प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० प्राचीनलिपिमला.
इस संवत् को १००० वर्ष का चक्र मान नहीं सकते. वीर रवि रविवर्मन् के त्रिवेंद्रम् से मिले हुए
शिलालेख में कलियुग संवत् ४७०२ (वर्तमान=गत ४७०१) और कोल्लम् संवत् ७१६ दोनों लिखे हुए हैं
जिससे भी यही पाया जाता है कि गत कलियुग संवत् और कोल्लम् संवत् के बीच का अंतर
(४७०१-७१६ = ) ३९८५ है.
डॉ. कीलहॉर्न ने कोल्लम् संवत्वाले कई शिलालेखों में दिये हुए संवत्, संक्रांति, वार आदि
को गणित से जांच कर कोल्लम् संवत् में ८२४-२५ मिलाने से ई. स. होना निश्चय किया है
(ई. ऐँ; जि. २५, पृ. ५४) और दीवान बहादुर एल. डी. स्वामिकन्नु पिल्ले ने ई. स. में से ८२५
घटाने से कोल्लम् संवत् का बनना माना है (इंडियन क्रॉनॉलॉजी, पृ. ४३).
यह संवत् मलबार से कन्याकुमारी तक और तिन्नवेल्लि ज़िले में अब तक प्रचलित है.
उत्तरी मलबार में इसका प्रारंभ कन्या संक्रांति (सौर आश्विन) से और दक्षिणी मलबार तथा
तिन्नवेल्लि ज़िले में सिंह संक्रांति (सौर भाद्रपद) से होता है. इसका वर्ष सौर है और मलबार
में महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं; परंतु तिन्नवेल्लि ज़िले में उनके नाम चैत्रादि महीनों
के लौकिक रूप से हैं (चैत्र को 'चित्तिरै' या 'चित्तिरै' कहते हैं). वहां का सौर चैत्र मलबार-
वालों का 'मेष' है. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान ही लिखे जाते हैं. इस संवत्वाला सब से पुराना
लेख कोल्लम् संवत् १४६² का मिला है.
१५-नेवार (नेपाल) संवत्.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को नेपाल से जो वंशावली मिली उससे पाया जाता है कि
दूसरे ठाकुरी वंश के राजा अभयमल्ल के पुत्र जयदेवमल्ल³ ने नेवार संवत् चलाया. उसने कांति-
पुर और ललितपट्टन पर राज्य किया और उसके छोटे भाई आनंदमल्ल ने भक्तपुर (भाटगांव)
बसाया और वह वहीं रहा. इन दोनों भाइयों के समय कर्णाटकवंश को स्थापित करनेवाले नान्य-
देव ने दक्षिण से आकर नेपाल संवत् ६ या शक संवत् ८११ श्रावण शुदि ७ को समग्र देश (नेपाल)
करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ
कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स. ७८८ (विक्रम संवत् ८४५ = कलियुग संवत् ३८८६*) में और
देहांत ३२ वर्ष की अवस्था में (केरलौत्पत्ति के अनुसार) माना जावे तो उनका देहांत ई. स. (७८८+३२= ) ८२० में होना
स्थिर होता है. यह समय कोल्लम् संवत् के प्रारंभ के निकट आ जाता है परंतु ऐसा मानने के लिये मलबारवालों की
जनश्रुति के सिवाय कोई अन्य प्रमाण नहीं है. ऐसी दशा में यही कह सकते हैं कि यह संवत् किसने किस घटना की याद-
गार में चलाया यह अब तक अनिश्चित ही है.
१. दा. आ. सी; जि. २, पृ. २८. २. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २३४.
३. डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को मिली हुई नेपाल की वंशावली में जयदेवमल्ल का नेवार (नेपाल) संवत् चलाना
लिखा है परंतु जनरल कनिंगहाम लिखता है कि राजा राघवदेव ने ई. स. ८८० में नेपाल में यह संवत् प्रचलित किया (क;
ई; पृ. ७४). राघवदेव का नाम डॉ. भगवानलाल इंद्रजी की वंशावली तथा नेपाल के इतिहास के अंग्रेजी पुस्तकों में नहीं
मिलता परंतु नेपाल के राजा जयस्थितिमल्ल (ई. स. १३८०-१३६४) के समय की लिखी हुई वंशावली की पुस्तक में जो प्रो.
सेसिल बेंडाल को नेपाल से मिला, उक्त राजा का नाम मिलता है और नेपाल से मिले हुए हस्तलिखित संस्कृत पुस्तकों
के अंत में मिलनेवाले वहां के राजाओं के नाम और संवतों को देखते हुए राघवदेव का यह संवत् चलाना अधिक
- शंकराचार्यप्रादुर्भावस्तु विक्रमार्कसमयादतीते पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतीमिते संवत्सरे केरलदेशे कालपीग्रामे....। तथा च संप्रदायविद
आहुः । निधिनागेभवह्न्यब्दे विभवे मासि माधवे । शुक्रे तिथौ दशम्यां तु शंकरायोदयः स्मृतः ॥ इति ३८८६ । .... तथा च शंकरमंदारसौरभे
नीलकंठभट्टा अपि एवमाहुः । प्रासूत तिष्यशरदाम् अतियातवत्याम् एकादशाधिकशतो ननवद्युतःसहस्र्याम् । ३८८६ । (यज्ञेश्वर शास्त्री का
'आर्यविद्यासुधाकर' पृ. २२६, २२७).