रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदकीदरशेमतिसी । लोपैतमताअपकीरतिसी ॥ मानौपति-
देवनकीरतिको । सतमारगकीसमुझैगतिको ॥ २७ ॥
टी०-सुजातिकहे उत्तम॥२४॥ द्वै छंदको अन्वय एकहै शरदको स्त्री रूप करि
कहतहैं कुंदके जे पुष्पहैं तेई दंतनकी अवली पंक्तिहै कुन्द शरत्कालमें फूलतहैं
यह कवि नियमहै औ चन्द्रमा जो है सोई आनन मुखहै चन्द्रमा वर्षाके मेहनमें
मूंद्यो रहत है शरत्कालमें प्रकाशित होतहै औ सब राजा शरत्काल में पूजन
करि धनुष चामरादि धारण करत हैं सो चौंर जे हैं तेई कुन्तल केशपाश हैं
घनो कहे अति सघन औ धनुष जे हैं तेई भौंहैं हैं औ शरत्कालमें खंजन आवत
है तेई नयन हैं औ राजीव कहे कमल फूलतहैं तेई पद औ पाणि कहे कर हैं
औ स्वातीनक्षत्रकी वर्षा सों नीरज मोती होतहैं तिनकी हारावलि हृदयमें
है जाके औ पयोधर जे मेघहैं ते अम्बर कहे आकाशमें लीनहैं मिलैहैं स्त्री
पक्ष पयोधर कुच अम्बर वस्त्रमें लीनहैं औ जोन्हाई जो है सोई पाटीर कहे
चन्दनलेपहैं शरत्पक्षहंसी गति कहे हंसनकी गति स्त्रीपक्ष हंसन की ऐसी गति
इन सब करिकै सबके चित्त को हरे है वश्य करे है ॥ २५ ॥ २६ ॥ तमता
अंधकार औ तमोगुण नारद सत्त्वगुणी हैं पतिदेव जे पतिव्रता हैं तिनकी रति
प्रीति को मानौ कहे जानौं अर्थ शरत्काल नहीं है पतिव्रतन की प्रीति है
प्रीति कैसी है पतिसेवा आदि जे सत कहे उत्तम मार्ग हैं तिनकी गति कहे
तिनविषे गमन समुझति कहे जानति हैं शरत्कैसी है सत कहे उत्तम जे मार्ग
राह हैं तिनकी गति कहे प्रभाव को समुझै कहे जानति है अर्थ वर्षा करिके
विदारित जे सतमार्ग हैं तिनको प्रकट करति है ॥ २७ ॥
मू०-दोहा ॥ लक्ष्मणदासीवृद्धसी, आईशरदबजाति ॥
मनहुँजगावनकोहमहिं,बीतेवर्षांराति ॥ २८ ॥ कुंडलिया ॥
तातेनृपसुग्रीवपै, जैयेसत्वरतात । कहियोवचनबुझाइकैकै, कुश-
लनचाहोगात ॥ कुशलनचाहोगातचहतहौबालिहिदेखो। कर-
हुनसीताशोधकामवशरामनलेखो॥रामनलेखोचित्तचहीसुख
संपतिजाते । मित्रकह्योगहिबाहँकानिकीजतहै ताते ॥ २९ ॥
दोहा ॥ लक्ष्मणकिष्किंधागये, वचनकहेकरिकोध ॥ तारातब