प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १७६
में) नामक प्राचीन नगर से १, जिसको संस्कृत लेखक 'कोलंबपत्तन २' लिखते हैं, संबंध रखनेवाली
किसी घटना से यह संवत् चला हो ३. मलबार के लोग इस को 'परशुराम को संवत्' कहते हैं तथा
१००० वर्ष का चक्र, अर्थात् १००० वर्ष पूरे होने पर वर्ष फिर १ से प्रारंभ होना, मानते हैं और वर्तमान
चक्र को चौथा चक्र बतलाते हैं परंतु ई. स. १८२५ में इस संवत् या चक्र के १००० वर्ष पूरे हो जाने
पर फिर उन्होंने १ से वर्ष लिखना शुरू नहीं किया किंतु १००० से आगे लिखते चले जा रहे हैं जिससे
१. कोल्लम् (किलोन) एक प्राचीन नगर और बंदरगाह है. दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर का व्योपार का
प्रसिद्ध स्थान होने के कारण पहिले मिसर, यूरप, अरब, चीन आदि के व्योपारी वहां माल खरीदने को आया करते थे.
ई. स. की ७वीं शताब्दी के नेस्टोरिअन पादरी जेसुजयस ने किलान का उल्लेख किया है. ई. स. ८५१ के अरब लेखक ने
'कोल्लम-मल्ल' नाम से इसका उल्लेख किया है (इंपीरिअल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया, जि. २१, पृ. २२).
२. बंबई गज़ेटिअर, जि. १, भाग १, पृ. १८२, टिप्पण १.
३. बर्नल लिखता है कि 'इस संवत् का ई. स. ८२४ के सेप्टेंबर से प्रारंभ हुआ है. ऐसा माना जाता है कि यह
कोल्लम (किलोन) की स्थापना की यादगार में चला है' (ब; सा. इं; पे; पृ. ७३), परंतु कोल्लम् शहर ई. स. ८२४ से
बहुत पुराना है और ई. स. की ७ वीं शताब्दी का लेखक उसका उल्लेख करता है (देखो, इसी पृष्ठ का टिप्पण १) इस
लिये ई. स. ८२४ में उसका बसाया जाना और उसकी यादगार में इस संवत् का चलाया जाना माना नहीं जा सकता.
ट्रावनकोर राज्य के आर्किआलॉजिकल सर्वे के सुपरिंटेंडेंट टी. ए. गोपीनाथ राव का अनुमान है कि ई. स. ८२५ में
मरुवान् सपीर ईशो नामक ईसाई व्यौपारी दूसरे ईसाइयों के साथ कोल्लम् में आया हो और उसकी यादगार में वहां के
राजा ने यह संवत् चलाया हो...... [ उस समय ] सारा मलबार देश वस्तुतः एक ही राजा के अधीन था और यदि उसने
आज्ञा दी हो कि मरुवान् सपीर ईशो के जहाज़ से कोल्लम् में उतरने के दिन से लोग अब [ नया ] संवत् गिना करें
तो सारे मलेनाडु (मलबार) के, जिसका वह शासक था, लोगों ने अवश्य उसे शिरोधार्य किया होगा' (ट्रा. आ. सी;
जि. २, पृ. ७६, ७८-७६; और ता० ८ फरवरी ई. स. १६१८ के पत्र के साथ गोपीनाथ राव का मेरे पास भेजा हुआ कोल्लम् संवत्
का वृत्तान्त). गोपीनाथ राव का यह कथन भी ठीक नहीं कहा जा सकता. उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के
ईसाइयों के पास से मिले हुए वट्टेळुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम्
में तिरिस्सापळ्ळि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के
वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी
और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में
कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की
अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था
७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की
कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६०
और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-
केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई
प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने
की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्यों कि उसमें पचीस
पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही
मिले हुए वट्टेळुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नल ने ई. स. ७७४ का अनुमान किया था परंतु
तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राय बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-
पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (एं. इं; जि. ४, पृ. २६२). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार
के राजा चेरुमान् पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन'
नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के
ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अबदुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं
कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. पं; जि. ११, पृ. ११६
ड; क्रॉ. इं; पृ. ५४), परंतु मलबार गज़ेटिअर का कर्त्ता मि. इवेल लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं
हुआ (मलबार गज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का
भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि
ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे
तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न