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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

की दूसरी शताब्दि से इधर का नहीं माना जा सकता. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि या

१० 'गाथासप्तशति' के अंत में सातवाहन को कुंतल देश का राजा, प्रतिष्ठान (पैठण) नगर का अधीश, शतकर्ण
(शातकर्णि) उपनामवाला, द्वीपिकर्ण का पुत्र, मलयवती का पति और हालादि उपनामवाला लिखा है (प्रो. पीटर्सन की
ई. स. १८८४-८६ तक की रिपोर्ट, पृ. ३४६). शिलालेखों में आंध्र (आंध्रभृत्य) वंश के लिये सातवाहन नाम का प्रयोग
मिलता है. नानाघाट के लेख में उक्त वंश के मूल पुरुष सिमुक को सातवाहन कहा है और उक्तवंश के राज्य का अंत ई. स.
२२५ के आस पास होना (स्मिथ; अ. हि. इं; पृ. २१८ के पास का नक्शा) माना जाता है. ऐसी दशा में 'गाथासप्तशति'
का समय उक्त सन से पूर्व का ही होना चाहिये. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने विक्रम संवत्संबंधी अपने लेख में
'गाथासप्तशति' के राजा विक्रम के विषय में लिखते हुए उक्त पुस्तक के रचनाकाल के संबंध में लिखा है कि 'क्या
गाथासप्तशति वास्तव में उतना पुराना ग्रंथ है जितना कि माना जाता है?......बाण के हर्षचरित के प्रारंभ के १३ वें श्लोक
में सातवाहन के द्वारा गीतों के 'कोश' के बनाये जाने का उल्लेख अवश्य है परंतु इस 'कोश' को हाल की सप्तशति मानने
के लिये कोई कारण नहीं है जैसा कि प्रो. वेबर ने अच्छी तरह बतलाया है. उसी पुस्तक में मिलनेवाले प्रमाण उसकी
रचना का समय बहुत पीछे का होना बतलाते हैं. यहां पर केवल दो बातों का विचार किया जाता है. एक तो उस
(पुस्तक) में कृष्ण और राधिका का (१।८६) और दूसरा मंगलवार (३।६१) का उल्लेख है. राधिका का सब से
पुराना उल्लेख जो मुझे मिल सका वह पंचतंत्र में है जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी का बना हुआ है. ऐसे ही तिथियों के
साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति ६ वीं शताब्दी से प्रचलित हुई, यद्यपि उसका सब से पुराना उदाहरण
बुधगुप्त के ई. स. ४८४ के एरण के लेख में मिलता है. यदि हम गाथासप्तशति के हाल का समय छठी शताब्दी का प्रारंभ
मानें तो अधिक अनुचित न होगा' (आर. जी. भंडारकर कोम्मेमोरेशन वॉल्यम, पृ. १८८-८६). हम उक्त विद्वान् के इस
कथन से सर्वथा सहमत नहीं हो सकते क्योंकि बाणभट्ट सातवाहन के जिस सुभाषितरूपी उज्ज्वलरत्नों के कोश (संग्रह,
खज़ाने) की प्रशंसा करता है (अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः। विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३) वह 'गाथास-
प्तशति' ही है, जिसमें सुभाषित रूपी रत्नों का ही संग्रह है. यह कोई प्रमाण नहीं कि प्रो. वेबर ने उसे गाथासप्तशति नहीं
माना इस लिये वह उससे भिन्न पुस्तक होना चाहिये. वेबर ने ऐसी ऐसी कई प्रमाणशून्य कल्पनाएं की हैं जो अब मानी
नहीं जातीं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉक्टर सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी वेबर के उक्त कथन के विरुद्ध बाणभट्ट के उपर्युक्त
श्लोक का संबंध हाल की सप्तशति से होना ही माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१). ऐसा ही डॉ० फ्लीट ने (ज.
रॉ. ए. सो; ई. स. १६१२, पृ. ८२०) और 'प्रबंधचिंतामणि' के कर्ता मेरुतुंग ने माना है (प्रबंधचिंतामणि, पृ. २६). पांचवीं
शताब्दी के बने हुए 'पंचतंत्र' में कृष्ण और राधिका का उल्लेख होना तो उलटा यह सिद्ध करता है कि उस समय कृष्ण और
राधिका की कथा लोगों में भलीभांति प्रसिद्ध थी अर्थात् उक्त समय के पहिले से चली आती थी. यदि ऐसा न होता तो
पंचतंत्र का कर्ता उसका उल्लेख ही कैसे करता? ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति
का ६ वीं शताब्दी में प्रचलित होना बतलाना भी ठीक नहीं हो सकता, क्यों कि कच्छ राज्य के अंधौ गांव से मिले हुए
क्षत्रप रुद्रदामन् के समय के [शक] संवत् ५२ (ई. स. १३०) के ४ लेखों में से एक लेख में 'गुरुवार' लिखा है (वर्षे द्विपंचाशे
५० २ फागुणबहुलस द्वितीया वी २ गुरुवास[रे] सिंहलपुरस ओपशतस गोत्रस० स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की
तय्यार की हुई उक्त लेख की छाप से) जिससे सिद्ध है कि ई. स. की दूसरी शताब्दी में वार लिखने की रीति
परंपरागत प्रचलित थी. राधिका और बुधवार के उल्लेख से ही 'गाथासप्तशति' का छठी शताब्दी में बनना किसी प्रकार
सिद्ध नहीं हो सकता. डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी गाथासप्तशति के कर्ता हाल को आंध्रभृत्य वंश के
राजाओं में से एक माना है (बंब. गं; जि. १, भा. २, पृ. १७१) जिससे भी उसका आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंशियों के
राजत्वकाल में अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी में बनना मानना पड़ता है.
केवल 'गाथासप्तशति' से ही चंद्रगुप्त (दूसरे) से पूर्व के राजा विक्रम का पता लगता है इतना ही नहीं किंतु राजा
सातवाहन (हाल) के समय के महाकवि गुणाढ्य रचित पैशाची (कश्मीर तरफ की प्राकृत) भाषा के 'बृहत्कथा' नामक ग्रंथ
से भी, जिसकी प्रशंसा बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित के प्रारंभ के १७ वें श्लोक (समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव
नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा) में की है. वह पुस्तक अब तक नहीं मिला परंतु उसके संस्कृत अनुवाद रूपी सोमदेव भट्ट के 'कथा-
सरित्सागर' में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह (लंबक ६, तरंग १), पाटलीपुत्र के राजा विक्रमतुंग (लंबक ७, तरंग १) आदि
विक्रम नाम के राजाओं की कई कथाएं मिलती हैं. इस पुस्तक को भी वेबर ने ई. स. की छठी शताब्दी का माना है परंतु
डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने उपर्युक्त सातवाहन के समय का अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी का
माना है (बंब. गं; जि. १ भा. २, पृ. १७०-७१) और काव्यमाला के विद्वान संपादक स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं. दुर्गाप्रसाद
और पांडुरंग परब ने उसका ई. स. की पहिली शताब्दी में बनना बतलाया है इतना ही नहीं किंतु वेबर के माने हुए उसके
समय के विषय में लिखा है कि "वेबर पंडित 'हिस्टरी ऑव संस्कृत लिटरेचर' नामक पुस्तक में गुणाढ्य का ई. स. की
छठी शताब्दी में होना बतलाता है और दशकुमारचरित के रचयिता आचार्य दंडी का भी छठी शताब्दी में होना स्वीकार
करता है. किंतु आचार्य दंडी काव्यदर्श में 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भूतार्थां बृहत्कथाम्' में 'प्राहुः' पद से बृहत्कथा का अपने से बहुत

भारतीय संवत्. १६६

तो विक्रम १, जिसका नाम इस संवत् के साथ जुड़ा है, मालव जाति का मुखिया या राजा हो, अथवा
चंद्रगुप्त (दूसरे) से पहिले का उससे भिन्न कोई राजा हो.
विक्रम संवत् का प्रारंभ कलियुग संवत् के (५०१६-१६७५=) ३०४४ वर्ष व्यतीत होने पर
माना जाता है जिससे इसका गत वर्ष १ कलियुग संवत् ३०४५ के बराबर होता है. इस
संवत् में से ५७ या ५६ घटाने से ईसवी सन् और १३५ घटाने से शक संवत् आता है. इसका
प्रारंभ उत्तरी हिंदुस्तान में चैत्र शुक्ला १ से और दक्षिण में कार्तिक शुक्ला १ से होता है जिससे
उत्तरी (चैत्रादि) विक्रम संवत् दक्षिणी (कार्तिकादि२) विक्रम संवत् से ७ महीने पहिले
प्रारंभ होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में महीनों का प्रारंभ कृष्णा १ से और अंत शुक्ला १५ को
होता है, परंतु दक्षिण में महीनों का प्रारंभ शुक्ला १ से और अंत कृष्णा अमावास्या को होता है.
इस लिये उत्तरी विक्रम संवत् के महीने पूर्णिमांत और दक्षिणी के अमांत (दर्शांत) कहलाते
हैं. शुक्ल पक्ष तो उत्तरी और दक्षिणी हिंदुस्तान में एक ही होता है परंतु उत्तरी हिंदुस्तान का कृष्ण
पक्ष दक्षिणी से १ महीना पहिले रहता है अर्थात् जिस पक्ष को हम उत्तरी हिंदुस्तानवाले वैशाख
कृष्ण कहते हैं उसीको दक्षिणेवाले चैत्र कृष्ण लिखते हैं. काठियावाड़, गुजरात तथा राजपुताने
के कुछ अंश में विक्रम३ संवत् का प्रारंभ आषाढ शुक्ला १ (अमांत) से भी होता था जिससे उसको


प्राचीन होना प्रकट करता है. इस लिये दंडी और गुणाढ्य दोनों छठी शताब्दी में हुए ऐसा वेबर पंडित ने किस आधार
पर माना यह मालूम नहीं होता. अथवा प्रायः यूरोपियन विद्वानों का यह स्वभाव ही है कि भारतवर्ष के प्राचीनतम
ग्रंथों एवं उनके रचयिताओं को अर्वाचीन सिद्ध करने का जहां तक हो सके वे यत्न करते हैं और उनका प्राचीनत्व सिद्ध
करने का दृढ प्रमाण मिल भी जावे तो उसको 'प्रक्षिप्त' कह कर अपने को जो अनुकूल हो उसीको आगे करते हैं (अर्थात्
ठीक बतलाते हैं) (बंबई के निर्णयसागर प्रेस का छुपा हुआ 'कथासरित्सागर', तीसरा संस्करण, भूमिका, पृ. २).
१. 'ज्योतिर्विदाभरण' का कर्त्ता कालिदास नामक ज्योतिषी उक्त पुस्तक के २२ वें अध्याय में अपने को उज्जैन के
राजा विक्रम का मित्र (श्लोक १६) और 'रघुवंश' आदि तीन काव्यों का कर्ता बतला कर (श्लो. २०) गत कलियुग
संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) के वैशाख में उक्त पुस्तक का प्रारंभ और कार्तिक में उसकी समाप्ति होना (श्लो. २१) लिखता है.
उसमें विक्रम के विषय में यह भी लिखा है कि 'उसकी सभा में शंकु, वररुचि, मणि, अंशु, जिष्णु, त्रिलोचन, हरि, घटखर्पर
और अमरसिंह आदि कवि (श्लो. ८); सत्य, वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ और कुमारसिंह आदि ज्योतिषी
थे (श्लो. ६). धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि ये नव
विक्रम की सभा के रत्न थे. उसके पास ३००००००० पैदल, १०००००००० सवार, २४३०० हाथी और ४००००० नाव थीं
(श्लो. १२). उसने ६५ शक राजाओं को मार कर अपना शक अर्थात् संवत् चलाया (श्लो. १३) और रूम देश के शक
राजा को जीत कर उज्जैन में लाया परंतु फिर उसको छोड़ दिया' (श्लो. १७). यह सारा कथन मनघडंत ही है क्यों कि
'ज्योतिर्विदाभरण' की कविता मामूली है और रघुवंश आदि के कर्त्ता कविशिरोमणि कालिदास की अलौकिक सुंदरता-
वाली कविता के आगे तुच्छ है. ऐसे ही गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) में उक्त पुस्तक की रचना करने का
कथन भी कृत्रिम ही है क्यों कि उसी पुस्तक में अयनांश निकालने के लिये यह नियम दिया है कि 'शक संवत् में से ४४५
घटाकर शेष में ६० का भाग देने से अयनांश आते हैं' (शाकः शराम्भोधियुगो नितो हृते मानं खतर्कैरयनांशकाः स्मृताः । १२ । १८).
विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला था अत एव यदि वह पुस्तक वि. सं. २४ में बना होता तो उसमें
शक संवत् का नाम भी नहीं होना चाहिये था. वास्तव में वह पुस्तक श. सं. ११९४ (वि. संं. १२६६=ई. स. १२०२) के
आसपास का बना हुआ है (देखो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित का 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र', पृ. ४७६). ऐसी दशा में उक्त
पुस्तक का विक्रमसंबंधी सारा कथन कल्पित ही मानना पड़ता है.
२. वास्तव में विक्रम संवत् का प्रारंभ कार्तिक शुक्ला १ से और शक संवत् का चैत्र शुक्ला १ से है. उत्तरी
हिंदुस्तान के भी पंचांग शक संवत् के आधार पर बनने से उनमें वर्ष चैत्र शुक्ला १ से प्रारंभ होता है, जिससे वहांवालों
ने पीछे से विक्रम संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से भी मानना शुरू कर दिया हो. उत्तरी भारत के लेखों में संवत् दोनों तरह
से (कार्तिकादि और चैत्रादि) मिल आते हैं. ई. स की १२ वीं शताब्दी तक के लेखों में कार्तिकादि संवत् अधिक परंतु
१३ वीं से १६ वीं शताब्दी तक के लेखों में चैत्रादि अधिक मिलते हैं (इं. ऐं; जि. २०, पृ. ३६६).
३. 'पृथ्वीराजरासे' में दिये हुए कितनी एक घटनाओं के अशुद्ध संवतों का ठीक होना सिद्ध करने की खींचतान में
स्वर्गीय पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने पृथ्वीराज के जन्म संवत् संबंधी दोहे (एकादस सै पंच दह विक्रम साक
अनंद । तिहि रिपु जय पुर हरन कौं भय प्रथिराज नरिंद। मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या संपादित 'पृथ्वीराजरासा' आदिपर्व,
पृ. १३८), के 'अनंद' शब्द पर से 'अनंद विक्रम शक' (संवत्) की कल्पना कर लिखा है कि 'विक्रम साक अनन्द कौ

१७० प्राचीनलिपिमला.
'आषाढादि संवत्' कहते थे. राजपुताने के उदयपुर आदि राज्यों में राजकीय विक्रम संवत् अब
श्रावण कृष्णा (पूर्णिमांत) से प्रारंभ होता है.
८-शक संवत्.
शक संवत् के प्रारंभ के विषय में ऐसी प्रसिद्धि है कि दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के राजा
शालिवाहन (सातवाहन, हाल) ने यह संवत् चलाया. कोई इसका प्रारंभ शालिवाहन के जन्म से २
मानते हैं. जिनप्रभसूरि अपने 'कल्पप्रदीप' ३ नामक पुस्तक में लिखता है कि प्रतिष्ठानपुर (पैठण)
में रहनेवाले एक विदेशी ब्राह्मण की विधवा बहिन से सातवाहन (शालिवाहन) नामक पुत्र उत्पन्न
हुआ. उसने उज्जैन के राजा विक्रम को परास्त किया. जिसके पीछे उसने प्रतिष्ठानपुर का राजा बन
कर तापी नदी तक का देश अपने अधीन किया और वहां पर अपना संवत् प्रचलित किया४.
क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनंद साक करके उसका अर्थ करे कि नव-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम
का नव-रहित शक अर्थात् १००-६=६० । ६१ अर्थात् विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ६० । ६१ से प्रारंभ हुआ
है। यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा (?) करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैंकड़ों वर्षों से यह
कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तो अब तक प्रचलित है
और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह अब अप्रचलित हो गया है... अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं।
एक तो सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है' (पृथ्वीराजरासा आदि
पर्व, पृ. १३६). पं. मोहनलाल पंड्या का यह सारा कथन सर्वथा स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि रासे के 'अनंद' शब्द
का अर्थ 'आनंददायक' या 'शुभ' ही है जैसा कि भाषा के अन्य काव्यों में मिलता है*. उसको वास्तविक अर्थ में न
ले कर 'विक्रम के राज्य के ६० वे या ६१ वे वर्ष से चलनेवाला अनंद विक्रम संवत्' अर्थ निकालना हठधर्मी से खाली नहीं
है; ज्योतिषियों ने विक्रम के दो संवतों का होना कभी नहीं माना और न किसी वृद्ध पुरुष को ऐसा कहते हुए सुना.
पं. मोहनलाल की यह कल्पना भी ठीक वैसी ही है जैसी कि 'राजप्रशस्ति' में खुदे हुए 'भापारासापुस्तकेस्य' के 'भाव-
नगर प्राचीनशोधसंग्रह' में छपे हुए अशुद्ध पाठ 'भीपारासापुस्तकेस्य' पर से 'भीमरासा' नामक ऐतिहासिक पुस्तक
की सृष्टि खड़ी कर दी गई. पं. मोहनलाल पंड्या के इस मनघडंत कथन के आधार पर डॉ. ग्रीअर्सन (स्मि; अ. हि. इं;
पृ. ४२, टिप्पण २), वी. ए. स्मिथ (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ३८७, टिप्पण २) और डॉ. बार्नेट ने (वा; एं. इं; पृ. ६५) 'अनंद
विक्रम संवत्' का ई. स. ३३ से चलना माना है परंतु हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि राजपुताने में विक्रम के दो
संवतों का होना कभी माना नहीं गया, न वहां से मिले हुए शिलालेखों, दानपत्रों, हस्तलिखित पुस्तकों, भाटों तथा चारणों
के लिखे हुए भाषा कविता के ग्रंथों या ख्यातों में कहीं भी अनंद विक्रम संवत् का उल्लेख मिलता है, न 'पृथ्वीराजरासे' के
उपर्युक्त दोहे में 'अनंद विक्रम संवत्' की कल्पना पाई जाती है और न 'पृथ्वीराजविजय' महाकाव्य से, जो चौहानों के इतिहास
का प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तक है, वि. सं. १२२० (ई. स. ११६३) के पूर्व पृथ्वीराज का जन्म होना माना जा सकता है.
१ आषाढादि विक्रम संवत् शिलालेखों तथा पुस्तकों में मिलता है. अडालिज (अहमदाबाद से १२ मील पर)
की बावड़ी के लेख में 'श्रीमन्नृपविक्रमसमयातीता (त) आषाढादिसंवत १५५५ वर्ष शाके १४२०.... माघमासे पंचम्यां तिथौ बुधवासरे'
(इं. पं; जि. १८, पृ. २४१). डुंगरपुर राज्य के डेसां गांव के पास के शिवमंदिर के लेख में-'श्रीमन्नृ (न्नृ) पविक्रमार्क (र्क) राज्यसम-
यातीतसंवत् १६ आषादादि २३ वर्षे शाके १४८८ प्रवर्त्तमाने । युवराव्यनाम्नि संवत्सरे.... वैशाखमासे । कृष्णापक्षे । प्रतिपति (ति) या । गुरुवारसरे.'
डुंगरपुर राज्य से मिले हुए कई शिलालेखों में 'आषाढादि' संवत् लिखा मिलता है. 'प्रभातक्षेत्रतीर्थयात्राक्रम' नामक
पुस्तक के अंत में-'संवत् १५ आषाढादि ३४ वरणे (वर्षे) श्रावणशुदि ५ बु(धौ) मे'-लिखा मिला है (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१).
२ त्र्यंकेन्द्र (१४६३) प्रमिते वर्षे शालिवाहनजन्मतः । कृतस्तपसि मार्तंडोऽयमलं जयतुद्गतः (मुहूर्त्त मार्तंड, अलंकार, श्लोक ३).
३ यह पुस्तक ई. स. १३०० के आस पास बना था. ४ ज. ए. सो. बंब; जि. १०, पृ. १३२-३३.

  • गगन पाणि पुनि द्वीप ससि (१७२०) हिम रुत मंगसर मास । शुक्ल पच्छ तेरस दिने बुध वासर दिन जाम ॥ २६६ ॥
    मरदानो अरु महा बली अवरंग शाह नरिंद । तासु राज महिं हरखसूं रच्यो शास्त्र अनंद ॥ २६७ ॥ (पद्मराग के शिष्य
    रामचंद्र रचित 'रामविनोद' नामक पुस्तक).

भारतीय संवत्. १७१
अलबेरूनी लिखता है कि 'विक्रमादित्य ने शक राजा को परास्त कर यह संवत् चलाया' १. इस
प्रकार इसके प्रचलित किये जाने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं.
पहिले पहिल यह संवत् काठियावाड़ तथा कच्छ से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के [ शक ]
संवत् ५२ से १४३ तक के शिलालेखों २ में तथा उन्हीं के सिक्कों में, जो [ शक ] संवत् १०० (ई. स.
१७८) के आस पास से लगा कर ३१० (ई. स. ३८८) से कुछ पीछे तक के हैं, मिलता है. उक्त
शिलालेखों में केवल 'वर्षे' (=संवत्सरे) लिखा मिलता है, 'शक' आदि कोई नाम 'वर्षे' (संवत्)
के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, और सिक्कों में तो अंक ही मिलते हैं ('वर्षे' भी नहीं.)
संस्कृत साहित्य में इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ (=शककाल) पहिले पहिल ३
वराहमिहिर की 'पंचसिद्धांतिका' में शक संवत् ४२७ ४ (ई. स. ५०५) के संबंध में मिलता है, और
शक संवत् ५०० (ई. स. ५७८) से लगा कर १२६२ (ई. स. १३४०) तक के शिलालेखों और
दानपत्रों में 'शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सर' ५, 'शकनृपतिसंवत्सर' ६, 'शकनृपसंवत्सर' ७, शकनृप-
काल' ८, शक्संवत्' ९, 'शकवर्ष' १०, 'शककाल' ११, 'शककालसंवत्सर' १२, 'शक' १३ और 'शाक' १४
शब्दों का प्रयोग इस संवत् के वास्ते किया हुआ मिलता है जिससे पाया जाता है कि ई. स. ५०० के
आस पास से लगा कर शक संवत् १२६२ (ई. स. १३४०) तक तो यह संवत् किसी शक राजा के,
राज्याभिषेक से चला हुआ या किसी शक राजा अथवा शकों का चलाया हुआ माना जाता था और
उस समय तक शालिवाहन का नाम इसके साथ नहीं जुड़ा था.
१. आ. स. इं; जि. २, पृ. ६.
२. राज्ञो चष्टनस घ्समोतिकपुत्रस राज्ञो रुद्रदामस जयदामपुत्रस वर्षे द्विपंचाशे ५२ २ फागुणबहुल्स द्वितीयं वी २ मदनेन सिंहलपुत्रेण ०
कच्छराज्य के अंधौ गांव से मिले हुए क्षत्रपों के लेखों की स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई छापों पर से.
राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ (महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले
चट्टान पर के लेख से. ऐ. इं; जि. ८, पृ. ४२ ).
३. सिंहसूरिरचित 'लोकविभाग' नामक संस्कृत जैन ग्रंथ में उक्त पुस्तक का शकाब्द (शक संवत्) ३८० में बनना
लिखा है (संवत्सरे तु द्वात्रिंशे कांचीशसिंहवर्मणः । अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ (मोक्षविभाग नामक ११ वें प्रकरण के
अंत की प्रशस्ति, श्लोक ४) परंतु यह मूल ग्रंथ नहीं किंतु सर्वंनंदि नामक मुनि के बनाये हुए प्राकृत ग्रंथ का परिवर्द्धित संस्कृत
अनुवाद है और ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पीछे का बना हुआ है क्यों कि इसमें यतिवृषभरचित 'तिलोयपण्णत्ति,'
राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय के अर्थात् ई. स. की ९ वीं शताब्दी के बने हुए 'उत्तरपुराण' तथा ई. स. की ११ वीं
शताब्दी के आस पास के बने हुए नेमिचंद्ररचित 'त्रिलोकसार' से भी श्लोक उद्धत किये हुए मिलते हैं. संभव है
कि सर्वंनंदि का मूल प्राकृत ग्रंथ शक संवत् ३८० में बना हो, परंतु उसमें इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ था
या नहीं इसका जब तक मूल ग्रंथ न मिल आवे तब तक निश्चय नहीं हो सकता. ऐसी दशा में ११ वीं शताब्दी के पीछे के
बने हुए 'लोकविभाग' के 'शकाब्द' को शक संवत् का सब से प्राचीन उल्लेख नहीं कह सकते.
४. सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका १।८. देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण *.
५. शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सरेष्वतिक्रांतेषु पंचसु शतेषु (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास का सेट ).
६. शकनृपतिसंवत्सरेषु चतुस्त्रिंशाधिकेषु पंचस्वतीतेषु भाद्रपदामावास्यायां सूर्य्यग्रहणनिमित्तं (इं. ऐं; जि. ६, पृ ७३ ).
७. शकनृपसंवत्सरेषु शरशिखिमुनिषु व्यतीतेषु ज्ये(ज्ये)ष्ठमासशुक्लपंचदश्यां पुष्यनक्षत्रे चंद्रवारे (इं. ऐं; जि. १२, पृ. १६ ).
८. शकनृपकालातीतसंवत्सरस(श)तेषु सप्तसु(सु) जे(षो)डशोत्तरेषु वैशाखब(व)हुलामावास्यामादित्यग्रहणपर्व्वणि (ऍ. इं; जि. ३,
पृ १०६).
९. शक्संवत् ८३२ वैशाखशुद्धपौरर्णमास्यां महावैशाख्यां (ऐं. इं; जि. १, पृ. ५६ ).
१०. एकादशोत्तरषट्छतेषु शकवर्षेष्वतीतेषु....कार्तिकपौर्णमास्यां (इं. ऐं; जि. ६, पृ. ८६ ).
११. सप्तस(श)त्या नवत्या च समायुक़्तेसु(षु) सप्तसु [।] स(श)ककाले(ले) श्व(ष्व)तीतेषु मन्मथाह्वयवत्सरे (ज. ए. सो. बंब; जि. १०,
पृ. १६५ ).
१२. पंचसप्तत्यधिकशककालसंवत्सरशतषट्के व्यतीते संवत(त्) ६७५....माघमासरथसप्तम्यां (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११२ ).
१३. शक ११५७ मन्मथसंवत्सरे श्रावणबहुले ३० गुरौ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६३, लेखसंख्या ३४८).
१४. शाके ११२८ प्रभवसंवत्सरे श्रावणमासे पौर्णमास्यां (ऍ. इं; जि. १, पृ. ३४३ ).

१७२ प्राचीनलिपिमाला.
इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ शालिवाहन (सातवाहन) का नाम संस्कृत साहित्य में ई. स.
की १४वीं शताब्दी के प्रारंभ १ के आस पास से और शिलालेखादि में पहिले पहिल हरिहर गांव
से मिले हुए विजयनगर के यादव राजा बुक्कराय (प्रथम) के शक संवत् १२७६ (ई. स. १३५४)
के दानपत्र २ में मिलता है; जिसके पीछे शालिवाहन का नाम लिखने का प्रचार बढ़ता गया. विद्वान्
राजा सातवाहन (शालिवाहन) का नाम 'गाथासप्तशती' और 'बृहत्कथा' से सान्चरवर्ग में प्रचलित था
अत एव संभव है कि ई. स. की १४वीं शताब्दी के आस पास दक्षिण के विद्वानों ने उत्तरी हिंदुस्तान
में चलनेवाले संवत् के साथ जुड़े हुए राजा विक्रम के नाम का अनुकरण कर अपने यहां चलने-
वाले 'शक' (शक संवत्) के साथ दक्षिण के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) का नाम जोड़
कर 'नृपशालिवाहनशक' ३, 'शालिवाहनशक,' ४ 'शालिवाहनशकवर्ष,' ५ 'शालिवाहनशकाब्द' ६ आदि
से इस संवत् का परिचय देना प्रारंभ किया हो.
शालिवाहन, सातवाहन नाम का रूपांतर ७ मात्र है और सातवाहन (पुराणों के 'आंध्रभृत्य')
वंश के राजाओं का राज्य दक्षिण पर ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी से ई. स. २२५ के आस पास
तक रहा था, उनकी राजधानियों में से एक प्रतिष्ठान नगर (पैठण, गोदावरी पर) भी थी और उनमें
सातवाहन (शातकर्णि, हाल) राजा बहुत प्रसिद्ध भी था अतएव संभव है कि दक्षिण के विद्वानों ने
उसीका नाम इस संवत् के साथ जोड़ा हो, परंतु यह निश्चित है कि सातवाहनवंशियों में से किसीने
यह संवत् नहीं चलाया क्यों कि उनके शिलालेखों में यह संवत् नहीं मिलता किंतु भिन्न भिन्न राजाओं
के राज्यवर्ष (सन् जुलूस) ही मिलते हैं और सातवाहन वंश का राज्य अस्त होने के पीछे अनुमान
११०० वर्ष तक शालिवाहन का नाम इस संवत् के साथ नहीं जुड़ा था. इस लिये यही मानना उचित
होगा कि यह संवत् शक जाति के किसी विदेशी राजा या शक जाति का चलाया हुआ है.
यह संवत् किस विदेशी राजा ने चलाया इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न
अटकलें लगाई हैं. कोई तुरुष्क (तुर्क, कुशन) वंश के राजा कनिष्क को, कोई क्षत्रप नहपान को,
१. देखो, ऊपर पृ. १७० और टिप्पणी ३, ४.
२. नृपशालिवाहनशक १२७६ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ७८, लेखसंख्या ४५४). इससे पूर्व के थाणा से मिले हुए
देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के समय के शक संवत् १२१२ (ई. स. १२६०) के दानपत्र की छपी हुई प्रति में (की; लि.
इं. स. ई; पृ. ६७, लेखसंख्या ३७६) में 'शालिवाहनशके १२१२' छपा है परंतु डॉ. फ्लीट का कथन है कि उक्त ताम्रपत्र का
अब पता नहीं है और नउसकी कोई प्रतिकृति प्रसिद्धि में आई और जैसे थाणा से मिले हुए ई. स. १२७२ के दानपत्र में शालि-
वाहन का नाम न होने पर भी नक़ल में जोड़ दिया गया वैसा ही इसमें भी हुआ होगा (ज. रॉ ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८१३).
ऐसी दशा में उक्त ताम्रपत्र को शालिवाहन के नामवाला सब से पहिला लेख मान नहीं सकते.
३. देखो, इसी पृष्ठ का टि. २. ४. शालिवाहनशक १४७६ (इं. पॅ; जि. १०, पृ. ६४).
५. शालिवाहनशकवर्ष १४३०........ माघशु १४ (पॅ. इं; जि. १, ३६६).
६. शकाब्दे शालिवाहस्य सहस्त्रेण चतुःशतैः। चतुस्त्रिंशत्समैर्युक्ते संख्याते गणितक्रमात् ॥ श्रीमुखवत्सरे श्लाध्ये माघे चासितपञ्चके । शिव-
रात्रा महातिथ्यां पुं(पु)ण्यकाले शुभे दिने (ज; ए. सो; बंब. जि. १२, पृ. ३८४).
७. सातवाहन=सालवाहन=शालिवाहन. 'शालो हाले मत्स्यभेदे'; हालः सातवाहनपार्थिवे (हैम अनेकार्थकोश).
सालाहणम्मि हालो (देशीनाममाला वर्ग ८, श्लोक ६६). शालिवाहन, शालवाहन, सालवाहण, सालवाहन, सालाहण, सातवाहन,
हालेत्येकस्य नामानि (प्रबंधचिन्तामणि, पृ. २८ का टिप्पण). गाथासप्तशती के अंत के गद्यभाग में सातवाहन राजा को
शातकर्ण (शातकर्णि) भी कहा है (डॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८३-८६ की रिपोर्ट, पृ. ३४८). पुराणों में मिलनेवाली
आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंश के राजाओं की नामावली में शातकर्णि, शातकर्ण, यज्ञश्रीशातकर्णि, कुंतलशातकर्ण आदि
नाम मिलते हैं. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में शातकर्णि सातवाहन का कर्तरी (कैंची) से महादेवी मलयवती को मारना
लिखा है-कर्तर्या कुंतलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीं [जघान] (निर्णयसागर प्रेस का छपा हुआ 'कामसूत्र',
पृ. १७४). नासिक से मिले हुए वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के लेख में उसके पिता गौतमीपुत्र शातकर्णि का शक,
यवन और पह्लवों को नष्ट करना तथा खखरात वंश (अर्थात् क्षत्रप नहपान के वंश) को निरवशेष करना लिखा
है (पॅ. इं; जि. ८, पृ. ६०). उसी लेख से यह भी पाया जाता है कि उसके अधीन दूर दूर के देश थे. गौतमीपुत्र
शातकर्णि सातवाहन वंश में प्रबल राजा हुआ था अतएव संभव है कि शक संवत के साथ जो शालिवाहन (सातवाहन)
का नाम जुड़ा है वह उसीका सूचक हो और 'गाथासप्तशती', 'बृहत्कथा', तथा 'कामसूत्र' का सातवाहन भी वही हो.

कोई शक राजा वेननस् को और कोई शक राजा अय (अज़=Azes) को इसका प्रवर्त्तक मानते हैं
परंतु ये सब अनुमान ही हैं, निश्चित रूप से इसके प्रचारक का नाम अब तक ज्ञात नहीं हुआ.
गत शक संवत् में ३१७९ जोड़ने से कलियुग संवत्, १३५ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम
संवत् और ७८ (अंत के करीब तीन महीनों में ७९) जोड़ने से ई. स. आता है. यह संवत् बहुधा
सारे दक्षिण में (तिन्नेवेल्लि और मलबार प्रदेशों को छोड़ कर) प्रचलित है. उत्तरी हिंदुस्तान में पंचांग,
जन्मपत्र और वर्षफल आदि में विक्रम संवत् के साथ यह भी लिखा जाता है और वहां के शिला-
लेखादि में भी कभी कभी इसके वर्ष लिखे मिलते हैं. इसका प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है.
इसके महीने उत्तरी हिंदुस्तान में पूर्णिमांत, और दक्षिण में अमांत माने जाते हैं. दक्षिण के जिन
हिस्सों में सौर मान का प्रचार है वहां इसका प्रारंभ मेष संक्रांति से होता है. करण ग्रंथों के आधार
पर पंचांग बनानेवाले सारे भारतवर्ष के ज्योतिषी इसी संवत् का आश्रय लेते हैं. पंचांगों में इसके
वर्ष गत ही लिखे रहते हैं. शिलालेख और दानपत्रों में

१७४ प्राचीनलिपिमला.
आश्विन शुक्ला १ १ से इसका प्रारंभ होना निश्चय किया है जिससे वर्तमान चेदि संवत् में
२४८-४६ २ जोड़ने से ईसवी सन्, और ३०५-६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् आता है.
इस संवत्‌वाला सब से पहिला लेख कलचुरि संवत् २४५ ३ ( ई. स. ४६४ ) का और अंतिम
६५८ ४ ( ई. स. १२०७) का मिला है, जिसके पीछे यह संवत् अस्त हो गया. इसके वर्ष बहुधा
वर्तमान ५ लिखे मिलते हैं.

१०—गुप्त संवत्.
इस संवत् के लिये शिलालेखादि में ‘गुप्तकाल’, ‘गुप्तवर्ष’ ६ आदि शब्द लिखे मिलते हैं जिस-
से पाया जाता है कि यह संवत् गुप्तवंशी किसी राजा ने चलाया हो. इस विषय का लिखित प्रमाण
तो अब तक नहीं मिला, परंतु समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के लेख में गुप्त वंश के पहिले दो राजाओं
(गुप्त और घटोत्कच ) के नामों के साथ केवल ‘महाराज’ ७ विरुद्ध और घटोत्कच के पुत्र चंद्रगुप्त
(पहिले) के नाम के साथ ‘महाराजाधिराज’ विरुद्ध लिखा रहने तथा चंद्रगुप्त (प्रथम) के पौत्र
और समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय के गुप्त सं. ८२ ८ से ६३ ९ तक के शिलालेखों १० के
मिलने से विद्वानों का यह अनुमान है कि गुप्तवंश में पहिले पहिल चंद्रगुप्त (पहिला) प्रतापी राजा हुआ
हो और उसके राज्य पाने के समय से यह संवत् चला हो. गुप्तों के पीछे काठियावाड़ में वलभी के

१. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५. पँ. इं; जि. २, पृ. २६६.
२ आश्विन शुक्ला १ से लगा कर माघ के प्रारंभ के आसपास तक अर्थात् जनवरी मास के लगने से पहिले के कुछ
महीनों में ही ई. स. और वर्तमान कलचुरि संवत् का अंतर २४८ रहता है बाकी अधिकतर महीनों में २४६ रहता है.
३. कन्हेरी से मिला हुआ ताम्रपत्र (केवंटेंपल्स ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८).
४. क; आ. स. रि; जि. २१, पृ. १०२, सेंट २७. ५. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५, टिप्पण ५.
६. संवत्सराणामधिके शते तु त्रिंशद्भिंरन्यैरपि षड्भिरेव । रात्रौ दिने प्रौष्ठपदस्य षष्ठे गुप्तप्रकाले गणनां विधाय ॥.......वर्षशतेष्टाविंशे
गुप्तानां काल....(गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चटान पर खुदे हुए स्कंदगुप्त के समय के लेख से. फ्ली; गु.
इं; पृ. ६०, ६१). मोरबी (काठियावाड़ में) से मिले हुए गुप्त संवत् ५८५ के दानपत्र में ‘पंचाशीत्या युतेतीते समानां
शतपंचके । गोप्ते ददावदो नृपः सोपरागार्कंमंडले’ (ई. ऐं; जि. २, पृ. २५८). वर्षशते गुप्तानां सचतुःपंचाशदुत्तरे भूमिम् । शासति कुमा-
रगुप्ते मासे ज्येष्ठे द्वितीयायाम् (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). गुप्तानां
समतिक्रांते सप्तपंचाशदुत्तरे । शते समानां पृथिवीं बुधगुप्ते प्रशासति (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का
लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६१ के दानपत्र में ‘एकनवत्युत्तरेब्दशते
गुप्तनृपराज्यभुक्तौ श्रीमति प्रवर्द्धमानमहाचैत्रसंव(त्)त्सरे माघमासबहुलपंचतुत्तीयायाम्’ (फ्ली; गु. इं; पृ. १०७) लिखा मिलता है,
और अलबेरूनी अपने मूल अरबी पुस्तक में गुप्तकाल, या ‘गुवितकाल’ (=गुप्तकाल) ही लिखता है (फ्ली; गु. इं;
भूमिका, पृ. २६, ३०).
७. ‘विरुद्ध’ महाराज’ का प्रयोग सामंत के लिये होता था. मेवाड़ के गुहिल राजा अपराजित के समय के वि. सं.
७१८ के लेख में उसको ‘राजा’ और उसके सेनापति वराहसिंह को ‘महाराज’ लिखा है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ३१), परंतु
कन्नौज के प्रतिहारों के दानपत्रों में यही विरुद्ध उन प्रबल स्वतंत्र राजाओं के नामों के साथ लगा हुआ भी मिलता है (इं. पैँ;
जि. १५, पृ. ११२, १४०; ऐं. इं; जि. ५, पृ. २११-१२).
८. फ्ली; गु. इं; पृ. २५. ९. फ्ली; गु. इं; पृ. ३१-३२.
१० चंद्रगुप्त (दूसरे) का सब से पिछला शिलालेख गुप्त संवत् ६३ का और उसके पुत्र कुमारगुप्त (पहिले) का
सब से पहिला शिलालेख गुप्त संवत् ६६ का मिला है, जिससे चंद्रगुप्त (दूसरे) के राज्य की समाप्ति गुप्त संवत् ६५ के आसपास
होनी चाहिये. गुप्त संवत् का प्रारंभ चंद्रगुप्त (पहिले) के राज्य पाने के समय से मानने से उन तीन राजाओं (चंद्रगुप्त,
समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त दूसरे) का राजत्वकाल करीब ६५ वर्ष मानना पड़ता है जो सरसरी तौर से देखनेवालों को अधिक
प्रतीत होगा परंतु तीन राजाओं के लिये वह समय अधिक नहीं है क्योंकि अकबर, जहांगीर और शाहजहां इन तीन बादशाहों
का राजत्वकाल १०२ (ई. स. १५५६-१६५८) वर्ष होता है.

भारतीय संवत्. १७५
राज्य का उदय हुआ जिसके अस्त होने के पीछे वहांवालों ने गुप्त संवत् का ही नाम 'वलभी
संवत्'१ रक्खा.
अल्बेरूनी लिखता है कि 'वलभीपुर के राजा वलभ२ के नाम से उसका संवत् वलभी संवत्
कहलाया. यह संवत् शक संवत् के २४१ वर्ष पीछे शुरू हुआ है. शक संवत् में से ६ का घन और
५ का वर्ग ( २१६+ २५=२४१ ) घटाने से वलभी संवत् रह जाता है. गुप्तकाल के विषय में लोगों
का कथन है कि गुप्त लोग दुष्ट [और] पराक्रमी थे और उनके नष्ट होने पर भी लोग उनका संवत्
लिखते रहे. अनुमान होता है कि वलभ उन (गुप्तों) में से अंतिम था क्यों कि वलभी संवत् की
नांई गुप्त संवत् का प्रारंभ भी शक काल से २४१ वर्ष पीछे होता है. श्रीहर्ष संवत् १४८८, विक्रम
संवत् १०८८, शककाल ९५३ और वलभी तथा गुप्तकाल ७१२ ये सब परस्पर समान हैं'३. इससे
विक्रम संवत् और गुप्तकाल का अंतर (१०८८-७१२=) ३७६ आता है अर्थात् गुप्त संवत् में ३७६ मिलाने
से चैत्रादि विक्रम संवत्, २४१ मिलाने से शक संवत् और ३१६-२० मिलाने से ई. स. आता है.
गुजरात के चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के वेरावल (काठियावाड़ में) के एक शिलालेख में
रसूल महंमद संवत् (हिजरी सन्) ६६२, विक्रम संवत् १३२०, वलभी संवत् ९४५ और सिंह संवत्
१५१ आषाढ़ कृष्णा १३ रविवार लिखा है४. इस लेख के अनुसार विक्रम संवत् और वलभी (गुप्त)
संवत् के बीच का अंतर ( १३२०-९४५ = ) ३७५ आता है परंतु यह लेख काठियावाड़ का होने के
कारण इसका विक्रम संवत् १३२० कार्तिकादि५ है जो चैत्रादि १३२१ होता है जिससे चैत्रादि
विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर ३७६ ही आता है जैसा कि ऊपर लिखा गया है.
चैत्रादि पूर्णिमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर सर्वदा ३७६ वर्ष का और
कार्तिकादि अमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर चैत्रशुक्ला १ से आश्विन
कृष्णा अमावास्या तक ३७५ वर्ष का और कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन कृष्णा अमावास्या तक
३७६ वर्ष का रहता है.
गुप्त संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से और महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा
गत लिखे मिलते हैं और जहां वर्तमान लिखा रहता है वहां एक वर्ष अधिक६ रहता है.


१. काठियावाड़ में गुप्त संवत् के स्थान में 'वलभी संवत्' लिखे जाने का पहिला उदाहरण ऊना गांव (जूनागढ़
राज्य में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल के चालुक्यवंशी सामंत बलवर्मन् के वलभी संवत् ५७४ (ई. स.
८६४) माघ शुद्ध ६ के दानपत्र में मिलता है (एं. इं; जि. ६, पृ. ६).
२. अल्बेरूनी ने 'वलभी संवत्' को वलभीपुर के राजा वलभ का चलाया हुआ माना है और उक्त राजा को गुप्त वंश
का अंतिम राजा बतलाया है परंतु ये दोनों कथन ठीक नहीं हैं क्योंकि उक्त संवत् के साथ जुड़ा हुआ 'वलभी' नाम उक्त
नगर का सूचक है न कि वहां के राजा का, और न गुप्त वंश का अंतिम राजा वलभ था. संभव है कि गुप्त संवत् के प्रारंभ से
७०० से अधिक वर्ष पीछे के लेखक अल्बेरूनी को 'वलभी संवत्' कहलाने का ठीक ठीक हाल मालूम न होने के कारण
उसने ऐसा लिख दिया हो अथवा उसको लोगों ने ऐसा ही कहा हो.
३. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ७. फ़्ली; गु. इं; भूमिका, पृ. ३०-३१.
४. रसुलमहमदसवत् ६६२ तथा श्रीनृप[वि]क्रमसं १३२० तथा श्रीमद्वलभिसं ९४५ तथा श्रीसिंहसं १५१ वर्षे आषाढवदि १३ रखौ
( इं. ऐं; जि. ११, पृ. २४२ ).
५. वेरावल के उक्त लेख के विक्रम संवत् को कार्तिकादि मानने का यह भी कारण है कि उसमें लिखा हुआ हिजरी
सन् ६६२ चैत्रादि विक्रम संवत् १३२० मार्गशीर्ष शुक्ला २ को प्रारंभ हुआ था, अतएव हि. स. ६६२ में जो आषाढ़ मास आया
वह चैत्रादि वि. सं. १३२१ ( कार्तिकादि १३२०) का ही था.
६. खेड़ा से मिले हुए वलभी के राजा धरसेन (चौथे) के गुप्त संवत् ३३० के दानपत्र में उक्त संवत् में मार्गशिर मास
अधिक होना लिखा है ( सं. ३०० ३० द्विमागीशिरशु २. इं. ऐं. जि. १५, पृ. ३४० ). गत गुप्त संवत् ३३० गत विक्रम
संवत् ( ३३०+३७६= ) ७०६ के मुताबिक होता है. गत विक्रम संवत् ७०६ में कोई अधिक मास नहीं था परंतु वि. स. ७०५
में मध्यम मान से मार्गशिर मास अधिक आता है इस लिये उक्त ताम्रपत्र का गुप्त संवत् ३३० वर्तमान ( ३२९ गत ) होना
चाहिये.

१९१८ के पत्र में"!
Look at the second digit of 1918: it looks identical to the digit in line 18!
And 1918 is obviously ১৯১৮ / १९१८ (April 2, 1918)!
So that digit IS ९ (nine)!
Wait, why did I think it was ६? Because in this font, ९ is shaped like a reverse curve or modern 9: a curve, loop at top, or curved like 9!
Wait, in line 30, it is "ई. स. १९१८" (1918)!
Wait, what about line 15: "ई. स. ६६३"?
Wait! In line 15, is it "६६३" or "६६३"? The first two digits are ६, ६! They are shaped like ६.
In line 30: "१९१८" -> first digit is १, second is ९, third is १, fourth is ८!
So that second digit is ९!
And in line 18: "८७ और ९१ के" -> the digit in ९१ is identical to the ९ in १९१८!
So it is definitely ९१ (91)!
Wait, what about line 19: "ई. स. ६६३ ६ के"?
Wait, is line 15 "ई. स. ६६३" or "ई. स. ६६३"?
Wait, Indra-bhattaraka died in

भारतीय संवत्. १७७
ऐसा पाया नहीं जाता. इस लिये उपर्युक्त ई. स. ६६३ की घटना गांगेय संवत् ८७ से कुछ पूर्व
की होनी चाहिये. यदि ऊपर के दोनों अनुमान ठीक हों तो गांगेय संवत् का प्रारंभ ई. स.
(६६३-८७ =) ५७६ से कुछ पूर्व अर्थात् ई. स. ५७० के आस पास होना चाहिये, परंतु जब तक
अन्य प्रमाणों से इस संवत् के प्रारंभ का ठीक निर्णय न हो तब तक हमारा अनुमान किया हुआ
इस संवत् के प्रारंभ का यह सन् भी अनिश्चित ही समझना चाहिये.
गांगेय संवत्वाले दानपत्रों में सबसे पहिला गांगेय संवत् ८७ का और सबसे पिछला
३५१ का है. यह संवत् ३५० वर्ष से कुछ अधिक समय तक प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
१२- हर्ष संवत्.
यह संवत् थानेश्वर के बैसवंशी राजा हर्ष (श्रीहर्ष, हर्षवर्द्धन, शीलादित्य) के राज्यसिंहासन
पर बैठने के समय से चला हुआ माना जाता है परंतु किसी लेख में इस संवत् के साथ हर्ष का नाम
जुड़ा हुआ अब तक नहीं मिला. स्वयं राजा हर्ष के दोनों दानपत्रों में भी केवल 'संवत्' ही लिखा है १.
अलबेरूनी लिखता है कि 'मैने कश्मीर के एक पंचांग में पढ़ा है कि श्रीहर्ष विक्रमादित्य से
६६४ वर्ष पीछे हुआ २. यदि अलबेरूनी के इस कथन का अर्थ ऐसा समझा जावे कि विक्रम संवत्
६६४ से हर्ष संवत् का प्रारंभ हुआ है तो हर्ष संवत् में ६६३ जोड़ने से विक्रम संवत् तथा ६०६-७
जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख में संवत् ३४ प्रथम पौष शुक्ला २ लिखा है ३. संभव है कि
उक्त लेख का संवत् हर्ष संवत् हो. केंब्रिज के प्रोफेसर ऐडम्स और विएना के डॉक्टर थाम ने हर्ष संवत्
० = ई. स. ६०६ (वि. सं. ६६३) मान कर गणित किया तो 'ब्रह्मसिद्धांत' के अनुसार ई. स. ६४०
अर्थात् वि. सं. ६६७ में पौष मास अधिक आता है ४. इससे भी वि. सं. और हर्ष संवत् के बीच का
अंतर (६६७-३४=) ६६३ तथा ई. स. और हर्ष संवत् का अंतर ६०६ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया
गया है. यह संवत् बहुधा संयुक्त प्रदेश तथा नेपाल में करीब ३०० वर्ष प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
अलबेरूनी ने विक्रम संवत् १०८८ के मुताबिक जिस श्रीहर्ष संवत् १४८८ का होना लिखा है
(देखो, ऊपर पृ. १७५) वह इस हर्ष संवत् से भिन्न होना चाहिये परंतु उसका प्रचलित होना किसी
शिलालेख, दानपत्र या पुस्तक से पाया नहीं जाता.
का एक होना अब तक कहीं लिखा नहीं मिला. दूसरी आपत्ति यह है कि उक्त दानपत्र में लिखे हुए राज्यवर्ष २० वें को
डॉ. फ्लीट ने उक्त सामंत का राज्यवर्ष मानकर उसके राज्य (शासन) का प्रारंभ शक संवत् (५३२-२०=) ५१२ अर्थात्
ई. स. ५६० से होना स्थिर कर वहीं से गांगेय संवत् का प्रारंभ मान लिया है, परंतु रेवती द्वीप मंगलीश्वर ने ही विजय
किया था (गौ; सो. प्रा. इ; पृ. २३) इस लिये उक्त दानपत्र का राज्यवर्ष उक्त सामंत का नहीं किंतु उसके स्वामी मंग-
लीश्वर का ही होना चाहिये जैसा कि डॉ० सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर का मानना है. तीसरी बात यह है कि उक्त
सामंत का कोंकण से गंजाम ज़िले में जाकर नवीन राज्य स्थापित करना मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसी
दशा में डॉ. फ्लीट का गांगेय संवत्संबंधी कथन स्वीकार नहीं किया जा सकता.
१. बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष के दान पत्र में 'संवत् २० २ (=२२) कात्ति[क]वदि १' (एं. इं; जि ४, पृ. २११)
और मधुवन से मिले हुए दानपत्र में 'संवत् २० ५ (=२५) मार्गशीर्षवदि ६' (एं. इं; जि. १, पृ. ७२) लिखा है.
२. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ५.
३. संवत् ३० ४ (=३४) प्रथमपौषशुक्लद्वितीयायाम् (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ७३, लेखसंख्या ५३०).
४. इं. ऐं; जि. १५, पृ. ३३८.

१७८ प्राचीनलिपिमाला.
१३-भाटिक (भट्टिक) संवत्.
भाटिक (भट्टिकं) संवत् जैसलमेर के दो शिलालेखों में मिला है. भट्टि या भटिक (भाटी)
नामक राजा जैसलमेर के राजाओं का प्रसिद्ध पूर्वज था जिसके नाम से उसके वंशज भाटी कहलाये.
यह संवत् राजा भटिक (भाटी) का चलाया हुआ होना चाहिये१. जैसलमेर के लक्ष्मीनारायण के
मंदिर के शिलालेख में, जो वहां के राजा वैरिसिंह के समय का है, वि. सं. १४६४ और भाटिक संवत्
८१३ लिखा है२ जिससे वि. सं. और भाटिक संवत् का अंतर (१४६४-८१३=) ६८१ आता है. वहीं
के महादेव के मंदिर के लेख में, जो रावल भीमसिंह के समय का है, वि. सं. १६७३, शक संवत्
१५३८ और भाटिक संवत् ६६३ मार्गशीर्ष मास लिखा है३. इस हिसाब से वि. सं. और भाटिक
संवत् के बीच का अंतर (१६७३-६६३=) ६८० आता है. इन दोनों लेखों से पाया जाता है
कि भाटिक संवत् में ६८०-८१ मिलाने से विक्रम संवत् और ६२३-२४ मिलाने से ई. स.
आता है.
अभी तक जैसलमेर राज्य के प्राचीन लेखों की खोज बिलकुल नहीं हुई जिससे यह पाया
नहीं जाता कि कब से कब तक इस संवत् का प्रचार रहा.
१४-कोल्लम् (कोलंव) संवत्.
इस संवत् को संस्कृत लेखों में कोल्लंभ४ संवत् (वर्ष) और तमिळ में 'कोल्लम् आंडु'
(कोल्लम्=पश्चिमी, और आंडु=वर्ष) अर्थात् पश्चिमी [भारत का] संवत् लिखा है. यह संवत्
किसने और किस घटना की यादगार में चलाया इस विषय में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता.
इसके वर्षों को कभी 'कोल्लम् वर्ष' और कभी 'कोल्लम के उद्भव से वर्ष' लिखते हैं, जिससे
अनुमान होता है कि भारत के पश्चिमी तट पर के मलबार प्रदेश के कोल्लम् (किलोन, त्रावनकोर राज्य
१. चारण रामनाथ रत्नू ने अपने 'इतिहास राजस्थान' में भाटीजी (भट्टिक. भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२
दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं
देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रति-
हार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष
शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था.
यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब
से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय
भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव,
मजमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्रस्किन का जैसलमेर का गज़ेटिअर, पृ. ६-१०, और
टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की
गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का
चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय
की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.
२. संवत् श्रीविक्रमार्कसमयातीतसंवत् १४६४ वर्षे भाटिके संवत् ८१३ प्रवर्तमाने महामांगल्य........चंद्रे (प्रो. श्रीधर आर.
भंडारकर की संस्कृत पुस्तकों की तलाश की ई. स. १९०४-५ और १९०५-६ की रिपोर्ट, पृ. ६५).
३. स्वस्ति श्रीनृपविक्रमादिता (त्य) समयातात (तीत) संवत् १६७३ रामाश्र्वभूपतौ वर्षे शाके १५३८ वसुरामशरैके प्रवृत्तमन (र्तमाने)
भाटिक ६६३ मार्ग (र्गि) शिर....(उपर्युक्त रिपोर्ट, पृ. ६८).
४. श्रीमत्कोलंभवर्षे भवति गुणखणिश्रेणिश्रादित्यवर्मा वञ्चीपालो (इं. पँ; जि. २, पृ. ३६०).
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भारतीय संवत्. १७६
में) नामक प्राचीन नगर से १, जिसको संस्कृत लेखक 'कोलंबपत्तन २' लिखते हैं, संबंध रखनेवाली
किसी घटना से यह संवत् चला हो ३. मलबार के लोग इस को 'परशुराम को संवत्' कहते हैं तथा
१००० वर्ष का चक्र, अर्थात् १००० वर्ष पूरे होने पर वर्ष फिर १ से प्रारंभ होना, मानते हैं और वर्तमान
चक्र को चौथा चक्र बतलाते हैं परंतु ई. स. १८२५ में इस संवत् या चक्र के १००० वर्ष पूरे हो जाने
पर फिर उन्होंने १ से वर्ष लिखना शुरू नहीं किया किंतु १००० से आगे लिखते चले जा रहे हैं जिससे
१. कोल्लम् (किलोन) एक प्राचीन नगर और बंदरगाह है. दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर का व्योपार का
प्रसिद्ध स्थान होने के कारण पहिले मिसर, यूरप, अरब, चीन आदि के व्योपारी वहां माल खरीदने को आया करते थे.
ई. स. की ७वीं शताब्दी के नेस्टोरिअन पादरी जेसुजयस ने किलान का उल्लेख किया है. ई. स. ८५१ के अरब लेखक ने
'कोल्लम-मल्ल' नाम से इसका उल्लेख किया है (इंपीरिअल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया, जि. २१, पृ. २२).
२. बंबई गज़ेटिअर, जि. १, भाग १, पृ. १८२, टिप्पण १.
३. बर्नल लिखता है कि 'इस संवत् का ई. स. ८२४ के सेप्टेंबर से प्रारंभ हुआ है. ऐसा माना जाता है कि यह
कोल्लम (किलोन) की स्थापना की यादगार में चला है' (ब; सा. इं; पे; पृ. ७३), परंतु कोल्लम् शहर ई. स. ८२४ से
बहुत पुराना है और ई. स. की ७ वीं शताब्दी का लेखक उसका उल्लेख करता है (देखो, इसी पृष्ठ का टिप्पण १) इस
लिये ई. स. ८२४ में उसका बसाया जाना और उसकी यादगार में इस संवत् का चलाया जाना माना नहीं जा सकता.
ट्रावनकोर राज्य के आर्किआलॉजिकल सर्वे के सुपरिंटेंडेंट टी. ए. गोपीनाथ राव का अनुमान है कि ई. स. ८२५ में
मरुवान् सपीर ईशो नामक ईसाई व्यौपारी दूसरे ईसाइयों के साथ कोल्लम् में आया हो और उसकी यादगार में वहां के
राजा ने यह संवत् चलाया हो...... [ उस समय ] सारा मलबार देश वस्तुतः एक ही राजा के अधीन था और यदि उसने
आज्ञा दी हो कि मरुवान् सपीर ईशो के जहाज़ से कोल्लम् में उतरने के दिन से लोग अब [ नया ] संवत् गिना करें
तो सारे मलेनाडु (मलबार) के, जिसका वह शासक था, लोगों ने अवश्य उसे शिरोधार्य किया होगा' (ट्रा. आ. सी;
जि. २, पृ. ७६, ७८-७६; और ता० ८ फरवरी ई. स. १६१८ के पत्र के साथ गोपीनाथ राव का मेरे पास भेजा हुआ कोल्लम् संवत्
का वृत्तान्त). गोपीनाथ राव का यह कथन भी ठीक नहीं कहा जा सकता. उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के
ईसाइयों के पास से मिले हुए वट्टेळुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम्
में तिरिस्सापळ्ळि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के
वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी
और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में
कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की
अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था
७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की
कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६०
और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-
केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई
प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने
की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्यों कि उसमें पचीस
पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही
मिले हुए वट्टेळुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नल ने ई. स. ७७४ का अनुमान किया था परंतु
तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राय बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-
पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (एं. इं; जि. ४, पृ. २६२). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार
के राजा चेरुमान् पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन'
नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के
ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अबदुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं
कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. पं; जि. ११, पृ. ११६
ड; क्रॉ. इं; पृ. ५४), परंतु मलबार गज़ेटिअर का कर्त्ता मि. इवेल लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं
हुआ (मलबार गज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का
भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि
ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे
तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न

१८० प्राचीनलिपिमला.
इस संवत् को १००० वर्ष का चक्र मान नहीं सकते. वीर रवि रविवर्मन् के त्रिवेंद्रम् से मिले हुए
शिलालेख में कलियुग संवत् ४७०२ (वर्तमान=गत ४७०१) और कोल्लम् संवत् ७१६ दोनों लिखे हुए हैं
जिससे भी यही पाया जाता है कि गत कलियुग संवत् और कोल्लम् संवत् के बीच का अंतर
(४७०१-७१६ = ) ३९८५ है.
डॉ. कीलहॉर्न ने कोल्लम् संवत्वाले कई शिलालेखों में दिये हुए संवत्, संक्रांति, वार आदि
को गणित से जांच कर कोल्लम् संवत् में ८२४-२५ मिलाने से ई. स. होना निश्चय किया है
(ई. ऐँ; जि. २५, पृ. ५४) और दीवान बहादुर एल. डी. स्वामिकन्नु पिल्ले ने ई. स. में से ८२५
घटाने से कोल्लम् संवत् का बनना माना है (इंडियन क्रॉनॉलॉजी, पृ. ४३).
यह संवत् मलबार से कन्याकुमारी तक और तिन्नवेल्लि ज़िले में अब तक प्रचलित है.
उत्तरी मलबार में इसका प्रारंभ कन्या संक्रांति (सौर आश्विन) से और दक्षिणी मलबार तथा
तिन्नवेल्लि ज़िले में सिंह संक्रांति (सौर भाद्रपद) से होता है. इसका वर्ष सौर है और मलबार
में महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं; परंतु तिन्नवेल्लि ज़िले में उनके नाम चैत्रादि महीनों
के लौकिक रूप से हैं (चैत्र को 'चित्तिरै' या 'चित्तिरै' कहते हैं). वहां का सौर चैत्र मलबार-
वालों का 'मेष' है. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान ही लिखे जाते हैं. इस संवत्वाला सब से पुराना
लेख कोल्लम् संवत् १४६² का मिला है.
१५-नेवार (नेपाल) संवत्.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को नेपाल से जो वंशावली मिली उससे पाया जाता है कि
दूसरे ठाकुरी वंश के राजा अभयमल्ल के पुत्र जयदेवमल्ल³ ने नेवार संवत् चलाया. उसने कांति-
पुर और ललितपट्टन पर राज्य किया और उसके छोटे भाई आनंदमल्ल ने भक्तपुर (भाटगांव)
बसाया और वह वहीं रहा. इन दोनों भाइयों के समय कर्णाटकवंश को स्थापित करनेवाले नान्य-
देव ने दक्षिण से आकर नेपाल संवत् ६ या शक संवत् ८११ श्रावण शुदि ७ को समग्र देश (नेपाल)
करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ
कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स. ७८८ (विक्रम संवत् ८४५ = कलियुग संवत् ३८८६*) में और
देहांत ३२ वर्ष की अवस्था में (केरलौत्पत्ति के अनुसार) माना जावे तो उनका देहांत ई. स. (७८८+३२= ) ८२० में होना
स्थिर होता है. यह समय कोल्लम् संवत् के प्रारंभ के निकट आ जाता है परंतु ऐसा मानने के लिये मलबारवालों की
जनश्रुति के सिवाय कोई अन्य प्रमाण नहीं है. ऐसी दशा में यही कह सकते हैं कि यह संवत् किसने किस घटना की याद-
गार में चलाया यह अब तक अनिश्चित ही है.
१. दा. आ. सी; जि. २, पृ. २८. २. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २३४.
३. डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को मिली हुई नेपाल की वंशावली में जयदेवमल्ल का नेवार (नेपाल) संवत् चलाना
लिखा है परंतु जनरल कनिंगहाम लिखता है कि राजा राघवदेव ने ई. स. ८८० में नेपाल में यह संवत् प्रचलित किया (क;
ई; पृ. ७४). राघवदेव का नाम डॉ. भगवानलाल इंद्रजी की वंशावली तथा नेपाल के इतिहास के अंग्रेजी पुस्तकों में नहीं
मिलता परंतु नेपाल के राजा जयस्थितिमल्ल (ई. स. १३८०-१३६४) के समय की लिखी हुई वंशावली की पुस्तक में जो प्रो.
सेसिल बेंडाल को नेपाल से मिला, उक्त राजा का नाम मिलता है और नेपाल से मिले हुए हस्तलिखित संस्कृत पुस्तकों
के अंत में मिलनेवाले वहां के राजाओं के नाम और संवतों को देखते हुए राघवदेव का यह संवत् चलाना अधिक

  • शंकराचार्यप्रादुर्भावस्तु विक्रमार्कसमयादतीते पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतीमिते संवत्सरे केरलदेशे कालपीग्रामे....। तथा च संप्रदायविद
    आहुः । निधिनागेभवह्न्यब्दे विभवे मासि माधवे । शुक्रे तिथौ दशम्यां तु शंकरायोदयः स्मृतः ॥ इति ३८८६ । .... तथा च शंकरमंदारसौरभे
    नीलकंठभट्टा अपि एवमाहुः । प्रासूत तिष्यशरदाम् अतियातवत्याम् एकादशाधिकशतो ननवद्युतःसहस्र्याम् । ३८८६ । (यज्ञेश्वर शास्त्री का
    'आर्यविद्यासुधाकर' पृ. २२६, २२७).

भारतीय संवत्. १८१
विजय कर दोनों मल्लों ( जयदेवमल्ल और आनंदमल्ल ) को तिरहुत की तरफ़ निकाल दिया१.
इस कथन के अनुसार शक संवत् और नेवार संवत् के बीच का अंतर ( ८११-९= ) ८०२ और
विक्रम संवत् तथा नेवार संवत् के बीच का अंतर ( ९४६-९= ) ९३७ आता है.
नेपाल से मिले हुए दामोदर भट्ट रचित 'नवरत्नम्' नामक पुस्तक के अंत में शक संवत्
१६०७ मार्गशिर वदि अष्टमी, मघा नक्षत्र, सोमवार और नेपाल संवत् ८०६ लिखा है२. इसके
अनुसार शक संवत् और नेपाल संवत् के बीच का अंतर ( १६०७-८०६= ) ८०१ आता है.
डॉ. कीलहॉर्न ने नेपाल के शिलालेखों और पुस्तकों में इस संवत् के साथ दिये हुए मास,
पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र आदि को गणित से जांच कर ई. स. ८७९ तारीख २० अक्टोबर अर्थात् चैत्रादि
वि. सं. ९३६ कार्तिक शुक्ला १ से इस संवत् का प्रारंभ होना निश्चय किया है३. इससे गत नेपाल
संवत् में ८७८-७९ जोड़ने से ई. स

१८२ प्राचीनलिपिमला.
वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर ११३२ तथा ई. स. और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत्
का अंतर १०७५-७६ आता है अर्थात् वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् में १०७५-७६ मिलाने से
ई. स. बनता है.
कुर्तंकोटि से मिले हुए लेख में चालुक्य विक्रमवर्ष ७ दुंदुभि संवत्सर पौष शुक्ला ३ रवि वार
उत्तरायण संक्रांति और व्यतीपात लिखा है१. दक्षिणी बार्हस्पत्य गणना के अनुसार दुंदुभि संवत्सर
शक-सं. १००४ था; इससे भी गत शक संवत् और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर (१००४-
७ = ) ९९७ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
इस संवत् का प्रारंभ चैत्रशुक्ला १ से माना जाता है. यह संवत् अनुमान १०० वर्ष चल-
कर अस्त हो गया. इसका सब से पिछला लेख चालुक्य विक्रम संवत् ९४ का मिला है.

१७—सिंह संवत्.
यह संवत् किसने चलाया यह अब तक निश्चित रूप से मालूम नहीं हुआ. कर्नल जेम्स
टॉड ने इसका नाम 'शिवसिंह संवत्' लिखा है और इसको दीव बेट (काठियावाड़ के दक्षिण में)
के गोहिलों का चलाया हुआ बतलाया है२. इससे तो इस संवत् का प्रवर्तक गोहिल शिवसिंह
मानना पड़ता है. भावनगर के भूतपूर्व दीवान विजयशंकर गौरीशंकर ओझा ने लिखा है कि
'श्रीसिंह का नाम पोरबंदर के एक लेख में मिल आता है जिसमें उसको सौराष्ट्र का मंडलेश्वर
लिखा है, परंतु पीछे से उसने अधिक प्रबल हो कर विक्रम संवत् ११७० (ई. स. १११४) से अपने
नाम का संवत चलाया हो ऐसा मालूम होता है'३; परंतु पोरबंदर का वह लेख अब तक प्रसिद्धि में
नहीं आया जिससे मंडलेश्वर सिंह के विषय में कुछ भी कहा नहीं जा सकता.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी का कथन है कि 'संभवतः ई. स. १११३-१११४ (वि. सं.
११६९-७०) में [ चौलुक्य ] जयसिंह (सिद्धराज) ने सोरठ (दक्षिणी काठियावाड़) के
[राजा] खेंगार को विजय कर अपने विजय की यादगार में यह संवत् चलाया हो'४. परंतु यह
कथन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता क्यों कि प्रथम तो ई. स. १११३-१४ में ही जयसिंह के
खेंगार को विजय करने का कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि जयसिंह ने यह
संवत् चलाया होता तो इसका नाम 'जयसिंह संवत' होना चाहिये था न कि सिंह संवत
क्यों कि संवतों के साथ उनके प्रवर्तकों के पूरे नाम ही जुड़े रहते हैं. तीसरी बात यह है कि यदि
यह संवत् जयसिंह ने चलाया होता तो इसकी प्रवृत्ति के पीछे के उसके एवं उसके वंशजों के शिला-
लेखों तथा दानपत्रों में मुख्य संवत् यही होना चाहिये था परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि
यह संवत् जयसिंह का चलाया हुआ नहीं है. काठियावाड़ से बाहर इस संवत् का कहीं प्रचार
न ५ होना भी यही साबित करता है कि यह संवत् काठियावाड़ के सिंह नाम के किसी राजा ने

१. इं. ऐं.; जि. २२, पृ. १०६. २. इं. ऐं.; जि. ६, पृ. ६७-८.
३. कर्नल जेम्स टॉड का 'ट्रेव्हल्स इन् वेस्टर्न इंडिया', पृ. ५०६ और टिप्पण †.
४. 'भावनगर प्राचीन शोध संग्रह,' भाग १, पृ. ४-५ (गुजराती) ; अंग्रेज़ी अनुवाद, पृ. २-३.
५. बंब. गै.; जि. १, भाग १, पृ. १७६.
६. गुजरात के चौलुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव के दानपत्र में, जिसमें कच्छ मंडल (कच्छ राज्य) के सहस्रचाण
गांव की कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, केवल 'संवत् ९३' लिखा है जिसको उसके संपादक डॉ. फ़्लीट ने सिंह संवत्
अनुमान कर उक्त दानपत्र को विक्रम संवत् १२६२ या १२६३ का माना और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) का, जिसने वि. सं.
१२३५ से १२९८ तक राज्य किया था, ठहरा दिया (इं. ऐं.; जि. १८, पृ. १०८-६); परंतु ऐसा करने में उक्त विद्वान् ने धोखा खाया
है क्योंकि न तो वह दानपत्र भीमदेव (दूसरे) का है और न उसका संवत ९३ सिंह संवत् है जैसा कि माना गया है. वास्तव
में वह दानपत्र चौलुक्य (सोलंकी) भीमदेव (पहिले) का है और उसका संवत् वि. सं. १०६३ है परंतु शताब्दियों के अंक

भारतीय संवत्. १८३
चलाया होगा जिसका नाम इसके साथ जुड़ा हुआ है और जैसा कि विजयशंकर गौरीशंकर ओझा
का अनुमान है.
मांगरोल की सोढडी वाव (बावडी) के लेख में विक्रम संवत् १२०२ और सिंह संवत् ३२
आश्विन वदि १३ सोम वार लिखा है' जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत् के बीच का अंतर
१२०२-३२ = ) ११७० आता है. इस हिसाब से ई. स. में से १११३-१४ घटाने से सिंह संवत् होगा.
चौतुक्य राजा भीमदेव (दूसरे) के दानपत्र में वि. सं. १२६६ और सिंह संवत् ६६ मार्गशिर
शुदि १४ गुरु वार लिखा है. इससे भी वि. सं. और सिंह संवत् के बीच का अंतर (१२६६-६६= )
११७० आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के उपर्युक्त वेरावल के ४ संवत्‌वाले शिलालेख में वि. सं.
१३२० और सिंह संवत् १५१ आषाढ कृष्णा १३ लिखा है. उक्त लेख का विक्रम संवत् १३२०


(१०) छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक लिखे गये हैं. ऐसा मानने का कारण यह है कि उक्त दानपत्र के छपने से १२ वर्ष पहिले
डॉ. बूलर ने चौलुक्य भीमदेव (पहिले) का वि. सं. १०८६ कार्तिक शुदि १५ का दानपत्र प्रसिद्ध किया (एं. इं; जि. ६,
पृ. १६३-४) जिसमें उसका लेखक कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा होना लिखा है.
डॉ. फ़्लीट के प्रसिद्ध किये हुए संवत् ६३वाले दानपत्र का लेखक भी वही कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक वही
महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा है इस लिये ये दोनों दानपत्र एक ही राजा के हैं यह निश्चित है. ऐसी दशा में डॉ. फ़्लीटवाले
दानपत्र का संवत् ६३ विक्रम संवत् १०६३ ही है न कि १२६२ या १२६३. शिलालेख और दानपत्रों के संवतों में कभी कभी
शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक दिये हुए मिलते हैं जो विद्वानों को चक्कर में डाल देते हैं.
देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने कोटा राज्य के अटू नामक स्थान से मिले हुए महाराजाधिराज जयसिंह के लेख में
'संवत् १४' खुदा हुआ होने से लिखा है कि 'यदि यह जयसिंह चौलुक्य सिद्धराज जयसिंह है और संवत् १४ उसका
चलाया हुआ संवत् [अर्थात् सिंह संवत्, जिसको जयसिंह का चलाया हुआ मान लिया है] है तो उस [लेख] का समय
ई. स. ११२८ [वि. सं. ११८५] आता है. उक्त लेख का जयसिंह कोई दूसरा जयसिंह हो सकता है परंतु वह उक्त नाम के
चौलुक्य राजा से पहिले का नहीं हो सकता क्यों कि अक्षरों पर से उक्त लेख का [ई. स. की] १२वीं शताब्दी से पहिले का
होना पाया नहीं जाता' (प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ई. स. १९०३-४, पृ. ४८). अटू के लेख का संवत् भी सिंह संवत् १४ नहीं
किंतु वि. सं. १३१४ होना चाहिये जिसमें भी शताब्दियों के अंक छोड़ दिये गये हैं. वह लेख या तो मालवे के महाराजाधिराज
जयसिंह दूसरे (जयतुंगिदेव) का, जिसके समय का राहटगढ़ का लेख वि. सं. १३१२ भाद्रपद शुदि ७ (की; लि. इं. नां.
इं; पृ. २२, लेखसंख्या २२३) का मिला है, या उसके छोटे भाई जयवर्मन् का, जिसका दानपत्र वि. सं. १३१७ का मिला है
(ऍ. इं; जि. ६, पृ १२०-२३), होना चाहिये. कोटा और झालावाड़ के इलाके पहिले मालवे के परमारों के अधीन थे,
जिनके लेख ई. स. की ११वीं से १३वीं शताब्दी के वहां पर मिलते हैं. ऐसे ही उक्त विद्वान् ने जोधपुर राज्य के सेवाड़ी गांव
से मिले हुए कटुराज के समय के एक लेख का संवत् ३१ पढ़ा है और उसको सिंह संवत् मान कर विक्रम संवत् १२०० में
कटुराज का नाडोल का राजा होना माना है तथा उक्त कटुराज को चाहमान (चौहान) अश्वराज (आशाराज) का पुत्र
कटुकराज बतलाया है (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४, ६६). वह लेख बहुत बिगड़ी हुई दशा में है इस लिये उसके शुद्ध पढ़े जाने के
विषय में हमें शंका ही है. यदि उसका संवत् वास्तव में ३१ हो तो भी वह सिंह संवत् नहीं किंतु वि. सं. १२३१ होना चाहिये,
क्यों कि नाडोल के चौहान के लेखों में कहीं सिंह संवत् नहीं है. अश्वराज के पुत्र कटुकराज के सेवाड़ी के दूसरे लेख में
वि. सं. ११९२ (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३१-३२) ही लिखा है और वि. सं. ११८६ से १२०२ तक के कई शिलालेख चौहान
राजा रायपाल के समय के नाडोल और नारलाई से मिले हैं (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४-४३.) जिनसे पाया जाता है कि वि. सं.
११८६ से १२०२ तक नाडोल का राजा रायपाल था न कि कटुराज. ऐसी दशा में सिंह संवत् ३१ (वि. सं. १२००) में
कटुराज का नाडोल का राजा होना संभव नहीं हो सकता. काठियावाड़ से संबंध न रखनेवाले लेखों में सिंह संवत्
मानने की चेष्टा करने के केवल उपर्युक्त तीन ही उदाहरण अब तक मिले हैं जिनमें से एक में भी सिंह संवत् नहीं किंतु
शताब्दियों के अंकसहित वि. सं. के ही वर्ष हैं.


१ श्रीमद्विक्रमसंवत् १२०२ तथा श्रीसिंहसंवत् ३२ आश्विनवदि १३ सोमे (भावनगर प्राचीन शोध संग्रह, भाग १, पृ. ७).
२ श्रीविक्रमसंवत् १२६६ वर्षे श्रीसिंहसंवत् ६६ वर्षे लौकि मार्ग शुदि १४ गुरा० (इं. पँ; जि. १८, पृ. १১২).
३. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसीका टिप्पण ४.

१८४ प्राचीनलिपिरमाला.
कार्त्तिकादि¹ है इस लिये चैत्रादि और आषाढादि १३२१ होगा जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत्
के बीच का अंतर (१३२१-१५१= ) ११७० ही आता है.
इस संवत्‌वाले थोड़े से शिलालेख काठियावाड़ से ही मिले हैं और चौलुक्य भीमदेव
(दूसरे) के उपर्युक्त वि. सं. १२६६ के दानपत्र में विक्रम संवत् के साथ सिंह संवत् दिया है
जिसका कारण यही है कि वह दानपत्र काठियावाड़ में दान की हुई भूमि के संबंध का है. इस
संवत् का प्रारंभ आषाढ़ शुक्ला १ (अमांत) से है और इसका सब से पिछला लेख सिंह संवत् १५१
का मिला है.

१८-लक्ष्मणसेन संवत्.
यह संवत् बंगाल के सेनवंशी राजा बल्लालसेन के पुत्र लक्ष्मणसेन के राज्याभिषेक (जन्म)²
से चला हुआ माना जाता है.

१. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसी का टिप्पण ५.
२. ई. स. ११९८-६६ के आसपास (ई. पै., जि. १६, पृ. ७) देहली के गुलाम सुलतान कुतुबुद्दीन ऐबक के समय
बख्तियार खिलजी ने नदिया पर चढ़ाई कर उसे ले लिया और वहां का राजा लक्ष्मणसेन भाग गया. इस चढ़ाई का
वृत्तांत मिनहाज उस्सिराज (जन्म ई. स. ११९३-देहांत ई. स १२६५ के पीछे) ने 'तबकात-इ-नासिरी' नामक इतिहास के
पुस्तक में इस तरह लिखा है कि 'राय लखमणिया (लक्ष्मणसेन) गर्भ में था उस वक्त उसका पिता मर गया था.
उसकी माता का देहांत प्रसववेदना से हुआ और लखमणिया जन्मते ही गद्दी पर बिठलाया गया. उसने ८० वर्ष राज्य
किया' (तबकात-इ-नासिरी का अंग्रेज़ी अनुवाद; मेजर रावार्टी का किया हुआ; पृ. ५५४). लक्ष्मणसेन संवत् का प्रारंभ
ई. स. १११६ में हुआ जैसा कि आगे लिखा गया है, इस लिये बख्तियार खिलजी की लक्ष्मणसेन पर की नदिया की चढ़ाई
लक्ष्मणसेन संवत् (११८६-१११६=) ८० में हुई, जब कि लक्ष्मणसेन की उम्र ८० वर्ष की थी और उतने ही वर्ष उसको राज्य
करते हुए थे.
'लघुभारत' नामक संस्कृत पुस्तक में लिखा है कि परंपरागत जनश्रुति से यह प्रवाद सुनने में आता है कि बल्लाल
(बल्लालसेन, लक्ष्मणसेन का पिता) मिथिला की चढ़ाई में मर गया. जब ऐसा संवाद फैला उसी समय विक्रमपुर में लक्ष्मण
का जन्म हुआ' (प्रवादः श्रूयते चात्र पारम्परीयावार्त्तया। मिथिले युद्धयात्रायां वल्लालोभून्मृतत्वनिः ॥ तदानीं विक्रमपुरे लक्ष्मणो जातवानसौ।
लघुभारत, खण्ड २; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६). यह कथन मिनहाज की सुनी हुई बात से मिलता जुलता ही है
परंतु इससे पाया जाता है कि लक्ष्मणसेन का जन्म हुआ उस समय बल्लालसेन के मिथिला में मर जाने की खाली अफ़वाह
ही उड़ी थी. संभव है कि इस अफ़वाह के उड़ने से विक्रमपुर में लक्ष्मणसेन गद्दी पर बिठला दिया गया हो और उसके
जन्म की खबर पाने पर बल्लालसेन ने मिथिला में रहते समय पुत्रजन्म की खुशी में यह संवत् चलाया हो. बल्लाल-
सेन ने शक संवत् १०६१ (ई. स. ११६६) में 'दानसागर' नामक ग्रंथ रचा (निखिलचक्रतिलकश्रीमद्वल्लालसेनेन । पूर्णे शशि-
नवदशमिते शकवर्षे दानसागरो रचितः ॥ दानसागर; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६, भाग १, पृ. २३). डॉ. राजेंद्रलाल
मित्र ने बंगाल के सेनवंशी राजाओं के समय का निर्णय करने में दानसागर की सहायता ली और उसकी रचना का
श्लोक भी टिप्पण में उद्धृत किया (पूर्णे शशिनवदशमिते शकाब्दे-ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६५, पृ. १३७) परंतु उसका
अनुवाद करने में गलती की और शक संवत् १०६१ के स्थानपर १०१६ (ई. स. १०६७) लिख कर बल्लालसेन का समय
ई. स. १०५६ से ११०६ तक मान लिया जो ठीक नहीं है.
बल्लालसेनरचित 'अद्भुतसागर' नामक बड़े ग्रंथ के प्रारंभ की भूमिका में लिखा है कि 'गौडेंद्र (बल्लालसेन) ने शक
संवत् १०६० (ई. स. ११६८) में 'अद्भुतसागर' का प्रारंभ किया परंतु उसके समाप्त होने के पूर्व ही उसने अपने पुत्र (लक्ष्मणसेन)
को राज्यसिंहासन पर बिठलाया और अपने ग्रंथ को पूर्ण करने का भार उस पर डाला. फिर गंगा में अपने दान के जल के प्रवाह
से यमुना का संगम बना कर अपनी स्त्री सहित स्वर्ग को गया (अर्थात् डूब मरा) और लक्ष्मणसेन के उद्योग
से 'अद्भुतसागर' पूर्ण हुआ' (शाके खनवखेन्द्वब्दे आरेभेऽद्भुतसागरं । गौड़ेन्द्रकुञ्जरालांनस्तम्भाहुर्र्महीपतिः ॥ ग्रन्थेऽस्मिन्नसमाप्त एव
तनयं साम्राज्यलक्ष्माहदीक्षापर्वेणि दीक्षगान्निजकृते निष्पत्तिमभ्यर्थ्य सः । नानादानचिताम्बुसंचलनतः सूर्यात्मजासंगमं गङ्गायां विरचय्य निर्ज-
रपुरं भार्य्यानुयातो गतः ॥ श्रीमल्लक्ष्मणसेनभूपतिरतिश्लाघ्यो यदुद्योगतो निष्पन्नोऽद्भुतसागरः कृतिरसौ बल्लालभूमीभुजः। अद्भुतसागर).
यदि लक्ष्मणसेन के जन्मसमय (ई. स. १११६ में) बल्लालसेन की अवस्था २० वर्ष की मानें तो अद्भुतसागर के प्रारंभ के

अबुलफ़ज़ल ने 'अकबरनामे' में, तारीख इलाही के प्रसंग में लिखा है कि 'बंग (बंगाल) में
लछमनसेन (लक्ष्मणसेन) के राज्य के प्रारंभ से संवत् गिना जाता है. उस समय से अब तक
४६५ वर्ष हुए हैं. गुजरात और दक्षिण में शालिवाहन का संवत् है जिसके इस समय १५०६ और
मालवा तथा देहली आदि में विक्रम का संवत् चलता है जिसके १६४१ वर्ष व्यतीत हुए १ हैं'.
इससे शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर (१५०६-४६५ = ) १०४१ आता है.
डॉ. राजेंद्रलाल मित्र को मिले हुए 'स्मृतितत्त्वामृत' नामक हस्तलिखित पुस्तक के अंत में
'ल. सं. ५०५ शाके १५४६' लिखा है २. इससे भी शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का
अंतर (१५४६-५०५ = ) १०४१ आता है जैसा कि अबुलफ़ज़ल ने लिखा है.
नेपाल से मिले हुए 'नरपतिजयचर्या टीका' (स्वरोदयदीपिका) नामक हस्तलिखित पुस्तक के
अंत में शाके १५३६ ल सं ४६४ लिखा है ३. यदि यह शक संव

१८६ प्राचीनलिपिमाला!
चलाथा. वह बहुत दिन तक चलता रहा और अब सिर्फ मिथिला में कहीं कहीं लिखा जाता है.'
ई. स. १७१८ में डॉ. राजेंद्रलाल मित्र ने लिखा कि 'तिरहुत के पंडित इसका प्रारंभ माघ
शुक्ला १ से मानते हैं. इसका प्रारंभ ई. स. ११०६ के जनवरी (वि. सं. ११६२ = श. सं. १०२७) से
होना चाहिये'².
इन पिछले तीनों अवतरणों के अनुसार शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर
१०२८ या उसके करीब आता है. मिथिला देश के पंचांगों में विक्रम, शक और लक्ष्मणसेन संवत्
तीनों लिखे जाते हैं परंतु उनमें शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर एकसा नहीं
मिलता किंतु लक्ष्मणसेन संवत् १ शक संवत् १०२६-२७, १०२७-२८, १०२६-३० और १०३०-३१
के मुताबिक आता है³.
डॉ. कीलहॉर्न ने एक शिलालेख और पांच हस्तलिखित पुस्तकों में लक्ष्मणसेन संवत् के साथ
दिये हुए मास, पक्ष, तिथि और वार को गणित से जांच कर देखा तो मालूम हुआ कि गत शक
संवत् १०२८ मार्गशिर सुदि १ (ई. स. ११०६ तारीख २६ अक्टोबर) को इस संवत् का पहिला दिन
अर्थात् प्रारंभ मान कर गणित किया जावे तो उन ६ में से ५ तिथियों के वार ठीक मिलते हैं⁴ परंतु
गत शक संवत् १०४१ अमांत कार्तिक शुक्ला १ (ई. स. १११६ तारीख ७ अक्टोबर) को इस संवत् का
पहिला दिन मान कर गणित किया जावे तो छहों तिथियों के वार मिल जाते हैं⁵. ऐसी दशा में
अबुलफ़ज़ल का कथन ही ठीक है. इस हिसाब से लक्ष्मणसेन संवत् में १०४०-४१ जोड़ने से गत
शक संवत्, ११७५-७६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् और १११८-१६ जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
यह संवत् पहिले बंगाल, बिहार और मिथिला में प्रचलित था और अब मिथिला में इसका
कुछ कुछ प्रचार है, जहां इसका प्रारंभ माघ शुक्ला १ से माना जाता है.
१६-पुडुवैप्पु संवत्.
ई. स. १३४१ में कोचीन के उत्तर में एक टापू (१३ मील लंबा और १ मील चौड़ा) समुद्र में
से निकल आया, जिसे 'बौपीन' कहते हैं, उसकी यादगार में वहां पर एक नया संवत् चला जिस-
को पुडुवैप्पु (पुडु=नई; वेपु=आबादी; मलयाळम् भाषा में) कहते हैं⁶. कोचीन राज्य और डच ईस्ट
इंडिया कंपनी के बीच जो संधि हुई वह तांबे के ५ पत्रों पर खुदी हुई मिली है जिसमें पुडुवेप्पु संवत्
३२२; १४ मीनम् (मीन संक्रांति का १४ वां दिन = ई. स. १६६३ तारीख २२ मार्च) लिखा है⁶.
यह संवत् कोचीन राज्य में कुछ कुछ चलता रहा परंतु अब उसका प्रचार पाया नहीं जाता.
२०-राज्याभिषेक संवत्.
राज्याभिषेक संवत्, जिसको दक्षिणी लोग 'राज्याभिषेक शक' या 'राजशक' कहते हैं,
मराठा राज्य के संस्थापक प्रसिद्ध शिवाजी के राज्याभिषेक के दिन अर्थात् गत शक संवत् १५६६
(गत चैत्रादि वि. सं. १७३१) आनंद संवत्सर ज्येष्ठ शुक्ला १३ (तारीख ६ जून ई. स. १६७४) से
१. ज. प; सो. बंगा; जि. ४७, भाग १, पृ. ३६८. २. क; इं. ई; पृ. ७६.
३. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ५. ४. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ६. ५. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २८-२६.
६. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २६.

दक्षिणी लिपियाँ, अंक-पद्धति, संवत्-गणना, गुप्त-कूटलिपि व लिपिमाला उपसंहार

भारतीय संवत्. १८७
चला था. इसका वर्ष ज्येष्ठ शुक्ला १३ से पलटता था और वर्तमान ही लिखा जाता था. इसका
प्रचार मराठों के राज्य में रहा परंतु अब यह लिखा नहीं जाता.
२१—बार्हस्पत्य संवत्सर ( १२ वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर १२ वर्ष का चक्र है और इसका संबंध बृहस्पति की गति से है.
इसके वर्षों के नाम कार्तिकादि १२ महीनों के अनुसार हैं परंतु कभी कभी महीनों के नाम के पहिले
‘महा’ लगाया जाता है जैसे कि 'महाचैत', 'महावैशाख' आदि.
सूर्य समीप आने से बृहस्पति अस्त हो कर जब सूर्य उससे आगे निकल जाता है तब
( २५ से ३१ दिन के बाद ) जिस नक्षत्र पर फिर वह (बृहस्पति) उदय होता है उस नक्षत्र के अनुसार
संवत्सर (वर्ष) का नाम नीचे लिखे क्रम से रक्खा जाता है—
कृत्तिका या रोहिणी पर उदय हो तो महाकार्तिक (कार्तिक); मृगशिर या आर्द्रा पर
महामार्गशीर्ष (मार्गशीर्ष); पुनर्वसु या पुष्य पर महापौष; अश्लेषा या मघा पर महामाघ;
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी या हस्त पर महाफाल्गुन; चित्रा या स्वाति पर महाचैत्र; विशाखा या
अनुराधा पर महावैशाख; ज्येष्ठा या मूल पर महाज्येष्ठ; पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा पर महाआषाढ;
श्रवण या धनिष्ठा पर महाश्रावण; शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराभाद्रपदा पर महाभाद्रपद और
रेवती, अश्विनी या भरणी पर उदय हो तो महाआश्वयुज (आश्विन) संवत्सर कहलाता है¹. इस चक्र
में १२ वर्षों में एक संवत्सर क्षय² हो जाता हैं. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में बार्हस्पत्य
संवत्सर दिये हुए मिलते हैं,³ जो सब ई. स. की ७ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं. उसके पीछे इस
का प्रचार सामान्य व्यवहार से उठ गया और केवल पंचांगों में वर्ष का नाम⁴ बतलाने में ही रह
गया जो अब तक चला जाता है.
२२-बार्हस्पत्य संवत्सर ( ६० वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है. इसमें वर्षों की संख्या नहीं किंतु १ से ६० तक
के नियत नाम ही लिखे जाते हैं. मध्यम मान से बृहस्पति के एक राशि पर रहने के समय को
‘बार्हस्पत्य संवत्सर' (वर्ष) कहते हैं⁵ जो ३६१ दिन, २ घड़ी और ५ पल का होता है, और सौर
१. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वयद्वयानुयोगीनि ।
क्रमशस्त्रिभं तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यं च यद्वर्षम् ॥ (वाराही संहिता; अध्याय ८, श्लोक १-२).
२. १२ सौर वर्षों में ११ बार गुरु अस्त होकर फिर उदय होता है इसलिये १२ वर्ष में एक बार्हस्पत्य संवत्सर क्षय हो
जाता है. जैसे कि पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६६५ के पंचांग में 'वर्षनाम पौष' लिखा है परंतु १६६६ के पंचांग में
'वर्षनाम फाल्गुन' लिखा है जिससे माघ (महामाघ) संवत्सर क्षय हो गया.
३. भरतपुर राज्य के कोट नामक गांव से मिले हुए शिलालेख में 'महाचैत्र' संवत्सर (रि. रा. म्यु अ; ई. स. १६१६-
१७, पृ. २), परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६३ (ई. स. ४८२-८३) के दानपत्र में 'महाआश्वयुज' संवत्सर
(त्रिषष्ट्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ महाश्वयुजसंवत्स(त्त्स)रे चैत्रमासशुक्लपक्षद्वितीयायाम्—की; गु. इं; पृ. १०२) और कदंबवंशी
राजा मृगेशवर्मन् के राज्यवर्ष तीसरे के दानपत्र में 'पौष' संवत्सर—श्रीमृगेशवर्म्मा आत्मनः राज्यस्य तृतीये वर्षे पौषे संवत्सरे कार्त्ति-
कमासबहुलपक्षे दशम्यां तिथौ (इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५) आदि.
४. पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६७४ के पंचांग में 'वर्षनाम आश्विन' और १६७५ के पंचांग में 'वर्षनाम कार्तिक'
लिखा है. ये वर्षनाम १२ बरसवाले बार्हस्पत्य संवत्सर के ही हैं.
५. बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति (भास्कराचार्य का 'सिद्धांतशिरोमणि १।३०).
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