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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 318 में से

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पृष्ठ 203

१७४ प्राचीनलिपिमला.
आश्विन शुक्ला १ १ से इसका प्रारंभ होना निश्चय किया है जिससे वर्तमान चेदि संवत् में
२४८-४६ २ जोड़ने से ईसवी सन्, और ३०५-६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् आता है.
इस संवत्‌वाला सब से पहिला लेख कलचुरि संवत् २४५ ३ ( ई. स. ४६४ ) का और अंतिम
६५८ ४ ( ई. स. १२०७) का मिला है, जिसके पीछे यह संवत् अस्त हो गया. इसके वर्ष बहुधा
वर्तमान ५ लिखे मिलते हैं.

१०—गुप्त संवत्.
इस संवत् के लिये शिलालेखादि में ‘गुप्तकाल’, ‘गुप्तवर्ष’ ६ आदि शब्द लिखे मिलते हैं जिस-
से पाया जाता है कि यह संवत् गुप्तवंशी किसी राजा ने चलाया हो. इस विषय का लिखित प्रमाण
तो अब तक नहीं मिला, परंतु समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के लेख में गुप्त वंश के पहिले दो राजाओं
(गुप्त और घटोत्कच ) के नामों के साथ केवल ‘महाराज’ ७ विरुद्ध और घटोत्कच के पुत्र चंद्रगुप्त
(पहिले) के नाम के साथ ‘महाराजाधिराज’ विरुद्ध लिखा रहने तथा चंद्रगुप्त (प्रथम) के पौत्र
और समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय के गुप्त सं. ८२ ८ से ६३ ९ तक के शिलालेखों १० के
मिलने से विद्वानों का यह अनुमान है कि गुप्तवंश में पहिले पहिल चंद्रगुप्त (पहिला) प्रतापी राजा हुआ
हो और उसके राज्य पाने के समय से यह संवत् चला हो. गुप्तों के पीछे काठियावाड़ में वलभी के

१. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५. पँ. इं; जि. २, पृ. २६६.
२ आश्विन शुक्ला १ से लगा कर माघ के प्रारंभ के आसपास तक अर्थात् जनवरी मास के लगने से पहिले के कुछ
महीनों में ही ई. स. और वर्तमान कलचुरि संवत् का अंतर २४८ रहता है बाकी अधिकतर महीनों में २४६ रहता है.
३. कन्हेरी से मिला हुआ ताम्रपत्र (केवंटेंपल्स ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८).
४. क; आ. स. रि; जि. २१, पृ. १०२, सेंट २७. ५. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५, टिप्पण ५.
६. संवत्सराणामधिके शते तु त्रिंशद्भिंरन्यैरपि षड्भिरेव । रात्रौ दिने प्रौष्ठपदस्य षष्ठे गुप्तप्रकाले गणनां विधाय ॥.......वर्षशतेष्टाविंशे
गुप्तानां काल....(गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चटान पर खुदे हुए स्कंदगुप्त के समय के लेख से. फ्ली; गु.
इं; पृ. ६०, ६१). मोरबी (काठियावाड़ में) से मिले हुए गुप्त संवत् ५८५ के दानपत्र में ‘पंचाशीत्या युतेतीते समानां
शतपंचके । गोप्ते ददावदो नृपः सोपरागार्कंमंडले’ (ई. ऐं; जि. २, पृ. २५८). वर्षशते गुप्तानां सचतुःपंचाशदुत्तरे भूमिम् । शासति कुमा-
रगुप्ते मासे ज्येष्ठे द्वितीयायाम् (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). गुप्तानां
समतिक्रांते सप्तपंचाशदुत्तरे । शते समानां पृथिवीं बुधगुप्ते प्रशासति (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का
लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६१ के दानपत्र में ‘एकनवत्युत्तरेब्दशते
गुप्तनृपराज्यभुक्तौ श्रीमति प्रवर्द्धमानमहाचैत्रसंव(त्)त्सरे माघमासबहुलपंचतुत्तीयायाम्’ (फ्ली; गु. इं; पृ. १०७) लिखा मिलता है,
और अलबेरूनी अपने मूल अरबी पुस्तक में गुप्तकाल, या ‘गुवितकाल’ (=गुप्तकाल) ही लिखता है (फ्ली; गु. इं;
भूमिका, पृ. २६, ३०).
७. ‘विरुद्ध’ महाराज’ का प्रयोग सामंत के लिये होता था. मेवाड़ के गुहिल राजा अपराजित के समय के वि. सं.
७१८ के लेख में उसको ‘राजा’ और उसके सेनापति वराहसिंह को ‘महाराज’ लिखा है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ३१), परंतु
कन्नौज के प्रतिहारों के दानपत्रों में यही विरुद्ध उन प्रबल स्वतंत्र राजाओं के नामों के साथ लगा हुआ भी मिलता है (इं. पैँ;
जि. १५, पृ. ११२, १४०; ऐं. इं; जि. ५, पृ. २११-१२).
८. फ्ली; गु. इं; पृ. २५. ९. फ्ली; गु. इं; पृ. ३१-३२.
१० चंद्रगुप्त (दूसरे) का सब से पिछला शिलालेख गुप्त संवत् ६३ का और उसके पुत्र कुमारगुप्त (पहिले) का
सब से पहिला शिलालेख गुप्त संवत् ६६ का मिला है, जिससे चंद्रगुप्त (दूसरे) के राज्य की समाप्ति गुप्त संवत् ६५ के आसपास
होनी चाहिये. गुप्त संवत् का प्रारंभ चंद्रगुप्त (पहिले) के राज्य पाने के समय से मानने से उन तीन राजाओं (चंद्रगुप्त,
समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त दूसरे) का राजत्वकाल करीब ६५ वर्ष मानना पड़ता है जो सरसरी तौर से देखनेवालों को अधिक
प्रतीत होगा परंतु तीन राजाओं के लिये वह समय अधिक नहीं है क्योंकि अकबर, जहांगीर और शाहजहां इन तीन बादशाहों
का राजत्वकाल १०२ (ई. स. १५५६-१६५८) वर्ष होता है.