सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

यातछन्द ॥ मनौंअंकुरालीलसै सत्यकीसी । किधौंवेदविद्या
प्रभाईभ्रमीसी ॥ रमैंगंगकीज्योतिज्योंजहुनीकी । बिसजैस-
दाशोभदंतावलीकी ॥ ४६ ॥
टी०-त्रिस्रोता [ गंगा ] कहूं 'वंदति' पाठ है तहां या अर्थ कि त्रिस्रोताके
सोतनकी द्युति लिलारमें लगी भरद्वाजको वंदति है अर्थ सेवति है ॥ ४५ ॥
सत्यको रंग श्वेत है प्रभा [ शोभा ] भ्रमी कहे भरद्वाजको मुखरूपी शुभस्थान
पाइकै आश्चर्ययुक्त ह्वै रहीहै अर्थ प्रसन्न ह्वै रहीहै ज्यों कहे जानों जन्हु ऋषिके
मुखमें नीकी गंगाकी ज्योति रमति है जहु ऋषि गंगाको पान कियो है सो
कथा प्रसिद्ध है ॥ ४६ ॥
मू०-गीतिकाछन्द ॥ भ्रुकुटीबिराजतिश्वेतमानहुँमंत्रअद्भुत
सामके । जिनकेबिलोकतहीबिलातअशेषकर्मजकामके ॥
मुखबासआशप्रकाशकेशवभौँरभीरनसाजहीं । जनुसामके
शुभस्वक्षअक्षरह्वैसपक्षबिराजहीं ॥ ४७ ॥ तनुकम्बुकण्ठत्रि-
रेखराजतिरज्जुसीउनमानिये । अविनीतइंद्रियनिग्रहीतिनके
निबंधनजानिये । उपवीतउज्ज्वलशोभिजैउरदेखियोंबरणैस-
बै । सुरआपगातपसिंधुभैजसश्वेतश्रीदरशैअबै ॥ ४८ ॥
टी०-[ सामवेद ] काम जो कंदर्प है ताके जे कर्म हैं परस्त्री गमनादि तिनते
ज कहे उत्पन्न जे वस्तु हैं अम ( पातक ) ते अशेष कहे संपूर्ण बिलात हैं अथवा
काम जो हैं शुभ अशुभ अभिलाष तिनके जे कर्म हैं तिनते ज कहे उत्पन्न वस्तु
हैं अर्थ स्वर्ग नरक भोग शुभ अभिलाषके कर्मनसों स्वर्गभोग उत्पन्न होतहैं,
अशुभ अभिलाषके कर्मनसों नरक भोग उत्पन्न होत हैं, ते दुवौ बिलात हैं अर्थ
जिनको देखि प्राणी स्वर्ग, नरकभोगसों भिन्न होत हैं अंतमें मुक्तिपावत
हैं; प्रथम कह्यो है कि, स्वर्ग नरकहंतानामश्रीरामकैसो । औ सामके मंत्रके
पुरश्चरणसों कामके कर्मज बिलात हैं इनके देखतही तासों अद्भुत करयो बास
सुगंध ॥ ४७ ॥ कंबु सदृश कंठमें तनु सूक्ष्म त्रिरेख राजति है ताहि रज्जु
कहे जेवरीसम अनुमानियत है सो जेवरी काहेके लिये है अविनीत कहे अशि-
क्षित अर्थ आज्ञा टारि अभिलषित बात कर्त्ता जे इंद्रिय नेत्रादि हैं तिनके निग्रही