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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 269 में से

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पृष्ठ 219

कहे ताडन कर्त्ता अर्थ दुःखदु निबंधन कहे बंधन है तपसिंधु ( भरद्वाज ) हैं
सुरआपगा ( गंगा ) के तीनों सोतसम उपवीनके तीनों सूत्र हैं सिंधुमें मिलिबो
नदीको धर्म है ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ फटिकमालशुभशोभिजै, उरऋषिराजउदार ॥
अमलसकलश्रुतिवरणमय, मनौंगिराकोहार ॥ ४९ ॥
सुंदरीछंद ॥ यद्यपिहैरसरूपपरस्यौतनु । दंडहिसोअवलंबितहै-
मनु ॥ धूमशिखानकेव्याजमनौंगुनि । देवपुरीकहँपंथ रच्यौ-
मुनि ॥ ५० ॥ रूपधरेबडवानलकोजनु । पोषतहैंपयपान-
हिंसोतनु ॥ क्रोधभुजंगममंत्रबखानहुँ । मोहमहातमकेर-
विमानहुँ ॥ ५१ ॥
टी०-श्रुतिवर्ण ( वेदाक्षर ) सम स्फटिक गुरिया हैं औ भरद्वाजकी वाणी
( सरस्वती ) डोरासम है अर्थ सरस्वतीमें गुहिकै मानों वेदाक्षरनहीकी माला
पहिरे हैं ॥ ४९ ॥ वृद्धतासों चलिबेके लिये दंड लियेंहैं तामें तर्क करतहैं कि
ऋषिको तनुरूप रस पदते रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श, पांचों इंद्रिनके पांचों
विषय जानों तिनकरिकै कहे तिनकी वासना करिकै रह्यो कहे व्यै गयौहै रहित
भयो है इति अर्थ वृद्धतासों नेत्रादि इंद्रिनमें रूपादि विषयकी वासना टरि गई
है ताहूपर मानों दंडसों अवलंवित कहे युक्त है दंडपद श्लेष है दंड कहे निग्रह
औ लकुट औ अग्निहोत्राग्निको आहुतिसों नित्यहीं प्रज्वलित कियो करत हैं तामें
तर्क है कि धूमशिखा जो अग्नि है ताके व्याज मानों देवपुरीको पंथ ( गह )
बनायो है ॥ ५० ॥ पय ( दुग्ध ) औ ( जल ) ॥ ५१ ॥
मू०-सत्यसखाअसखाकलिकेजनु । पर्बतऔषधिसिद्धिन-
केमनु ॥ पापकलापनकेदिनदूषण । देखिप्रणामकियोजग-
भूषण ॥ ५२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ सीतासमेतशेषावतार । दंड-
वत कियेऋषिकेअपार ॥ नरवेषबिभीषणजामवंत । सुग्रीवबा-
लिसुतहनूमंत ॥ ५३ ॥ ऋषिराजकरीपूजाअपार । पुनिकुश-
लप्रश्न पूंछीउदार ॥ शत्रुघ्नभरतकुशलीनिकेत । सबमित्रम-