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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 318 में से

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पृष्ठ 197

की दूसरी शताब्दि से इधर का नहीं माना जा सकता. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि या

१० 'गाथासप्तशति' के अंत में सातवाहन को कुंतल देश का राजा, प्रतिष्ठान (पैठण) नगर का अधीश, शतकर्ण
(शातकर्णि) उपनामवाला, द्वीपिकर्ण का पुत्र, मलयवती का पति और हालादि उपनामवाला लिखा है (प्रो. पीटर्सन की
ई. स. १८८४-८६ तक की रिपोर्ट, पृ. ३४६). शिलालेखों में आंध्र (आंध्रभृत्य) वंश के लिये सातवाहन नाम का प्रयोग
मिलता है. नानाघाट के लेख में उक्त वंश के मूल पुरुष सिमुक को सातवाहन कहा है और उक्तवंश के राज्य का अंत ई. स.
२२५ के आस पास होना (स्मिथ; अ. हि. इं; पृ. २१८ के पास का नक्शा) माना जाता है. ऐसी दशा में 'गाथासप्तशति'
का समय उक्त सन से पूर्व का ही होना चाहिये. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने विक्रम संवत्संबंधी अपने लेख में
'गाथासप्तशति' के राजा विक्रम के विषय में लिखते हुए उक्त पुस्तक के रचनाकाल के संबंध में लिखा है कि 'क्या
गाथासप्तशति वास्तव में उतना पुराना ग्रंथ है जितना कि माना जाता है?......बाण के हर्षचरित के प्रारंभ के १३ वें श्लोक
में सातवाहन के द्वारा गीतों के 'कोश' के बनाये जाने का उल्लेख अवश्य है परंतु इस 'कोश' को हाल की सप्तशति मानने
के लिये कोई कारण नहीं है जैसा कि प्रो. वेबर ने अच्छी तरह बतलाया है. उसी पुस्तक में मिलनेवाले प्रमाण उसकी
रचना का समय बहुत पीछे का होना बतलाते हैं. यहां पर केवल दो बातों का विचार किया जाता है. एक तो उस
(पुस्तक) में कृष्ण और राधिका का (१।८६) और दूसरा मंगलवार (३।६१) का उल्लेख है. राधिका का सब से
पुराना उल्लेख जो मुझे मिल सका वह पंचतंत्र में है जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी का बना हुआ है. ऐसे ही तिथियों के
साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति ६ वीं शताब्दी से प्रचलित हुई, यद्यपि उसका सब से पुराना उदाहरण
बुधगुप्त के ई. स. ४८४ के एरण के लेख में मिलता है. यदि हम गाथासप्तशति के हाल का समय छठी शताब्दी का प्रारंभ
मानें तो अधिक अनुचित न होगा' (आर. जी. भंडारकर कोम्मेमोरेशन वॉल्यम, पृ. १८८-८६). हम उक्त विद्वान् के इस
कथन से सर्वथा सहमत नहीं हो सकते क्योंकि बाणभट्ट सातवाहन के जिस सुभाषितरूपी उज्ज्वलरत्नों के कोश (संग्रह,
खज़ाने) की प्रशंसा करता है (अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः। विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३) वह 'गाथास-
प्तशति' ही है, जिसमें सुभाषित रूपी रत्नों का ही संग्रह है. यह कोई प्रमाण नहीं कि प्रो. वेबर ने उसे गाथासप्तशति नहीं
माना इस लिये वह उससे भिन्न पुस्तक होना चाहिये. वेबर ने ऐसी ऐसी कई प्रमाणशून्य कल्पनाएं की हैं जो अब मानी
नहीं जातीं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉक्टर सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी वेबर के उक्त कथन के विरुद्ध बाणभट्ट के उपर्युक्त
श्लोक का संबंध हाल की सप्तशति से होना ही माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१). ऐसा ही डॉ० फ्लीट ने (ज.
रॉ. ए. सो; ई. स. १६१२, पृ. ८२०) और 'प्रबंधचिंतामणि' के कर्ता मेरुतुंग ने माना है (प्रबंधचिंतामणि, पृ. २६). पांचवीं
शताब्दी के बने हुए 'पंचतंत्र' में कृष्ण और राधिका का उल्लेख होना तो उलटा यह सिद्ध करता है कि उस समय कृष्ण और
राधिका की कथा लोगों में भलीभांति प्रसिद्ध थी अर्थात् उक्त समय के पहिले से चली आती थी. यदि ऐसा न होता तो
पंचतंत्र का कर्ता उसका उल्लेख ही कैसे करता? ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति
का ६ वीं शताब्दी में प्रचलित होना बतलाना भी ठीक नहीं हो सकता, क्यों कि कच्छ राज्य के अंधौ गांव से मिले हुए
क्षत्रप रुद्रदामन् के समय के [शक] संवत् ५२ (ई. स. १३०) के ४ लेखों में से एक लेख में 'गुरुवार' लिखा है (वर्षे द्विपंचाशे
५० २ फागुणबहुलस द्वितीया वी २ गुरुवास[रे] सिंहलपुरस ओपशतस गोत्रस० स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की
तय्यार की हुई उक्त लेख की छाप से) जिससे सिद्ध है कि ई. स. की दूसरी शताब्दी में वार लिखने की रीति
परंपरागत प्रचलित थी. राधिका और बुधवार के उल्लेख से ही 'गाथासप्तशति' का छठी शताब्दी में बनना किसी प्रकार
सिद्ध नहीं हो सकता. डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी गाथासप्तशति के कर्ता हाल को आंध्रभृत्य वंश के
राजाओं में से एक माना है (बंब. गं; जि. १, भा. २, पृ. १७१) जिससे भी उसका आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंशियों के
राजत्वकाल में अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी में बनना मानना पड़ता है.
केवल 'गाथासप्तशति' से ही चंद्रगुप्त (दूसरे) से पूर्व के राजा विक्रम का पता लगता है इतना ही नहीं किंतु राजा
सातवाहन (हाल) के समय के महाकवि गुणाढ्य रचित पैशाची (कश्मीर तरफ की प्राकृत) भाषा के 'बृहत्कथा' नामक ग्रंथ
से भी, जिसकी प्रशंसा बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित के प्रारंभ के १७ वें श्लोक (समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव
नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा) में की है. वह पुस्तक अब तक नहीं मिला परंतु उसके संस्कृत अनुवाद रूपी सोमदेव भट्ट के 'कथा-
सरित्सागर' में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह (लंबक ६, तरंग १), पाटलीपुत्र के राजा विक्रमतुंग (लंबक ७, तरंग १) आदि
विक्रम नाम के राजाओं की कई कथाएं मिलती हैं. इस पुस्तक को भी वेबर ने ई. स. की छठी शताब्दी का माना है परंतु
डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने उपर्युक्त सातवाहन के समय का अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी का
माना है (बंब. गं; जि. १ भा. २, पृ. १७०-७१) और काव्यमाला के विद्वान संपादक स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं. दुर्गाप्रसाद
और पांडुरंग परब ने उसका ई. स. की पहिली शताब्दी में बनना बतलाया है इतना ही नहीं किंतु वेबर के माने हुए उसके
समय के विषय में लिखा है कि "वेबर पंडित 'हिस्टरी ऑव संस्कृत लिटरेचर' नामक पुस्तक में गुणाढ्य का ई. स. की
छठी शताब्दी में होना बतलाता है और दशकुमारचरित के रचयिता आचार्य दंडी का भी छठी शताब्दी में होना स्वीकार
करता है. किंतु आचार्य दंडी काव्यदर्श में 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भूतार्थां बृहत्कथाम्' में 'प्राहुः' पद से बृहत्कथा का अपने से बहुत