प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १७७
ऐसा पाया नहीं जाता. इस लिये उपर्युक्त ई. स. ६६३ की घटना गांगेय संवत् ८७ से कुछ पूर्व
की होनी चाहिये. यदि ऊपर के दोनों अनुमान ठीक हों तो गांगेय संवत् का प्रारंभ ई. स.
(६६३-८७ =) ५७६ से कुछ पूर्व अर्थात् ई. स. ५७० के आस पास होना चाहिये, परंतु जब तक
अन्य प्रमाणों से इस संवत् के प्रारंभ का ठीक निर्णय न हो तब तक हमारा अनुमान किया हुआ
इस संवत् के प्रारंभ का यह सन् भी अनिश्चित ही समझना चाहिये.
गांगेय संवत्वाले दानपत्रों में सबसे पहिला गांगेय संवत् ८७ का और सबसे पिछला
३५१ का है. यह संवत् ३५० वर्ष से कुछ अधिक समय तक प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
१२- हर्ष संवत्.
यह संवत् थानेश्वर के बैसवंशी राजा हर्ष (श्रीहर्ष, हर्षवर्द्धन, शीलादित्य) के राज्यसिंहासन
पर बैठने के समय से चला हुआ माना जाता है परंतु किसी लेख में इस संवत् के साथ हर्ष का नाम
जुड़ा हुआ अब तक नहीं मिला. स्वयं राजा हर्ष के दोनों दानपत्रों में भी केवल 'संवत्' ही लिखा है १.
अलबेरूनी लिखता है कि 'मैने कश्मीर के एक पंचांग में पढ़ा है कि श्रीहर्ष विक्रमादित्य से
६६४ वर्ष पीछे हुआ २. यदि अलबेरूनी के इस कथन का अर्थ ऐसा समझा जावे कि विक्रम संवत्
६६४ से हर्ष संवत् का प्रारंभ हुआ है तो हर्ष संवत् में ६६३ जोड़ने से विक्रम संवत् तथा ६०६-७
जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख में संवत् ३४ प्रथम पौष शुक्ला २ लिखा है ३. संभव है कि
उक्त लेख का संवत् हर्ष संवत् हो. केंब्रिज के प्रोफेसर ऐडम्स और विएना के डॉक्टर थाम ने हर्ष संवत्
० = ई. स. ६०६ (वि. सं. ६६३) मान कर गणित किया तो 'ब्रह्मसिद्धांत' के अनुसार ई. स. ६४०
अर्थात् वि. सं. ६६७ में पौष मास अधिक आता है ४. इससे भी वि. सं. और हर्ष संवत् के बीच का
अंतर (६६७-३४=) ६६३ तथा ई. स. और हर्ष संवत् का अंतर ६०६ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया
गया है. यह संवत् बहुधा संयुक्त प्रदेश तथा नेपाल में करीब ३०० वर्ष प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
अलबेरूनी ने विक्रम संवत् १०८८ के मुताबिक जिस श्रीहर्ष संवत् १४८८ का होना लिखा है
(देखो, ऊपर पृ. १७५) वह इस हर्ष संवत् से भिन्न होना चाहिये परंतु उसका प्रचलित होना किसी
शिलालेख, दानपत्र या पुस्तक से पाया नहीं जाता.
का एक होना अब तक कहीं लिखा नहीं मिला. दूसरी आपत्ति यह है कि उक्त दानपत्र में लिखे हुए राज्यवर्ष २० वें को
डॉ. फ्लीट ने उक्त सामंत का राज्यवर्ष मानकर उसके राज्य (शासन) का प्रारंभ शक संवत् (५३२-२०=) ५१२ अर्थात्
ई. स. ५६० से होना स्थिर कर वहीं से गांगेय संवत् का प्रारंभ मान लिया है, परंतु रेवती द्वीप मंगलीश्वर ने ही विजय
किया था (गौ; सो. प्रा. इ; पृ. २३) इस लिये उक्त दानपत्र का राज्यवर्ष उक्त सामंत का नहीं किंतु उसके स्वामी मंग-
लीश्वर का ही होना चाहिये जैसा कि डॉ० सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर का मानना है. तीसरी बात यह है कि उक्त
सामंत का कोंकण से गंजाम ज़िले में जाकर नवीन राज्य स्थापित करना मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसी
दशा में डॉ. फ्लीट का गांगेय संवत्संबंधी कथन स्वीकार नहीं किया जा सकता.
१. बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष के दान पत्र में 'संवत् २० २ (=२२) कात्ति[क]वदि १' (एं. इं; जि ४, पृ. २११)
और मधुवन से मिले हुए दानपत्र में 'संवत् २० ५ (=२५) मार्गशीर्षवदि ६' (एं. इं; जि. १, पृ. ७२) लिखा है.
२. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ५.
३. संवत् ३० ४ (=३४) प्रथमपौषशुक्लद्वितीयायाम् (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ७३, लेखसंख्या ५३०).
४. इं. ऐं; जि. १५, पृ. ३३८.