प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १७५
राज्य का उदय हुआ जिसके अस्त होने के पीछे वहांवालों ने गुप्त संवत् का ही नाम 'वलभी
संवत्'१ रक्खा.
अल्बेरूनी लिखता है कि 'वलभीपुर के राजा वलभ२ के नाम से उसका संवत् वलभी संवत्
कहलाया. यह संवत् शक संवत् के २४१ वर्ष पीछे शुरू हुआ है. शक संवत् में से ६ का घन और
५ का वर्ग ( २१६+ २५=२४१ ) घटाने से वलभी संवत् रह जाता है. गुप्तकाल के विषय में लोगों
का कथन है कि गुप्त लोग दुष्ट [और] पराक्रमी थे और उनके नष्ट होने पर भी लोग उनका संवत्
लिखते रहे. अनुमान होता है कि वलभ उन (गुप्तों) में से अंतिम था क्यों कि वलभी संवत् की
नांई गुप्त संवत् का प्रारंभ भी शक काल से २४१ वर्ष पीछे होता है. श्रीहर्ष संवत् १४८८, विक्रम
संवत् १०८८, शककाल ९५३ और वलभी तथा गुप्तकाल ७१२ ये सब परस्पर समान हैं'३. इससे
विक्रम संवत् और गुप्तकाल का अंतर (१०८८-७१२=) ३७६ आता है अर्थात् गुप्त संवत् में ३७६ मिलाने
से चैत्रादि विक्रम संवत्, २४१ मिलाने से शक संवत् और ३१६-२० मिलाने से ई. स. आता है.
गुजरात के चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के वेरावल (काठियावाड़ में) के एक शिलालेख में
रसूल महंमद संवत् (हिजरी सन्) ६६२, विक्रम संवत् १३२०, वलभी संवत् ९४५ और सिंह संवत्
१५१ आषाढ़ कृष्णा १३ रविवार लिखा है४. इस लेख के अनुसार विक्रम संवत् और वलभी (गुप्त)
संवत् के बीच का अंतर ( १३२०-९४५ = ) ३७५ आता है परंतु यह लेख काठियावाड़ का होने के
कारण इसका विक्रम संवत् १३२० कार्तिकादि५ है जो चैत्रादि १३२१ होता है जिससे चैत्रादि
विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर ३७६ ही आता है जैसा कि ऊपर लिखा गया है.
चैत्रादि पूर्णिमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर सर्वदा ३७६ वर्ष का और
कार्तिकादि अमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर चैत्रशुक्ला १ से आश्विन
कृष्णा अमावास्या तक ३७५ वर्ष का और कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन कृष्णा अमावास्या तक
३७६ वर्ष का रहता है.
गुप्त संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से और महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा
गत लिखे मिलते हैं और जहां वर्तमान लिखा रहता है वहां एक वर्ष अधिक६ रहता है.
१. काठियावाड़ में गुप्त संवत् के स्थान में 'वलभी संवत्' लिखे जाने का पहिला उदाहरण ऊना गांव (जूनागढ़
राज्य में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल के चालुक्यवंशी सामंत बलवर्मन् के वलभी संवत् ५७४ (ई. स.
८६४) माघ शुद्ध ६ के दानपत्र में मिलता है (एं. इं; जि. ६, पृ. ६).
२. अल्बेरूनी ने 'वलभी संवत्' को वलभीपुर के राजा वलभ का चलाया हुआ माना है और उक्त राजा को गुप्त वंश
का अंतिम राजा बतलाया है परंतु ये दोनों कथन ठीक नहीं हैं क्योंकि उक्त संवत् के साथ जुड़ा हुआ 'वलभी' नाम उक्त
नगर का सूचक है न कि वहां के राजा का, और न गुप्त वंश का अंतिम राजा वलभ था. संभव है कि गुप्त संवत् के प्रारंभ से
७०० से अधिक वर्ष पीछे के लेखक अल्बेरूनी को 'वलभी संवत्' कहलाने का ठीक ठीक हाल मालूम न होने के कारण
उसने ऐसा लिख दिया हो अथवा उसको लोगों ने ऐसा ही कहा हो.
३. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ७. फ़्ली; गु. इं; भूमिका, पृ. ३०-३१.
४. रसुलमहमदसवत् ६६२ तथा श्रीनृप[वि]क्रमसं १३२० तथा श्रीमद्वलभिसं ९४५ तथा श्रीसिंहसं १५१ वर्षे आषाढवदि १३ रखौ
( इं. ऐं; जि. ११, पृ. २४२ ).
५. वेरावल के उक्त लेख के विक्रम संवत् को कार्तिकादि मानने का यह भी कारण है कि उसमें लिखा हुआ हिजरी
सन् ६६२ चैत्रादि विक्रम संवत् १३२० मार्गशीर्ष शुक्ला २ को प्रारंभ हुआ था, अतएव हि. स. ६६२ में जो आषाढ़ मास आया
वह चैत्रादि वि. सं. १३२१ ( कार्तिकादि १३२०) का ही था.
६. खेड़ा से मिले हुए वलभी के राजा धरसेन (चौथे) के गुप्त संवत् ३३० के दानपत्र में उक्त संवत् में मार्गशिर मास
अधिक होना लिखा है ( सं. ३०० ३० द्विमागीशिरशु २. इं. ऐं. जि. १५, पृ. ३४० ). गत गुप्त संवत् ३३० गत विक्रम
संवत् ( ३३०+३७६= ) ७०६ के मुताबिक होता है. गत विक्रम संवत् ७०६ में कोई अधिक मास नहीं था परंतु वि. स. ७०५
में मध्यम मान से मार्गशिर मास अधिक आता है इस लिये उक्त ताम्रपत्र का गुप्त संवत् ३३० वर्तमान ( ३२९ गत ) होना
चाहिये.