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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 318 में से

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पृष्ठ 201

१७२ प्राचीनलिपिमाला.
इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ शालिवाहन (सातवाहन) का नाम संस्कृत साहित्य में ई. स.
की १४वीं शताब्दी के प्रारंभ १ के आस पास से और शिलालेखादि में पहिले पहिल हरिहर गांव
से मिले हुए विजयनगर के यादव राजा बुक्कराय (प्रथम) के शक संवत् १२७६ (ई. स. १३५४)
के दानपत्र २ में मिलता है; जिसके पीछे शालिवाहन का नाम लिखने का प्रचार बढ़ता गया. विद्वान्
राजा सातवाहन (शालिवाहन) का नाम 'गाथासप्तशती' और 'बृहत्कथा' से सान्चरवर्ग में प्रचलित था
अत एव संभव है कि ई. स. की १४वीं शताब्दी के आस पास दक्षिण के विद्वानों ने उत्तरी हिंदुस्तान
में चलनेवाले संवत् के साथ जुड़े हुए राजा विक्रम के नाम का अनुकरण कर अपने यहां चलने-
वाले 'शक' (शक संवत्) के साथ दक्षिण के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) का नाम जोड़
कर 'नृपशालिवाहनशक' ३, 'शालिवाहनशक,' ४ 'शालिवाहनशकवर्ष,' ५ 'शालिवाहनशकाब्द' ६ आदि
से इस संवत् का परिचय देना प्रारंभ किया हो.
शालिवाहन, सातवाहन नाम का रूपांतर ७ मात्र है और सातवाहन (पुराणों के 'आंध्रभृत्य')
वंश के राजाओं का राज्य दक्षिण पर ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी से ई. स. २२५ के आस पास
तक रहा था, उनकी राजधानियों में से एक प्रतिष्ठान नगर (पैठण, गोदावरी पर) भी थी और उनमें
सातवाहन (शातकर्णि, हाल) राजा बहुत प्रसिद्ध भी था अतएव संभव है कि दक्षिण के विद्वानों ने
उसीका नाम इस संवत् के साथ जोड़ा हो, परंतु यह निश्चित है कि सातवाहनवंशियों में से किसीने
यह संवत् नहीं चलाया क्यों कि उनके शिलालेखों में यह संवत् नहीं मिलता किंतु भिन्न भिन्न राजाओं
के राज्यवर्ष (सन् जुलूस) ही मिलते हैं और सातवाहन वंश का राज्य अस्त होने के पीछे अनुमान
११०० वर्ष तक शालिवाहन का नाम इस संवत् के साथ नहीं जुड़ा था. इस लिये यही मानना उचित
होगा कि यह संवत् शक जाति के किसी विदेशी राजा या शक जाति का चलाया हुआ है.
यह संवत् किस विदेशी राजा ने चलाया इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न
अटकलें लगाई हैं. कोई तुरुष्क (तुर्क, कुशन) वंश के राजा कनिष्क को, कोई क्षत्रप नहपान को,
१. देखो, ऊपर पृ. १७० और टिप्पणी ३, ४.
२. नृपशालिवाहनशक १२७६ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ७८, लेखसंख्या ४५४). इससे पूर्व के थाणा से मिले हुए
देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के समय के शक संवत् १२१२ (ई. स. १२६०) के दानपत्र की छपी हुई प्रति में (की; लि.
इं. स. ई; पृ. ६७, लेखसंख्या ३७६) में 'शालिवाहनशके १२१२' छपा है परंतु डॉ. फ्लीट का कथन है कि उक्त ताम्रपत्र का
अब पता नहीं है और नउसकी कोई प्रतिकृति प्रसिद्धि में आई और जैसे थाणा से मिले हुए ई. स. १२७२ के दानपत्र में शालि-
वाहन का नाम न होने पर भी नक़ल में जोड़ दिया गया वैसा ही इसमें भी हुआ होगा (ज. रॉ ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८१३).
ऐसी दशा में उक्त ताम्रपत्र को शालिवाहन के नामवाला सब से पहिला लेख मान नहीं सकते.
३. देखो, इसी पृष्ठ का टि. २. ४. शालिवाहनशक १४७६ (इं. पॅ; जि. १०, पृ. ६४).
५. शालिवाहनशकवर्ष १४३०........ माघशु १४ (पॅ. इं; जि. १, ३६६).
६. शकाब्दे शालिवाहस्य सहस्त्रेण चतुःशतैः। चतुस्त्रिंशत्समैर्युक्ते संख्याते गणितक्रमात् ॥ श्रीमुखवत्सरे श्लाध्ये माघे चासितपञ्चके । शिव-
रात्रा महातिथ्यां पुं(पु)ण्यकाले शुभे दिने (ज; ए. सो; बंब. जि. १२, पृ. ३८४).
७. सातवाहन=सालवाहन=शालिवाहन. 'शालो हाले मत्स्यभेदे'; हालः सातवाहनपार्थिवे (हैम अनेकार्थकोश).
सालाहणम्मि हालो (देशीनाममाला वर्ग ८, श्लोक ६६). शालिवाहन, शालवाहन, सालवाहण, सालवाहन, सालाहण, सातवाहन,
हालेत्येकस्य नामानि (प्रबंधचिन्तामणि, पृ. २८ का टिप्पण). गाथासप्तशती के अंत के गद्यभाग में सातवाहन राजा को
शातकर्ण (शातकर्णि) भी कहा है (डॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८३-८६ की रिपोर्ट, पृ. ३४८). पुराणों में मिलनेवाली
आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंश के राजाओं की नामावली में शातकर्णि, शातकर्ण, यज्ञश्रीशातकर्णि, कुंतलशातकर्ण आदि
नाम मिलते हैं. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में शातकर्णि सातवाहन का कर्तरी (कैंची) से महादेवी मलयवती को मारना
लिखा है-कर्तर्या कुंतलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीं [जघान] (निर्णयसागर प्रेस का छपा हुआ 'कामसूत्र',
पृ. १७४). नासिक से मिले हुए वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के लेख में उसके पिता गौतमीपुत्र शातकर्णि का शक,
यवन और पह्लवों को नष्ट करना तथा खखरात वंश (अर्थात् क्षत्रप नहपान के वंश) को निरवशेष करना लिखा
है (पॅ. इं; जि. ८, पृ. ६०). उसी लेख से यह भी पाया जाता है कि उसके अधीन दूर दूर के देश थे. गौतमीपुत्र
शातकर्णि सातवाहन वंश में प्रबल राजा हुआ था अतएव संभव है कि शक संवत के साथ जो शालिवाहन (सातवाहन)
का नाम जुड़ा है वह उसीका सूचक हो और 'गाथासप्तशती', 'बृहत्कथा', तथा 'कामसूत्र' का सातवाहन भी वही हो.