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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 318 में से

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पृष्ठ 207

१७८ प्राचीनलिपिमाला.
१३-भाटिक (भट्टिक) संवत्.
भाटिक (भट्टिकं) संवत् जैसलमेर के दो शिलालेखों में मिला है. भट्टि या भटिक (भाटी)
नामक राजा जैसलमेर के राजाओं का प्रसिद्ध पूर्वज था जिसके नाम से उसके वंशज भाटी कहलाये.
यह संवत् राजा भटिक (भाटी) का चलाया हुआ होना चाहिये१. जैसलमेर के लक्ष्मीनारायण के
मंदिर के शिलालेख में, जो वहां के राजा वैरिसिंह के समय का है, वि. सं. १४६४ और भाटिक संवत्
८१३ लिखा है२ जिससे वि. सं. और भाटिक संवत् का अंतर (१४६४-८१३=) ६८१ आता है. वहीं
के महादेव के मंदिर के लेख में, जो रावल भीमसिंह के समय का है, वि. सं. १६७३, शक संवत्
१५३८ और भाटिक संवत् ६६३ मार्गशीर्ष मास लिखा है३. इस हिसाब से वि. सं. और भाटिक
संवत् के बीच का अंतर (१६७३-६६३=) ६८० आता है. इन दोनों लेखों से पाया जाता है
कि भाटिक संवत् में ६८०-८१ मिलाने से विक्रम संवत् और ६२३-२४ मिलाने से ई. स.
आता है.
अभी तक जैसलमेर राज्य के प्राचीन लेखों की खोज बिलकुल नहीं हुई जिससे यह पाया
नहीं जाता कि कब से कब तक इस संवत् का प्रचार रहा.
१४-कोल्लम् (कोलंव) संवत्.
इस संवत् को संस्कृत लेखों में कोल्लंभ४ संवत् (वर्ष) और तमिळ में 'कोल्लम् आंडु'
(कोल्लम्=पश्चिमी, और आंडु=वर्ष) अर्थात् पश्चिमी [भारत का] संवत् लिखा है. यह संवत्
किसने और किस घटना की यादगार में चलाया इस विषय में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता.
इसके वर्षों को कभी 'कोल्लम् वर्ष' और कभी 'कोल्लम के उद्भव से वर्ष' लिखते हैं, जिससे
अनुमान होता है कि भारत के पश्चिमी तट पर के मलबार प्रदेश के कोल्लम् (किलोन, त्रावनकोर राज्य
१. चारण रामनाथ रत्नू ने अपने 'इतिहास राजस्थान' में भाटीजी (भट्टिक. भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२
दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं
देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रति-
हार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष
शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था.
यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब
से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय
भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव,
मजमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्रस्किन का जैसलमेर का गज़ेटिअर, पृ. ६-१०, और
टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की
गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का
चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय
की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.
२. संवत् श्रीविक्रमार्कसमयातीतसंवत् १४६४ वर्षे भाटिके संवत् ८१३ प्रवर्तमाने महामांगल्य........चंद्रे (प्रो. श्रीधर आर.
भंडारकर की संस्कृत पुस्तकों की तलाश की ई. स. १९०४-५ और १९०५-६ की रिपोर्ट, पृ. ६५).
३. स्वस्ति श्रीनृपविक्रमादिता (त्य) समयातात (तीत) संवत् १६७३ रामाश्र्वभूपतौ वर्षे शाके १५३८ वसुरामशरैके प्रवृत्तमन (र्तमाने)
भाटिक ६६३ मार्ग (र्गि) शिर....(उपर्युक्त रिपोर्ट, पृ. ६८).
४. श्रीमत्कोलंभवर्षे भवति गुणखणिश्रेणिश्रादित्यवर्मा वञ्चीपालो (इं. पँ; जि. २, पृ. ३६०).
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri