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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

..." No, Keshavdas uses negation to mean something else, or is it "न चाटत" = "चाटत न"? No!
Wait! What if "न" is "नि"? Or "आन"?
Wait, look at line 23:
न + च + ा + ट + त.
Wait, could "न" be "तन"?
Look at the letter before चाटत:
It is: 'नी' (end of बाघिनी), then 'न'.
Wait, is it 'नी' or 'नि'? It has a right matra: 'नी'.
Then 'न'.
Wait, could it be "बाघिनी आन चाटत"?
Look at the letter 'न': does it have an 'आ' before it? No, just 'न'.
Wait! Could it be "बाघिनी न चाटत सुरभि, बाघ बालक बदन है"?
Wait, if it's "बाघिनी [चाटत सुरभि बालक बदन], [सुरभि चाटत] बाघ बालक बदन है"?
Wait! Chiasmus (आदान-प्रदान):
Tigress licks cow's calf's face,
Cow licks tiger cub's face!
"बाघिनी चाटत सुरभि बालक बदन, सुरभि चाटत बाघ बालक बदन है"!
Look at line 23:
"नीनचाटतसुरभिबाघबालकबदनहै"
Wait! Where is "सुरभि बालक बदन

सप्तदश से एकविंश प्रकाश: रावण-वध, राज्याभिषेक एवं रामचन्द्रिका उपसंहार

( २१० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-तहां ता आश्रममों विप्रनके बीचमों बैठे अनेक इतिहासादि कहि विप्रनके
मनको मोहतहैं इत्यर्थः लोकेश (ब्रह्मा) ॥४०॥मृग जब छेरू [मृगबालक] सटा
[ग्रीवाके बार] डोरे डोरे कहे डोल डोल अंध तापस कहे बडे तपस्वी यासों बानर-
को ऋषिनके ताडनसों अति निर्भयता जनायो अथवा अंध कहे आंधरे जो तापस
कहे तपस्वी हैं तिनके डोरे कहे हाथको गहे अर्थ जहां जाइवेकी इच्छा करत हैं
तहां बानर पठाइ आवतहैं, औ शिवके समाजमें मृगजबछेरू पदते चन्द्रमाके रथके
हरिण जानौं अथवा और अनेक गणके मृगवाहन हैं यथा तुलसीकृत रामायणे
“नानावाहननानावेषा । हरषेशिवसमाजनिजदेखा ॥” औ सुरभि पदते महादेवको
वाहन वृषभ जानौं औ वाघबालक पदते काहू गणको वाहन बाघ जानौं औ सिंह
पदते देवीको वाहन सिंह जानौं अथवा दूनों पदते सिंहही जानौं औ गयंदपदते
गणेश जानौं औ फणी महादेव धारण करे हैं मोर स्वामिकार्त्तिकको वाहन है
अंधतापस कहे तापस वेषधारी जे आंधरे गण हैं यथा तुलसीकृत रामायणे ॥
“विपुल नयन कोउ नयनविहीना।।”औ बानर पदते बानरमुखगण जानौ यथातुल-
सीकृतरामायणे । खरश्वानशूकरशृगालमुखगण वेषअगणित कोगनै । जैसे शिवके-
समाजमें स्वाभाविक विरोधी जीव अविरुद्ध रहत हैं तैसे आश्रमहूंमें रहत हैं
इति भावार्थः ॥ ४१ ॥
मू०-भुजंगप्रयातछन्द ॥ जहांकोमलैवलकलैबाससोहैं ।
जिन्हेंअलपधीकल्पसाषीबिमोहैं ॥ धरेश्रृंखलादुःखदाहैदुरंतै ।
मनौंशम्भुजीसंगलीनेअनंतै ॥ ४२ ॥
टी०-यामें आश्रमके ऋषीजननको वर्णन है जहां जा आश्रममें ऋषिनके
कोमल बल्कलहीनके वस्त्र सोहत हैं परन्तु जिनको देखि अल्पधी [लघुबुद्धि]
अर्थ स्पर्द्धायुक्त है बुद्धि जिनकी ऐसे जे कल्पशाखी [कल्पवृक्ष] हैं ते बिमोहैं-
कहे मोहित होत हैं अथवा अल्पकी धी कहे बुद्धिसों अर्थ हम इनसों लघु हैं या
बुद्धिसों मोहत हैं केवल वचनहीसों एतो देत है जे तो कल्पवृक्षनहूंको मोह होत
है कि हमहूं इनसम न भये; अथवा [कल्पसाक्षी] पाठ होई तौ जिनको देखि
अल्पकी धी करिकै अर्थ हम इनसों लघु हैं या बुद्धिसों कल्पासाक्षी जे कल्पांतयोनि
[मार्कंडेय] आदि हैं ते मोहत हैं औ केवल श्रृंखला जो कठिन बंधन है ताको
धारण करे हैं परन्तु दुरंत कहे बडे जे ओरनके दुःख हैं तिनको दाहै कहे नाश
करत हैं अर्थ ऐसे ऐसे आचार्य कृत्यनसों युक्त हैं । “श्रृंखला पुल्कटी
वस्त्रबन्धे च निगडे त्रिषु इति मेदिनी ॥” महादेव, अनंत जे शेष हैं

तिनको संगमें लीन्हें हैं धारण करे हैं औ ऋषिजन अनंत जे भगवान हैं
तिनके ध्यानसों अथवा कथन सों संगमें लीन रहते हैं ॥ ४२ ॥
मू०-मालिनीछंद ॥ प्रशमितरजराजैहर्षवर्षामयैसे ।
विरलजठनशाखीस्वर्नदीकूलकैसे ॥ जगमगदरशाईसूरकेअंशु
ऐसे ॥४३॥ गहेकेशपाशैंक्रियासीबखानौं । कँपैशापकेत्रासते-
गातमानौं ॥ मनौचंद्रमाचंद्रिकाचारुसाजैं । जरासोंमिलेयों-
भरद्वाजराजैं ॥ ४४ ॥
टी०-फेरि कैसे हैं ऋषिजनसो कहत हैं वर्षामयमें रज जो धूरि है सो
प्रशमित कहे नष्ट ह्वैजाति है ऋषिनके रजोगुण सब ऋषि सत्त्वगुणी हैं इति
भावार्थः स्वर्नदी [ गंगा ] के कूलको साखी [ वृक्ष ] विरल कहे प्रगट जटा जे
जरे हैं तिनसहित हैं इहां स्वर्नदीकूलको साखी कहि अति पावन ताहू जनायो
अथवा स्वर्नदी उपलक्षणमात्र है नदीमात्रके कूलको जानौं नदीके प्रवाहके

यातछन्द ॥ मनौंअंकुरालीलसै सत्यकीसी । किधौंवेदविद्या
प्रभाईभ्रमीसी ॥ रमैंगंगकीज्योतिज्योंजहुनीकी । बिसजैस-
दाशोभदंतावलीकी ॥ ४६ ॥
टी०-त्रिस्रोता [ गंगा ] कहूं 'वंदति' पाठ है तहां या अर्थ कि त्रिस्रोताके
सोतनकी द्युति लिलारमें लगी भरद्वाजको वंदति है अर्थ सेवति है ॥ ४५ ॥
सत्यको रंग श्वेत है प्रभा [ शोभा ] भ्रमी कहे भरद्वाजको मुखरूपी शुभस्थान
पाइकै आश्चर्ययुक्त ह्वै रहीहै अर्थ प्रसन्न ह्वै रहीहै ज्यों कहे जानों जन्हु ऋषिके
मुखमें नीकी गंगाकी ज्योति रमति है जहु ऋषि गंगाको पान कियो है सो
कथा प्रसिद्ध है ॥ ४६ ॥
मू०-गीतिकाछन्द ॥ भ्रुकुटीबिराजतिश्वेतमानहुँमंत्रअद्भुत
सामके । जिनकेबिलोकतहीबिलातअशेषकर्मजकामके ॥
मुखबासआशप्रकाशकेशवभौँरभीरनसाजहीं । जनुसामके
शुभस्वक्षअक्षरह्वैसपक्षबिराजहीं ॥ ४७ ॥ तनुकम्बुकण्ठत्रि-
रेखराजतिरज्जुसीउनमानिये । अविनीतइंद्रियनिग्रहीतिनके
निबंधनजानिये । उपवीतउज्ज्वलशोभिजैउरदेखियोंबरणैस-
बै । सुरआपगातपसिंधुभैजसश्वेतश्रीदरशैअबै ॥ ४८ ॥
टी०-[ सामवेद ] काम जो कंदर्प है ताके जे कर्म हैं परस्त्री गमनादि तिनते
ज कहे उत्पन्न जे वस्तु हैं अम ( पातक ) ते अशेष कहे संपूर्ण बिलात हैं अथवा
काम जो हैं शुभ अशुभ अभिलाष तिनके जे कर्म हैं तिनते ज कहे उत्पन्न वस्तु
हैं अर्थ स्वर्ग नरक भोग शुभ अभिलाषके कर्मनसों स्वर्गभोग उत्पन्न होतहैं,
अशुभ अभिलाषके कर्मनसों नरक भोग उत्पन्न होत हैं, ते दुवौ बिलात हैं अर्थ
जिनको देखि प्राणी स्वर्ग, नरकभोगसों भिन्न होत हैं अंतमें मुक्तिपावत
हैं; प्रथम कह्यो है कि, स्वर्ग नरकहंतानामश्रीरामकैसो । औ सामके मंत्रके
पुरश्चरणसों कामके कर्मज बिलात हैं इनके देखतही तासों अद्भुत करयो बास
सुगंध ॥ ४७ ॥ कंबु सदृश कंठमें तनु सूक्ष्म त्रिरेख राजति है ताहि रज्जु
कहे जेवरीसम अनुमानियत है सो जेवरी काहेके लिये है अविनीत कहे अशि-
क्षित अर्थ आज्ञा टारि अभिलषित बात कर्त्ता जे इंद्रिय नेत्रादि हैं तिनके निग्रही

कहे ताडन कर्त्ता अर्थ दुःखदु निबंधन कहे बंधन है तपसिंधु ( भरद्वाज ) हैं
सुरआपगा ( गंगा ) के तीनों सोतसम उपवीनके तीनों सूत्र हैं सिंधुमें मिलिबो
नदीको धर्म है ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ फटिकमालशुभशोभिजै, उरऋषिराजउदार ॥
अमलसकलश्रुतिवरणमय, मनौंगिराकोहार ॥ ४९ ॥
सुंदरीछंद ॥ यद्यपिहैरसरूपपरस्यौतनु । दंडहिसोअवलंबितहै-
मनु ॥ धूमशिखानकेव्याजमनौंगुनि । देवपुरीकहँपंथ रच्यौ-
मुनि ॥ ५० ॥ रूपधरेबडवानलकोजनु । पोषतहैंपयपान-
हिंसोतनु ॥ क्रोधभुजंगममंत्रबखानहुँ । मोहमहातमकेर-
विमानहुँ ॥ ५१ ॥
टी०-श्रुतिवर्ण ( वेदाक्षर ) सम स्फटिक गुरिया हैं औ भरद्वाजकी वाणी
( सरस्वती ) डोरासम है अर्थ सरस्वतीमें गुहिकै मानों वेदाक्षरनहीकी माला
पहिरे हैं ॥ ४९ ॥ वृद्धतासों चलिबेके लिये दंड लियेंहैं तामें तर्क करतहैं कि
ऋषिको तनुरूप रस पदते रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श, पांचों इंद्रिनके पांचों
विषय जानों तिनकरिकै कहे तिनकी वासना करिकै रह्यो कहे व्यै गयौहै रहित
भयो है इति अर्थ वृद्धतासों नेत्रादि इंद्रिनमें रूपादि विषयकी वासना टरि गई
है ताहूपर मानों दंडसों अवलंवित कहे युक्त है दंडपद श्लेष है दंड कहे निग्रह
औ लकुट औ अग्निहोत्राग्निको आहुतिसों नित्यहीं प्रज्वलित कियो करत हैं तामें
तर्क है कि धूमशिखा जो अग्नि है ताके व्याज मानों देवपुरीको पंथ ( गह )
बनायो है ॥ ५० ॥ पय ( दुग्ध ) औ ( जल ) ॥ ५१ ॥
मू०-सत्यसखाअसखाकलिकेजनु । पर्बतऔषधिसिद्धिन-
केमनु ॥ पापकलापनकेदिनदूषण । देखिप्रणामकियोजग-
भूषण ॥ ५२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ सीतासमेतशेषावतार । दंड-
वत कियेऋषिकेअपार ॥ नरवेषबिभीषणजामवंत । सुग्रीवबा-
लिसुतहनूमंत ॥ ५३ ॥ ऋषिराजकरीपूजाअपार । पुनिकुश-
लप्रश्न पूंछीउदार ॥ शत्रुघ्नभरतकुशलीनिकेत । सबमित्रम-

. न्त्रिमातन समेत ॥ ५४ ॥ भरद्वाज ॥ कहकुशलकहाँतुम-
आदिदेव । सबजानत हौंसंसारभेव ॥ बिधिबिष्णुशंभुसविश-
शिउदार । सबपावकादिअंशावतार ॥ ५५ ॥ ब्रह्मादिसकल-
परमाणुअंत । तुम्हींहौरघुपतिअज अनंत ॥ अबसकलदान-
देपूजिविप्र । पुनिकरहुबिजयबैकुंठक्षिप्र ॥ ५६ ॥
इतिश्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र
चंद्रिकायामिंद्रजिद्विरचितायांरामस्यभरद्वाजाश्रमग-
मनंनामविंशःप्रकाशः॥ २० ॥
टी०-सत्य कहे सत्ययुग औषधि सम जे आठौं सिद्धि हैं तिनकं पर्वत हैं
जैसे पर्वतमें औषधी रहती हैं तैसे ऋषिमें आठौं सिद्धि रहती हैं कलाप ( समूह )
जगभूषण [ रामचंद्र ] ॥ ५२ ॥ प्रथम दूरसों करनसों प्रणाम कियो यामें निकट
जाइ दंडवत्प्रणाम करचौ ॥५३॥ पुनि कहे फिर ऋषिकी पूजा किये पर रामचंद्र
कुशलप्रश्न पूछत भये ॥ ५४ ॥ अंशावतार कहे तुम्हारे अंशावतार हैं ॥ ५५ ॥
“जालांतरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः । तस्य षष्ठितमो भागः परमाणुः स
उच्यते ॥” बिजय कहे हमारे इहां भोजन करौ बैकुंठ ! रामचन्द्रको संबोधन
है ॥ “ विष्णुर्नारायणः कृष्णो वैकुंठो विष्टरश्रवाः इत्यमरः ” ॥ ५६ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकाया विशतितमः प्रकाशः ॥ २० ॥
मू०-दोहा ॥ इकइसयेंप्रकाशमें, कहऋषिदानविधान ॥
भरत मिलनकापिगुणनको, श्रीमुखआपबखान ॥ १ ॥ श्री-
राम-सोमराजीछंद ॥ कहादानदीजै। सुकैभांतिकीजै॥ जहांहो-
हिंजैसो । कहोविप्रतैसो ॥ २ ॥ भरद्वाज-दोहा ॥ सात्त्विक
तामसराजसी, दानतीनिबिधिजानि ॥ उत्तममध्यमअधम-
पुनि, केशवदासबखानि ॥ ३ ॥ चंचरी छंद ॥ पूजियेद्वि-
जआपनेकरनारिसंयुतजानिये । देवदेवहिथापिकैपुनिवेदमंत्र

एकविंशप्रकाशः २१. ( २१५ )

बखानिये ॥ हाथलैकुशगोत्रउच्चरिसुवर्णयुक्तप्रमानिये । दान
दैकछुऔरदीजहिदानसात्त्विकजानिये ॥ ४ ॥
टी०-॥१॥ कहा कहे कौन वस्तु कै भांति कहें कै प्रकारसों दान कीजै दान
पदको संबंध याहूमों है ॥ २ ॥ ३ ॥ देवदेव जे विष्णु हैं तिनहिं स्थापिकै
कहे तिनके अर्थ फल समर्पण करिकै अथवा ब्राह्मणको देवहि ( विष्णुहि )
थापिकै कहे मानिकै अथवा देवदेवकी स्थापना करिकै सुवर्णसों युक्त कुश
हाथमें लैके गोत्रको उच्चरिकै वेदके मंत्रसों दान फेरि कछू और दीजै अर्थ
सांगतादान दीजै दानके बादि जो दान दियो जात है सो सांगतादान
कहावतहै ॥ ४ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देहि नहींअपनेकरदानैं । औरकेहाथ
जोमंगलजानै ॥ दानहिं देतजोआरसुआवै । सोवहरा जसदा-
नकहाव ॥ ५ ॥ बिप्रनदीजतहीनबिधानैं । जानहुँताकहँता-
मसं दानैं ॥ बिप्रनजानहुँजैनररूपै । जानहुँयेसबविष्णुस्वरूपै
॥ ६ ॥ श्लोक ॥ साचारो वा निराचारो साधुर्वासाधुरेव च ।
अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ॥ ७ ॥
तोमरछंद ॥ द्विजधामदेहिं जो जाइ । बहुभाँतिपूजिसुराइ ॥
कछुनाहिँनैपरिमान । कहियेसोउत्तमदान ॥८॥ द्विजकोजो-
देतबोलाइ । कहियेसोमध्यमराइ ॥ गुनियाचनामिसदानु ।
अतिहीनताकहँजानु ॥ ९ ॥
टी०-॥५॥ विप्रनको जगरूपै कहे जगतके सदृशै जै कहे जनि जानहुँ ॥६॥
पाछे कह्यो कि विप्रनको विष्णुस्वरूपै जानौं ताको विष्णु वाक्यसों पुष्ट करत
हैं विष्णु कह्यो है कि ब्राह्मण कहे आचार सहित होइ और अर्थ सुगम है
मामकी कहे हमारो तनु कहा है ॥ ७ ॥ ताकी उत्तमताको कछू प्रमाग नहीं
है ॥ ८ ॥ अतिहीन कहे अधम ॥ ९ ॥
मू०-श्लोक ॥ अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात्सेवादानं तु निष्फलम् ॥ १०॥ दोहा॥

( २१६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

प्रतिदिनदीजतनेमसों, ताकहँनित्यबखान ॥ कालहिपाइजो
दीजिये, सोनैमित्तिकदान ॥ ११ ॥ श्लोक ॥ आश्रितं साधु
कर्माणं ब्राह्मणं यो व्यतिक्रमेत् । तस्य पुण्यचयोप्याशु क्षयं
याति न संशयः ॥ १२ ॥ तोटकछंद ॥ पहिलेनिजवर्तिनदेहु
अबै । पुनिपावहिनागरलोगसबै ॥ पुनिदेहुसबैनिजदेशिनको
उबरोधनदेहुबिदेशिनको ॥ १३ ॥ दोधकछंद ॥ दानसकाम
अकामकहेहैं । पूरिसबैजगमांझरहेहैं॥इच्छितहीफलहोतसका-
मैं । रामनिमित्तेजानिअकामै ॥ १४ ॥
टी०-अभिगम्य कहे ब्राह्मणके घरमें जाइकै जो दान है सो उत्तम है औ
आहूत कहे ब्राह्मणको बोलायकै जो दान है सो मध्यम है औ याच्यमान कहे
जब ब्राह्मण मांगै आइ तब जो दान है सो अधम है औ सेवादान कहे जब
ब्राह्मण सेवा करै तब जो दान है सो निष्फल है अर्थ वामें कछू पुण्य नहीं है
॥ १० ॥ काल पाइ अर्थ चन्द्र सूर्य ग्रहणादि समयमों ॥ ११ ॥ अपनो
आश्रित जो साधुकर्मा ब्राह्मण है ताको जो व्यतिक्रमेत् कहे व्यतिक्रम करत है
अर्थ तिन्हें छोड़ि औरको दान देत है ताको पुण्यचय कहे पुण्यसमूह आशु कहे
शीघ्र ही “ क्षयं याति ” कहे क्षयको प्राप्त होता है यामें संशय नहीं अपि शब्दते
या जनायो कि थोरी पुण्य तौ क्षयको प्राप्त होतिही है ॥ १२ ॥ आश्रितको
व्यतिक्रम न कियो चाहिये तासों पहिले निज कहे आपने वर्ती कहे आश्रित-
नको देहु औ “ निजबृित्तिन ” पाठ होइ तौ निज कहे आपने इहां है दानहीसों
वृत्ति कहे जीविका जिनकी नागर कहे नगरवासी ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-दानतेदक्षिणबामबखानौं । धर्मनिमित्तेदक्षिणजा-
नों ॥ धर्मबिरुद्धतेबामगुनौजूं । दानकुदानसबैतेसुनौजूं १५॥
देहुसुदानतेउत्तमलेखो। देहुकुदानतिन्हैंजनिदेखो ॥ छांडिसबै
दिनदानहिं दीजै । दानहिंतेसबकेमतलीजै ॥ १६ ॥ दोहा ॥
केशवदानअनंतहैं, बनैनकाहूदेत ॥ यहैजानिसुवभूपसब,भूमि
दानहीदेत ॥ १७॥ श्लोक ॥ यत्किंचित्कुरुते पापं ज्ञानतोऽज्ञा-

नतोपि वा ॥ अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन शुध्यति ॥१८॥
सप्तहस्तेनदंडेनत्रिंशद्दंडैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा
स्वर्ग महीयते ॥ १९॥ अन्यायेन कृता भूमियैर्नरैरपहारिता।
हरंतो हारयंतश्च हन्यते सप्तमं कुलम् ॥ २० ॥ राम-दोहा ॥
कौनहिदीजैदानुभुव, हैंऋषिराजअनेक ॥ देहुसनाढ्यनआदि
दै, आयेसहितविवेक ॥ २१ ॥ श्रीराम--उपेंद्रवज्राछन्द ॥ कहौ
'भरद्वाजसनाढ्यकों हैं। भयेकहांतेंसबमद्ध्यसोहैं ॥ हुतेसबैबि-
प्रप्रभावभीने । तजेतेक्योँयेअतिपूज्यकीने ॥ २२ ॥
टी०-मारणोच्चाटनादिके लिये जो दान है सो धर्मविरुद्ध जानौ अथवा वेश्या-
दिके अर्थ दान ॥ १५ ॥ सबके मीमांसकादिकनके मत कहे सम्मत अर्थ
सम्मत फलको लीजै कहे पाइयत है अर्थ मीमांसकादिकनको मत है कि यज्ञा-
दिसों ऐहिक पारलौकिक फल होत है सो सब फल दाननहीसों पाइयत है तासों
सबको यज्ञादिकनको छोडिकै दिनप्रति दानहीको दीजै ॥ १६ ॥ १७ ॥ यत्कहे
जो ज्ञानतः कहे जानिकै अज्ञानतः कहे विनजाने कोऊ प्राणी किंचित्कह कछु
पापं कहे पाप जो है ताहि कुरुते कहे करत हैं, सो प्राणी गोचर्ममात्रेण भूमि-
दानेन कहे गोचर्ममात्र भूमिदान करत संते शुद्ध होत है अपि शब्दको अर्थ यह
कि अधिक भूमिदान करै तासों तौ शुद्ध यामें गोचर्मको लक्षण कहत हैं ॥१८॥
सप्तहस्तेन दंडेन कहे सात हाथके दंडकरिके त्रिंशद्दंडैः कहे तीसदंड करत संतेनिवर्तन
संज्ञक भूमिक्षेत्र होत है हस्तप्रमाण दुइसैदश औ दश तान्येव कहे तेई निवर्त्तनहीं
एक गोचर्म संज्ञक क्षेत्र होत है हस्तप्रमाण इक्कीससै २१०० सो गोचर्म प्रमाणहूं
भूमिको दत्त्वा कहे दैके स्वर्गे कहे स्वर्गको महीयते कहे जात है ॥ १९ ॥ यैर्नरैः
कहे जिन नरन करिकै अन्यायेन कहे न्याय बिनाही भूमिहृता कहे हरि गई औ जिन
नरन करिकै अपहारिता कहे हराई गई ता भूमिकरिकै हरंतःकहे हरनहार औ हारयंतः
[ हरावनहार ] ते हन्यते कहे पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ सो भूमि तिनको पीडा
करती है औ “तेषां सप्तमं कुलमपि हन्यते” अर्थ ताही भूमि करिकै तिनके
सातपुस्त पर्यंत पितर पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ जे दानकी भूमिको निर्दोष
छोरत हैं औ वृथापवाद कहि छोरावतहैं सो भूमि तिनको औ तिन दुहुनके सप्तपुस्त
पर्यंत पितरनको पितृलोकमें पीडा करति है ॥ २० ॥ ऋषि कह्यो सनाढ्यनको

( २१८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

दान देहु काहंते इन सनाढ्यनको आदिही सों अस अर्थ जबसों इनकी उत्पत्ति
है तबहीसों तुम विवेक सहित दै आये हौ ॥ २१ ॥ २२ ॥
मू०-भरद्वाज ॥ गिरीश नारायणपैसुनीत्यौं । गिरीशमोसों
जो कहीकहौंत्यौं ॥ सुनोसोसीतापतिसाधुचर्चा । करीसोजाते
तुमब्रह्मअर्चा ॥ २३ ॥ नारायण-मोटनछंद ॥ मोतेजलना-
भिसरोजबढ्यो । ऊंचोअतिउग्रअकाशचढ़्यो ॥ तातेचतुरा-
ननरूपपरो ॥ ब्रह्मायहनामप्रगट्टभयो ॥२४॥ ताकेमनतेसुत
चारिभये । सोहैंअतिपावनवेदमये ॥ चौहूंजनकेमनतेउपजे ।
भूदेवसनाढ्यतेमोहिंभजे ॥ दीन्हौतुमहीतिनजोहितजू ॥ है
हौ तुमब्रह्मपुरोहितजू ॥ २५ ॥
टी०-गिरीश (महादेव) जाति कहे जाकारणते तुम ब्रह्म अर्चा कहे सनाढ्य
ब्राह्मणनकी पूजा करी है अथवा ब्रह्म जे तुम हौ ते सनाढ्यनकी अर्चा आदिहीसों
करी है ॥ २३ ॥ २४ ॥ यह छंद छह चरणको है चारि सुत सनक, सनन्दन,
सनातन, सनत्कुमार वेदमये कहे वेदस्वरूप ये नारायणके वचन शिव प्रति हैं तिन्हें
कहिके द्वै चरणनमों भरद्वाज रामचन्द्रसों कहत हैं कि हे रामचन्द्र ! नारायणरूप
जे तुम हौ तिनहीं तिनको हितसों यह वचन दियो है वचन इतिशेषः ॥ कि तुम
ब्रह्म कहे परब्रह्मके पुरोहित है हौ ॥ २५ ॥
मू०-गौरीछंद ॥ तातेऋषिराजसबैतुमछांडो । भूदेवसना-
ढ्यनकेपद्मांडो ॥ दीन्हौतुमहीतिनकोबररुरे । चौंहूंयुगहो-
हुतपोबलपूरे ॥ २६ ॥ उपेंद्रवज्राछन्द ॥ सनाढ्यपूजाअघ-
ओघ हारी । अखंडआखंडललोकधारी । अशेषलोकावधि-
भूमिचारी । समूलनाशेनृपदोषकारी ॥ २७ ॥ श्रीराम-तोट-
कछंद ॥ हनुमन्तबलीतुमजाहुतहां । मुनिवेषभरत्थबसं-
तजहां ॥ ऋषिकैहमभोजनआजुकरैं । पुनिप्रातभरत्थहिंअं-
कभरैं ॥२८॥ चतुष्पदीछंद ॥ हनुमंतविलोकेभरतसशोकेअं-
गसकलमलधारी । बकलापहिरेतनशीशजटागणहैंफल-

एकविंशप्रकाशः २१. ( २१९ )

मूलअहारी ॥ बहुमंत्रिनगणमें राजकाजमेंसबसुखसोहित-
तोरे । रघुनाथपादुकातनमनप्रभुकारसेवतअंजुलिजोरे ॥२९॥
टी०-ब्रह्मपुरोहित होवेको इन्हें तुम्हारोई वर है औ तुम ब्रह्म हौ ताते कहे ता
हेतुते ॥ २६ ॥ अखंड कहे पूर्ण आखंडललोकधारी कहे इन्द्रलोककी धरण
हारी है जो कोऊ सनाढ्यनकी पूजा करत है ताको पूर्ण इंद्रलोक देतिहै इति
भावार्थः अशेषलोकावधि कहे चौदहों लोक पर्यन्त जो भूमि कहे स्थान हैं
तिनमें चारी कहे गमनकारी है अर्थ चौदहोंलोकमें सनाढ्यनकी पूजा सब करत
है अथवा चौदहोंलोकनमें नैनमारग, श्रवणमारग ह्वै गमन करति हैं अथ चौदहों
लोकनमें विदित है ॥ २७ ॥ बीसयें प्रकाशमें भरद्वाज कह्यो है कि अब करहु
विजय वैकुंठ क्षिप्र या प्रकार निमंत्रण दियो है तामों रामचन्द्र हनूमानसों कहत
हैं कि आज ऋषिको निमंत्रण है तासों ऋषिके इहां भोजन करि प्रात भरतपास
नन्दिग्राममें आइ हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥
मू०-हनुमान ॥ सबशोकनिछाड़ौभूषणमांडीकेजेविविधि
बधाये । सुरकाजसँवारेरावणमारेरघुनन्दनघरआये ॥ सुग्री-
वसुयोधनसहितबिभीषणसुनहुँभरतशुभगीता । जयकीरति
ज्योंसँगअमलसकलअँगसोहतलक्ष्मणसीता ॥ ३० ॥ पद्ध-
टिकाछंद ॥ सुनिपरमभावतीभरतबात । भयेसुखसमुद्रमैंमगन
गात ॥ यह सत्यकिधौंकछुस्वप्नमईश । अबकहाकह्योमोसन
कपीश ॥ ३१ ॥ जैसेचकोरलीलैलैअँगार । त्यहिभूलिजाति
सिगरीसँभार । जीउठतउबतज्योंउदधिनंद । त्योंभरतभये
सुनिरामचन्द्र ॥ ३२ ॥ ज्यों सोइरहतसबशूरहीन । अतिहै
अचैतयद्यपिप्रबीन॥ ज्यों उबत उठतहँसिकरतभोग त्यों राम
चन्द्रसुनिअवधिलोग ॥ ३३ ॥ मालिनीछंद ॥ जहँतहँगज-
गाजैंदुंदुभीदीहबाजैं । बहुबरणपताकास्यंदनाश्वादिराजैं ॥
भरतसकलसेनामध्ययोंवेषकीने । सुरपतिजनुआये मेघमा-
लानिलीने ॥ ३४ ॥ सकलनगरबासिभिन्नसेनानिसार्जैं ।

रथसुगजपताकाझुंडझुंडानिराजैं ॥ थलथलसब शोभैंशुभ्र
शोभानिछाई । रघुपतिसुनिमानोंऔधिसीआजआई ॥ ३५॥
चामरछंद ॥ यत्रतत्रदासईशव्योमतेविलोकहीं । बानरालिरी-
छराजिदृष्टिसृष्टिरोकहीं । ज्योंचकोरमेघओघमध्यचंद्र-
लेखहा । भानुकेसमानजानत्योंबिमानदेखहीं ॥३६ ॥' मदन
मनोहरदंडक ॥ आवतबिलोकिरघुबीर लघुबीरतजिव्योमगति
भूतलबिमानतबआइयो । रामपदपद्मसुखसझकहँबंधुयुगदौरि
तबषटमदसमानसुखपाइयो ॥ चूमिमुखसूंघिशिरअंकरघुनाथ- .
धरिअश्रुजललोचननिपेखिउरलाइयो । देवमुनिवृद्धपरसिद्ध
सबसिद्धजनहर्षितनपुष्पवर्षानिवरषाइयो ॥ ३७ ॥
टी०-माँडौ कहे पहिरौ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ उद्घिनंद ( चन्द्रमा ) ॥ ३२ ॥
॥ ३३ ॥ स्यंदन ( रथ ) अश्व ( घोडे ] आदि पदते पालकी आदि और जानौं
॥ ३४ ॥ थल थलमें सकल नगरबासी कैसे शोभित हैं कि अनेक प्रकारके
भूषण वस्त्रादिकी शोभानसों छायो रघुपतिको आगमन इतिशेषः सुनिकै मानों
अवधपुरीहीसी आई है ॥ ३५ ॥ बानरनकी आलि कहे पंक्ति औ ऋक्षन की
राजि पंक्ति है सो पुरवासिनकी दृष्टिकी जो सृष्टि कहे ताको रोकति है अर्थ
आगे वानर ऋक्ष उडत आवत हैं तासों रामचंद्र नहीं देखि परत भानु कहे सूर्य-
रूपी जो यान कहे बाहे बाहन हैं. तामों चढ्यो चंद्रमाको जैसे मेघ ओघ कहे मेघ
समूहमें चकोर लेखै ताहि बिधि भानु (सूर्य ) सम जान [ पुष्पक ] में रामचन्द्रको
बानरनके मध्यमें पुरवासी देखत हैं यामें [ अभूतोत्प्रेक्षा ] है दूसरो अर्थ सुगम
है ॥ ३६ ॥ अंक कहे गोदमें धरि लियो कहे बैठारि लियो फेरि लोचननमें अश्रु
देखि अति प्रीतिसों उरमें लाइ लियो ॥ ३७ ॥
मू०-दोहा ॥ भरतचरणलक्ष्मणपरे, लक्ष्मणकेशत्रुघ्न ॥ सी
तापगलागतदियो, आशिषशुभशत्रुघ्न ॥ ३८ ॥ मिलैभरतअरु
शत्रुहन, सुग्रीवहिअकुलाइ ॥ बहुरिबिभीषणकोमिले,अंगदको
सुखपाइ ॥ ३९ ॥ आभीरछंद ॥ जामवंतनलनील । मिलेभर

तशुभशीला॥ गवयगवाक्षगयंद । कपिकुलसबसुखकंद ॥४०॥
ऋषिवशिष्ठकोदेखि । जनमसफलकरिले खि ॥ रामपरेउठिपाय
लक्ष्मणसहितसुभाय ॥ ४१ ॥ दोहा ॥ लैसुग्रीवबिभीषणहिं,
करिकरिबिनयअनंत ॥ पाँयनपरेवशिष्ठके कबिकुलबुधिबलवं-
त ॥ ४२ ॥ श्रीराम-पद्धतिकाछंद ॥ सुनिजैवशिष्ठकुलइष्टदे-
व। इनकपिनायककेसकलभेव ॥ हमबूझतहैं विपदासमुद्र । इन
राखिलियोसंग्रामरुद्र ॥ ४३ ॥
टी०-जब भरत शत्रुघ्न सीताके पद लागे तब सीताजू आशिष दियो कि
शत्रुघ्न कहे शत्रुको मारौ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ कपिनायक
(सुग्रीव) संग्राममें रुद्र कहे भयंकर ॥ ४३ ॥
मू०-सबआसमुद्रकीभूशोधाइ । तबदईजनकतनयाबताइ ॥
निजबाइभरतज्योंदुखहरण । अतिसमरअमरहत्यो कुंभक-
रण ॥ ४४ ॥ इनहरेविभीषणसकलशूल । मनमानतहौं शत्रुघ्न
तूल ॥ दशकंठहनतसबदेवसाखि । इनलियेएकहनुमंतराखि ॥
॥ ४५ ॥ तजितियसुतसोदरबंधुईश । मिलेहमहिंकायमनवच
ऋषीशं ॥ दईमीचुइन्द्रजितकीबताय । अरुमंत्रजपतराषणदे-
खाय ॥ ४६ ॥ तोटकछंद ॥ इनअंगदशत्रुअनेकहने । हम-
हेतुसहेदिनदुःखघने ॥ बहुरावणकोसिखहीदुखलै। पुनिआये
भलेसियभूषणलै ॥ ४७ ॥
टी०-शोधाइ कहे ढुंढाइके कुंभकर्णको तो रामचन्द्रही मारयो है परंतु कुंभ-
कर्णकी नासा, श्रवण, प्रथम सुग्रीव काटि लियो है ताही समयमें रामचन्द्र
मारयो है ताको मारिवो सुग्रीव ही पर स्थापित करत हैं अमर कहे काहूके मारिबे
लायक नहीं ॥ ४४ जब मेघनाद ब्रह्मपाशमें हनुमानको बांधि लैगयो है तब
रावण हनूमानके वध करिबेकी आज्ञा राक्षसनको दियो है तब विभीषण “दूत
मारिये न राज छोडि दीजै” ऐसे वचन कहि हनूमानको बचायो है सो कथा
चौदहें प्रकाशमें है ॥ ४५ ॥ सोदर [ कुंभकर्ण ] बंधु [ ज्ञातिसमूह ] ईश-

( २२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
रावण के मंत्र जपत समय अंगदादि गये हैं ता समय विभीषणके कछू वचन
नहीं हैं तौ इहां रामचन्द्रकी उक्तिसों जानो विभीषणहीके बतायेसों अंगदादि
गये हैं ॥ ४६ ॥ हम हेतु कहे हमारे हेतु ॥ ४७ ॥
मू०-दशकंधके जायजोगूढ़थली । तिनकेतनसोंबहुभांति
दली ॥ महिमैंमयकीतनयाकर्षी । मतिमारिअकंपनकोहर्षी ॥
॥ ४८ ॥ दोहा ॥ मारयोमैंअपराधबिन,इनकोपितुगुणग्राम ॥
मनसावाचाकर्मणा,कीन्हेमेरेकाम॥४९॥गीतिकाछंद॥इनजा-
मवंतअनेकराक्षसलक्षलक्षनहींहने । मृगराजज्यौंबनराजमैंग-
जराजमारतनीगने॥ बलभावनाबलवानकोटिकरावणादिकहा-
रहीं । चढ़िव्योमदीहबिमानदेवदिवानआनिनिहारहीं ॥ ५० ॥
दोहा ॥ करैनकरिहैकरतअब, कोऊऐसोकर्म ॥ जैसेबांध्योनल
उपल, जलनिधिसेतुसधर्म ॥ ५१ ॥ गीतिकाछंद ॥ हनुमन्त
येजिनमित्रतारविपुत्रसोंहमसोंकरी । जलजालकालकरालमा-
लउफालपारधराधरी ॥ निश्शंकलंकनिहारिरावणधामधामनि
धाइयो । यकबाटिकातरुमूलसीताहिंदेखिकैदुखपाइयो ॥५२॥
टी०-गूढस्थली [ जपस्थान ] तिनके अंगदके तनसों कर्षी कहे खेंची कठोरि
इति औ अकंपनको मारिकै इनकी मति हर्षी ( प्रसन्न ) भई ॥ ४८ ॥
॥४९॥ लक्षलक्षनही अर्थ एक एक वारमें लाख लाख मारयौहै बनराज कहे बडो बन
बलभावता कहे बलक्रिया हारही कहे हारत भये यहां भूतार्थमें बर्त्तमान प्रत्ययको
अर्थ है ॥ ५० ॥ उपल ( पाषाण ) सधर्म कहे यथोचित ॥५१॥ कालहूते कराल
जे नक्रादि जंतु हैं तिनको है माल कहे समूह जामें ऐसो जो जलजाल कहे समु-
द्रको जलसमूह है ताके पारकी धरा पृथ्वीको उफाल कहे कूदिबो ताही सों धरी
कहे प्राप्त भये अर्थ एतो बडो समुद्र ताके पार कूदिही कै गये काहू पोतादिमें
नहीं गये इति भावार्थः ॥ ५२ ॥
मू०-तरुतोरिडारिप्रहारिकिंकरमंत्रिपुत्रसँहारियो । रणमारि
अक्षकुमाररावणगर्वसोंपुरजारियो । पुनिसौंपिसीतहिमुद्रिका-

मणिशीशकीजबपाइयो । बलवन्तनांविअनंतसागरतैसही
फिरिआइयो ॥ ५३ ॥ दशकंठदेखिबिभीषणैरनब्रह्मशक्तिच-
लाइयो । करिपीठित्योंशरणागतैतबआपवक्षसिलाइयो । एक
यामयामिनिमैंगयोहतिदुष्टपर्बतआनिकै । त्यहिकाललक्ष्मण
कोजिआइजिआइयोहम्जानिकै ॥ ५४ ॥ दोहा ॥ अपने
प्रभुकोआपनो, कियोहमारोकाज ॥ ऋषिऋक्षकहौहनुमंतसों,
भक्तनकोशिरताज ॥ ५५ ॥ चामरछन्द ॥ बीरधीरसाहसी
बलीजेबिक्रमीक्षमी । साधुसर्वदासुखीतपीजपीजेसंयमी ॥
भोगभागयोगयागवेगवन्तहँजिते । वायुपुत्ररामकाजवारिडारि
येतितै ॥५६॥ दोहा ॥ सीतापाईरिपुहत्यो, देख्योतुमअरुगेहु
रामायणजपसिद्धिको, कपिशिरटीकादेहु ॥ ५७ ॥ दोहा ॥
यहिबिधिकपिकुलगुणनको, कहतहुतेश्रीराम ॥ देख्योआश्रम
भरथको, केशवनन्दीग्राम ॥ ५८ ॥
टी०-अनंत कहे बडो ॥ ५३ ॥ दुष्टपदते कालनेमि जानो लक्ष्मणको जियाइ
हम कहे हमें जिआयो लक्ष्मणके मरे राम न जी हैं यह जानिकै ॥ ५४ ॥ सब
भक्तनके शिरताज एई हैं इति भावार्थः ॥ ५५ ॥ विक्रमी ( उपायी ) भाग कहे
(भाग्य) वतुप्रत्ययांतः भोगादिपांचौं शब्द जानौ राजकाजमें वायुपुत्र पर इत्यादिकन
(वीरादिकन) को सबन वारि डारियत है अर्थ जो रामकाज वायुपुत्र सँवारचो
है सो इन वीरादिकनको काहूको सँवारचो न सँवरतो ॥ ५६ ॥ रामायण कहे
रामकथा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
मू०-सुन्दरीछंद ॥ पुष्पकतेउतरेरघुनायक ॥ यक्षपुरीपठये
सुखदायक ॥ सोदरकोअवलोकितपोथलु।भूलिरह्योकपिरिक्ष-
सकोदलु ॥ ५९ ॥ कंचनकोअतिशुद्धसिंहासन । रामरच्यो
त्यहिऊपरआसन ॥ कोपरहीरनकोअतिकोमल । तामहँकुंकु-
मचन्दनकोजल ॥६०॥ दोहा ॥ चरणकमलश्रीरामके, भरत

पखारेआप ॥ जातेगंगादिकनको, मिटतसकलसंताप ॥६१॥
पंकजवाटिकाछंद ॥ सूरजबचरणबिभीषणकेअति । आपुहिभ-
रतपखारिमहामति ॥ दुन्दुभिधुनिकरिकैबहुभेवनि । पुष्पबर-
षिहरषेदिविदेवनि ॥ ६२ ॥ दोहा ॥ पीछेदुरिशत्रुघ्नसुन, ल-
क्ष्मणधवायेपाइ ॥ चरणसौमित्रिपखारियो, अंगदादिकेआइ ॥
॥ ६३ ॥ तोमरछन्द ॥ शिरतेजटानिउतारि । अँगअंगराग
निधारि ॥ तनभूषिभूषणबस्त्र । कटिसोंकसेसबशस्त्र ॥ ६४॥
दोहा ॥ शिरतेपावनपादुका, लेकरिभरतबिचित्र ॥ चरणक-
मलतरहरिधरी, हँसिपहिरि जगमित्र ॥ ६५ ॥
टी०-यक्षपुरी कुबेरपुरी ॥ ५९ ॥ कोमल कहे चिकण ॥ ६० ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
सौमित्रि शत्रुघ्न ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ तरहरि कहे तरे ॥ ६५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीराम

देवनशावैं । फूलनकीबरषाबरषावैं ॥ हीननिमेषसबैअवलो-
कैं । होडपरीबहुधादुहुँलोकैं ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ देवतनके प्रतिबिंब सम अवधवासी अवधवासिनके
प्रतिबिंब सम देवता मोद बढ़ावत हैं अर्थ जो आनंद क्रिया हास्यादि अवधबासी
करत हैं सोई देवता करत हैं ॥ ४ ॥ होड कहे वहस मानो अवधवासी वहस
करि देवता लोकको धूरि उडावत हैं औ देवता ता धूरिको फूलनकी अति वृष्टि
करि नशाइ देते हैं अर्थ दबाइ लेते हैं औ देवता तो अनिमेषही हैं औ रामचन्द्रके
दर्शनमें अवधवासिनहूकी पलक नहीं लागत सो मानों परस्पर होड किये हैं कि
देखिये धौ काकी पलक लागति हैं यामें ( असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा ) है ॥ ५ ॥
मू०-तारकछंद ॥ सिगरेदलऔधपुरीतबदेखी । अमराव-
तितेअतिसुन्दरलेखी ॥ चहुंओरबिराजतिदीरघखाई । शुभ
देवतरंगिनिसीफिरिआई ॥ ६ ॥ अतिदीरघकंचनकोटबिरा-
जैं । मणिलालकँगूरनकीरुचिराजैं ॥ पुरसुन्दरमध्यलसैछबि
छायो । परिवेषमनोरबिकोफिरिआयो ॥ ७ ॥ दोहा ॥ बिबि-
धपताकाशोभिजैं, ऊंचेकेशोदास ॥ दिविदेवनकेशोभिजैं,
मानहुँब्यजनबिलास ॥ ८ ॥ बिजयछंद ॥ चढ़ीप्रतिमंदिर
शोभबढ़ीतरुणीअवलोकनकोरघुनन्दनु । मनोगृहदीपतिदेह
धरेसुकिधौंगृहदेविबिमोहितिहैमनु ॥ किधौंकुलदेविविदियेअति
केशवकैपुरदेविनकोहुलस्योगनु । जहीं सोतहीँयहिभांतिलसैं
दिविदेविनकोमदघालतिहैमनु ॥ ९ ॥
टी०-देवतरंगिनी ( गंगा ) सम कह्यो तासों विमल जल युक्त जानो ॥ ६॥
रविसम अयोध्यापुरी है परिवेष सम कंचनकोट है ॥ ७ ॥ व्यजन ( पंखा ) ॥
॥ ८ ॥ अपनी सुन्दरतादि देखाइ देविनकी सुन्दरतादिको मद् दूरि करती हैं
अवधपुरीकी स्त्री देविनहूँसो अधिक सुंदरी हैं इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ अतिऊंचेमंदिरनपर, चढ़ीसुन्दरीसाधु ॥ दि-
विदेवनकोकरतिहैं, मनुआतिथ्यअगाधु ॥१०॥ तोटकछंद ॥

नरनारिभलीसुरनारिसबै । तिनकोऊपरैपहिंचानिअबै ॥
मिलिफूलनकीबरषैंबरषा । अरुगावतहैं जयकेकरषा ॥११॥
पद्मावतीछंद ॥ रघुनन्दनआयेलुनिसबधायेपुरजनजैसेतैसे॥
दर्शनरसभूलेतनमनफूलेबरणेजाहिनजैसे ॥ पतिकेसँगनारी-
सबसुखकारीरामहिंयोहगजोरी । जहँतहँचहुँओरनिमिलीझ-
कोरनिचाहतिचन्दचकोरी ॥ १२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ बहुभां-
तिरामप्रतिद्वारद्वार । अतिपूजतलोगसबैउदार ॥ यहिभांति-
गयेनृपनाथगेह । युतसुन्दरिसोदरस्योसनेह ॥ १३ ॥ दोहा॥
मिलेजायजननीनकों, जबहीश्रीरघुराइ ॥ करुणारसअद्भुत
भयोमौपैकह्योनजाइ ॥ १४ ॥ सीतासीतानाथजू, लक्ष्मण
सहितउदार । सबनमिलेसबके किये, भोजनएकहिबार ॥१५॥
टी०-अति सुंदर रूप आतिथ्यसम है ॥ १० ॥ यासों या जनायो कि जेती
दूरि देविनको विमान है तेतेई ऊंचे अवध बासिनके गृह हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥
नृपनाथ (दशरथ) ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मू०-सोरठा ॥ पुरजनलोगअपार, यहईसबजानतभये ॥
हमहींमिलेअगार, आयेप्रथमहमोरही ॥१६॥ मदनहराछंद ॥
सँगसीतालक्ष्मणश्रीरघुनन्दनमातनकेशुभपाइपरेसबदुःखह-
रे॥ आँसुनअन्हवायेभागनिआयेजीवनपायेअंकभरेअरुअंक-
धरे ॥ तेबदननिहारैंसरबसुवारैंदेहिंसबैसबहीनघनोअरुलेहिं-
घनो । तनमननसँभारैंयहैबिचारैंभागबडोयहहैअपनोकिधौं-
हैसपनो ॥ ॥ १७॥ स्वागताछन्द ॥ धामधामप्रतिहोति-
बधाई । लोकलोकतिनकीधुनिधाई ॥ देखिदेखिकपिअद्भुत-
लेखैं । जाहिंयत्रतित रामहिंदेखैं ॥ १८ ॥ दौरिदौरिकपिराव-

द्वाविंशप्रकाशः २२. (२२७)

रआवैं । बारबारप्रतिधामनिधावैं ॥ देखिदेखितिनकोदैतारी ।
भांतिभांतिबिबिहसैंपुरनारी ॥ १९ ॥
टी०-॥ १६ ॥ रामचन्द्रजू भागनसों आये तासों मातन जीवन समपाये सो
अंकमें भरे कहे अति प्रेमसो छातीमें लगाये फेरि अंक जो गोद है तामें धरे
कहे बैठारे तब आनंदअश्रुनसों सीता राम लक्ष्मणको अन्हवाये औ ते सबै कौश-
ल्यादि माता रामादिके वदन निहारती हैं औ तिनपर सर्वस्व वारि वारि सबको
अर्थ याचक नेगिनको देती हैं औ तिन याचकनसों आशीर्वाद करि घनो लेती
हैं पावती हैं अर्थ याचक आशीर्वाद देते हैं कि जो हमको तुम दियो ताको कोटि
गुणित तुम्हारे होय अथवा रामादिके वदन दर्शनहीसों घनो लेती हैं पावती हैं
अर्थ मुखदर्शन करि घनो पायो सम मानती हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥ रावर (स्त्री
भवन) ॥ १९ ॥
मू०-श्रीराम-दोहा ॥ इनसुग्रीवबिभीषणै, अंगदअरुहनु-
मान ॥ सदाभरतशत्रुघ्नसम, माताजीमैं जान ॥ २० ॥ सुमि-
त्रा-सोरठा ॥ प्राणनाथरघुनाथ, जियकीजीवनमूरिहौं॥ लक्ष्म-
णहेतुमसाथ, क्षमियहुचूकपरीजोकछु ॥ २१ ॥ राम-दंडक ॥
पौरियाकहौं कि प्रतीहारकहौं किधौं प्रभुपुत्र कहौं मित्र किधौं मंत्री-
सुखदानिये । सुभटकहौं किशिष्यदासकहौं किधौं दूत केशोदा-
सहायकोहथ्यारउर आनिये । नैनकहौं किधौं तनमनकिधौं
तन त्राण बुद्धिकहौं किधौं बल बिक्रम बखानिये । देखिबेको-
एकहैं अनेक भांतिकीन्हीसेवा लक्ष्मणके मात कौन कौनगुणगा-
निये ॥ २२ ॥
टी०-॥ २० ॥ २१ ॥ पौरियाजो मुख्यद्वारकी रक्षामें रहते हैं प्रतीहार जो
राजसभाद्वारमें सुवर्णादिको दंडलै ठाढो रहत है बल जोर विक्रम यत्न ये सब
एक एक आपनो आपनो कार्य करि सुख देत हैं सो लक्ष्मण जहा जाको
काज लाग्यो है तहा ताही विधि तौन काज करि हमको परम सुख दीन्हो
है ॥ २२ ॥

( २२८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-मोटनकछंद ॥ शत्रुघ्नबिलोकतरामकहें ॥ डेरानिस
जौजहँसुःखलहैं ॥ मेरेघरसंपतियुक्तसबै । सुग्रीवहिदेहुनिवास
अबै ॥ २३ ॥ साजेजोभरथसबैधनको। राखौतहँजाइबिभी-
षणको ॥ नैऋत्यनकोकपिलोगनको। राखौनिजधामनिभो-
गनको ॥ २४ ॥ दोहा ॥ एकएकनैऋत्यको, जितनेबानर-
लोग । आगेहीठाढेरहत, अमितइंद्रकेभोग ॥ २५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजि-
द्विरचितायांरामस्यायोध्यापुरप्रवेशोनामद्वाविंशः प्रकाशः ॥ २२ ॥
टी०-संपति ( अनेक भोग वस्तु ) ॥ २३ ॥ २४ ॥ अमित कहे
अप्रमाण ॥ २५ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद-
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकाया द्वाविशः प्रकाशः ॥ २२ ॥
मू०-दोहा ॥ या तेइसयेंप्रकाशमें ऋषिजनआगमलेषि ॥
राज्यश्रीनिंदाकही, श्रीमुखरामविशेषि ॥ १ ॥ मल्लिकाछंद॥
एककालरामदेव । सोधुबंधुकरतसेव ॥ शोभिजैसैबैसोऔर ।
मंत्रिमित्रठौरठौर ॥ २ ॥ बानरेशयूथनाथ । लंकनाथबंधु-
साथ ॥ शोभिजैसैबैसमीप । देशदेशकेंमहीप ॥ ३ ॥ दोहा ॥
सरसस्वरूपबिलोकिकै, उपजीमदनहिंलाज ॥ आइगयेताही
समय, केशवऋषिऋषिराज ॥ ४ ॥ असितअत्रिभृगुअं-
गिरा, कश्यपकेशव व्यास॥ विश्वामित्रअगस्त्ययुत, बालमी-
किदुर्बास ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ बानरेश [ सुग्रीव ] यूथनाथ [ अंगदादि ] लंकनाथ जे बंधु
बिभीषण अथवा बंधु जे जातिवर्ग हैं राक्षस गण इति ते हैं साथ जिनके ऐसे लंकनाथ
जे बिभीषण हैं ते ॥ ३ ॥ सरस कहे आपनासों अधिक सुन्दर ॥ ४ ॥ ५ ॥