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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 318 में से

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पृष्ठ 211

१८२ प्राचीनलिपिमला.
वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर ११३२ तथा ई. स. और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत्
का अंतर १०७५-७६ आता है अर्थात् वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् में १०७५-७६ मिलाने से
ई. स. बनता है.
कुर्तंकोटि से मिले हुए लेख में चालुक्य विक्रमवर्ष ७ दुंदुभि संवत्सर पौष शुक्ला ३ रवि वार
उत्तरायण संक्रांति और व्यतीपात लिखा है१. दक्षिणी बार्हस्पत्य गणना के अनुसार दुंदुभि संवत्सर
शक-सं. १००४ था; इससे भी गत शक संवत् और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर (१००४-
७ = ) ९९७ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
इस संवत् का प्रारंभ चैत्रशुक्ला १ से माना जाता है. यह संवत् अनुमान १०० वर्ष चल-
कर अस्त हो गया. इसका सब से पिछला लेख चालुक्य विक्रम संवत् ९४ का मिला है.

१७—सिंह संवत्.
यह संवत् किसने चलाया यह अब तक निश्चित रूप से मालूम नहीं हुआ. कर्नल जेम्स
टॉड ने इसका नाम 'शिवसिंह संवत्' लिखा है और इसको दीव बेट (काठियावाड़ के दक्षिण में)
के गोहिलों का चलाया हुआ बतलाया है२. इससे तो इस संवत् का प्रवर्तक गोहिल शिवसिंह
मानना पड़ता है. भावनगर के भूतपूर्व दीवान विजयशंकर गौरीशंकर ओझा ने लिखा है कि
'श्रीसिंह का नाम पोरबंदर के एक लेख में मिल आता है जिसमें उसको सौराष्ट्र का मंडलेश्वर
लिखा है, परंतु पीछे से उसने अधिक प्रबल हो कर विक्रम संवत् ११७० (ई. स. १११४) से अपने
नाम का संवत चलाया हो ऐसा मालूम होता है'३; परंतु पोरबंदर का वह लेख अब तक प्रसिद्धि में
नहीं आया जिससे मंडलेश्वर सिंह के विषय में कुछ भी कहा नहीं जा सकता.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी का कथन है कि 'संभवतः ई. स. १११३-१११४ (वि. सं.
११६९-७०) में [ चौलुक्य ] जयसिंह (सिद्धराज) ने सोरठ (दक्षिणी काठियावाड़) के
[राजा] खेंगार को विजय कर अपने विजय की यादगार में यह संवत् चलाया हो'४. परंतु यह
कथन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता क्यों कि प्रथम तो ई. स. १११३-१४ में ही जयसिंह के
खेंगार को विजय करने का कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि जयसिंह ने यह
संवत् चलाया होता तो इसका नाम 'जयसिंह संवत' होना चाहिये था न कि सिंह संवत
क्यों कि संवतों के साथ उनके प्रवर्तकों के पूरे नाम ही जुड़े रहते हैं. तीसरी बात यह है कि यदि
यह संवत् जयसिंह ने चलाया होता तो इसकी प्रवृत्ति के पीछे के उसके एवं उसके वंशजों के शिला-
लेखों तथा दानपत्रों में मुख्य संवत् यही होना चाहिये था परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि
यह संवत् जयसिंह का चलाया हुआ नहीं है. काठियावाड़ से बाहर इस संवत् का कहीं प्रचार
न ५ होना भी यही साबित करता है कि यह संवत् काठियावाड़ के सिंह नाम के किसी राजा ने

१. इं. ऐं.; जि. २२, पृ. १०६. २. इं. ऐं.; जि. ६, पृ. ६७-८.
३. कर्नल जेम्स टॉड का 'ट्रेव्हल्स इन् वेस्टर्न इंडिया', पृ. ५०६ और टिप्पण †.
४. 'भावनगर प्राचीन शोध संग्रह,' भाग १, पृ. ४-५ (गुजराती) ; अंग्रेज़ी अनुवाद, पृ. २-३.
५. बंब. गै.; जि. १, भाग १, पृ. १७६.
६. गुजरात के चौलुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव के दानपत्र में, जिसमें कच्छ मंडल (कच्छ राज्य) के सहस्रचाण
गांव की कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, केवल 'संवत् ९३' लिखा है जिसको उसके संपादक डॉ. फ़्लीट ने सिंह संवत्
अनुमान कर उक्त दानपत्र को विक्रम संवत् १२६२ या १२६३ का माना और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) का, जिसने वि. सं.
१२३५ से १२९८ तक राज्य किया था, ठहरा दिया (इं. ऐं.; जि. १८, पृ. १०८-६); परंतु ऐसा करने में उक्त विद्वान् ने धोखा खाया
है क्योंकि न तो वह दानपत्र भीमदेव (दूसरे) का है और न उसका संवत ९३ सिंह संवत् है जैसा कि माना गया है. वास्तव
में वह दानपत्र चौलुक्य (सोलंकी) भीमदेव (पहिले) का है और उसका संवत् वि. सं. १०६३ है परंतु शताब्दियों के अंक