रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
शक्ती, आवैतेहिगहिखाउँ ॥ रामरूपसीताहरण,उधरहुगहनउ
पाउ॥३४॥सुरसरितेआगेचले,मिलिहैंकपिसुग्रीव।दैहैंसीताकी
खवरि, बाढैसुखअतिजीव ॥३५॥ तोटकछंद ॥ सरिताएकके-
शवसोभरई । अवलोकितहांचकवाचकई ॥ उरमेंसियप्रीतिस-
माइरही । तिनसोंरघुनायकबातकही ॥ ३६ ॥ अवलोकतहौं
जबहींजबहीं। दुखहोततुम्हैंतबहींतबहीं॥ वहबैरनचित्तकछूध-
रिये । सियदेहुबताइ कृपाकरिये ॥ ३७॥ शशिकेअवलोकन
दूरिकिये । जिनकेमुखकीछविदेखिजिये। कृतचित्तचकोरकछू-
कधरौ । सियदेहुबताय सहायकरौ ॥ ३८ ॥
टी०-॥३४॥करुणा करिकै द्वै कोश कि वाहु दई औ यह वर दियो कि जो इन
बाहुनके मध्यमें आवै ताको खाहु जब सीताहरण हैहै तब रामचन्द्र या मग अइहैं
तिनके गहन उपाय सों उद्धरहु कहै तुम्हारो उद्धार होई अर्थ जब रामचन्द्रको इन
बाहुनसों गहिहै तब तेरो उद्धार हैहै ॥ ३४ ॥ सुरसरि गोदावरी ॥ ३५ ॥३६ ॥
जब सीताको तुम अवलोकत रहे कहै देखत रहौ तब अपनासों अधिक सुन्दर
सीताके कुच देखि तुम्हारे दुख होत रहै अथवा हमको संयोगी देखत तासों
तुम्हारे दुःख होत रह्यो ॥ ३७ ॥ शशि जो अति सुन्दर जिनके मुखको देखि
शशिकी ओर विलोकिबो छोड़ि केवल जिनके मुखकी छविको देखिकै जियत
रहेहौ अथवा शशिके अवलोकन दर्शन दूरिकिये पर अर्थ जब कृष्णपक्षमें चन्द्रमा
आपनो दर्शनदृष्टि सों दूरि कियो न देखि परयो तब चन्द्रसम केवल जिनके
मुखकी छविको देखि जियत रहे हौ वह कृत कहै उपकार कछु चित्तमें धरिकै
सीताको बताइ देउ ॥ ३८ ॥
मू०-सवैया ॥ कहिकेशवयाचककेअरिचंपकशोकअशोक
लियेहरिकै । लखिकेतककेतकिजातिगुलाबतेतीक्षणजानितजे
डरिकै ॥ सुनिसाधुतुम्हैं हमबूझनआयेरहेमनमौनकहाधरिकै ।
सियकोकछुसोधुकहौकरुणामयसोकरुणाकरुणाकरिकै॥३९॥
नाराजछंद॥ हिमांशुमूरसोलगैसोबातबज्रसोबहै। दिशालगैंकु-
( ११८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शानुज्यौविलेपअंगकोदहै ॥ विशेषिकालरातिलोकरालराति
मानिये । वियोगसीयकोनकाललोकहारजानिये ॥ ४० ॥
टी०-रामचन्द्र करुण वृक्षसों कहत हैं कि चम्पक जेहैं ते याचकर्क अरि शत्रुहैं
पुष्पनको याचक जो भ्रमर है ताकों निकट नहीं आवनदेत चंपकमें भ्रमर नहीं
बैठत यह प्रसिद्ध है ता भयसों चंपक सो सीताको सोधु नहीं जांचे अशोक जे
वृक्ष हैं तिनकं शोककों हरिकै छोडिकै अशोक यह जो नाम है ताको लीन्हों
है तासों जिनहूको तज्यौहै कि जिनके शोक हैही नहीं ते हमारो दुःख देखि
दुःखी है कृपा करि सीताको सोधु काहेको बताई है केतक केवरा औ केतकी
औ गुलाब इनकी जाति जे और कंटक वृक्ष हैं कमलादि तिन्हें तीक्ष्ण कहे कंट-
कित जानिकै डरिकै तज्यौ है सो हे करुणा कहे करुण वृक्ष ! करुणा कहे
दीनतामय जे हमहैं तिनसों सीताको कछू सोधु कहौ ॥३९॥ रामचन्द्र लक्ष्मणसों
कहत हैं कि हिमांशु जो चन्द्रमा है सो हमको सूर्य सम तप्त लागत है औ वायु
वज्रसम बहात है औ दशों दिशा अग्निके समान तप्तलागतिहैं औ तुम जो
शीतलताके अर्थ हमारे अंगनमें विलेप करतहौ सो अंगनकोजारतहै औ राति
काल राति समकराल लागति है औ सीताको वियोग लोक हरकाल संहार काल
सम लागत है ॥ ४० ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ यहिभाँतिविलोकेसकलठौर । गये
शबरीपैदोउदेवमौर ॥ लियोपादोदकत्यहिपदपखारि । पुनि
अर्ध्यादिकदीन्हेंसुधारि ॥ ४१ ॥ हरदेतमंत्रजिनकोविशाल
शुभकाशीमेंपुनिमरणकाल॥ तेआयेमेरेधामआज । सबसफ-
लकरनजपतपसमाज ॥४२॥ फलभोजनकोतेहिधरेआनि ।
भयेयज्ञपुरुषअतिप्रीतिमानि ॥ तिनरामचन्द्रलक्ष्मणस्वरूप ।
तबधरेचित्तजगजोतिरूप॥४३॥ दोहा ॥ शबरीपावकपंथतब,
हरखिगईहरिलोक ॥ बननबिलोकितहरिगये, पंपातीरसशोक
॥ ४४ ॥ तोटकछंद ॥ अतिसुन्दरशीतलसोभवसै । जहँरू-
पअनेकनिलोभलसै ॥ बहुपंकजपक्षिविराजतहैं । रघुनाथवि-
लोकतलाजतहैं ॥ ४५ ॥ सिगरीऋतुशोभितसुभ्रजही । लहै
ग्रीषमपैनप्रवेशसही ॥ नवनीरनीरताँहँसरसैं । सियकेशुभ
लोचनसेदरसैं ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४१ ॥ मंत्र राम तारक तप औ जप समाज के सफल करन कहे
सफल कर्त्ता अर्थ जो कोऊ जप तप करत है ताको फल रामचंद्र ही देत हैं ॥
॥ ४२ ॥ ४३ ॥ जीवतही अग्निमां जरिकै ॥ ४४ ॥ कैसो है पंपासर अति
सुंदर है औ अति शीतल है जहां शोभा जो है सदा आय वास करति है औ
जहां कहे स्थान में जातही प्राणिन के अनेक रूप सो लोभ बसतहै अर्थ जहां
जातही प्राणिन के रहिबेको लोभबाढत हैं औ बहुत पंकज कमल औ हंसादि
पक्षी विराजतहैं ते रामचन्द्रको देखिकै लज्जित होत हैं जा अंगको जो उपमान
है ता अंगको निरखि अपना सों अधिक जानि लजात हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
मू०-विजयछंद ॥ सुन्दरसेतसरोरुहमें करहाटकहाटककी
द्युतिकोहै । तापरभौरभलेमनरोचनलोकविलोचनकीरुचिरो-
है। देखिदईउप
कह्यो सों संग मित्र जो चंदहै ताको विलोकि इनको चित्त जरत है सोऊ न्यायही
है काहेते निशाचरन की पद्धति परिपाटीको लिये है निशाचर राक्षसहू हैं चंदहू
है सो निशाचरन की राक्षसन की परिपाटीको लिये है राक्षसनहूंको देखतही
चित्तजरतहै औ मृग मित्रकहिया जनायो कि पशुनको मित्र है प्रतिकूला दुःखद
जो शुकादिक होतहैं सोऊ न्यायही है काहेते वे पक्षी पशुहैं इनकी गतिको नहीं
जानत कि ये ईश्वरहैं कमलाकरपद श्लेष है कमलनके आकर समूहसों युक्त औ
कमला लक्ष्मीके उत्पन्नकर्ता युक्ति यह कि ये तुम्हारे जामोतु हैं इनको दुःख
देना तुम्हें न चाहिये ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ ऋष्यमूकपर्वतगये, केशवश्रीरघुनाथ ॥ देखे
वानरपंचविभु, मानोदक्षिणहाथ ॥४९॥ कुसुमविचित्राछंद ॥
तबकपिराज रघुपतिदेखे । मननरनारायणसमलेखे॥ द्विजव-
पुधरि तहँहनुमत आये । बहुविधिआशिषदैमनभाये ॥ ५० ॥
हनुमान ॥ सबविधिरूरेबनमहँकोहौ । तनमनसूरेमनमथमों-
हौ ॥ शिरसिजटावकलाबपुधारी । हरिहरमानहुँविपिनबिहारी
॥ ५१ ॥ परमबियोगीसमरसभीने । तनमनएकैयुगतनकी-
ने ॥ तुमकोहौकालगिबन आये । क्यहिकुलहौकौनैपुनिजाये
॥ ५२ ॥ राम-चंचरीछंद ॥ पुत्रश्रीदशरथकेबनराजशासन
आइयो । सीयसुन्दरिसंगहीबिछुरीसोसोधनपाइयो ॥ राम
लक्ष्मणनामसंयुक्तशूरवंशबखानिये । रावरेबनकौनहौक्यहि
काजक्यौंपहिंचानिये ॥ ५३ ॥
टी०-सुग्रीव हनूमान नल नील सुषेण य पांच जे वानरहैं बिभु कहे प्रतापी
तिन सहित ऋष्यमूक को देख्यो मानों सो पृथिवीको दक्षिण हाथहै पृथिवी इति
शेषः अथवा मानों अपनो दक्षिण हाथही देख्यो है मित्रको औ भ्राता को दक्षिण
बाहुसम कहिबेकी रीतिहै ॥ ४९ ॥ नरनारायणके द्वैरूप हैं ॥ ५० ॥ रूरे सुन्दर
१ दामाद ।
द्वादशप्रकाशः १२. ( १२१ )
॥ ५१ ॥ परम वियोगी हौ अर्थ तुम्हारी चेष्टाते जानि परत है कि काहू बडे
हितको बियोग भयो है औ जटा वल्कलादि सों शान्तरसमें भीनेजानि परतहौ ॥
॥ ५२ ॥ शासनआज्ञा ॥ ५३ ॥
मू०-हनुमान-दोहा ॥ यागिरिपरसुग्रीवनृप, तासँगमंत्री
चारि ॥ वानरलईछँड़ाइतिय, दीन्होवालिनिकारि ॥ ५४ ॥
दोधकछंद ॥ वाकहँजोअपनोकरिजानो । मारहुवालिविनैयह
मानो ॥ राजदेहुजोवाकीतियाको । तोहमदेंहिंबतायसिया-
को ॥ ५५ ॥ लक्ष्मण ॥ आरतकेप्रभुआरतटारौ । दीनअना-
थनकोप्रतिपारौ ॥ स्थावरजंगमजीवजोकोऊ । सन्मुखहोतकृ-
तारथसोऊ ॥ ५६ ॥ वानरहैहनुमानसिधारेउ । सूरजकोसु-
तपायँनिपारेउ ॥ रामकह्योउठिवानरराई । राजसिरीसखिस्यो
तियपाई ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ उठेराजसुग्रीवतब, तनमनअतिसु-
खपाइ ॥ सीताजूकेपटसहित, नूपुरदीन्हेआइ ॥५८॥ तारक
छंद ॥ रघुनाथजबैपटनूपुरदेखे । कहिकेशवमानसमानाहँले-
खे ॥ अवलोकतलक्ष्मणकेकरदीन्हे । उनआदरसोंशिरमानि-
कैलीन्हे ॥ ५९ ॥ राम-दंडक ॥ पंजरकीखंजरीटनैननको-
किधौंमीनमानसको केशोदासजलुहैकिजालुहै । अंगकोकि
अंगरागगेडुआकीगलसुईकिधौंकटिजेबहीकोउरकोकिहारुहै॥
बंधनहमारोकामकेलिकोकिताडिबेकोताजनोंविचारकोकीच-
मरबिचारुहै । मानकीजमनिकाकी कंजमुखमूंदिबेकोसीता-
जूकोउत्तरीयसबसुखसारुहै ॥ ६० ॥
टी०-वानर वालिको विशेषण है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ कृतार्थ कहे कृतहै अर्थ
प्रयोजन जाको ॥ ५६ ॥ अर्थ वालिको मारि कै राज्य श्रीसहित तुम्हारी स्त्री
हम तुमको दैंहैं ऐसा निश्चय वचन रामचंद्र सुग्रीवको दियो ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
( १२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शिर मानिकै कहे शिरपर राखि कै ॥ ५९ ॥ रामचन्द्रकहत हैं कि हमारे खंजे-
रीट कहे खंजरिचस्पीनयनहैं तिनको पंजर पिंजराहै जामें परिनयन कै कढन
नहीं पावत औ कि मीनरूपी जो मानस मन है ताको जल है कि जालु है जैसे
मीन जलसों नहीं कढति तैसे मन यासों नहीं कढत औ जालको औ पंजरको
हेतु एकही है अंगन को कि अंगराग कहे चंदनादि को लेपैहै कि गेरुआ तकिया
है कि गलसुई छोटी तकिया है अर्थ स्पर्शते अंगनको अंगरागादि सम सुखदैहै
औ कि कटिजेव कहे क्षुद्रघंटिका है औ किही को जेव कहे धुकधुकी है जेवपदको
संबंध याहूमैं है औ कि उरको हार है औ कि कामकेलि समयको हमारो बंधन
फांस है औ कि कामकेलि समयको हमारे ताडिबेको ताज नोकसा है कोडाइति
अर्थ कामकेलिमें अति चंचल कर्ता है औ कि कामकेलिका जो विचार कहे
विगत चार चलन है रतांत इतिताको रत भ्रमहर चमरकहे बाल व्यजन है यहां
चमर पदते व्यजन जानौं अथवा हमारे विचारको चमर है अर्थ विचारको शोभा-
कर्त्ता है अर्थ प्रकाश कर्ता है ऐसो हमारो विचार अनुमान है औ कि सीताजूके
मानकी जमनीका कनात है अर्थ याही की आडमें सीताजूको मान रहत रह्यो
औ कि सीताजूको कंजमुख मूँदिबेको सब सुखसार उत्तरीय है याही विधि उत्त-
रीयको वर्णन हनुमन्नाटकमें है । “द्यूतेपणःप्रणयकेलिषुकंठपाशः क्रीडापरिश्रम
हरंव्यजनं रता॑ते । शय्यानिशीथसमयेजनकात्मजायाप्राप्तं मयाविधिवशादिहचो-
त्तरीयम्” ॥ ६० ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ वानरेन्द्रतबयोंहँसिबोल्यो । भीतभेद
जियकोसबखोल्यो ॥ आगिबारिपरतक्षकरीजू । रामचन्द्रहँ-
सिबाँहँधरीजू ॥ ६१ ॥
टी०-जब निश्चय मित्र जान्यो तब आपनो भीतभेदकहे बालि कृत भयके
सब भेद खोल्यो कहे कह्यो मित्र सों अंतःकरण को सब भेद कह्यो चाहिये॥६१॥
मू०-सूरपुत्रतबजीवनजान्यो । वालिजोरबहुभाँतिबखा-
न्यो॥ नारिछीनिजेहिभाँतिलईजू। सोअशेषबिनतीविनईजू।
॥ ६२॥ एकबारशरएकहनोंजो ॥ साततालबलवंतगनोतो ।
रामचन्द्रहँसिबाणचलायो॥तालबेधिफिरिकैकरआयो ॥६३॥
१ खञ्जन या खडरीच ।
द्वादशप्रकाशः १२. ( १२३ )
सुग्रीव-तारकछंद ॥ यह अद्भुतकर्मऔरपै होई । सुरसिद्धप्रसि-
द्धनमेंतुमकोई ॥ निकरीमनतेसिगरीडुचितई । तुमसोंप्रभु-
पाय सदासुखदाई ॥ ६४ ॥ विजयछंद-बावनकोपदलोकन-
मापिज्योंबावनकेवपुमाँहसिधायो । केशवसूरसुताजलसिंधु-
हिपूरिकैसूरहिको पदपायो ॥ रामकेबाणत्वचामबबेधिकैका-
म्पैआवतज्यों जगगायो ॥ रामकोशायकसातहुतालनि बेधि-
कैरामहिंकेकरआयो ॥ ६५ ॥ सोरठा ॥ जिनकेनामविलास,
अखिललोकबेधतपतित ॥ तिनको केशवदास, साततालबे-
धतकहा ॥ ६६ ॥ रामतारकछंद-अतिसंगतिबानरकीलघु-
ताई । अपराधबिनावधकौनिबडाई ॥ हतिवालिहिदेउतुम्हैं-
नृपशिक्षा । अबहैकछुमोमनऐसियइच्छा ॥ ६७ ॥
टी०-॥ ६२ ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वालिके शीघ्र वधमें आपने
अंतर निश्चयको प्रकट करत मित्रताधिक्य को दिखावत रामचन्द्र परिहासपूर्वक
सुग्रीव सों कहते हैं कि हे सुग्रीव ! वानरकी संगति अति लघुता है काहेते
अपराध विना वधमें कछू बडाई नहीं है लघुताई ही है परंतु हमारे मनमें अब
यहै इच्छा है कि वालिको मारि तुमको नृपशिक्षा दीजै अर्थात् राजा कीजिये
यह केवल वानर संगतिको प्रभाव है बिनकाज अकाज करिवो सब बानरनको
स्वभाव होतहै तिनकी संगतिते तैसो स्वभाव भयोचहै ॥ ६७ ॥
मू०-इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रच-
न्द्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायां सीताहरणरामसुग्रीव
मैत्रीवर्णनंनामद्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥
टी०-इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायां द्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥
( १२४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-॥ यातेरेहेप्रकाशमें, बालिवध्योकपिराज ॥ वर्णनवर्षा
शरदको, उदधिउलंघनसाज ॥ १ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ रविपु-
त्रबालिसों होतयुद्ध । रघुनाथभयेमनमाहँक्रुद्ध ॥ शरएकहन्यो-
उरमित्रकाम ॥ तबभूमिगिरयोकहिरामराम ॥ २ ॥ कछुचेत-
भयेतेहिबलनिधान ॥ रघुनाथविलोकेहाथबान ॥ शुभचीरज-
टाशिरश्यामगात । वनमालहियेउरविप्रलात ॥ ३ ॥ वालि ॥
तुम आदिमध्यअवशानएक । जगमोहतहौवपुधरिअनेक ॥
तुमसदाशुद्धसबकोसमान। केहिहेतुहत्योकरुणानिधान ॥४॥
राम ॥ सुनिवासवसुतबृधिबलविधान । मैंशरणागतहितहते-
प्रान ॥ यहसांटोलैकृष्णावतार । तबह्वैहौतुम संसारपार ॥ ५॥
टी०-॥ १॥ मित्र जे सुग्रीवह्रैं तिनके काम कहे अर्थ बालिके वधमें केवल सुग्रीवही
को हित है रामचंद्रको कछु हित नहीं है॥२॥३॥जगको आदि कहे उत्पत्ति मध्य
कहे प्रतिपाल अवसान कहे संसार कर्त्ता एक तुमही हौ अर्थ ब्रह्मारूप है तुम्हीं सृष्टि
करते हो विष्णु रूप है प्रतिपाल करत हौ रुद्र रूप है संहार करतहौ सो अनेक
वपुशरीर धरिकै जगको मोहत हौ अर्थ दशरथके पुत्र रामचन्द्र हैं इत्यादि मोह
बढावत हौ ॥ ४ ॥ सांटो कहे बदलो ॥ ५ ॥
मू०-रघुवीररंकतेराजकीन । युवराजबिरदअंगदहिदीन ॥
तबकिष्किंधातारासमेत ॥ सुग्रीवगयेअपनेनिकेत ॥ ६ ॥
दोहा ॥ कियोनृपतिसुग्रीवहति, बालिबलीरणधीर । गयेप्रव-
र्षण अद्रिको, लक्ष्मणश्रीरघुवीर ॥ ७ ॥ त्रिभंगीछंद ॥ देख्यो-
शुभ गिरिवरसकलसोभधरफूलबरनबहुफलनिफरे । संगसर-
भऋक्षजन केशरिकेगणमनहुधरणिसुग्रीवधरे॥सँग शिवाविरा-
जैगजमुख गाजैपरवभूतेलैचित्तहरे। शिरशुभचन्द्रकधरपरम-
दिगंबरमानो हरअहिराजधरे ॥ ८ ॥
टी०-रामचंद्र सुग्रीवको रंक कहे दरिद्री ते राजा कीन्हो सुग्रीव पदको
संबंध रंक राज पदहूंमेंहै विरद पदवी ॥ ६ ॥ प्रवर्षण नामा जो अद्रि
पर्वत है तामें जाइ वास करचो ॥ ७ ॥ रामचंद्र कैसो पर्वत देखंत भये कि
फूल हैं वरन बहु कहे अनेक रंगके औ बहुत फलन सों फरे बहुपदको संबंध
फलन हूं में हैं आगे श्लेषोत्प्रेक्षाकरि वर्णत हैं शरभवानर नाम विशेष हैं औ पशु-
जाति विशेष ॥ "शरभस्तु पशौ भिंदिकरमेवानरेभिदि इति मेदिनी" । ऋक्ष
पर्वतहूमें है सुग्रीवहूके संग जाम्बवंतादि हैं केशरी कहे सिंह ताके गण समूह औ
केशरी नामा वानर हनूमान के पिता तिनके गण सैन्य समूह शिवा पार्वती औ
शृगाली गजमुख गणेश औ हस्ती आदि और वनजीव आदि पदते गैंडा आदि
जानौं पर कहे बडे जे भृतसेवक हैं नंदिकेश्वरादि औ कोकेलचंद्रक चंद्रमा औ
कपूर अर्थ कदली वृक्षनमें कपूर होतहै ते कदली जामें बहुत हैं अथवा जल अनेक
वाप्यादिकनमें भरचो है अथ चंद्रक धर मोर ॥ "चंद्रः कर्पूरको कांपिल्य
सुवर्णवारिषु इति मेदिनी" । दिगंबरनग्नदुवौपच्छमेंएकैहै अहिराज वासुकी औ
बडे सर्प ॥ ८ ॥
मू०-तोमरछंद ॥ शिशुसोलसैसंगधाइ । बनमालज्योंसुर
राइ ॥ अहिराजसोयहिकाल । बहुशीशशोभनिमाल ॥ ९ ॥
स्वागताछंद ॥ चंद्रमंदद्युतिवासरदेखौ । भूमिहीनभुवपालवि-
शेषौ ॥ मित्रदेखियहशोभतहैनौं । राजसाजबिनुसीतहिहौं
ज्यौं ॥ १० ॥ दोहा ॥ पतिनीपतिबिनुदीनअति, पतिपति
नीबिनुमंद ॥ चंद्रबिनाज्योंयामिनी, ज्योंबिनयामिनिचंद ॥
॥ ११ ॥ स्वागताछंद ॥ देखिरामबरषाऋतुआई । रोमरो-
मबहुधादुखदाई ॥ आसपास तमकीछबिछाई रातिदिवसकछु-
जानिनजाई ॥ १२ ॥ मंदमंद धुनिसोंघनगाजैं । तुरतार-
जनुआवझबाजैं ॥ ठौरठौरचपलाचमकैक्यों । इंद्रलोकतियना-
चतिहैंज्यौं ॥ १३ ॥ मोटनकछंद ॥ सौहैंघनश्यामलघोर
घनैं । मोहैंतिनमैं बकपांतिमनैं ॥ शंखावलि पी बहुधाजल-
सों । मानीतिनकोउगिलैबलसों ॥ १४ ॥ शोभा अतिशक्र-
( १२६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शरासनमें । नानाद्युतिदीसतिहैघनमें । रत्नावलिसी दिवि-
द्वारभनो । वर्षागमबांधियदेवमनो ॥ १५ ॥
टी०-शिशु बालक धाइ जो माताते अन्य आपनो स्तन दूध पिआवति है औ
वृक्षविशेष सुरराइ कहे विष्णु ते वनमाल पहिरेहैं पर्वतमें वनकी माला पंगति-
समूहैति है अथ बडोवनहै बहुशीश सहस्र शिर औ बहुतशीशसो सो हैं वृक्ष
॥ ९ ॥ दिनमें द्युतिहीन चंद्रमाको देखि रामचंद्र लक्ष्मण सों कहतहैं मित्र ।
सूर्य अथवा मित्र लक्ष्मण को संबोधन है ॥ १० ॥ ११ ॥ एकादश छंदन् मों
जैसो वर्णन करयो है ऐसी बर्षाऋतु आई देखिकै रामचंद्र कलहंस कलानिधि
खंजन कंज याते इसयें छंद में जे वचन हैं ते कहत भये इति शेषः ॥ १२ ॥
तूर नगारे तार उच्चस्वर ॥ १३ ॥ १४ ॥ दिवि द्वार कहे आकाशके द्वारमें रत्ना-
वलि पढ़ते रतननके वन्दनवार जानौ बडे की अवाईमें बंदनवार बांधिबेकी रीति
प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥
मू०-तारकछंद ॥ घनघोरघनेदशहूं दिशिछाये । मघवाज-
नुसूरजैपैचढिआये ॥ अपराधबिनाक्षितिकेतनताये । तिनपी-
डनपीडितहैउठिधाये ॥ १६ ॥
टी०-तीनि छंद को अन्वय एक है ग्रीष्म ऋतुमें अति तेजसों सूर्य क्षिति
पृथ्वीके तनताये तप्त करचो है जो कोऊ काहूको बिन दोष दुःख देई ताको दंड
करिबो राजन को उचित है इंद्रदेवन के राजा हैं तासों सूर्यको उचित दीर्घ
दंड कियो जासों ऐसो अबना करै उत्प्रेक्षा करि यह राजनीति प्रगट देखायो
अथवा पृथ्वीको अशरण जानिकै अशरणको सहाय करिबो बड़ेनको उचित है
तासों अथवा पृथ्वीको स्त्री जानिकै स्त्री की रक्षा करिबो बडेन को उचित है तासों
दुंदुभि कहे जे गजादि वाहन पर चमूके आगे नगारे बाजत हैं निर्घात कहे
जाको वज्र शब्द सब कहत हैं सो नहीं है सबै कहे जे ते निर्घात होत हैं तेते
पवि कहे वज्र के पात गिरिवो बखानो कहे कहत हैं अर्थ जै बार निर्घात होत
है सो निर्घात नहीं है बार बार इंद्र सूर्यको वज्र चलावत हैं ताहीको शब्द
होत है सम कहे बराबरी अर्थ जैसे अत्रिकी स्त्रीके उरमें देख्यो
तैसे याके उरमें देख्यो है गोर मदाइनी कहे इंद्र धनुष नहीं है प्रत्यक्ष धनुष है
गोर मदाइनि हेंद्र धनुष को नाम पश्चिममों प्रसिद्ध है औ बर्षना तुसारहूसों
प्रगट होत है कहूँगोर सदायिन नाहीं पाठ है तौ गो जे किरणें हैं ते रसद् कहे
An exact, line-by-line transcription of the Hindi/Braj text from the image into Devanagari:
मेघनके अयन कहे घरमें मध्यममें इति नहीं है प्रत्यक्ष धनुष है सूर्य की किरणें
मेघनमें परि इंद्र धनुष होत है यह प्रसिद्ध है खड्ग कहे तरवारि द्युतिवंत चन्द्र-
शुक्रादि तौ एकही चूकसों जातिमात्रको दंड बडे कांपको जनावत है चन्द्रवन्धू
वीरबहोटी रसराज में कह्योहै नवलवधू उरलाजे इन्द्र वधूसीहोई ॥ १६ ॥
मू०-अतिगाजतबाजतदुंदुभिमानो ॥ निरघातसबैपविपा-
तबखानो ॥ धनुहैयहगोरमदाइनिनाहीं । शरजालबहैजल-
धार वृथाहीं ॥ १७ भटचातकदादुरमोरनबोलै । चपलाचम-
कैनफिरैखरगखोलै ॥ द्युतिवंतनकोबिपदाबहुकीन्हीं । धरनीक-
हँ चंद्रवधूधरिदीन्हीं ॥ १८ ॥ तरुनीयहअत्रिऋषीश्वरकीसी ।
उरमें हमचन्द्रकलासमदीसी ॥ वरषानसुनैकिलकैकिलका-
कहे चन्द्रमाकी अर्थ चन्द्रप्रकाश नहीं होन पावत औ नै जे नदी हैं ते न कहे
नहीं हैं अमल निर्मल अर्थ नदीनको जल म्लान है जात है औ कमलनको दल
समूह दलित होत है औ निकाई कहे काई सों रहित है अथवा कमलदलकी
दलित है निकाई जामें केशवदास कहत हैं कि रेणुका जो धूरिरहै ताको गमनहर
प्रबल है क कहे जल जामें अर्थ ऐसो जल चारों ओर भयो है जासों धूलि नहीं
उडति औ मुकुत कहे त्यक्त है हंसक जे हंस हैं तिनको सुखदाई शब्द जामें
वर्षामें हंस उडजातहैं यह प्रसिद्ध है औ अम्बर जो प्रकाश है तामें वलित
कहे युक्त नीलकण्ठ जे मोर हैं तिनकी मतिको मोहै कहे प्रसन्न करति हैं कालि-
का कैसी है कि भौंहैं हैं सुरचाप इन्द्रधनुषहू ते चारु जाकी औ प्रमुदित कहे
उन्नत हैं पयोधर स्तन जाके भूषणनमें जराइ कहे जराऊ जो ज्योति है तामें
तडित जो बिजुली है ताकी तरलाई चंचलता है अथवा भूषणमें जडाऊकी जो
ज्योति है सो जटिल समरलाई कहे योजित है अर्थ भूषणनमें रतननकी ज्योति
बिजुली सम दमकति है रत्नजटित भूषण जडाऊ कहावत हैं औ दूरि कीनी है
सुख मुख कहे सहज मुखही सो शशि जो चन्द्र है ताकी सुखमा शोभा अर्थ
सहजमुख ऐसो छविवान् है जामें चन्द्र द्युति मंद होति है औ अमल कहे स्वच्छ
जे नयन हैं तिन करिकै कमलदलकी निकाई दलित है अर्थ जिनके नयननके
आगे कमलनकी छवि दलि जाति है औ केशवदास कहत हैं कि प्रबल कहे
नीको जो करेनुका हस्तिनी को गमन है ताकी हरणहारी है औ मुकुत कहे
छूटचो अर्थ उच्चरित जो हंसक कहे बिछुवान को शब्द है सोहै सुखदायी जाको
अर्थ जाके चलतमें सुखदायक अनेक रंगको बिछुवानको शब्द होतहै औ अम्बर
जो वस्त्रहैं तामें वलित युक्त नीलकण्ठ जे महादेव हैं तिनकी मति को मोहन है
यहाँ काली पदते पार्वती जानो ॥ २० ॥
मू०-तारककन्द ॥ अभिसारिनिसीसमुझैंपरनारी । सत-
मारगमेटनकोअधिकारी ॥ मतिलोभमहामदमोहछयीहै ।
द्विजराजसुमित्रप्रदोषमयीहै ॥ २१ ॥ दोहा ॥ वर्णतकेशव
सकलकवि, विषमगाढ़तमसृष्टि ॥ कुपुरुषसेवाज्योंभई,
संततमिथ्यादृष्टि ॥ ॥ २२ ॥ चंद्रकलाछंद ॥ कलहंसकला
निधिखंजनकंजकछूटिदिन केशवदेखिजिये । गतिआननलो-
चनपायनकेअनुरूपकसेमनमानिलिये ॥ यहिकालकरालते-
शोधिसबैहठिकैबरषामिसदूरिकिये । अबधौं बिनप्राणप्रियार-
हिहैंकहिकौनहितूअवलम्बिहिये ॥ २३ ॥
टी०-सत कहे उत्तम मार्ग यथोचित कुलांगनन की रीति औ राजमार्गादि
ग्रामते ग्रामांतर की राह इति कि लोभ औ महामद औ मोह सों छई मति बुद्धि है
वर्षा द्विजराज चन्द्रमा औ सुमित्र सूर्य तिनके दोषमयी है अर्थ चंद्र सूर्यको उदय
नहीं होन पावत औ मति द्विजराज ब्राह्मण औ सुष्ठुमित्र इनके दोषमयी है
यासों या जानौं लोभ मद मोह युक्त प्राणी मित्र दोष द्विजदोष करत नहीं
डरत ॥ २१ ॥ विषम कहे भयानक जो गाढ तम अन्धकार है ताकी सृष्टि
कहे वृद्धि में मिथ्या दृष्टि भई जैसे कुपुरुषकी सेवामें होति है तैसी सकल कवि
वर्णत हैं अर्थ जब कुपुरुष सेवा कोऊ करत है तब वाहि यह देखि परतहै कि
कछू पायहैं जब कछू ना पायो तब पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतभई तैसे जा दृष्टि सों
सब विषय पदार्थ देखि परत हैं ताही दृष्टिसों वर्षांधकारमें निकटगत बस्तु
नहीं देखियत पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतिहै ॥ २२ ॥ अनुरूपक कहे प्रतिम जा
वस्तुके वियोगसों विकलता होति है ताकी प्रतिमा देखि कछू बोध होतहै यह
जो हमारो कराल कहे भयानक काल कहे समयहै जामें सीयावियोगादि दुःख
भये ताही काल वर्षाको व्याज करि हमको दुःख देवेको तिनहुन कलहंसादिक-
नको दूरि कीन्हों ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ बीतेबर्षोकालयों, आईशरदसुजाति ॥ गये
अँध्यारीहोतिज्यों, चारुचांदनीराति ॥ २४ ॥ मोटनकछंद ॥
दंतावलिकुन्दसमानगनो । चंद्राननकुन्तलचौरघनो ॥ भौंहैं
धनुखंजननैनमनो । राजीवनिज्यों पदपानिभनो ॥ २५ ॥
हारावलिनीरजहीपरमैं । हैंलीनपयोधरअम्बरमैं ॥ पाटीरजो-
न्हाइहिअंगधरे । इसीगतिकेशवचित्तहरे ॥ २६ ॥ श्रीनार-
१ सुंदर. २ सदृश.
९
दकीदरशेमतिसी । लोपैतमताअपकीरतिसी ॥ मानौपति-
देवनकीरतिको । सतमारगकीसमुझैगतिको ॥ २७ ॥
टी०-सुजातिकहे उत्तम॥२४॥ द्वै छंदको अन्वय एकहै शरदको स्त्री रूप करि
कहतहैं कुंदके जे पुष्पहैं तेई दंतनकी अवली पंक्तिहै कुन्द शरत्कालमें फूलतहैं
यह कवि नियमहै औ चन्द्रमा जो है सोई आनन मुखहै चन्द्रमा वर्षाके मेहनमें
मूंद्यो रहत है शरत्कालमें प्रकाशित होतहै औ सब राजा शरत्काल में पूजन
करि धनुष चामरादि धारण करत हैं सो चौंर जे हैं तेई कुन्तल केशपाश हैं
घनो कहे अति सघन औ धनुष जे हैं तेई भौंहैं हैं औ शरत्कालमें खंजन आवत
है तेई नयन हैं औ राजीव कहे कमल फूलतहैं तेई पद औ पाणि कहे कर हैं
औ स्वातीनक्षत्रकी वर्षा सों नीरज मोती होतहैं तिनकी हारावलि हृदयमें
है जाके औ पयोधर जे मेघहैं ते अम्बर कहे आकाशमें लीनहैं मिलैहैं स्त्री
पक्ष पयोधर कुच अम्बर वस्त्रमें लीनहैं औ जोन्हाई जो है सोई पाटीर कहे
चन्दनलेपहैं शरत्पक्षहंसी गति कहे हंसनकी गति स्त्रीपक्ष हंसन की ऐसी गति
इन सब करिकै सबके चित्त को हरे है वश्य करे है ॥ २५ ॥ २६ ॥ तमता
अंधकार औ तमोगुण नारद सत्त्वगुणी हैं पतिदेव जे पतिव्रता हैं तिनकी रति
प्रीति को मानौ कहे जानौं अर्थ शरत्काल नहीं है पतिव्रतन की प्रीति है
प्रीति कैसी है पतिसेवा आदि जे सत कहे उत्तम मार्ग हैं तिनकी गति कहे
तिनविषे गमन समुझति कहे जानति हैं शरत्कैसी है सत कहे उत्तम जे मार्ग
राह हैं तिनकी गति कहे प्रभाव को समुझै कहे जानति है अर्थ वर्षा करिके
विदारित जे सतमार्ग हैं तिनको प्रकट करति है ॥ २७ ॥
मू०-दोहा ॥ लक्ष्मणदासीवृद्धसी, आईशरदबजाति ॥
मनहुँजगावनकोहमहिं,बीतेवर्षांराति ॥ २८ ॥ कुंडलिया ॥
तातेनृपसुग्रीवपै, जैयेसत्वरतात । कहियोवचनबुझाइकैकै, कुश-
लनचाहोगात ॥ कुशलनचाहोगातचहतहौबालिहिदेखो। कर-
हुनसीताशोधकामवशरामनलेखो॥रामनलेखोचित्तचहीसुख
संपतिजाते । मित्रकह्योगहिबाहँकानिकीजतहै ताते ॥ २९ ॥
दोहा ॥ लक्ष्मणकिष्किंधागये, वचनकहेकरिकोध ॥ तारातब
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३१ )
समुझाइयो, कीन्होंबहुतप्रबोध ॥ ३०॥ दोधकछंद ॥ बोलिल-
येहनुमानतबैलू ॥ ल्यावहुवानरबोलिसबैजू ॥ बारलगैनकहू
बिरमाहीं ॥ एकनकोउरहैघरमाहीं॥३१॥त्रिभंगीछंद ॥ सुग्री-
वसंघातीसुखदुतिरातीकेशवसाथहिसूरनये । आकाशबिलासी
सूरप्रकाशीतबहींवानरआइगये ॥ दिशिदिशिअवगाहनसीतहि
चाहनयूथपयूथसबैपठये । नलिनीलऋच्छपतिअंगदकेसँग
दक्षिणदिशिको बिदाभये ॥ ३२ ॥
टी०-जैसे वृद्धदासीके शुक्ल रोमनकरिके सर्वाङ्ग शुक्लहोतेहैं तैसे याहू शुक्ल है
तासों वृद्धदासी समकह्यो लक्ष्मण संबोधन है ॥ २८ ॥ सत्वर कहे शीघ्र चित्त
चही कहे मनमानी ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ साथहि कहे लक्ष्मणके साथहि
रामचन्द्रके पास आइ गये लक्ष्मण इतिशेषः सूरमकाशी कहे सूर्यको ऐसोहै-
प्रकाश जिनको ॥ ३
अति जोर सों कूर्दिकै गगन कहे आकाश को मंडिकै भूषित करिकै अर्थ अति-
आकाश मार्ग ह्वैकै धावतहैं सीताको लक्ष्मण कहे खोज नहीं पावत धीरके धरन
हार जे वीर वरण स्वरूप सब हैं ते सिंधुके तटमें स्वभाव ही साधरमको परम
कहे बडो धाम जो रामनाम है औ कर्म वालिवधादि तिन्हें गावत हैं धीरधरण
कहि या जनायो कि यद्यपि खोज नहीं सीताको पायो परन्तु धीरको धरे हैं
अधीर नहीं भये तौ जहां ताईं खोजपाइहैं तहां ताईं ढूंढ़ि हैं औ स्वभावही कहि
या जनायो कि कछुभय मानिकै रामनामको नहीं गावत ॥ ३४ ॥
मू०-अंगद-अनुकूलछंद ॥ सीयनपाई अवध बिनासी ।
होहुसबैसागरतटवासी ॥ जोघरजैयेसकुचअनंता।मोहिनछोडै
जनकनिहंता ॥ ३५ ॥ हनुमान ॥ अंगदरक्षारघुपतिकीन्हों ।
सोधनसीताजलथललीन्हों ॥ आलसछांडौंकृतउरआनौ।होहु
कृतघ्नीजनिशिखमानौ ॥ ३६ ॥ अंगददंडक ॥ जीरणजटायु
गीधधन्यएकजिनरोंकिरावणबिरथकीन्होंसहिनीजप्राणहानि।
हुतेहनुमंतबलवंततहांपांचजनदीनेहुतेभूषणकछूकरनरूपजा-
नि॥ आरतपुरकारतहीरामरामबारबारलीन्होंनछंडाइतुमसीता
अतिभीतमानि। गाइद्विजराजतियकाजनपुकारलागैभोगवैन-
रकघोरचोरकोअभयदानि ॥३७॥ दोहा ॥ सुनिसंपातिसप-
क्षह्वै,रामचरितसुखपाय।सीतालंकामांझहैं,खगपतिदईबताय॥
॥ ३८ ॥ दंडक ॥ हरिकैसोवाहनकीबिधिकैसोहेमहंसलीक-
सीलिखत भवाहनकेअंकको । तेजकोनिधानराममुद्रिकाबि-
मानकौधौलक्ष्मणकोबाणछूट्योरावणनिशंकको । गिरिगजगं-
डेतेउड्यान्योसुवरण अलि सीतापदपंकजसदाकलंकरंकको ।
हवाईसीछूटीकेशोदासआसमानमेंकमानकैसोगोलाहनुमान-
चल्योलंकको ॥ ३९ ॥
टी०-मास दिवस की अवधि दियो है । यथा वाल्मीकीये ॥ “अधिगम्य-
तुर्वैदेहीन्निलयंरावणस्यच । मासेपूर्णेनिवर्तध्वमुदयं प्राप्यपर्वतम् ॥ १ ॥ ऊर्द्धमा-
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३३ )
सान्नवस्तव्यावसन्वध्योभवेन्मम '' ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ जीरण वृद्ध ॥ ३७ ॥ चंद्रमा
ऋषि को आशीर्वाद रह्यो है कि सीताके खोजको वानर ऐ हैं तिन्हें मिले पच्छ
तेरे जामिहैं तुलसीकृतरामायणमों प्रसिद्ध है ॥ ३८ ॥ सदा कलंकही को रंक
कहे दरिद्र अर्थ कलंक रहित जो सीतापदपंकज हैं कमान तोपको नाम पश्चिम-
मों प्रसिद्ध हैं औ गोला के साहचर्य सों अति निश्चित है यथा भूषणकविः ।
“छूटतकमाननकेगोलीतीरवाननकेमुसकिलजात मुरचानहूं के ओटमें । नाही-
समैंशिवराजदावकरीपैंडापर दैसुरंगहलाकोहुकुमकरयोगोटमें ॥ भूषणभनतक-
हौंकिमतिकहांलौंदेसीहिम्मतइहांलौंशरजाकेभटजोटमें । ताउदैदै मोछन कंगूरनमैं
पारंदैदै धाउदैदैअरुमुख कूदेजाय कोटमें” ॥ ३९ ॥
मू०-दोहा ॥ उदधिनाकपतिशत्रुको उदितजानिबलवंत ॥
अंतरिक्षहींलक्षिपद, अच्छछुयोहनुमंत ॥ ४० ॥ बीचगयेसुर-
सामिली, औरसिंहिकानारि ॥ लीलिलियोहनुमंततेहि, कढ़े-
उदरकहँफारि ॥ ४१ ॥
टी०-उदधि जो समुद्रहैं तामें नाकपति जे इन्द्र हैं तिनको शत्रु मैनाक ताको
उदित कहे आपने विश्रामके लिये उठचो जानिकै अंतरिक्ष ही कहे आकाशही
सों लक्षि कहे देखिकै बलवंत जे हनुमंतहैं तिन ता मैनाकके बोधके लिये अच्छ कहे
स्वच्छ जो पद हैं तासों छुयो स्पर्शमात्र करचो काहे ते वाल्मीकीयरामायणमें
लिख्यो है कि हनुमान मैनाक सों अपनी प्रतिज्ञा कह्योहै कि मध्यमें विश्राम न
करिहौं । यथा-“त्वरतेकार्यकालोमे अहश्चाप्यनिवर्तते । प्रतिज्ञाचमयादत्तानस्थात-
व्यमिहांतरा '' ॥ अथवा पदके सदृश अच्छसो छुयो अर्थ जैसे पदसों स्पर्शकरि
लघुविश्राम करनोरहै तैसे केवल दृष्टि सों स्पर्श करि विश्राम कियो ॥ ४० ॥
सिंहिकाने हनुमंत को लीलिलियो ॥ ४१ ॥
मू०-तारकछंद ॥ कछुरातियेगयेकरिदंशदशासी । पुरमांझ
चलेबनराजिबिलासी॥ जबहींहनुमंतचलेतजिशंका । मगरों-
किरहीतियद्वैतबलंका ॥ ४२ ॥ लंका ॥ कहिमोहिंउलंघ्यच-
लेतुमकोहौ ॥ अतिसूक्षमरूपधरेमनमोहौ ॥ पठयेक्यहिकार-
णकौनचलेहौ । सुरहौकिधौंकोऊसुरेशभलेहौ ॥ ४३ ॥ हनू-
( १३४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मान ॥ हमबानरहैंरघुनाथपठाये । तिनकीतरुणीअवलोकन-
आये ॥ लंका ॥ हतिमोहिंमहामतिभीतरजैये ॥ हनूमान ॥
तरुणीहिंहते कबलोंसुखपैयै ॥ ४४ ॥ लंका ॥ तुममोरेहिपै-
पुरपैठनपैहौ । हठकोटिकरौघरहीफिरिजैहौ ॥ हनुमंतबलीते-
हिथापरमारी । तजिदेहभईतबहीबरनारी ॥ ४५ ॥ लंका-चौ-
पाई ॥ धनदपुरीहोंरावणलीन्ही । बहुविधिपापनकरेसभीनी ।
चतुराननचितचिंतनकीन्हों ॥ बरुकborder/रुणाकरिमोहँदीन्हों ॥
॥ ४६ ॥ जबदशकंठसियाहरिलैहैं । हरिहनुमंतबिलोकनऐहैं ॥
जबवहतौहिहतैतजिशंका । तबप्रभुहोइविभीषणलंका ॥४७॥
चलनलगौं जबहीतबकीजो । मृतकशरीरहिपावकदीजो ॥
यहकहिजातभईवहनारी । सबनगरीहनुमंतनिहारी ॥ ४८ ॥
टी०-दंशकहे डास यामें कोऊ कोऊ संदेह करत हैं कि दंश रूप धरिकै
गये मुद्रिका कैसे लैगये तालिये और अर्थ करि दंशकहे सिंह “करिणंहस्तिनंद-
शतीतिकरिदंशः” । ताको रूप करि चले तो सिंहको औ श्वानको रूप एक
होताहै ताही सों श्वानको नाम ग्रामसिंह है श्वानको ग्राममें जैबो साधारण
रहत है तासों श्वानको रूप धरिकैगये ॥ ४२ ॥ सूक्ष्म कहे लघु श्वानके अर्थमें
सूक्ष्म कहे तुच्छ ॥४३॥४४॥४५॥ धनद कुबेर ॥४६॥ हरि बानर॥४७॥मृतक
शरीर कहे पुरी रूप मृतक शरीर लंकाने या प्रकार को बर मांग्यो है ताही
लिये हनुमान लंकापुरीको जारी हैं ॥ ४८ ॥
मू०-तबहरिरावणसोवतदेख्यो । मणिमयपालिककीछ-
बिलेख्यो ॥ तहँतरुणीबहुभाँतिनगावैं । बिच बिच आवझ
बीनबजावैं ॥ ४९ ॥ मृतकचितापरवानहुंसोहैं । चहुँदिशि-
प्रेतवधूमनमोहैं ॥ जहाँ जहाँ जाइतहाँदुखदूनो । सियबिनहै-
सिगरोपुरसूनो ॥ ॥ ५० ॥ भुजंगप्रयातछंद ॥ कहूंकिन्नरी-
किन्नरीलैबजावैं । सुरी आसुरीबांसुरीगीतगावैं ॥ कहूंयक्षिणी-
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३५ )
पक्षिणीलैपढ़ावैं । नगी कन्यकापन्नगीकोनचावैं ॥ ५१ ॥
पियैंएकहालागुहैंएकमाला । बनीएकबालानचैचित्रशाला ॥
कहूंकोकिलाकोककीकारिकाको । पढ़ावैसुआलैशुकीशारि-
काको ॥ ५२ ॥ फिरयोदेखिकै राजशालासभाको । रह्योरी-
झिकैबाटिकाकीप्रभाको । फिरयो बीरचौंहूंचितैशुद्धगीता ।
बिलोकीभलीसिंसिपामूलसीता ॥ ५३ ॥
टी०-॥ ४९ ॥ ५० ॥ किन्नरी सारंगी बाँसुरीमें गीत गावती हैं अथवा
बाँसुरी सम गीत गावतीहैं ॥ ५१ ॥ हाला मदिरा सुष्ठु जे आलय घर हैं तिनमें
शुकी औ शारिका मैना कोकिला जे हैं ते कोकशास्त्र की कारिका पढ़ावती हैं
अथवा स्त्री कोकिला सम पढ़ावती हैं ॥ ५२ ॥ या प्रकार सब स्थाननमें
फिरयो सो ऐसी राजशाला सभा कहे राजभवनमें स्त्रीनकी सभाको देखिकै रीझि रह्यो
अथवा या प्रकार राजशाला औ राजसभाको देखि कै रीझि रह्यो जब सीताको
तहां न देख्यो तब वाटिका की प्रभाको फिरयो अर्थ वाटिकाको गमन करचो
शुद्ध गीता सीताको विशेषण है शिंशुपासी सौ अथवा “ अगुरु पिच्छिलागुरु
शिंशुपा ” इति विश्वः ॥ ५३ ॥
मू०-धरेएकबेनीमिलीमैलसारी । मृणालीमनोपंकसोंकाढ़ि
डारी ॥ सदारासनामैररैदीनबानी । चहूँओरहैंएकसीदुःखदा-
नी ॥ ५४ ॥ ग्रसीबुद्धिसीचित्तचिंतानिमानों । कियौजीभदं-
तावलीमेंबखानो ॥ किधौंधेरिकैराहुनारीनलीनी । कलाचं-
द्रकी चारूपीयूषभीनी ॥ ५५ ॥ किधौंजीवकोजोतिमायान-
लीनी । अविद्यानकेमध्यविद्याप्रवीनी ॥ मनोसर्वस्त्रीनमैं-
कामबामा । हनूमानऐसीलखीरामरामा ॥ ५६ ॥ तहाँदेव-
द्वेषीदशग्रीवआयो । सुन्योदेविसीतामहादुःखपायो ॥ सबै-
अंगलैअंगहीमेंदुरायो । अधोदृष्टिकैअश्रुधाराबहायो ॥५७॥
रावण ॥ सुनोदेविमोपैकछूदृष्टिदीजे । इतोशोचतोरामकाजैं-
( १३६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
नकीजे ॥ बसैंदंडकारण्यदेखैनकोऊ । जोदेखैमहाबावरोहो-
यसोऊ ॥ ५८ ॥
टी०-पंकसदृश मैल सारोहै कहूंपंक शोकाधिकारी पाठ है तौ मानो पंक
युक्त मृणाली है शोकाधिकारी कहे अति शोक युक्त दुहुन को विशेषणहै
॥ ५४ ॥ ५५ ॥ संसार विषे कीनी बुद्धि अविद्या है ईश्वर विवेकिनी बुद्धि
विद्या है रामा स्त्री ॥ ५६ ॥ अति लाज भयसों अंग सिकोरिके बैठी ॥ ५७॥
चारि छंदको अन्वय एक हैं रावण कहत है कि हे देवि ! ऐसे जे रामचंद्र हैं
तिनको शोचना करो हमजे तुम्हारे सदादास हैं तिनपै कृपा काहे नाहि करियत
जासों अदेवी दैत्य स्त्री देवांगना तिनकी रानी होय औ वाणी सरस्वती औ
मधौनी इंद्राणी मृडानी पार्वती तुम्हारी सेवा करें औ किन्नरी सारंगी लिये
किन्नरी किन्नर कन्या तुम्हारे समीप गीत गावैं औ सुकेशी औ उर्वशी नाचैं
तुमसों मान कहे आदर पावैं यामें आपनो प्रभाव दिखायो कि ए सब इंद्रादि
मेरी आज्ञाकर हैं रामचन्द्र कैसे हैं दंडकारण्य में बसत हैं अर्थ वनवासी हैं औ
ऐसे छिपे रहत हैं जिनको कोऊ कबहूं देखत नहीं औ जो देखत है औ सो महा
बावरो आपने तनकी औ भवनादि की सुधि भूलि जात है यासों या जनायो कि
बावरो होत है ताहीको संग्रह कोऊ नाहीं करत औ वे ऐसे हैं जिनको देखत
औरऊ बावरो होत है तासों सोच करिवे लायक नहीं है अनाथ के अनुसारी
कहे अनुगामी हैं अर्थ यह कि काहू बडेके अनुगामी नहीं हैं ‘तुम्हें देवि दूषै
हितू ताहि मानैं’ इत्यादि दुवौ वचन भेद उपायकेहैं सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे देवि !
हे जगदंब ! हमपर कछु कृपादृष्टि दीजै अर्थ तुम्हारी नेक कृपादृष्टिसों हमारो
भलो होत है औ रामचन्द्रके काज येतो शोच काहेको करती हौ रामचंद्र
शोचनीय नहीं हैं काहेते वे ऐसे प्रतापी हैं कि निर्जन दंडकारण्यमें बसते
हैं आशय कि अति निर्भय हैं औ देखै न कोऊ अर्थ अनेक ध्यानादि उपाय
योगी जन जिनके देखिबेको करत हैं ताहूपर दर्शन नहीं पावत सो छठे प्रकाशमें
कह्यो है कि “सिद्धसमाधि सजैं अजहूं न कहूं जग योगिन देखन पाई” । औ
जो देखतहै अर्थ जाको दर्शन होतहै सो महा बावरो होत है अर्थ बावरे सम
संसार सुखको त्यागकरि जीवन्मुक्त है जात है अथवा बावरे सम देहकी सुधि
नहीं रहति जैसे सुतीक्षणको भयो अथवा महा बावरो महादेव होई अर्थ महादेव
सम प्रभावको प्राप्त होइ ॥ ५८ ॥