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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 269 में से

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पृष्ठ 84

( ७८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

जाहिबरु । भृगुनंदसँभारुकुठारमैं कियोशरासनयुक्तशरु ॥
॥ ४३ ॥ स्वागताछंद ॥ रामरामजबकोपकरचोजू ॥ लोक
लोकभयेभूरिभरचोजू ॥ वामदेवतबआपुनआये । रामदेव
दोऊसमुझाये ॥ ४४ ॥ दोहा ॥ महादेवकोदेखिकै, दोऊरा-
मविशेष ॥ कीन्होंपरमप्रणामउन, आशिषदियोअशेष ॥
॥ ४५ ॥ महादेव-चतुष्पदी ॥ भृगुनंदनसुनियेमनमहँगुनि-
येरघुनंदन निर्दोषी। निजयेअविकारीसबसुखकारीसबहीविधि
संतोषी ॥ एकैतुमदोऊऔरनकोऊएकैनामकहायो । आयु-
र्बलखूट्योधनुषजोटूट्योमैंनमनसुखपायो ॥ ४६ ॥ महा-
देव-पद्धटिका छंद ॥ तुमअमलअनंतअनादिदेव । नहिंवे-
दवखानतसकलभेव ॥ सबकोसमाननहिंबैरनेह । सबभक्त
नकारनधरतदेह ॥ ४७ ॥
टी०-जब गुरुजे विश्वामित्रहें तिनकी निंदा करचो तब रामचन्द्र कोप करिकै
बोले ईश महादेव आसन योगासनते चालै कहे चले सबही कहे सर्वत्र अर्थ
चौदहों लोकमें ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ निर्दोषी हैं अर्थ धनुष तौरनेमें इनको
कछू दोष नहींहै औ अविकारी कहे माया कृत विकार रहित हैं यासों
या जनायो कछू द्रोहादिसों धनुष नहीं तोरचो औ संतोषी कहि या जनायो
कि इनके कछू इच्छा नहीं है दुवो गुणनसों या जनायो ईश्वर हैं ॥ ४६ ॥ द्वै
छंदको अन्वय एक है महादेव परशुरामसों कहतहें कि तुम अमल कहे माया
विकार रहित औ अनंत जाको अन्त नहीं है कि ये तो है औ अनादि कहे जाकी
आदि नहीं कोऊ जानन कि कबमों है ऐसे देव हौ अर्थ परब्रह्म हौ औ तुम्हारो
सब भेद कहे भेद वेद नहीं बखानि सकत अर्थ वेदहू नहीं जाको प्रमाण यावत्
राव प्राणिनको समानहौ काहू को स्वाभाविक वैर औ स्नेह तुम्हारे नहींहै केवल
प्रह्लादादि जे भक्त हैं तिनके हेतु देह धरि दुःख दूरि करत हौ यासों भक्तवत्स-
लता जनायो आपनपौ पहिंचानि कै कि हम औ ये एकही हैं यह जानिकै
इनके हाथ मों होनहार जो रावणादि वध आगिलो काज है ताको करौ तब महा