प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १८३
चलाया होगा जिसका नाम इसके साथ जुड़ा हुआ है और जैसा कि विजयशंकर गौरीशंकर ओझा
का अनुमान है.
मांगरोल की सोढडी वाव (बावडी) के लेख में विक्रम संवत् १२०२ और सिंह संवत् ३२
आश्विन वदि १३ सोम वार लिखा है' जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत् के बीच का अंतर
१२०२-३२ = ) ११७० आता है. इस हिसाब से ई. स. में से १११३-१४ घटाने से सिंह संवत् होगा.
चौतुक्य राजा भीमदेव (दूसरे) के दानपत्र में वि. सं. १२६६ और सिंह संवत् ६६ मार्गशिर
शुदि १४ गुरु वार लिखा है. इससे भी वि. सं. और सिंह संवत् के बीच का अंतर (१२६६-६६= )
११७० आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के उपर्युक्त वेरावल के ४ संवत्वाले शिलालेख में वि. सं.
१३२० और सिंह संवत् १५१ आषाढ कृष्णा १३ लिखा है. उक्त लेख का विक्रम संवत् १३२०
(१०) छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक लिखे गये हैं. ऐसा मानने का कारण यह है कि उक्त दानपत्र के छपने से १२ वर्ष पहिले
डॉ. बूलर ने चौलुक्य भीमदेव (पहिले) का वि. सं. १०८६ कार्तिक शुदि १५ का दानपत्र प्रसिद्ध किया (एं. इं; जि. ६,
पृ. १६३-४) जिसमें उसका लेखक कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा होना लिखा है.
डॉ. फ़्लीट के प्रसिद्ध किये हुए संवत् ६३वाले दानपत्र का लेखक भी वही कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक वही
महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा है इस लिये ये दोनों दानपत्र एक ही राजा के हैं यह निश्चित है. ऐसी दशा में डॉ. फ़्लीटवाले
दानपत्र का संवत् ६३ विक्रम संवत् १०६३ ही है न कि १२६२ या १२६३. शिलालेख और दानपत्रों के संवतों में कभी कभी
शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक दिये हुए मिलते हैं जो विद्वानों को चक्कर में डाल देते हैं.
देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने कोटा राज्य के अटू नामक स्थान से मिले हुए महाराजाधिराज जयसिंह के लेख में
'संवत् १४' खुदा हुआ होने से लिखा है कि 'यदि यह जयसिंह चौलुक्य सिद्धराज जयसिंह है और संवत् १४ उसका
चलाया हुआ संवत् [अर्थात् सिंह संवत्, जिसको जयसिंह का चलाया हुआ मान लिया है] है तो उस [लेख] का समय
ई. स. ११२८ [वि. सं. ११८५] आता है. उक्त लेख का जयसिंह कोई दूसरा जयसिंह हो सकता है परंतु वह उक्त नाम के
चौलुक्य राजा से पहिले का नहीं हो सकता क्यों कि अक्षरों पर से उक्त लेख का [ई. स. की] १२वीं शताब्दी से पहिले का
होना पाया नहीं जाता' (प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ई. स. १९०३-४, पृ. ४८). अटू के लेख का संवत् भी सिंह संवत् १४ नहीं
किंतु वि. सं. १३१४ होना चाहिये जिसमें भी शताब्दियों के अंक छोड़ दिये गये हैं. वह लेख या तो मालवे के महाराजाधिराज
जयसिंह दूसरे (जयतुंगिदेव) का, जिसके समय का राहटगढ़ का लेख वि. सं. १३१२ भाद्रपद शुदि ७ (की; लि. इं. नां.
इं; पृ. २२, लेखसंख्या २२३) का मिला है, या उसके छोटे भाई जयवर्मन् का, जिसका दानपत्र वि. सं. १३१७ का मिला है
(ऍ. इं; जि. ६, पृ १२०-२३), होना चाहिये. कोटा और झालावाड़ के इलाके पहिले मालवे के परमारों के अधीन थे,
जिनके लेख ई. स. की ११वीं से १३वीं शताब्दी के वहां पर मिलते हैं. ऐसे ही उक्त विद्वान् ने जोधपुर राज्य के सेवाड़ी गांव
से मिले हुए कटुराज के समय के एक लेख का संवत् ३१ पढ़ा है और उसको सिंह संवत् मान कर विक्रम संवत् १२०० में
कटुराज का नाडोल का राजा होना माना है तथा उक्त कटुराज को चाहमान (चौहान) अश्वराज (आशाराज) का पुत्र
कटुकराज बतलाया है (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४, ६६). वह लेख बहुत बिगड़ी हुई दशा में है इस लिये उसके शुद्ध पढ़े जाने के
विषय में हमें शंका ही है. यदि उसका संवत् वास्तव में ३१ हो तो भी वह सिंह संवत् नहीं किंतु वि. सं. १२३१ होना चाहिये,
क्यों कि नाडोल के चौहान के लेखों में कहीं सिंह संवत् नहीं है. अश्वराज के पुत्र कटुकराज के सेवाड़ी के दूसरे लेख में
वि. सं. ११९२ (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३१-३२) ही लिखा है और वि. सं. ११८६ से १२०२ तक के कई शिलालेख चौहान
राजा रायपाल के समय के नाडोल और नारलाई से मिले हैं (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४-४३.) जिनसे पाया जाता है कि वि. सं.
११८६ से १२०२ तक नाडोल का राजा रायपाल था न कि कटुराज. ऐसी दशा में सिंह संवत् ३१ (वि. सं. १२००) में
कटुराज का नाडोल का राजा होना संभव नहीं हो सकता. काठियावाड़ से संबंध न रखनेवाले लेखों में सिंह संवत्
मानने की चेष्टा करने के केवल उपर्युक्त तीन ही उदाहरण अब तक मिले हैं जिनमें से एक में भी सिंह संवत् नहीं किंतु
शताब्दियों के अंकसहित वि. सं. के ही वर्ष हैं.
१ श्रीमद्विक्रमसंवत् १२०२ तथा श्रीसिंहसंवत् ३२ आश्विनवदि १३ सोमे (भावनगर प्राचीन शोध संग्रह, भाग १, पृ. ७).
२ श्रीविक्रमसंवत् १२६६ वर्षे श्रीसिंहसंवत् ६६ वर्षे लौकि मार्ग शुदि १४ गुरा० (इं. पँ; जि. १८, पृ. १১২).
३. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसीका टिप्पण ४.