रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मृल्लता आदि औ विचार औ वाहन गज अश्वरथादि वसन श्याम श्वेत पीतादि
एकहि बार कहं एकहि तरह विलोकियत हैं जा वेषसो जा पहरकी चौकी जैसे
सेनापतिकीहैं तसी आठहू ओर की है इति भावार्थः ॥ अथवा जा पुरीमें आठौं दिशिके
शील आदि एकही बार एकही समय विलोकियतहैं यासों या जनायो कि आठौं
दिशिके राजा जा पुरमें हाजिर रहत हैं औ आठौं दिशिके प्राणी जापुर में
बसत हैं वीथी गली ॥ ७ ॥ ८ ॥ प्रतिमंदिर कहे अपने अपने मंदिरन पर
वगत को कौतुक देखिवेकों सुंदरी कहे स्त्री चढींहैं मोहनारि सदृश कहि अति
सुंदर मंदिर जनायो जब देखती हैं तब वाणसम जे नयन कोर हैं तिनसों
मानो तनको देखती हैं कहे वेधती हैं ॥ ९ ॥ सिद्धदेव योनि विशेष हैं
पद्मिनी कमलिनी रूपसौंदर्य कैलास औ पद्म औ रूप सम गेह है सिद्धतनया
कमलिनी दीपत्ति सम स्त्री हैं ॥ १० ॥
मूल-कीरतिश्रीजयसंयुतसोहति । श्रीपतिमंदिरकोमन
मोहति ॥ ऊपरमेरुमनोमनरोचन । स्वर्णलताजनरोचतिलो-
चन ॥ ११ ॥ विशेषकछंद ॥ एकलियेकरदर्पणचंदनचित्र
करे । मोहतितैमनमानहुँचांदनिचंदधरे ॥ नैनविशालनिअं-
बरलालनिज्योतिजगी ॥ मानहुँरागनिरजतिहैंअनुरागरँगी
॥ १२ ॥ नीलनिचोलनकोपहिरेयकचित्तहरे । मेघनकीय-
तिमानहुँदामिनिदेहघरे ॥ एकनकेतनसूक्ष्मसारिजरायजरी ।
सूरकरावलीसीजनुपद्मिनिदेहधरी ॥ १३ ॥ तोटकछंद ॥
बरषैकुसुमावलिएकघनी । शुभशोभनकामतासिबनी ॥
बरषैफलफूलनलायककी । जनुहैंतरुणीरतिनायककी ॥ १४ ॥
टी०-कि जय संयुत कीर्ति है जयसम गेहहै कीर्ति सम स्त्री है कि पतिके
विष्णु के मंदिर में श्रीलक्ष्मी है कि मन रोचन कहे सुंदर अनेक मेरु सुमेरु पर
स्वर्णलता हैं रोचति कहे नीकी लागति हैं लोचननि की ॥ ११ ॥ मानो चन्द्र-
माके मन को चांदनी मोहती है चंद्र सरिस दर्पणहै चांदनी सरिस चंदन चर्चित
स्त्रीहैं नयन हैं विशाल जिनके ऐसी जे स्त्रीहैं तिनके अंबर बस्त्र लालनकी शोभा