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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 318 में से

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पृष्ठ 215

१८६ प्राचीनलिपिमाला!
चलाथा. वह बहुत दिन तक चलता रहा और अब सिर्फ मिथिला में कहीं कहीं लिखा जाता है.'
ई. स. १७१८ में डॉ. राजेंद्रलाल मित्र ने लिखा कि 'तिरहुत के पंडित इसका प्रारंभ माघ
शुक्ला १ से मानते हैं. इसका प्रारंभ ई. स. ११०६ के जनवरी (वि. सं. ११६२ = श. सं. १०२७) से
होना चाहिये'².
इन पिछले तीनों अवतरणों के अनुसार शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर
१०२८ या उसके करीब आता है. मिथिला देश के पंचांगों में विक्रम, शक और लक्ष्मणसेन संवत्
तीनों लिखे जाते हैं परंतु उनमें शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर एकसा नहीं
मिलता किंतु लक्ष्मणसेन संवत् १ शक संवत् १०२६-२७, १०२७-२८, १०२६-३० और १०३०-३१
के मुताबिक आता है³.
डॉ. कीलहॉर्न ने एक शिलालेख और पांच हस्तलिखित पुस्तकों में लक्ष्मणसेन संवत् के साथ
दिये हुए मास, पक्ष, तिथि और वार को गणित से जांच कर देखा तो मालूम हुआ कि गत शक
संवत् १०२८ मार्गशिर सुदि १ (ई. स. ११०६ तारीख २६ अक्टोबर) को इस संवत् का पहिला दिन
अर्थात् प्रारंभ मान कर गणित किया जावे तो उन ६ में से ५ तिथियों के वार ठीक मिलते हैं⁴ परंतु
गत शक संवत् १०४१ अमांत कार्तिक शुक्ला १ (ई. स. १११६ तारीख ७ अक्टोबर) को इस संवत् का
पहिला दिन मान कर गणित किया जावे तो छहों तिथियों के वार मिल जाते हैं⁵. ऐसी दशा में
अबुलफ़ज़ल का कथन ही ठीक है. इस हिसाब से लक्ष्मणसेन संवत् में १०४०-४१ जोड़ने से गत
शक संवत्, ११७५-७६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् और १११८-१६ जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
यह संवत् पहिले बंगाल, बिहार और मिथिला में प्रचलित था और अब मिथिला में इसका
कुछ कुछ प्रचार है, जहां इसका प्रारंभ माघ शुक्ला १ से माना जाता है.
१६-पुडुवैप्पु संवत्.
ई. स. १३४१ में कोचीन के उत्तर में एक टापू (१३ मील लंबा और १ मील चौड़ा) समुद्र में
से निकल आया, जिसे 'बौपीन' कहते हैं, उसकी यादगार में वहां पर एक नया संवत् चला जिस-
को पुडुवैप्पु (पुडु=नई; वेपु=आबादी; मलयाळम् भाषा में) कहते हैं⁶. कोचीन राज्य और डच ईस्ट
इंडिया कंपनी के बीच जो संधि हुई वह तांबे के ५ पत्रों पर खुदी हुई मिली है जिसमें पुडुवेप्पु संवत्
३२२; १४ मीनम् (मीन संक्रांति का १४ वां दिन = ई. स. १६६३ तारीख २२ मार्च) लिखा है⁶.
यह संवत् कोचीन राज्य में कुछ कुछ चलता रहा परंतु अब उसका प्रचार पाया नहीं जाता.
२०-राज्याभिषेक संवत्.
राज्याभिषेक संवत्, जिसको दक्षिणी लोग 'राज्याभिषेक शक' या 'राजशक' कहते हैं,
मराठा राज्य के संस्थापक प्रसिद्ध शिवाजी के राज्याभिषेक के दिन अर्थात् गत शक संवत् १५६६
(गत चैत्रादि वि. सं. १७३१) आनंद संवत्सर ज्येष्ठ शुक्ला १३ (तारीख ६ जून ई. स. १६७४) से
१. ज. प; सो. बंगा; जि. ४७, भाग १, पृ. ३६८. २. क; इं. ई; पृ. ७६.
३. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ५. ४. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ६. ५. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २८-२६.
६. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २६.