रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमप्रकाशः ७. ( ७९ )
देवके वचनसों जानिकहे ये नारायण हैं यह जानिकै नारायणको धनुष परशुराम
पै रह्यो सो रामचंद्रको दियो ॥ ४७ ॥
मूल-अबआपनपौपहिंचानिविप्र । सबकरहुआगिलो
काजक्षिप्र ॥ तवनारायणकोधनुषजानि ॥ भृगुनाथदियोर-
घुनाथपानि ॥ ४८ ॥ मोटनकछंद ॥ नारायणकोधनुबाण
लियो । ऐंच्योहँसिदेवनमोदकियो ॥ रघुनाथकहेउअबकाहि
हनो । त्रैलोक्यकँप्योभयमानिघनो ॥ ४९ ॥ दिग्देवदहेव
हुबातबहे । भूकम्पभयेगिरिराजढहे ॥ आकाशविमानअ-
मानछये । हाहासबहीँयहशब्दरये ॥ ५० ॥ परशुराम-श-
शिबदनाछंद ॥ जगगुरुजान्यो । त्रिभुवनमान्यो ॥ ममगति
मारौ । हृदयबिचारौ ॥ ५१ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ द्वै छंदको अन्वय एक है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ त्रिभुवनमें मान्यो
अर्थ जाको तीनों भुवनमानतहैं पूजतहैं औ जगतके गुरु जो ईश्वर हैं सो हम
तुमको जान्यो अर्थ तुम ईश्वर हौ ताते और सब को निर्दोष हमको सदोष विचारि
हमारी सुर पुरकी गति मारो ॥ ५१ ॥
मूल-दोहा ॥ विषयीकीज्योंपुष्पशर, गतिकोंहनतअ-
नंग । रामदेवत्योंहींकियो, परशुरामगतिभंग ॥ ५२ ॥ च-
तुष्पदीछंद ॥ सुरपुरगतिभानी शासनमानी भृगुपतिको
सुखभारो । आशिपरसभीने सबसुखदीने अबदशकंठहिमा-
रो ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ सोवतसीतानाथके, भृगुमुनिदीन्हीं
लात । भृगुकुलपतिकीगतहरी, मनोसुमिरिवहबात ॥५४॥
मधुभारछन्द॥दशरथजगाइ । संभ्रमभगाइ । चलिरामराइ। दुं-
दुभिबजाइ ॥ ५५ ॥ सवैया ॥ नाडकातारिसुबाहुसँहारिकै
गौतमनारिकेपातकटारे । चापहत्योहरकोहँसिकै सबदेवअदेव