प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकोई शक राजा वेननस् को और कोई शक राजा अय (अज़=Azes) को इसका प्रवर्त्तक मानते हैं
परंतु ये सब अनुमान ही हैं, निश्चित रूप से इसके प्रचारक का नाम अब तक ज्ञात नहीं हुआ.
गत शक संवत् में ३१७९ जोड़ने से कलियुग संवत्, १३५ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम
संवत् और ७८ (अंत के करीब तीन महीनों में ७९) जोड़ने से ई. स. आता है. यह संवत् बहुधा
सारे दक्षिण में (तिन्नेवेल्लि और मलबार प्रदेशों को छोड़ कर) प्रचलित है. उत्तरी हिंदुस्तान में पंचांग,
जन्मपत्र और वर्षफल आदि में विक्रम संवत् के साथ यह भी लिखा जाता है और वहां के शिला-
लेखादि में भी कभी कभी इसके वर्ष लिखे मिलते हैं. इसका प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है.
इसके महीने उत्तरी हिंदुस्तान में पूर्णिमांत, और दक्षिण में अमांत माने जाते हैं. दक्षिण के जिन
हिस्सों में सौर मान का प्रचार है वहां इसका प्रारंभ मेष संक्रांति से होता है. करण ग्रंथों के आधार
पर पंचांग बनानेवाले सारे भारतवर्ष के ज्योतिषी इसी संवत् का आश्रय लेते हैं. पंचांगों में इसके
वर्ष गत ही लिखे रहते हैं. शिलालेख और दानपत्रों में