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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 269 में से

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पृष्ठ 216

( २१० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-तहां ता आश्रममों विप्रनके बीचमों बैठे अनेक इतिहासादि कहि विप्रनके
मनको मोहतहैं इत्यर्थः लोकेश (ब्रह्मा) ॥४०॥मृग जब छेरू [मृगबालक] सटा
[ग्रीवाके बार] डोरे डोरे कहे डोल डोल अंध तापस कहे बडे तपस्वी यासों बानर-
को ऋषिनके ताडनसों अति निर्भयता जनायो अथवा अंध कहे आंधरे जो तापस
कहे तपस्वी हैं तिनके डोरे कहे हाथको गहे अर्थ जहां जाइवेकी इच्छा करत हैं
तहां बानर पठाइ आवतहैं, औ शिवके समाजमें मृगजबछेरू पदते चन्द्रमाके रथके
हरिण जानौं अथवा और अनेक गणके मृगवाहन हैं यथा तुलसीकृत रामायणे
“नानावाहननानावेषा । हरषेशिवसमाजनिजदेखा ॥” औ सुरभि पदते महादेवको
वाहन वृषभ जानौं औ वाघबालक पदते काहू गणको वाहन बाघ जानौं औ सिंह
पदते देवीको वाहन सिंह जानौं अथवा दूनों पदते सिंहही जानौं औ गयंदपदते
गणेश जानौं औ फणी महादेव धारण करे हैं मोर स्वामिकार्त्तिकको वाहन है
अंधतापस कहे तापस वेषधारी जे आंधरे गण हैं यथा तुलसीकृत रामायणे ॥
“विपुल नयन कोउ नयनविहीना।।”औ बानर पदते बानरमुखगण जानौ यथातुल-
सीकृतरामायणे । खरश्वानशूकरशृगालमुखगण वेषअगणित कोगनै । जैसे शिवके-
समाजमें स्वाभाविक विरोधी जीव अविरुद्ध रहत हैं तैसे आश्रमहूंमें रहत हैं
इति भावार्थः ॥ ४१ ॥
मू०-भुजंगप्रयातछन्द ॥ जहांकोमलैवलकलैबाससोहैं ।
जिन्हेंअलपधीकल्पसाषीबिमोहैं ॥ धरेश्रृंखलादुःखदाहैदुरंतै ।
मनौंशम्भुजीसंगलीनेअनंतै ॥ ४२ ॥
टी०-यामें आश्रमके ऋषीजननको वर्णन है जहां जा आश्रममें ऋषिनके
कोमल बल्कलहीनके वस्त्र सोहत हैं परन्तु जिनको देखि अल्पधी [लघुबुद्धि]
अर्थ स्पर्द्धायुक्त है बुद्धि जिनकी ऐसे जे कल्पशाखी [कल्पवृक्ष] हैं ते बिमोहैं-
कहे मोहित होत हैं अथवा अल्पकी धी कहे बुद्धिसों अर्थ हम इनसों लघु हैं या
बुद्धिसों मोहत हैं केवल वचनहीसों एतो देत है जे तो कल्पवृक्षनहूंको मोह होत
है कि हमहूं इनसम न भये; अथवा [कल्पसाक्षी] पाठ होई तौ जिनको देखि
अल्पकी धी करिकै अर्थ हम इनसों लघु हैं या बुद्धिसों कल्पासाक्षी जे कल्पांतयोनि
[मार्कंडेय] आदि हैं ते मोहत हैं औ केवल श्रृंखला जो कठिन बंधन है ताको
धारण करे हैं परन्तु दुरंत कहे बडे जे ओरनके दुःख हैं तिनको दाहै कहे नाश
करत हैं अर्थ ऐसे ऐसे आचार्य कृत्यनसों युक्त हैं । “श्रृंखला पुल्कटी
वस्त्रबन्धे च निगडे त्रिषु इति मेदिनी ॥” महादेव, अनंत जे शेष हैं