सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

भारतीय संवत्. १८७
चला था. इसका वर्ष ज्येष्ठ शुक्ला १३ से पलटता था और वर्तमान ही लिखा जाता था. इसका
प्रचार मराठों के राज्य में रहा परंतु अब यह लिखा नहीं जाता.
२१—बार्हस्पत्य संवत्सर ( १२ वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर १२ वर्ष का चक्र है और इसका संबंध बृहस्पति की गति से है.
इसके वर्षों के नाम कार्तिकादि १२ महीनों के अनुसार हैं परंतु कभी कभी महीनों के नाम के पहिले
‘महा’ लगाया जाता है जैसे कि 'महाचैत', 'महावैशाख' आदि.
सूर्य समीप आने से बृहस्पति अस्त हो कर जब सूर्य उससे आगे निकल जाता है तब
( २५ से ३१ दिन के बाद ) जिस नक्षत्र पर फिर वह (बृहस्पति) उदय होता है उस नक्षत्र के अनुसार
संवत्सर (वर्ष) का नाम नीचे लिखे क्रम से रक्खा जाता है—
कृत्तिका या रोहिणी पर उदय हो तो महाकार्तिक (कार्तिक); मृगशिर या आर्द्रा पर
महामार्गशीर्ष (मार्गशीर्ष); पुनर्वसु या पुष्य पर महापौष; अश्लेषा या मघा पर महामाघ;
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी या हस्त पर महाफाल्गुन; चित्रा या स्वाति पर महाचैत्र; विशाखा या
अनुराधा पर महावैशाख; ज्येष्ठा या मूल पर महाज्येष्ठ; पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा पर महाआषाढ;
श्रवण या धनिष्ठा पर महाश्रावण; शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराभाद्रपदा पर महाभाद्रपद और
रेवती, अश्विनी या भरणी पर उदय हो तो महाआश्वयुज (आश्विन) संवत्सर कहलाता है¹. इस चक्र
में १२ वर्षों में एक संवत्सर क्षय² हो जाता हैं. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में बार्हस्पत्य
संवत्सर दिये हुए मिलते हैं,³ जो सब ई. स. की ७ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं. उसके पीछे इस
का प्रचार सामान्य व्यवहार से उठ गया और केवल पंचांगों में वर्ष का नाम⁴ बतलाने में ही रह
गया जो अब तक चला जाता है.
२२-बार्हस्पत्य संवत्सर ( ६० वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है. इसमें वर्षों की संख्या नहीं किंतु १ से ६० तक
के नियत नाम ही लिखे जाते हैं. मध्यम मान से बृहस्पति के एक राशि पर रहने के समय को
‘बार्हस्पत्य संवत्सर' (वर्ष) कहते हैं⁵ जो ३६१ दिन, २ घड़ी और ५ पल का होता है, और सौर
१. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वयद्वयानुयोगीनि ।
क्रमशस्त्रिभं तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यं च यद्वर्षम् ॥ (वाराही संहिता; अध्याय ८, श्लोक १-२).
२. १२ सौर वर्षों में ११ बार गुरु अस्त होकर फिर उदय होता है इसलिये १२ वर्ष में एक बार्हस्पत्य संवत्सर क्षय हो
जाता है. जैसे कि पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६६५ के पंचांग में 'वर्षनाम पौष' लिखा है परंतु १६६६ के पंचांग में
'वर्षनाम फाल्गुन' लिखा है जिससे माघ (महामाघ) संवत्सर क्षय हो गया.
३. भरतपुर राज्य के कोट नामक गांव से मिले हुए शिलालेख में 'महाचैत्र' संवत्सर (रि. रा. म्यु अ; ई. स. १६१६-
१७, पृ. २), परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६३ (ई. स. ४८२-८३) के दानपत्र में 'महाआश्वयुज' संवत्सर
(त्रिषष्ट्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ महाश्वयुजसंवत्स(त्त्स)रे चैत्रमासशुक्लपक्षद्वितीयायाम्—की; गु. इं; पृ. १०२) और कदंबवंशी
राजा मृगेशवर्मन् के राज्यवर्ष तीसरे के दानपत्र में 'पौष' संवत्सर—श्रीमृगेशवर्म्मा आत्मनः राज्यस्य तृतीये वर्षे पौषे संवत्सरे कार्त्ति-
कमासबहुलपक्षे दशम्यां तिथौ (इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५) आदि.
४. पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६७४ के पंचांग में 'वर्षनाम आश्विन' और १६७५ के पंचांग में 'वर्षनाम कार्तिक'
लिखा है. ये वर्षनाम १२ बरसवाले बार्हस्पत्य संवत्सर के ही हैं.
५. बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति (भास्कराचार्य का 'सिद्धांतशिरोमणि १।३०).
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri