रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३३ )
सान्नवस्तव्यावसन्वध्योभवेन्मम '' ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ जीरण वृद्ध ॥ ३७ ॥ चंद्रमा
ऋषि को आशीर्वाद रह्यो है कि सीताके खोजको वानर ऐ हैं तिन्हें मिले पच्छ
तेरे जामिहैं तुलसीकृतरामायणमों प्रसिद्ध है ॥ ३८ ॥ सदा कलंकही को रंक
कहे दरिद्र अर्थ कलंक रहित जो सीतापदपंकज हैं कमान तोपको नाम पश्चिम-
मों प्रसिद्ध हैं औ गोला के साहचर्य सों अति निश्चित है यथा भूषणकविः ।
“छूटतकमाननकेगोलीतीरवाननकेमुसकिलजात मुरचानहूं के ओटमें । नाही-
समैंशिवराजदावकरीपैंडापर दैसुरंगहलाकोहुकुमकरयोगोटमें ॥ भूषणभनतक-
हौंकिमतिकहांलौंदेसीहिम्मतइहांलौंशरजाकेभटजोटमें । ताउदैदै मोछन कंगूरनमैं
पारंदैदै धाउदैदैअरुमुख कूदेजाय कोटमें” ॥ ३९ ॥
मू०-दोहा ॥ उदधिनाकपतिशत्रुको उदितजानिबलवंत ॥
अंतरिक्षहींलक्षिपद, अच्छछुयोहनुमंत ॥ ४० ॥ बीचगयेसुर-
सामिली, औरसिंहिकानारि ॥ लीलिलियोहनुमंततेहि, कढ़े-
उदरकहँफारि ॥ ४१ ॥
टी०-उदधि जो समुद्रहैं तामें नाकपति जे इन्द्र हैं तिनको शत्रु मैनाक ताको
उदित कहे आपने विश्रामके लिये उठचो जानिकै अंतरिक्ष ही कहे आकाशही
सों लक्षि कहे देखिकै बलवंत जे हनुमंतहैं तिन ता मैनाकके बोधके लिये अच्छ कहे
स्वच्छ जो पद हैं तासों छुयो स्पर्शमात्र करचो काहे ते वाल्मीकीयरामायणमें
लिख्यो है कि हनुमान मैनाक सों अपनी प्रतिज्ञा कह्योहै कि मध्यमें विश्राम न
करिहौं । यथा-“त्वरतेकार्यकालोमे अहश्चाप्यनिवर्तते । प्रतिज्ञाचमयादत्तानस्थात-
व्यमिहांतरा '' ॥ अथवा पदके सदृश अच्छसो छुयो अर्थ जैसे पदसों स्पर्शकरि
लघुविश्राम करनोरहै तैसे केवल दृष्टि सों स्पर्श करि विश्राम कियो ॥ ४० ॥
सिंहिकाने हनुमंत को लीलिलियो ॥ ४१ ॥
मू०-तारकछंद ॥ कछुरातियेगयेकरिदंशदशासी । पुरमांझ
चलेबनराजिबिलासी॥ जबहींहनुमंतचलेतजिशंका । मगरों-
किरहीतियद्वैतबलंका ॥ ४२ ॥ लंका ॥ कहिमोहिंउलंघ्यच-
लेतुमकोहौ ॥ अतिसूक्षमरूपधरेमनमोहौ ॥ पठयेक्यहिकार-
णकौनचलेहौ । सुरहौकिधौंकोऊसुरेशभलेहौ ॥ ४३ ॥ हनू-