लोकसंहरहुशेषशिरतेधरडारैं । सप्तसिंधुमिलिजाहिहोहिंस-
बहीनभभारैं ॥ अतिअमलज्योतिनारायणीकहिंकेशवबुडि

( ७८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

जाहिबरु । भृगुनंदसँभारुकुठारमैं कियोशरासनयुक्तशरु ॥
॥ ४३ ॥ स्वागताछंद ॥ रामरामजबकोपकरचोजू ॥ लोक
लोकभयेभूरिभरचोजू ॥ वामदेवतबआपुनआये । रामदेव
दोऊसमुझाये ॥ ४४ ॥ दोहा ॥ महादेवकोदेखिकै, दोऊरा-
मविशेष ॥ कीन्होंपरमप्रणामउन, आशिषदियोअशेष ॥
॥ ४५ ॥ महादेव-चतुष्पदी ॥ भृगुनंदनसुनियेमनमहँगुनि-
येरघुनंदन निर्दोषी। निजयेअविकारीसबसुखकारीसबहीविधि
संतोषी ॥ एकैतुमदोऊऔरनकोऊएकैनामकहायो । आयु-
र्बलखूट्योधनुषजोटूट्योमैंनमनसुखपायो ॥ ४६ ॥ महा-
देव-पद्धटिका छंद ॥ तुमअमलअनंतअनादिदेव । नहिंवे-
दवखानतसकलभेव ॥ सबकोसमाननहिंबैरनेह । सबभक्त
नकारनधरतदेह ॥ ४७ ॥
टी०-जब गुरुजे विश्वामित्रहें तिनकी निंदा करचो तब रामचन्द्र कोप करिकै
बोले ईश महादेव आसन योगासनते चालै कहे चले सबही कहे सर्वत्र अर्थ
चौदहों लोकमें ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ निर्दोषी हैं अर्थ धनुष तौरनेमें इनको
कछू दोष नहींहै औ अविकारी कहे माया कृत विकार रहित हैं यासों
या जनायो कछू द्रोहादिसों धनुष नहीं तोरचो औ संतोषी कहि या जनायो
कि इनके कछू इच्छा नहीं है दुवो गुणनसों या जनायो ईश्वर हैं ॥ ४६ ॥ द्वै
छंदको अन्वय एक है महादेव परशुरामसों कहतहें कि तुम अमल कहे माया
विकार रहित औ अनंत जाको अन्त नहीं है कि ये तो है औ अनादि कहे जाकी
आदि नहीं कोऊ जानन कि कबमों है ऐसे देव हौ अर्थ परब्रह्म हौ औ तुम्हारो
सब भेद कहे भेद वेद नहीं बखानि सकत अर्थ वेदहू नहीं जाको प्रमाण यावत्
राव प्राणिनको समानहौ काहू को स्वाभाविक वैर औ स्नेह तुम्हारे नहींहै केवल
प्रह्लादादि जे भक्त हैं तिनके हेतु देह धरि दुःख दूरि करत हौ यासों भक्तवत्स-
लता जनायो आपनपौ पहिंचानि कै कि हम औ ये एकही हैं यह जानिकै
इनके हाथ मों होनहार जो रावणादि वध आगिलो काज है ताको करौ तब महा

सप्तमप्रकाशः ७. ( ७९ )

देवके वचनसों जानिकहे ये नारायण हैं यह जानिकै नारायणको धनुष परशुराम
पै रह्यो सो रामचंद्रको दियो ॥ ४७ ॥
मूल-अबआपनपौपहिंचानिविप्र । सबकरहुआगिलो
काजक्षिप्र ॥ तवनारायणकोधनुषजानि ॥ भृगुनाथदियोर-
घुनाथपानि ॥ ४८ ॥ मोटनकछंद ॥ नारायणकोधनुबाण
लियो । ऐंच्योहँसिदेवनमोदकियो ॥ रघुनाथकहेउअबकाहि
हनो । त्रैलोक्यकँप्योभयमानिघनो ॥ ४९ ॥ दिग्देवदहेव
हुबातबहे । भूकम्पभयेगिरिराजढहे ॥ आकाशविमानअ-
मानछये । हाहासबहीँयहशब्दरये ॥ ५० ॥ परशुराम-श-
शिबदनाछंद ॥ जगगुरुजान्यो । त्रिभुवनमान्यो ॥ ममगति
मारौ । हृदयबिचारौ ॥ ५१ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ द्वै छंदको अन्वय एक है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ त्रिभुवनमें मान्यो
अर्थ जाको तीनों भुवनमानतहैं पूजतहैं औ जगतके गुरु जो ईश्वर हैं सो हम
तुमको जान्यो अर्थ तुम ईश्वर हौ ताते और सब को निर्दोष हमको सदोष विचारि
हमारी सुर पुरकी गति मारो ॥ ५१ ॥
मूल-दोहा ॥ विषयीकीज्योंपुष्पशर, गतिकोंहनतअ-
नंग । रामदेवत्योंहींकियो, परशुरामगतिभंग ॥ ५२ ॥ च-
तुष्पदीछंद ॥ सुरपुरगतिभानी शासनमानी भृगुपतिको
सुखभारो । आशिपरसभीने सबसुखदीने अबदशकंठहिमा-
रो ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ सोवतसीतानाथके, भृगुमुनिदीन्हीं
लात । भृगुकुलपतिकीगतहरी, मनोसुमिरिवहबात ॥५४॥
मधुभारछन्द॥दशरथजगाइ । संभ्रमभगाइ । चलिरामराइ। दुं-
दुभिबजाइ ॥ ५५ ॥ सवैया ॥ नाडकातारिसुबाहुसँहारिकै
गौतमनारिकेपातकटारे । चापहत्योहरकोहँसिकै सबदेवअदेव

(८०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
हुतेसबहोरेसीतहिब्याहिअभीतचल्योगिरिगर्वचढेभृगुनंदउतारे।
श्रीगरुडध्वजकोधनुलेरघुनन्दनऔधपुरिपगुधारे ॥ ५६॥
इति श्रीमत्सकलोलोचनचकोरचिन्तामणि-श्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिंद्रजिद्विरचितायां परशुरामसंवादवर्णनं नाम सप्तमः प्रकाशः ॥ ७॥
टीका-॥ ५२ ॥ सब जे देवऋषि आदिहैं तिनका सुख दीन अबदशकंठको
मारौ ऐसी जो परशुराम कृत आशिष है ताके रसमें भीने ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ पर-
शुरामके भयसों मूर्च्छाको प्राप्त जे दशरथ हैं तिनको जगाइके औ परशुराम
हारिकै गये यह कहि संभ्रम भगाइके ॥ ५५ ॥ गर्वके गिरिपरचढे रहे तासों उ-
तारचो अथवा गर्वका गिरि सोई परशुराम पर चडो रहै सो उतारो ॥ ५६ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकाया सप्तमः प्रकाशः ॥ ७॥
मू०-दोहा ॥ यहप्रकाशअष्टमकथा, अवधप्रवेशबखा-
नि । सीतावर्ण्योदशरथहि, औरबंधुजनमानि ॥ १ ॥ सुमु-
खीछंद् ॥ सबनगरीबहुशोभरये । जहँतहँमंगलचारठये ॥
बरणतहैंकविराजबने । तनमनवृद्धिविवेकसने ॥ २ ॥ मोट-
नकछंद् ॥ ऊंचीबहुवर्णपताकलसैं । मानोपुरदीपतिसीदर
सैं॥ देवीगणव्योमविमानलसैं । शोभैतिनकेमुखअंचलसैं ॥
॥ ३॥ दोहा ॥ कलभनलीनेकोटपर, खेलतशिशुचहुँवोर ।
अमलकमलऊपरमनो, चंचरीकचितचोर ॥ ४॥ कलहंस
छंद् ॥ पुरआठआठदरबारविराजैं । युतआठआठसैनापति
राजैं ॥ रहैंचारिचारिघटिकापरिमानै । घरजाहिँऔरजबआ-
वतजानै ॥ ५ ॥
टी०-मंगलाचार बंदनवारादि ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ कलभ छोटे हाथी कमल
सदृश कह्यो तासों पद्माख्य कोट जानो ताको भेद आगे कहिहैं ॥ ४ ॥ पुर

कहे अग्रभाग जे पुरीके आठहैं ॥ तिनमें आठ दरवार कहे सभा विराजत हैं अर्थ
आठ प्रकारके कोट होतहैं यथा नरपती । “अतिदुर्गं कालवर्मं चक्रावर्त्तं च
डिंबुरम् । तटावर्त्तंच पद्माख्यं यक्षभेदं च सार्वगम् । कोटचक्रं प्रवक्ष्यामि विशेषादृष्टधा-
च तत्” ॥ सो जैसे एक ओर पद्माख्य कोटदेख्यो तैसे पुरीके आठहू ओर शहर
पनाहमें आठहू प्रकार के कोटबनेहैं तिनमें राजाके आठ मंत्रीहैं। यथा वाल्मीकीये-
“धृष्टिर्जयंतो विजयः सिद्धार्थोत्यर्थसाधकः । अशोको मंत्रपालश्च सुमंत्रश्चाष्टमो
महान्” । ते मंत्री तिन कोटनमें आठहू दिशानके प्रजान संग सभा करतहैं अथ तिनमें
बैठि आठहू दिशान को मामलो करतहैं अथवा दरबार कहे मुख्यद्वार पुरद्वार इति
अर्थ-पुरीके शहरपनाह में आठहू दिशान में आठद्वार बनेहैं यथा कविप्रियायां ।
“नींके के केवार देहों द्वारद्वार दरबार केशवदास आम खास शूर जोन
छावैगो” ॥ ५ ॥
मू०-

( ८२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मृल्लता आदि औ विचार औ वाहन गज अश्वरथादि वसन श्याम श्वेत पीतादि
एकहि बार कहं एकहि तरह विलोकियत हैं जा वेषसो जा पहरकी चौकी जैसे
सेनापतिकीहैं तसी आठहू ओर की है इति भावार्थः ॥ अथवा जा पुरीमें आठौं दिशिके
शील आदि एकही बार एकही समय विलोकियतहैं यासों या जनायो कि आठौं
दिशिके राजा जा पुरमें हाजिर रहत हैं औ आठौं दिशिके प्राणी जापुर में
बसत हैं वीथी गली ॥ ७ ॥ ८ ॥ प्रतिमंदिर कहे अपने अपने मंदिरन पर
वगत को कौतुक देखिवेकों सुंदरी कहे स्त्री चढींहैं मोहनारि सदृश कहि अति
सुंदर मंदिर जनायो जब देखती हैं तब वाणसम जे नयन कोर हैं तिनसों
मानो तनको देखती हैं कहे वेधती हैं ॥ ९ ॥ सिद्धदेव योनि विशेष हैं
पद्मिनी कमलिनी रूपसौंदर्य कैलास औ पद्म औ रूप सम गेह है सिद्धतनया
कमलिनी दीपत्ति सम स्त्री हैं ॥ १० ॥
मूल-कीरतिश्रीजयसंयुतसोहति । श्रीपतिमंदिरकोमन
मोहति ॥ ऊपरमेरुमनोमनरोचन । स्वर्णलताजनरोचतिलो-
चन ॥ ११ ॥ विशेषकछंद ॥ एकलियेकरदर्पणचंदनचित्र
करे । मोहतितैमनमानहुँचांदनिचंदधरे ॥ नैनविशालनिअं-
बरलालनिज्योतिजगी ॥ मानहुँरागनिरजतिहैंअनुरागरँगी
॥ १२ ॥ नीलनिचोलनकोपहिरेयकचित्तहरे । मेघनकीय-
तिमानहुँदामिनिदेहघरे ॥ एकनकेतनसूक्ष्मसारिजरायजरी ।
सूरकरावलीसीजनुपद्मिनिदेहधरी ॥ १३ ॥ तोटकछंद ॥
बरषैकुसुमावलिएकघनी । शुभशोभनकामतासिबनी ॥
बरषैफलफूलनलायककी । जनुहैंतरुणीरतिनायककी ॥ १४ ॥
टी०-कि जय संयुत कीर्ति है जयसम गेहहै कीर्ति सम स्त्री है कि पतिके
विष्णु के मंदिर में श्रीलक्ष्मी है कि मन रोचन कहे सुंदर अनेक मेरु सुमेरु पर
स्वर्णलता हैं रोचति कहे नीकी लागति हैं लोचननि की ॥ ११ ॥ मानो चन्द्र-
माके मन को चांदनी मोहती है चंद्र सरिस दर्पणहै चांदनी सरिस चंदन चर्चित
स्त्रीहैं नयन हैं विशाल जिनके ऐसी जे स्त्रीहैं तिनके अंबर बस्त्र लालनकी शोभा

-मनो" -> "शोभमनो" (शोभ मनो)!
Wait, why did I think it was "भनो"? Because of the loop? No, look at the first letter of line 8:
It is 'म'! Just like 'म' in "मनमत्थ"!
Wait, let's look at the letter at the end of line 7 again:
Is it 'भ'?
Yes, 'श' + 'ो' + 'भ'!
So line 7 ends with: "गिरिअंजनऊपरशोभ-"
Line 8 begins with: "मनो ॥" (or "भनो"? Wait, look at 'म' in "मनमत्थ" vs the letter in "...नो"):
The letter has: top bar, left vertical going down with loop, horizontal bar, right vertical. That is unequivocally 'म'!
Wait, is there a vowel? No, just 'म' + 'न' + 'ो' = "मनो ॥"
Wait, why does line 7 end with 'शोभ-'?
Because the typesetter ran out of space at the end of line 7 and hyphenated "शोभ-" and "मनो"!
Wait, "शोभमनो" = "शोभ मनो"!
Yes! Totak meter requires:
गि रि अं (I I S)
ज न ऊ (I I S)
प र शो (I I S)
भ म नो (I I S)
Exactly 12 syllables (Totak

ग्मकहें प्रेम में भीजे जे सब पुरवारीहिँ तिन करिकै भूषण पट दीजै कहै दीजि-
यत हैं अर्थ प्रेमसों युक्त सब भूषण पटदान करत हैं ॥ २० ॥
मू०-सोरठा ॥ रघुपतिपूरणचंद, देखिदेखिसबसुखमढैं ॥
दिनदूनेआनंद, तादिनितेतेहिपुरबढैं ॥ २१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्र-
जिद्विरचितायांरामस्यायोध्यानगरप्रवेशोनामाष्टमः प्रकाशः ॥ ८ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायामष्टम प्रकाशः ॥ ८ ॥
मू०-दोहा ॥ यहप्रकाशनवमेंकथा, रामगमनबनजानि ॥
जनकनंदिनीको सुकृत, वर्णन रूप बखानि ॥ १॥ रामचंद्र
लक्ष्मणसहित, घरराखे दशरथ ॥ बिदाकियोननसारको, सँग
शत्रुघ्नभरत्थ ॥ २ ॥ तोटकछंद ॥ दशरत्थमहामनमोदरये ।
तिनबोलिवशिष्ठहिंमंत्रलये ॥ दिनएककहोशुभशोभरयो ।
हमचाहत रामहिंराजदयो ॥ ३ ॥ यहबातभरत्थकीमातसुनी।
पठऊं बनरामहिंबुद्धिगुनी ॥ तेहिमंदिरमेंनृपसोंबिनयो । वरदे
हुहतोहमकोजोदयो ॥ ४ ॥ नृपबातकहीँसिहेरिहियो । बर
मांगिसुलोचनिमैंजोदियो ॥ कैकेयी ॥ नृपतासुविशोभिभरत्थ
लहैं । बरषैबनचौदहरामरहैं ॥ ५ ॥
टीका-॥ १ ॥ २ ॥ शोभरयो राजाको विशेषणहै ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ यहबातलगीउरवज्रतूल । हियफा-
ट्योज्योंजीरनदुकूल ॥ उठिचलेविपिनकहँसुनतराम । तजि
तातमाततियबंधुधाम ॥ ६ ॥ हरिलीलाछंद ॥ छूटेसबै
सबनिकेसुखक्षुत्पिपास । विद्वद्विनोदगुणगीतविधानवास ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:

नवमप्रकाशः ९. (८५)
ब्रह्मादिअंत्यजनअंतअनंतलोग । भूलेअशेषसविशेषनिराग
भोग ॥७॥ मौक्तिकदामछंद ॥ गयेतहँरामजहाँनिजमात ।
कहीयहबातकहाँवनजात। कह्योजनजोदुखपावहुमाइ । सोदु-
हुअशीषमिलौफिरिआइ ॥ ८॥ कौशल्या ॥ रहौचुपह्वैसुत
क्योंवनजाहु । नदेखिसकैतिनकेउरदाहु ॥ लगीअत्रवापतु-
म्हारेहिवाइ । करैउलटीविधिक्योंकहिजाइ ॥९॥ राम-ब्रह्मरूप
कछंद ॥ अन्नदेइसीखदेइराखिलेइप्राणजात । राजवापमोल
लैकरैजोदीहपोपिगात ॥ दासहोइपुत्रहोइशिष्यहोइकोइमाइ ।
शासना न मानई तौ कोटिजन्मनर्कजाइ ॥ १० ॥
दी०-जीर्णकहे पुगनीनजिचलै पढ़ते इहां मानसिक त्याग जानो ॥ ६ ॥
श्रुतकहे श्रुया विद्याद्विनोद कहे शास्त्रार्थ गुणशास्त्र विद्यादि गीतविधान गाइबो
वासघर अथवा वस्त्रब्रह्मादिआदि देवौ अंत्यज जे चांडालहैं तिन पर्यन्त जे अनंत
लोगहैं तिनको अशेषराग प्रेम औ भोग नविशेषण भूले अर्थ अत्यन्त भूले
यद्यपि रामवन गमन सों ब्रह्मादि देवन को रावण वधादि हित कार्य है है परंतु
अनवसर विलोकि तिनहूॅंको दुःख भयो ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ अन्नदाता औ शिख-
दाता औ कहूं प्राण जान होइ ता भय सों रक्षक औ राजा औ बाप औ जो
मोल लैके पोषिकै गाकत बडे करै अर्थ जो मोलले पालन करूँ ई जे छल हैं तिन-
के दान औ पुत्र औ शिष्य औ कोहू कहे औरहूं कोऊ होइ अर्थ अन्नग्राहक प्राण
रक्षित औ प्रजा जे छल हैं ते आज्ञा को नमानैं तो कोटि जन्म तक नरक जाइँ या
जनायो कि एक तौ राजा हैं दूसरे पिताहैं तासों विशेषि कै आज्ञामानि हमको
वन जैबो उचित है ॥ १० ॥
सूल-कौशल्या-हरनीछंद ॥ मोहिंचलोवनसंगलिये । पुत्र
तुम्हेंहमदेखिजियें ॥ अवधपुर्रीमहँगाजपरै । कैअबराजभर-
त्थकरै ॥ ११ ॥ राम-तोमरछंद ॥ तुमक्योंचलोवनआजु ।
जिनशीशगजतराजु ॥ जियजानियेपतिदेव । करिसर्वभाँति

( ८६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।

नसेव ॥ १२ ॥ पतिदेइजोअतिदुःख। मनमानिलैजैसुःख ॥
सबजक्तजानिअमित्र । पतिजानिकेवलमित्र ॥ १३ ॥ अमृ-
तगतिछंद ॥ नितपतिपंथहिचलिये । दुखसुखकोदलुदलिये
तनमनसेवहुपतिको । तबलहियेशुभगतिको ॥ १४ ॥ स्वा-
गताछंद ॥ योगयागब्रतआदिजोकीजै । न्हानगामगनदान
जो दीजै ॥ धर्म कर्मसबनिष्फलदेवा । होहिंएकफलकैपति
सेवा ॥ १५ ॥
टी०-तुम क्यों चलौ वन इत्यादि दश छंदानमें पातिब्रत धर्म सुनाइ रामचन्द्र
माता को बोध करत हैं राजकहे राजा दशरथ अथवा राजस्त्रिन करिकै केवल
पतिही को देवजानिये कहे जानो चाहिये ॥ ११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ पतिही स्त्रिन
करिकै नित्यप्रति पथ कहे सुराहशास्त्रोक्तपतिब्रतनकी रीति इति तामें चलिये या
प्रकार सुख औ दुःख के दल कहे समूह को दलिये कहे विताइये औ तन औ
मन सों केवल पतिही को सेवहु कहे सेवन करिये तब शुभगति को पाइये कछू
सुख दुख परै तामें स्त्रीको पतिही की सेवा करिवो उचित है और उपाय करिवो
उचित नहीं है इति भावार्थः ॥ १४ ॥ देव कहे देवता अर्थ देवपूजा ॥ १५ ॥
मू०-तातमातुजनसोदरजानौं । देवरजेठसगे सो बखानौं ॥
पुत्रपुत्रसुतश्रीछबिछाई । है बिहीनभरतादुखदाई ॥ १६ ॥
कुंडलिया ॥ नारीतजैनआपनो, सपनेहूँभरतार ॥ पंगुगुं-
गुबौराबधिर, अंधअनाथअपार ॥ अंधअनाथअपारवृ-
द्धवावनअतिरोगी बालकपंडुकुरूपसदाकुवचनजडयोगी ॥
कलहीकोढीभीरुचोरज्वारी व्यभिचारी । अधमअभागीकु-
टिलकुपतिपतितजैननारी ॥ १७ ॥ पंकजवाटिकाछंद ॥
मारितजैनमरेभरतारहि । तासंगसहतिधनंजयझारहिं ॥ जी-
केहूँकरतारजिआवत । तौताकोयहबातसुनावत ॥ १८ ॥
निशिपालिकाछंद ॥ गानविनमानविनहासविनजीवहीं । तत्त

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

नवमप्रकाशः ९. (८७)
नहिंखाइज लशीतलनपीवहीं। तेलतजिखेलतजिखाटतजि
सोवहीं। शीतजलन्हाइनहिंउष्णजलजोवहीं॥ १९॥
टी०-पुत्र सुत पौत्र ॥ १६ ॥ पंडु पिंडगोगी योगी विरक्त भीरु कादर कुपति
निर्लज्ज अथवा नपुंसक ॥ १७ ॥ धनंजय कहे अग्नि की झाग महनिहैं अर्थ मती
होति हैं जो काहू प्रकार कर्त्तार जिआवै अर्थ पतिके संग ना जरयो जाइ तौ तिन
खिनके लिये यह बात है सो हम तुमको सुनावत हैं सो गान विन इत्यादि द्वैछं-
दमों आगे कहत हैं ॥ १८ ॥ द्वैछंद को अन्वय एक है जल शीतल न पीवहीं
अर्थ सीरो करिके जल न पीवैं जैसो होइ तैसो पीवैं शीत जलमें न्हाइ या जनायो
कि गरम जल करि स्नान ना करे जा समय जैमे पीवैं तैमे में स्नान करै काय
मन वाचा सब धर्म करिवो करें अर्थ ये जे सब धर्म हैं तिनको मनसा वाचा कर्म्मणासे
करें अथवा और जे सब धर्मदानादि हैं तिनहुंन को करे कृच्छ्र उपवास कृच्छ्र-
चांद्रायणादिसो जबलों तनको अतीत कहे छांड़ें अर्थ मरे तबलों पुत्रकी शिष में
लीन रहै पुत्र की आज्ञामें रहै यांमें त्रिकाल दर्शी जे रामचंद्र हैं तिन अपने
वियोग सों पिताको मरण निश्चय करि पति ब्रतन को धर्म सुनाय माताको बोध
करि युक्ति सों विधवा स्त्री को उचित धर्म सिखायो ॥ १९ ॥
मू०-खायँमधुगन्ननहिंपायपनहींधरैं। कायमनवाचसबध-
र्मकरिबोकरैं॥कृच्छ्रउपबाससबइंद्रियनिकैजितहीं॥ पुत्रशिपली-
नतनजौलगिअतीतहीं॥२०॥ दोहा॥ पतिहितपितुपरतनु
तज्यो, सतीसाखिदैदेव ॥ लोकलोकपूजितभई, तुलसीपतिकी
सेव॥ २१ ॥ मनसावाचाकर्मणा, हमसोंछाँडोनेहु। राजाको
विपदापरी, तुमतिनकीसुधिलेहु ॥ २२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥
उठिरामचन्द्रलक्ष्मणसमेत । तबगयेजनकतनयानिकेत ॥
सुनुराजपुत्रिकेएकबात । हमबनपठयैहैनृपतितात ॥ २३॥
तुमजननिसेवकहँरहहुबाम । कैजाहुआजुहीजनकधाम॥सुनि
चन्द्रबदननिगजगमनिएनि । मनरुचैसोकीजैजलजनैनि॥२४॥

( ८८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

सीताजू-नाराचछंद ॥ नहौंरहौनजाइहूजिविदेहधामकोअबैकही
जोबातमातुपैसो आजुमैं सुनीसबै॥लगेक्षुधाहिमा भलीविपत्तिमां
झनारिये । पियासत्रासनीरबीरयुद्धमेंसम्भारिये ॥ २५ ॥
टी०-॥ २० ॥ सती की औ तुलसी की कथा प्रसिद्ध है ॥ २१ ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥ जननि कौशल्या ऐनि कहे हे सुन्दरि ॥ २४ ॥ कि स्त्रीको पतिहि कि
सेवा उचित है यह बात जो माता सों तुमकहो हैसो हम सब सुन्यो है यासों या
जनायो कि तुम्हारी सेवा छाँडि हम कैसे घर में रहें क्षुधामें माता भली लगतिहै
पोषण करिवो मुख्य धर्म माताकोहै तासों यथाकवि प्रियायां माता जिमि पोषति
पिता जिमि प्रतिपाल करें औ विपत्तिमें नारिये कहे स्त्रीही भली लागति है जो अनेक
प्रकारसों शुश्रूषा करि मन को बहरावतिहै औ पियास की त्रास समय नीर भलो
लागतहै औ युद्धमें बीर जो योद्धा है तिन को सँभारिये यहै भलो लागत है अर्थ
अनेक वीरनको संभारिवो एकत्र करिवो अथवा सावधान करिवोई भलो लागत है
यह कहि या जनायो कि यह तुम्हारो विपत्तिको समय है तासों तुम्हारे संग
हमको चलिवो विशेषि है ॥ २५ ॥
मू०-लक्ष्मण-सुप्रियाछंद ॥ वनमहँविकटविविधदुखसुनि-
ये । गिरि गहवर मग अगमके गुनिये ॥ कहुँअहि हरिकहूँनिशिच-
रचरहीं । कहुँदवदहनदुसहदुखदहहीं॥२६॥सीताजू-दंडक ॥
केशोदासनींदभूखप्यास उपहासत्रासदुखकोनिवासविषमुखहू
गह्यो परै । वायुकोवहनदिनदावाकोदहनबडीवाडवाअनलज्वा-
लजालमँरह्योपरै । जीरनजनमजातजोरजुरघोर परिपूरणप्रकट
परित्तापक्योंकह्योपरै । सहिहौंतपनतापपतिकेप्रतापरघुवीरको
विरहबीरमोंसोंनसह्योपरै ॥ २७॥
टी०-दवदहन कहेदावाग्नि-॥ २६ ॥ दुखको निवास जो विष है सो मुखमें
गह्यो परत है अर्थ विष खायो जात है जीर्ण कहै जर्जर अर्थ थोडी है मर्यादा
जाकी ऐसो जो जन्म है सो जातु कहे जाउ अर्थ कि मृत्यु होय औ घोर जो
ज्वरहै औ परिपूर्ण कहे दैहिक दैविक भौतिक तीनों प्रकार की जो

: "गाँकी" or "गौंकी"?
Wait, look at L19: "अर्थ गाँकी" or "अर्थ गौंकी" or "अर्थ गां की"?
Wait! Look at the word: "ग" with 'ा' and anusvara/chandrabindu, then 'की'? Or is it 'गौंकी'?
Wait, the original phrase was "उर गौ यह बात" in verse 28:
"जो दुख दैहैं तौ लै उर गौ यह बात सुनौ"
So the commentator explains:
"उरगौ कहै वितावो अथवा हे भाई ! जो भरत तुमको दुःख दैहैं तौ लै कहे अंगीकारकरिकै उरमें गुनौ अर्थ समय पाय ताको फलदेवेके लिये समुझि राखैगौ यह बात सुनौ अर्थ गौंकी जो यह बात है सो सुनो"
Wait, what is "गौंकी"? In verse 28, the word is "गौ" (उरगौ).
So "अर्थ गौंकी" or "अर्थ गौ की"? Wait, does it say "गौंकी"?
Let's look at the letters: 'ग' with double matra? No, it has an 'ा' and a curved stroke on top: 'ौ' with dot? Or 'ाँ'?
Wait, look at 'गौ' in L7: 'ग' + 'ौ' = गौ.
In L17: 'उरगौ' = 'ग' + 'ौ'.
In L

An exact, line-by-line transcription of the page into Devanagari Markdown:

( ९० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सीताहैं औ कहूं सिद्धि मनो फल्योपाठ है सो अर्थ खुल्यो है ॥३०॥ उछाह जो
आनंदहै तेहिते सबपुर चल्यो कहे सब पुरवासी चले तो या जानो पुरीमें उछाहहू
रामहीं के साथ चलो गयो ॥ ३१ ॥ गेहु कहे पिंजरा ॥ ३२ ॥
मू०-चित्रपदाछंद ॥ रूपहिदेखतमोहें । ईशकहौनरकोहैं ॥
संभ्रमचित्तअरुझै । रामहियोंसबबूझै ॥ ३३ ॥ चंचरीछंद ॥
कौनहौकिततेचलेकितजातहौकेहिकामजू । कौनकीदुहिताब-
हूकहिंकौनकीयहवामजू ॥ एकगाँवउरहौकिसाजनमित्रबंधुब-
खानिये । देशकेपरदेशकेकिधौंपंथकीपहिचानिये ॥ ३४ ॥
जगमोहनदंडक ॥ किधौयहराजपुत्रीबरहींवर्योहैकिधौउपधि-
बरचोहै यहिशोभाअभिरतहै। किधौरतिरतिनाथजससाथके-

"? No.
Let's look at: "जयंत औ की दू"
Yes, it literally reads: जयंत औ की दू or जयंत औ की दू.

Let's check line 22:
कहे दूनौ कृष्णपक्ष तिनकी संधिमें स्वच्छ संध्या सधी है स्थित है जाको प्रत्यक्ष ही

Line 23:
लक्षिये कहे देखियत है औ शोभा सों मोहित है कृष्णपक्षरूप राम हैं शुक्लपक्ष

Line 24:
रूप लक्ष्मणहैं संध्यारूप सीताहैं अथवा दूनों जे पक्ष हैं तिनमें संधि कहे
Wait, "लक्ष्मणहैं" - space or no space? "लक्ष्मणहैं संध्यारूप सीताहैं" (no space between लक्ष्मण and हैं, space before संध्यारूप).

Line 25:
मध्य है तौ शुक्लादि गणना सों दुवौ पक्षनको मध्य पूर्णिमा है तौ संधिपदते
Wait, "दुवौ पक्षनको" - yes.
"संधिपदते" - yes.

Line 26:
पूर्णिमा जानौ याहूमें पूर्णिमारूप सीता हैं दुवौ पक्षरूप राम लक्ष्मण हैं औ

Line 27:
तीनों संध्या परस्परसधी हैं अर्थ कि एकत्र हैं प्रातःसंध्या रक्त है मध्याह्न
Wait, "परस्परसधी" - yes.
"मध्याह्न" - yes.

Line 28:
`संध्या शुक्ल है

(९२) रामचन्द्रिका-सटीक ।

अपराह्ने तु या संध्या कृष्णांगीकृष्णवाससा'॥ कतहूं संध संध्या संधी या
पाठ है तौ दुवौ पंकनके संध कहे साथ संध्या संधी है सो जानो ॥ ३६ ॥
मू०-अनंगशेखरदंडक ॥ तडागनीरहीनतेसनीरहोतकेशो-
दासपुंडरीकझुंडभौरमंडलीनमंडहीं । तमालवल्लरीसमेतिसू-
खिसूखिकैरहेतेबागफूलिफूलिकैसमूलशूलखंडहीं ॥ चितैच-
कोरनीचकोरमोरमोरनीसमेत हंसहंसिनीसमेतशारिकास-
वैपढैं । जहींजहींविरामलेतरामजूतहींतहींअनेकभांतिकेअने-
कभोगभागसोबढैं ॥ ३७ ॥
टी०-पुंडरी कमल भाग सो कहे भाग्य सों अथवा द्विगुण चतुर्गुणादि भाग
कहे हींसा सों ॥ ३७ ॥
मू०-सुंदरीछंद ॥ घामकोरामसमीपमहाबल । शीतहिला-
गतहैअतिशीतल ॥ ज्योंघनसंयुतदामिनिकेतन । होतहैंपू-
षन केकरभूषण ॥३८॥ मारगकीरजतापिकैहैअति । केशवसी
तहि शीतललागति ॥ ज्योंपदपङ्कज ऊपरपाँयानि। दैजोचलैते-
हितैं सुखदायनि॥३९॥ दोहा ॥ प्रतिपुर औ प्रतिग्रामकी, प्रति
नगरनकीनारि ॥ सीताजूकोदेखिकै, वर्णतहैंसुखकारि ॥४०॥
जगमोहनदंडक ॥ वासों मृगअङ्क कहैं तोसोंमृगनैनीसबवह-
सुधारहतुहूँसुधावरमानिये।वहद्विजराजतेरोद्विजराजिराजैंवहक
लानिधितुहूं कलाकलितबखानिये।रत्नाकरकहैंदोऊकेशवप्रका
शकर अंबरविलासकुवलयहितमानिये । वाकेअतिशीतकर-
तुहूँसीताशीतकरचंद्रमासीचंद्रमुखीसबजगजानिये ॥ ४१ ॥
॰टी०-घामको जो महाबल कहे अति तेजहै सो रामके समीप में सीताको
अति शीतल लागतहै जैसे घन जे मेघहैं तिनते युक्त जो दामिनी बिजुली है
ताके तनुमें पूषण जे सूर्य हैं तिनके कर किरण भूषण होतहैं सूर्यकी किरणें
मेघनमें परतीहै तब इंद्रधनुष होतहै सोई दामिनीको भूषण समहै ॥३८॥

नवमप्रकाशः ९. (९३)
हेतु यह कि पृथ्वी की सीता पुत्रीहै रामचन्द्र जामातुहैं तासों पृथ्वीकी रज
तिनको सुख दियोई चहै तामें युक्ति यह कि पंकजपर पांउ धारिकै चलै तौ
शीतलई लागत है ॥ ३९ ॥ ४० ॥ या प्रकार कोऊ स्त्री सीतासों कहतिहै कि
वह जो चंद्रमा है जाको मृगअंक सब कहत हैं मृगा जो शशा है सोहै अंकमें
गोदमें मध्य इति जाके अथवा मृगको अंक कहे चिह्नहै जाके औ तोहूँको
मृगनैनी कहतहैं औ वह सुधाधरहै सुधा अमृत को धरै है औ तूहूं सुधाधर है
सुधासम हैं अधर ओष्ठजाके औ वह द्विजराज कहावत है तेरेहू द्विज जे दंतहैं
तिनकी राजिकहे पंगति राजतिहै औ वह षोडशकलनको निधिहै औ तूहूं अनेक
जे नेत्र विक्षेपादि कला हैं अथवा चौसठिकला तिनसों कलित है औ वह
रत्नाकर जो समुद्र है ताको प्रकाशकर कहे बढावन हार है पूर्णमासीके चन्द्र-
माके उदयसों समुद्र बाढत है प्रसिद्ध है औ तू भूषणनके रतननको जो आकर
समूह है ताको प्रकाश शोभा करता है अर्थ तेरी छविसां भूषणनके रत्न शोभा
पावतहैं औ चन्द्रको अंबर आकाशमें विलासहै सीताको अंबर वस्त्रमें औ चन्द्रमा
कुवलयको हित है औ सीता कुवलय कहे पृथ्वी मंडलको हितकरे अतिप्रिय
लागतिहै अर्थ सौंदर्यादिक गुण सीतामें ऐसे हैं जासों सबको प्रिय है औ
वाके चन्द्रमाके अति शीत है कर कहे किरण औ हे सीता तूहूं शीतकर है जो
तो को देखत हैं ताके लोचन शीतल हैं तौ जौन जौन जिह्मगुण चंद्रमामो
हैं ते तोहूं में हैं याते हे चंद्रमुखी! सब जग करिकै तोकों चन्द्रमा सम
जानियतहै अर्थ सब जग तोकों चन्द्रमा समजानत हैं ॥ ४१ ॥
मू०-अन्यच्छ ॥ कलितकलंककेतुकेतुअरिसितुगातभोगयोग-
कोअयोगरोगहीकोथलसों ॥ पून्योईकोपूरनपैप्रतिदिनदूनो-
दूनो क्षणक्षणक्षीणहोतछीलरकीजलसों । चंद्रसोंजोबरणत-
रामचंद्रकी दोहाईसोईमतिमंदकविकेशवकुशलसों । सुंदरसु-
वासअरुकोमलअमलअतिसीताजूकोमुखसखिकैवलकम-
लसों ॥ ४२ ॥
टी०-दूसरीस्त्री ताकोमत खंडिकै आपनोमत कहतिहै कलंक कि जो केतुकहे
पताका है अर्थ पताकासम जाको कलंक प्रसिद्ध है औ केतुको अरि शत्रु है राहु
केतु एकइके खंड हैं तासों अक्षर मैत्रीके लिये केतु कह्यो औ स्त्री आदिके जे

( ९४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
भोग हैं तिनको जो योगसंयोग रेताको अयोग असमर्थ है गुरुशापसों क्षयरोग
युक्त है क्षणक्षण क्षीण होत जो छीलरकहे दीना अथवा अंजलिकोजलहै तासम
प्रतिदिन दूनों क्षीणहोत हैं ॥ ४२ ॥
मू०-अन्यच्च ॥ एकेकहैं अमलकमलमुखसीताजूको एकक
हैंचन्द्रसमआनंदकोकंदरी । होइजोकमलतौरयनिमैनसकुचै
रीचंदजोतौबासरनहोइद्युतिमंदरी । बासरहीकमलरजनीही-
मेंचंद्रमुखबासरहूरजनिविराजैजगबंदरी। देखेमुखभावैअनदे-
खईकमलचंद तातमुखमुखैसखीकमलैनचंदरी ॥ ४३ ॥
दोहा ॥ सीतानयनचकोरसखि, रविवंशीरघुनाथ ॥ रामचंद्र
सियकमलमुख, भलोबन्योहैसाथ ॥ ४४॥ विजयछंद ॥ बहु-
बागतड़ागतरं गनितीरतमालकीछांहबिलोकिभली । घटिका-
यकबैटतहैंसुख पायबिछायतहांकुशकाशथली ॥ मगकोश्रम-
श्रीपतिदूरिकरैंसियकोशुभवाकलअंचलसों । श्रमतेऊहरैंतिन
कोकहिकेशवचंचल चारुदृगंचलसों ॥ ४५ ॥ सोरठा ॥ श्रीर-
घुबरकेइष्ट, अश्रुबलित सीतानयन ॥ सांचीकरीअदृष्ट,
झूठीउपमामीनकी ॥ ४६ ॥
टी०-तीसरी स्त्री दुवौ को मत खंडि आपनो कहति है कमलचंद्रके देखेहू
पर मुख भावत है औ कमलचन्द्रमुखके अनदेखे ही भावत है जब या मुखको
देखो तब कमलचंद्रके देखबे की इच्छा नहीं होति जब उत्तमवस्तु देखो तब
अनुत्तम वस्तु देखे अच्छीनहीं लागति है ॥ ४३ ॥ सूर्यको औ चकोर को औ
चंद्रको औ कमल को स्वाभाविक विरोध है सो इहाँ भलो कहे अद्भुत साथ
बन्यो है ॥ ४४ ॥ दृगंचल दृगकोर ॥ ४५ ॥ श्रीरघुबर के इष्ट कहे प्रिय अश्रु
आनंदाश्रु करिकैं वलित युक्त जे सीताके नयन हैं तिन मीनकी जो झूठी उपमा
अदृष्ट रही है ताको सांची करी अर्थ मीन जल में रहते हैं नयन जलमें नहीं रहत
समतामें यह भेद रह्यो है सो आनंदाश्रु जलमें बूडि कै सीता के नयन सांची
करी ॥ ४६ ॥

दशमप्रकाशः १०. (९५)
मू०-दोहा ॥ मारगयोंरघुनाथजू, दुखसुखसबहीदेत ॥
चित्रकूटपर्वतगये, सोदरसियासमेत ॥ ४७ ॥
इति श्रीमत्सकलोलोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायांरामस्यचित्रकूटगमनं
नामनवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
टी०-दर्शन सों सुख देत वियोग सों दुख देत ॥ ४७ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानिप्रसादाय जन जानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्ति प्रकाशिकाया नवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ यहप्रकाश दशमेंकथा, आवनभरतसुनाम ॥
राजमरणअरुतासुको, बसिबोनंदिग्राम ॥ १ ॥ दोधकछंद ॥
आनिभरत्तपुरीअवलोकी । स्थावरजंगमजीवसशोकी ॥ भाट
नहींविरदावलिसाजैं ॥ कुंजरगाजैनदुंदुभिबाजैं ॥ २ ॥ राजस-
भानविलोकियकोऊ । शोकगहेतवसोदरदोऊ ॥ मंदिरमातु-
विलोकिअकेली । ज्योंबिनवृक्षविराजतिवेली ॥ ३ ॥ तोट-
कछंद ॥ तबदीरघदेखिप्रणामकियो ॥ उठिकैउनकण्ठलगाइ
लियो ॥ नपियोजलसंभ्रमभूलिरहे । तबमातुसोंबातभरत्थ-
कहे ॥ ४ ॥
टी०-नाम कहे प्रसिद्ध ॥ १ ॥ २ ॥ राज सभामें कोऊ न देख्यो तब
शोकको गहे औ