रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिनको संगमें लीन्हें हैं धारण करे हैं औ ऋषिजन अनंत जे भगवान हैं
तिनके ध्यानसों अथवा कथन सों संगमें लीन रहते हैं ॥ ४२ ॥
मू०-मालिनीछंद ॥ प्रशमितरजराजैहर्षवर्षामयैसे ।
विरलजठनशाखीस्वर्नदीकूलकैसे ॥ जगमगदरशाईसूरकेअंशु
ऐसे ॥४३॥ गहेकेशपाशैंक्रियासीबखानौं । कँपैशापकेत्रासते-
गातमानौं ॥ मनौचंद्रमाचंद्रिकाचारुसाजैं । जरासोंमिलेयों-
भरद्वाजराजैं ॥ ४४ ॥
टी०-फेरि कैसे हैं ऋषिजनसो कहत हैं वर्षामयमें रज जो धूरि है सो
प्रशमित कहे नष्ट ह्वैजाति है ऋषिनके रजोगुण सब ऋषि सत्त्वगुणी हैं इति
भावार्थः स्वर्नदी [ गंगा ] के कूलको साखी [ वृक्ष ] विरल कहे प्रगट जटा जे
जरे हैं तिनसहित हैं इहां स्वर्नदीकूलको साखी कहि अति पावन ताहू जनायो
अथवा स्वर्नदी उपलक्षणमात्र है नदीमात्रके कूलको जानौं नदीके प्रवाहके