प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० प्राचीनलिपिमला.
'आषाढादि संवत्' कहते थे. राजपुताने के उदयपुर आदि राज्यों में राजकीय विक्रम संवत् अब
श्रावण कृष्णा (पूर्णिमांत) से प्रारंभ होता है.
८-शक संवत्.
शक संवत् के प्रारंभ के विषय में ऐसी प्रसिद्धि है कि दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के राजा
शालिवाहन (सातवाहन, हाल) ने यह संवत् चलाया. कोई इसका प्रारंभ शालिवाहन के जन्म से २
मानते हैं. जिनप्रभसूरि अपने 'कल्पप्रदीप' ३ नामक पुस्तक में लिखता है कि प्रतिष्ठानपुर (पैठण)
में रहनेवाले एक विदेशी ब्राह्मण की विधवा बहिन से सातवाहन (शालिवाहन) नामक पुत्र उत्पन्न
हुआ. उसने उज्जैन के राजा विक्रम को परास्त किया. जिसके पीछे उसने प्रतिष्ठानपुर का राजा बन
कर तापी नदी तक का देश अपने अधीन किया और वहां पर अपना संवत् प्रचलित किया४.
क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनंद साक करके उसका अर्थ करे कि नव-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम
का नव-रहित शक अर्थात् १००-६=६० । ६१ अर्थात् विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ६० । ६१ से प्रारंभ हुआ
है। यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा (?) करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैंकड़ों वर्षों से यह
कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तो अब तक प्रचलित है
और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह अब अप्रचलित हो गया है... अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं।
एक तो सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है' (पृथ्वीराजरासा आदि
पर्व, पृ. १३६). पं. मोहनलाल पंड्या का यह सारा कथन सर्वथा स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि रासे के 'अनंद' शब्द
का अर्थ 'आनंददायक' या 'शुभ' ही है जैसा कि भाषा के अन्य काव्यों में मिलता है*. उसको वास्तविक अर्थ में न
ले कर 'विक्रम के राज्य के ६० वे या ६१ वे वर्ष से चलनेवाला अनंद विक्रम संवत्' अर्थ निकालना हठधर्मी से खाली नहीं
है; ज्योतिषियों ने विक्रम के दो संवतों का होना कभी नहीं माना और न किसी वृद्ध पुरुष को ऐसा कहते हुए सुना.
पं. मोहनलाल की यह कल्पना भी ठीक वैसी ही है जैसी कि 'राजप्रशस्ति' में खुदे हुए 'भापारासापुस्तकेस्य' के 'भाव-
नगर प्राचीनशोधसंग्रह' में छपे हुए अशुद्ध पाठ 'भीपारासापुस्तकेस्य' पर से 'भीमरासा' नामक ऐतिहासिक पुस्तक
की सृष्टि खड़ी कर दी गई. पं. मोहनलाल पंड्या के इस मनघडंत कथन के आधार पर डॉ. ग्रीअर्सन (स्मि; अ. हि. इं;
पृ. ४२, टिप्पण २), वी. ए. स्मिथ (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ३८७, टिप्पण २) और डॉ. बार्नेट ने (वा; एं. इं; पृ. ६५) 'अनंद
विक्रम संवत्' का ई. स. ३३ से चलना माना है परंतु हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि राजपुताने में विक्रम के दो
संवतों का होना कभी माना नहीं गया, न वहां से मिले हुए शिलालेखों, दानपत्रों, हस्तलिखित पुस्तकों, भाटों तथा चारणों
के लिखे हुए भाषा कविता के ग्रंथों या ख्यातों में कहीं भी अनंद विक्रम संवत् का उल्लेख मिलता है, न 'पृथ्वीराजरासे' के
उपर्युक्त दोहे में 'अनंद विक्रम संवत्' की कल्पना पाई जाती है और न 'पृथ्वीराजविजय' महाकाव्य से, जो चौहानों के इतिहास
का प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तक है, वि. सं. १२२० (ई. स. ११६३) के पूर्व पृथ्वीराज का जन्म होना माना जा सकता है.
१ आषाढादि विक्रम संवत् शिलालेखों तथा पुस्तकों में मिलता है. अडालिज (अहमदाबाद से १२ मील पर)
की बावड़ी के लेख में 'श्रीमन्नृपविक्रमसमयातीता (त) आषाढादिसंवत १५५५ वर्ष शाके १४२०.... माघमासे पंचम्यां तिथौ बुधवासरे'
(इं. पं; जि. १८, पृ. २४१). डुंगरपुर राज्य के डेसां गांव के पास के शिवमंदिर के लेख में-'श्रीमन्नृ (न्नृ) पविक्रमार्क (र्क) राज्यसम-
यातीतसंवत् १६ आषादादि २३ वर्षे शाके १४८८ प्रवर्त्तमाने । युवराव्यनाम्नि संवत्सरे.... वैशाखमासे । कृष्णापक्षे । प्रतिपति (ति) या । गुरुवारसरे.'
डुंगरपुर राज्य से मिले हुए कई शिलालेखों में 'आषाढादि' संवत् लिखा मिलता है. 'प्रभातक्षेत्रतीर्थयात्राक्रम' नामक
पुस्तक के अंत में-'संवत् १५ आषाढादि ३४ वरणे (वर्षे) श्रावणशुदि ५ बु(धौ) मे'-लिखा मिला है (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१).
२ त्र्यंकेन्द्र (१४६३) प्रमिते वर्षे शालिवाहनजन्मतः । कृतस्तपसि मार्तंडोऽयमलं जयतुद्गतः (मुहूर्त्त मार्तंड, अलंकार, श्लोक ३).
३ यह पुस्तक ई. स. १३०० के आस पास बना था. ४ ज. ए. सो. बंब; जि. १०, पृ. १३२-३३.
- गगन पाणि पुनि द्वीप ससि (१७२०) हिम रुत मंगसर मास । शुक्ल पच्छ तेरस दिने बुध वासर दिन जाम ॥ २६६ ॥
मरदानो अरु महा बली अवरंग शाह नरिंद । तासु राज महिं हरखसूं रच्यो शास्त्र अनंद ॥ २६७ ॥ (पद्मराग के शिष्य
रामचंद्र रचित 'रामविनोद' नामक पुस्तक).