रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३५ )
पक्षिणीलैपढ़ावैं । नगी कन्यकापन्नगीकोनचावैं ॥ ५१ ॥
पियैंएकहालागुहैंएकमाला । बनीएकबालानचैचित्रशाला ॥
कहूंकोकिलाकोककीकारिकाको । पढ़ावैसुआलैशुकीशारि-
काको ॥ ५२ ॥ फिरयोदेखिकै राजशालासभाको । रह्योरी-
झिकैबाटिकाकीप्रभाको । फिरयो बीरचौंहूंचितैशुद्धगीता ।
बिलोकीभलीसिंसिपामूलसीता ॥ ५३ ॥
टी०-॥ ४९ ॥ ५० ॥ किन्नरी सारंगी बाँसुरीमें गीत गावती हैं अथवा
बाँसुरी सम गीत गावतीहैं ॥ ५१ ॥ हाला मदिरा सुष्ठु जे आलय घर हैं तिनमें
शुकी औ शारिका मैना कोकिला जे हैं ते कोकशास्त्र की कारिका पढ़ावती हैं
अथवा स्त्री कोकिला सम पढ़ावती हैं ॥ ५२ ॥ या प्रकार सब स्थाननमें
फिरयो सो ऐसी राजशाला सभा कहे राजभवनमें स्त्रीनकी सभाको देखिकै रीझि रह्यो
अथवा या प्रकार राजशाला औ राजसभाको देखि कै रीझि रह्यो जब सीताको
तहां न देख्यो तब वाटिका की प्रभाको फिरयो अर्थ वाटिकाको गमन करचो
शुद्ध गीता सीताको विशेषण है शिंशुपासी सौ अथवा “ अगुरु पिच्छिलागुरु
शिंशुपा ” इति विश्वः ॥ ५३ ॥
मू०-धरेएकबेनीमिलीमैलसारी । मृणालीमनोपंकसोंकाढ़ि
डारी ॥ सदारासनामैररैदीनबानी । चहूँओरहैंएकसीदुःखदा-
नी ॥ ५४ ॥ ग्रसीबुद्धिसीचित्तचिंतानिमानों । कियौजीभदं-
तावलीमेंबखानो ॥ किधौंधेरिकैराहुनारीनलीनी । कलाचं-
द्रकी चारूपीयूषभीनी ॥ ५५ ॥ किधौंजीवकोजोतिमायान-
लीनी । अविद्यानकेमध्यविद्याप्रवीनी ॥ मनोसर्वस्त्रीनमैं-
कामबामा । हनूमानऐसीलखीरामरामा ॥ ५६ ॥ तहाँदेव-
द्वेषीदशग्रीवआयो । सुन्योदेविसीतामहादुःखपायो ॥ सबै-
अंगलैअंगहीमेंदुरायो । अधोदृष्टिकैअश्रुधाराबहायो ॥५७॥
रावण ॥ सुनोदेविमोपैकछूदृष्टिदीजे । इतोशोचतोरामकाजैं-