प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ प्राचीनलिपिरमाला.
कार्त्तिकादि¹ है इस लिये चैत्रादि और आषाढादि १३२१ होगा जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत्
के बीच का अंतर (१३२१-१५१= ) ११७० ही आता है.
इस संवत्वाले थोड़े से शिलालेख काठियावाड़ से ही मिले हैं और चौलुक्य भीमदेव
(दूसरे) के उपर्युक्त वि. सं. १२६६ के दानपत्र में विक्रम संवत् के साथ सिंह संवत् दिया है
जिसका कारण यही है कि वह दानपत्र काठियावाड़ में दान की हुई भूमि के संबंध का है. इस
संवत् का प्रारंभ आषाढ़ शुक्ला १ (अमांत) से है और इसका सब से पिछला लेख सिंह संवत् १५१
का मिला है.
१८-लक्ष्मणसेन संवत्.
यह संवत् बंगाल के सेनवंशी राजा बल्लालसेन के पुत्र लक्ष्मणसेन के राज्याभिषेक (जन्म)²
से चला हुआ माना जाता है.
१. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसी का टिप्पण ५.
२. ई. स. ११९८-६६ के आसपास (ई. पै., जि. १६, पृ. ७) देहली के गुलाम सुलतान कुतुबुद्दीन ऐबक के समय
बख्तियार खिलजी ने नदिया पर चढ़ाई कर उसे ले लिया और वहां का राजा लक्ष्मणसेन भाग गया. इस चढ़ाई का
वृत्तांत मिनहाज उस्सिराज (जन्म ई. स. ११९३-देहांत ई. स १२६५ के पीछे) ने 'तबकात-इ-नासिरी' नामक इतिहास के
पुस्तक में इस तरह लिखा है कि 'राय लखमणिया (लक्ष्मणसेन) गर्भ में था उस वक्त उसका पिता मर गया था.
उसकी माता का देहांत प्रसववेदना से हुआ और लखमणिया जन्मते ही गद्दी पर बिठलाया गया. उसने ८० वर्ष राज्य
किया' (तबकात-इ-नासिरी का अंग्रेज़ी अनुवाद; मेजर रावार्टी का किया हुआ; पृ. ५५४). लक्ष्मणसेन संवत् का प्रारंभ
ई. स. १११६ में हुआ जैसा कि आगे लिखा गया है, इस लिये बख्तियार खिलजी की लक्ष्मणसेन पर की नदिया की चढ़ाई
लक्ष्मणसेन संवत् (११८६-१११६=) ८० में हुई, जब कि लक्ष्मणसेन की उम्र ८० वर्ष की थी और उतने ही वर्ष उसको राज्य
करते हुए थे.
'लघुभारत' नामक संस्कृत पुस्तक में लिखा है कि परंपरागत जनश्रुति से यह प्रवाद सुनने में आता है कि बल्लाल
(बल्लालसेन, लक्ष्मणसेन का पिता) मिथिला की चढ़ाई में मर गया. जब ऐसा संवाद फैला उसी समय विक्रमपुर में लक्ष्मण
का जन्म हुआ' (प्रवादः श्रूयते चात्र पारम्परीयावार्त्तया। मिथिले युद्धयात्रायां वल्लालोभून्मृतत्वनिः ॥ तदानीं विक्रमपुरे लक्ष्मणो जातवानसौ।
लघुभारत, खण्ड २; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६). यह कथन मिनहाज की सुनी हुई बात से मिलता जुलता ही है
परंतु इससे पाया जाता है कि लक्ष्मणसेन का जन्म हुआ उस समय बल्लालसेन के मिथिला में मर जाने की खाली अफ़वाह
ही उड़ी थी. संभव है कि इस अफ़वाह के उड़ने से विक्रमपुर में लक्ष्मणसेन गद्दी पर बिठला दिया गया हो और उसके
जन्म की खबर पाने पर बल्लालसेन ने मिथिला में रहते समय पुत्रजन्म की खुशी में यह संवत् चलाया हो. बल्लाल-
सेन ने शक संवत् १०६१ (ई. स. ११६६) में 'दानसागर' नामक ग्रंथ रचा (निखिलचक्रतिलकश्रीमद्वल्लालसेनेन । पूर्णे शशि-
नवदशमिते शकवर्षे दानसागरो रचितः ॥ दानसागर; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६, भाग १, पृ. २३). डॉ. राजेंद्रलाल
मित्र ने बंगाल के सेनवंशी राजाओं के समय का निर्णय करने में दानसागर की सहायता ली और उसकी रचना का
श्लोक भी टिप्पण में उद्धृत किया (पूर्णे शशिनवदशमिते शकाब्दे-ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६५, पृ. १३७) परंतु उसका
अनुवाद करने में गलती की और शक संवत् १०६१ के स्थानपर १०१६ (ई. स. १०६७) लिख कर बल्लालसेन का समय
ई. स. १०५६ से ११०६ तक मान लिया जो ठीक नहीं है.
बल्लालसेनरचित 'अद्भुतसागर' नामक बड़े ग्रंथ के प्रारंभ की भूमिका में लिखा है कि 'गौडेंद्र (बल्लालसेन) ने शक
संवत् १०६० (ई. स. ११६८) में 'अद्भुतसागर' का प्रारंभ किया परंतु उसके समाप्त होने के पूर्व ही उसने अपने पुत्र (लक्ष्मणसेन)
को राज्यसिंहासन पर बिठलाया और अपने ग्रंथ को पूर्ण करने का भार उस पर डाला. फिर गंगा में अपने दान के जल के प्रवाह
से यमुना का संगम बना कर अपनी स्त्री सहित स्वर्ग को गया (अर्थात् डूब मरा) और लक्ष्मणसेन के उद्योग
से 'अद्भुतसागर' पूर्ण हुआ' (शाके खनवखेन्द्वब्दे आरेभेऽद्भुतसागरं । गौड़ेन्द्रकुञ्जरालांनस्तम्भाहुर्र्महीपतिः ॥ ग्रन्थेऽस्मिन्नसमाप्त एव
तनयं साम्राज्यलक्ष्माहदीक्षापर्वेणि दीक्षगान्निजकृते निष्पत्तिमभ्यर्थ्य सः । नानादानचिताम्बुसंचलनतः सूर्यात्मजासंगमं गङ्गायां विरचय्य निर्ज-
रपुरं भार्य्यानुयातो गतः ॥ श्रीमल्लक्ष्मणसेनभूपतिरतिश्लाघ्यो यदुद्योगतो निष्पन्नोऽद्भुतसागरः कृतिरसौ बल्लालभूमीभुजः। अद्भुतसागर).
यदि लक्ष्मणसेन के जन्मसमय (ई. स. १११६ में) बल्लालसेन की अवस्था २० वर्ष की मानें तो अद्भुतसागर के प्रारंभ के