रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
नकीजे ॥ बसैंदंडकारण्यदेखैनकोऊ । जोदेखैमहाबावरोहो-
यसोऊ ॥ ५८ ॥
टी०-पंकसदृश मैल सारोहै कहूंपंक शोकाधिकारी पाठ है तौ मानो पंक
युक्त मृणाली है शोकाधिकारी कहे अति शोक युक्त दुहुन को विशेषणहै
॥ ५४ ॥ ५५ ॥ संसार विषे कीनी बुद्धि अविद्या है ईश्वर विवेकिनी बुद्धि
विद्या है रामा स्त्री ॥ ५६ ॥ अति लाज भयसों अंग सिकोरिके बैठी ॥ ५७॥
चारि छंदको अन्वय एक हैं रावण कहत है कि हे देवि ! ऐसे जे रामचंद्र हैं
तिनको शोचना करो हमजे तुम्हारे सदादास हैं तिनपै कृपा काहे नाहि करियत
जासों अदेवी दैत्य स्त्री देवांगना तिनकी रानी होय औ वाणी सरस्वती औ
मधौनी इंद्राणी मृडानी पार्वती तुम्हारी सेवा करें औ किन्नरी सारंगी लिये
किन्नरी किन्नर कन्या तुम्हारे समीप गीत गावैं औ सुकेशी औ उर्वशी नाचैं
तुमसों मान कहे आदर पावैं यामें आपनो प्रभाव दिखायो कि ए सब इंद्रादि
मेरी आज्ञाकर हैं रामचन्द्र कैसे हैं दंडकारण्य में बसत हैं अर्थ वनवासी हैं औ
ऐसे छिपे रहत हैं जिनको कोऊ कबहूं देखत नहीं औ जो देखत है औ सो महा
बावरो आपने तनकी औ भवनादि की सुधि भूलि जात है यासों या जनायो कि
बावरो होत है ताहीको संग्रह कोऊ नाहीं करत औ वे ऐसे हैं जिनको देखत
औरऊ बावरो होत है तासों सोच करिवे लायक नहीं है अनाथ के अनुसारी
कहे अनुगामी हैं अर्थ यह कि काहू बडेके अनुगामी नहीं हैं ‘तुम्हें देवि दूषै
हितू ताहि मानैं’ इत्यादि दुवौ वचन भेद उपायकेहैं सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे देवि !
हे जगदंब ! हमपर कछु कृपादृष्टि दीजै अर्थ तुम्हारी नेक कृपादृष्टिसों हमारो
भलो होत है औ रामचन्द्रके काज येतो शोच काहेको करती हौ रामचंद्र
शोचनीय नहीं हैं काहेते वे ऐसे प्रतापी हैं कि निर्जन दंडकारण्यमें बसते
हैं आशय कि अति निर्भय हैं औ देखै न कोऊ अर्थ अनेक ध्यानादि उपाय
योगी जन जिनके देखिबेको करत हैं ताहूपर दर्शन नहीं पावत सो छठे प्रकाशमें
कह्यो है कि “सिद्धसमाधि सजैं अजहूं न कहूं जग योगिन देखन पाई” । औ
जो देखतहै अर्थ जाको दर्शन होतहै सो महा बावरो होत है अर्थ बावरे सम
संसार सुखको त्यागकरि जीवन्मुक्त है जात है अथवा बावरे सम देहकी सुधि
नहीं रहति जैसे सुतीक्षणको भयो अथवा महा बावरो महादेव होई अर्थ महादेव
सम प्रभावको प्राप्त होइ ॥ ५८ ॥