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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 318 में से

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पृष्ठ 200

भारतीय संवत्. १७१
अलबेरूनी लिखता है कि 'विक्रमादित्य ने शक राजा को परास्त कर यह संवत् चलाया' १. इस
प्रकार इसके प्रचलित किये जाने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं.
पहिले पहिल यह संवत् काठियावाड़ तथा कच्छ से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के [ शक ]
संवत् ५२ से १४३ तक के शिलालेखों २ में तथा उन्हीं के सिक्कों में, जो [ शक ] संवत् १०० (ई. स.
१७८) के आस पास से लगा कर ३१० (ई. स. ३८८) से कुछ पीछे तक के हैं, मिलता है. उक्त
शिलालेखों में केवल 'वर्षे' (=संवत्सरे) लिखा मिलता है, 'शक' आदि कोई नाम 'वर्षे' (संवत्)
के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, और सिक्कों में तो अंक ही मिलते हैं ('वर्षे' भी नहीं.)
संस्कृत साहित्य में इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ (=शककाल) पहिले पहिल ३
वराहमिहिर की 'पंचसिद्धांतिका' में शक संवत् ४२७ ४ (ई. स. ५०५) के संबंध में मिलता है, और
शक संवत् ५०० (ई. स. ५७८) से लगा कर १२६२ (ई. स. १३४०) तक के शिलालेखों और
दानपत्रों में 'शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सर' ५, 'शकनृपतिसंवत्सर' ६, 'शकनृपसंवत्सर' ७, शकनृप-
काल' ८, शक्संवत्' ९, 'शकवर्ष' १०, 'शककाल' ११, 'शककालसंवत्सर' १२, 'शक' १३ और 'शाक' १४
शब्दों का प्रयोग इस संवत् के वास्ते किया हुआ मिलता है जिससे पाया जाता है कि ई. स. ५०० के
आस पास से लगा कर शक संवत् १२६२ (ई. स. १३४०) तक तो यह संवत् किसी शक राजा के,
राज्याभिषेक से चला हुआ या किसी शक राजा अथवा शकों का चलाया हुआ माना जाता था और
उस समय तक शालिवाहन का नाम इसके साथ नहीं जुड़ा था.
१. आ. स. इं; जि. २, पृ. ६.
२. राज्ञो चष्टनस घ्समोतिकपुत्रस राज्ञो रुद्रदामस जयदामपुत्रस वर्षे द्विपंचाशे ५२ २ फागुणबहुल्स द्वितीयं वी २ मदनेन सिंहलपुत्रेण ०
कच्छराज्य के अंधौ गांव से मिले हुए क्षत्रपों के लेखों की स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई छापों पर से.
राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ (महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले
चट्टान पर के लेख से. ऐ. इं; जि. ८, पृ. ४२ ).
३. सिंहसूरिरचित 'लोकविभाग' नामक संस्कृत जैन ग्रंथ में उक्त पुस्तक का शकाब्द (शक संवत्) ३८० में बनना
लिखा है (संवत्सरे तु द्वात्रिंशे कांचीशसिंहवर्मणः । अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ (मोक्षविभाग नामक ११ वें प्रकरण के
अंत की प्रशस्ति, श्लोक ४) परंतु यह मूल ग्रंथ नहीं किंतु सर्वंनंदि नामक मुनि के बनाये हुए प्राकृत ग्रंथ का परिवर्द्धित संस्कृत
अनुवाद है और ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पीछे का बना हुआ है क्यों कि इसमें यतिवृषभरचित 'तिलोयपण्णत्ति,'
राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय के अर्थात् ई. स. की ९ वीं शताब्दी के बने हुए 'उत्तरपुराण' तथा ई. स. की ११ वीं
शताब्दी के आस पास के बने हुए नेमिचंद्ररचित 'त्रिलोकसार' से भी श्लोक उद्धत किये हुए मिलते हैं. संभव है
कि सर्वंनंदि का मूल प्राकृत ग्रंथ शक संवत् ३८० में बना हो, परंतु उसमें इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ था
या नहीं इसका जब तक मूल ग्रंथ न मिल आवे तब तक निश्चय नहीं हो सकता. ऐसी दशा में ११ वीं शताब्दी के पीछे के
बने हुए 'लोकविभाग' के 'शकाब्द' को शक संवत् का सब से प्राचीन उल्लेख नहीं कह सकते.
४. सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका १।८. देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण *.
५. शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सरेष्वतिक्रांतेषु पंचसु शतेषु (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास का सेट ).
६. शकनृपतिसंवत्सरेषु चतुस्त्रिंशाधिकेषु पंचस्वतीतेषु भाद्रपदामावास्यायां सूर्य्यग्रहणनिमित्तं (इं. ऐं; जि. ६, पृ ७३ ).
७. शकनृपसंवत्सरेषु शरशिखिमुनिषु व्यतीतेषु ज्ये(ज्ये)ष्ठमासशुक्लपंचदश्यां पुष्यनक्षत्रे चंद्रवारे (इं. ऐं; जि. १२, पृ. १६ ).
८. शकनृपकालातीतसंवत्सरस(श)तेषु सप्तसु(सु) जे(षो)डशोत्तरेषु वैशाखब(व)हुलामावास्यामादित्यग्रहणपर्व्वणि (ऍ. इं; जि. ३,
पृ १०६).
९. शक्संवत् ८३२ वैशाखशुद्धपौरर्णमास्यां महावैशाख्यां (ऐं. इं; जि. १, पृ. ५६ ).
१०. एकादशोत्तरषट्छतेषु शकवर्षेष्वतीतेषु....कार्तिकपौर्णमास्यां (इं. ऐं; जि. ६, पृ. ८६ ).
११. सप्तस(श)त्या नवत्या च समायुक़्तेसु(षु) सप्तसु [।] स(श)ककाले(ले) श्व(ष्व)तीतेषु मन्मथाह्वयवत्सरे (ज. ए. सो. बंब; जि. १०,
पृ. १६५ ).
१२. पंचसप्तत्यधिकशककालसंवत्सरशतषट्के व्यतीते संवत(त्) ६७५....माघमासरथसप्तम्यां (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११२ ).
१३. शक ११५७ मन्मथसंवत्सरे श्रावणबहुले ३० गुरौ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६३, लेखसंख्या ३४८).
१४. शाके ११२८ प्रभवसंवत्सरे श्रावणमासे पौर्णमास्यां (ऍ. इं; जि. १, पृ. ३४३ ).