प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
परिशिष्ट.
भारतीय संवत् १.
भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों में समय समय पर भिन्न भिन्न संवत् चलते रहे जिनके प्रारंभ
आदि का हाल जानना प्राचीन शोध के अभ्यासियों के लिये आवश्यक है, इस लिये उनका संक्षेप
से विवेचन किया जाता है.
१- सप्तर्षि २ संवत्.
सप्तर्षि संवत् को लौकिककाल, लौकिक संवत् ३, शास्त्र संवत् ४, पहाड़ी संवत् ५ या कच्चा
संवत् ६ भी कहते हैं. यह संवत् २७०० वर्ष का कल्पित चक्र है जिसके विषय में यह मान लिया
गया है कि सप्तर्षि नाम के सात तारे अश्विनी से रेवती पर्यंत २७ नक्षत्रों में से प्रत्येक पर
क्रमशः सौ सौ वर्ष तक रहते हैं ७. २७०० वर्ष में एक चक्र पूरा हो कर दूसरे चक्र का
प्रारंभ होता है. जहां जहां यह संवत् प्रचलित रहा या है वहां नक्षत्र का नाम नहीं
लिखा जाता, केवल १ से १०० तक के वर्ष लिखे जाते हैं. १०० वर्ष पूरे होने पर शताब्द्दी का
अंक छोड़ कर फिर एक से प्रारंभ करते हैं. कश्मीर के पंचांग ८ तथा कितने एक पुस्तकों ९ में
कभी कभी प्रारंभ से भी वर्ष लिखे हुए मिलते हैं. कश्मीरवाले इस संवत् का प्रारंभ कलियुग
१. 'संवत्' शब्द 'संवत्सर' शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ 'वर्ष' है. कभी कभी इसके और भी संक्षिप्त
रूप 'संव', 'सं,' या 'स्व' और 'स' (प्राकृत लेखों में) मिलते हैं. संवत् शब्द को कोई कोई विक्रम संवत् का ही सूचक
मानते हैं परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह शब्द केवल 'वर्ष' का सूचक होने से विक्रम संवत्, गुप्त संवत् आदि प्रत्येक
संवत् के लिये आता है और कभी कभी इसके पूर्व उक्त संवतों के नाम भी (विक्रम संवत्, वलभी संवत् आदि) लिखे
मिलते हैं. इसके स्थान में वर्ष, अब्द, काल, शक आदि इसी अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग होता है.
२. सप्तर्षि नामक ७ तारों की कल्पित गति के साथ इसका संबंध माना गया है जिससे इसको 'सप्तर्षि संवत्'
कहते हैं.
३. कश्मीर आदि में शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर ऊपर के वर्षों के अंक लिखने का लोगों में प्रचार होने के
कारण इसको 'लौकिक संवत्' या 'लौकिक काल' कहते हैं.
४. विद्वानों के शास्त्रसंबंधी ग्रंथों तथा ज्योतिःशास्त्र के पंचांगों में इसके लिखने का प्रचार होने से ही इसको
शास्त्र संवत् कहते हैं.
५. कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी प्रदेश में प्रचलित होने से इसको पहाड़ी संवत् कहते हैं.
६. इस संवत् के लिखने में शताब्दियों को छोड़ कर ऊपर के ही वर्ष लिखे जाने से इसे कच्चा संवत् कहते हैं.
७. एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते (मुनयः) चरन्ति वर्षाणाम् (वाराही संहिता, अध्याय १३, श्लोक ४). सप्तर्षीणां तु यौ
पूर्वी दृश्येते उदितौ दिवि । तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते तत्समं निशि ॥ तेनैत ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् (भागवत, स्कंध १२,
अध्याय २, श्लोक २७-२८. विष्णुपुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५३-५४). पुराण और ज्योतिष के संहिताग्रंथों में
सप्तर्षियों की इस प्रकार की गति लिखी है वह कल्पित है. 'सिद्धांततत्वविवेक' का कर्त्ता कमलाकर भट्ट भी ऐसी गति को
स्वीकार नहीं करता (अद्यापि कैरपि नरैर्गतिराश्चर्यैर्द्दृष्टा न यात्र कथिता किल संहितासु । तत्काव्यमेव हि पुराणवदत्र तज्ज्ञास्तेनैव तत्व-
विषयं गदितुं प्रवृत्ताः ॥ (सिद्धांततत्वविवेक, भग्रहयुत्यधिकार, श्लोक ३२).
८. श्रीसप्तर्षिचारानुमतेन संवत् ४९६६ तथा च संवत् ६६ चैत्रसुति १ श्रीशाकाः १७१५ करणागताब्दा(ब्दाः) १०२८ दिनगणाः
४१२०१० श्रीविक्रमादित्यसंवत् १८५० कल्पगताब्दा(ब्दाः) १९७२९४८८६४ शेषाब्दा(ब्दाः) २३४७०५११३६....कलौ गतवर्षाणि
४८९४ शेषवर्षाणि ४२७१०६ (विक्रम संवत् १८५० का पंचांग, इं. ऐ.; जि. २०, पृ. १५०).
९. सप्तर्षिः(र्षि)संवत् ४६५१ आ[१]श्व[यु]जकृष्णसप्तमी मंगलं(ल)वासरं(रे) (हस्तलिखित 'ध्वन्यालोक'; इं. ऐ.; जि. २०,
पृ. १५१).
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के २५ वर्ष पूरे होने पर १ (२६ वें वर्ष से) मानने हैं परंतु पुराण तथा ज्योतिष के ग्रंथों में इस
का प्रचार कलियुग के पहिले से होना माना गया है २.
(अ). 'राजतरंगिणी' में कल्हण पंडित लिखता है कि 'इस समय लौकिक [संवत्] के
२४ वें (वर्तमान) वर्ष में शक संवत् के १०७० वर्ष बीत चुके हैं' ३. इस हिसाब से वर्तमान ४
लौकिक संवत् और गत शक संवत् के बीच का अंतर (१०७०-२४=) १०४६=४६ है. अर्थात्
शताब्दी के अंकराहित सप्तर्षि संवत् में ४६ जोड़ने से शताब्दीरहित शक (गत), ८१ जोड़ने से
चैत्रादि विक्रम (गत), २५ जोड़ने से कलियुग (गत) और २४ या २५ जोड़ने से ई. स. (वर्तमान)
आता है.
(आ). चंबा से मिले हुए एक लेख में विक्रम संवत् (गत) १७१७, शक संवत् १५८२
(गत) और शास्त्र संवत् ३६ वैशाख वति (वदि) ५ १३ बुधवार ६ लिखा है. इससे भी वर्तमान
शास्त्र संवत् और [गत] विक्रम संवत् (१७१७-३६=१६८१=८१) तथा शक संवत् (१५८२-३६=
१५४६=४६) के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार ही आता है.
(इ). पूना के दक्षिण कॉलेज के पुस्तकालय में शारदा (कश्मीरी) लिपि का 'काशि-
कावृत्ति' पुस्तक है जिसमें गत विक्रम संवत् १७१७ और सप्तर्षि संवत् ३६ पौष वति (वदि)
१. कालेर्गतेः सायकनेत्र(२५)वर्षैः सप्तर्षिवर्यास्त्रिदिवं प्रयाताः । लोके हि संवत्सरपत्रिकायां सप्तर्षिमानं प्रवदन्ति सन्तः ॥ (डॉ.
वूलर की कश्मीर की रिपोर्ट; पृ. ६०).
२. क; इं; ई; पृ. ४.
३. लौकिकाब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः (राजतरंगिणी, तरंग १, श्लोक ५२).
४. सप्तर्षि संवत् के वर्ष वर्तमान और कलियुग, विक्रम तथा शक संवतों के वर्ष पंचांगों में गत लिखे रहते हैं.
ता० १२ एप्रिल ई. स. १९१८ को जो चैत्रादि विक्रम संवत् १९७५ और शक संवत् १८४० प्रवेश हुआ उसको लोग वर्तमान
मानते हैं. परंतु ज्योतिष के हिसाब से वह गत है, न कि वर्तमान. मद्रास इहाते के दक्षिणी विभाग में अबतक शक संवत्
के वर्तमान वर्ष लिखे जाते हैं तो वहां का वर्ष बंबई इहाते तथा उत्तरी भारतवर्ष के पंचांगों के शक संवत् से एक वर्ष आगे
रहता है.
५. 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव
में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों
के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में
संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त
रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १४६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या
'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब';
'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त
रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल'
के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को मिला कर लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से)
बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और
'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख
खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५.
ई. पं; जि. १६, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही
उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि
पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'बदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप-
र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे
कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्ठिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत
रूप) का 'उ०' (इं. पं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है
और कहीं नहीं भी.
६. श्रीमन्नृपतिविक्रमादित्यसंवत्सरे १७१७ श्रीशालिवाहनशके १५८२ श्रीशास्त्रसंवत्सरे ३६ वैशाष(ख)वदि त्रयोदश्यां दु(बु)धवासरे
मेषेर्कसंक्रान्तौ (इं. पं; जि. २०, पृ. १५२ ).
भारतीय संवत् . १६१
३ रवि वार और तिष्य ( पुष्य ) नक्षत्र लिखा है. १ इससे भी सप्तर्षि और विक्रम संवत् के बीच का
अंतर ऊपर लिखे अनुसार ( १७१७-३६ = १६८१ = ८१ ) ही आता है.
सप्तर्षि संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है और इसके महीने पूर्णिमांत हैं. इस
संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान २ ही लिखे जाते हैं. प्राचीन काल में इस संवत् का प्रचार कश्मीर
और पंजाब में था परंतु अब कश्मीर तथा उसके आस पास के पहाड़ी इलाकों में ही, विशेष कर
ज्योतिषियों में, रह गया है.
२-कलियुग ३ संवत्.
कलियुग संवत् को भारतयुद्ध संवत् और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं. इस संवत् का विशेष
उपयोग ज्योतिष के ग्रंथों तथा पंचांगों में होता है तो भी शिलालेखादि में भी कभी कभी इसमें
दिये हुए वर्ष मिलते हैं ४. इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ३१०२ तारीख १८ फरवरी के प्रातःकाल से
माना जाता है. चैत्रादि विक्रम संवत् १९७२ ( गत ) और शक संवत् १८४० ( गत ) के पंचांग में गत
कलि ५०१६ लिखा है. इस हिसाब से चैत्रादि गत विक्रम संवत् में ( ५०१६-१९७२ = ) ३०४४,
गत शक संवत् में ( ५०१६-१८४० = ) ३१७६, और ई. स. में ३१०१ जोड़ने से गत कलियुग संवत्
आता है.
दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशि ( दूसरे ) के समय के, एहोले की पहाड़ी पर के
जैन मंदिर के शिलालेख में भारतयुद्ध से ३७३५ और शक राजाओं ( शक संवत् ) के ५५६ वर्ष
बीतने पर उक्त मंदिर का बनना बतलाया है ५. उक्त लेख के अनुसार भारत के युद्ध ( भारत-
युद्ध संवत् ) और शक संवत् के बीच का अंतर ( ३७३५-५५६ = ) ३१७९ वर्ष आता है. ठीक यही
अंतर कलियुग संवत् और शक संवत् के बीच होना ऊपर बतलाया गया है, अतएव उक्त लेख के
अनुसार कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् एक ही हैं. भारत के युद्ध में विजयपाने से राजा युधि-
ष्ठिर को राज्य मिला था जिससे इस संवत् को युधिष्ठर संवत् ६ भी कहते हैं. पुराणों में कलियुग का
१. श्रीनृपविक्रमादित्यराज्यस्य गताब्दाः १७१७ श्रीसप्तर्षिमते संवत् ३६ पौ [व]ति ३ रवौ तिष्यनक्षत्रे ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५२ ).
२. कभी कभी गत वर्ष भी लिखे मिलते हैं, जैसे कि कय्यटरचित 'देवीशतक' की टीका के अंत में यह श्लोक है-
वसुमुनिगगनोदधिसमकाले याते कलेस्तथा लोके ।
द्वापञ्चाशे वर्षे रचितेयं भीमगुप्तनृपे ॥ ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५४ ).
यहां पर गत कलियुग संवत् ४०७८ और लौकिक संवत् ५२ दिया है जो गत है ('याते' दोनों के साथ लगता है)
क्योंकि वर्तमान ५३ में ही गत कलियुग संवत् ४०७८ आता है. परंतु ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
३. हिंदुओं की कालगणना के अनुसार कलियुग एक महायुग का १० वां अंश मात्र है. महायुग में ४ युग माने जाते हैं
जिनको कृत, त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं. कलियुग ४३२००० वर्ष का, द्वापर उससे दुगुना अर्थात् ८६४००० वर्ष का,
त्रेता तिगुना अर्थात् १२९६००० वर्ष का और कृत चौगुना अर्थात् १७२८००० वर्ष का माना जाता है. इस प्रकार एक
महायुग, जिसको चतुर्युगी भी कहते हैं, कलियुग से १० गुना अर्थात् ४३२०००० वर्ष का माना जाता है. ऐसे ७१ महायुग
का एक मन्वंतर कहलाता है. १४ मन्वंतर और ६ महायुग अर्थात् १००० महायुग (=४३२००००००० वर्ष ) को एक कल्प
या ब्रह्मा का दिन कहते हैं और उतने ही वर्षों की रात्री भी मानी गई है.
४. अष्टाचत्वारिंशदधिकत्रिशतो [त्त] रेषु चतुःसहस्रेषु कलियुगसंवत्सरेषु परावृत्तेषु सत्सु । स्वराज्यानुभवकाले पंचमे साधारणसंवत्सरे
( गोवा के कदंबवंशी राजा शिवचित्त [ षष्ठदेव दूसरे ] के समय के दानपत्र से. इं. ऍ; जि. १४, पृ. २९० ).
५. त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः [ । ] सप्ताब्दशतयुक्तेषु श(ग)तेष्वब्देषु पंचसु [ ॥ ] पंचाशत्सु कलौ काले षट्सु पंचशतासु
च [ । ] समासु समतीतासु शकानामापि भूभुजाम् ( ऍ. ई.; जि. ६, पृ. ७ ).
६. डॉ० कीलहॉर्न संगृहीत दक्षिण के लेखों की सूची, पृ. १६२, लेखसंख्या १०१७.
१६२ प्राचीनलिपियाला.
प्रारंभ कृष्ण के स्वर्गारोहण १ से अर्थात् भारत के युद्ध के पीछे माना है परंतु उसको पिछले विद्वानों
ने स्वीकार नहीं किया. वराहमिहिर लिखता है कि युधिष्ठिर के राज्यसमय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर
थे और उस राजा का शककाल ( संवत् ) २५२६ वर्ष रहा २ अर्थात् उसके संवत् के २५२६ वर्ष बीतने
पर शक संवत् चला. इससे महाभारत के युद्ध का द्वापर के अंत में नहीं किंतु कलियुग संवत् के
(३१७६-२५२६=) ६५३ वर्ष व्यतीत होने पर होना मानना पड़ता है. कल्हण पंडित कश्मीर के
राजाओं के राज्यसमय के विषय में लिखते हुए कहता है कि 'द्वापर के अंत में भारत [ युद्ध ] हुआ
इस दंतकथा से विमोहित हो कर कितने एक [विद्वानों] ने इन राजाओं का राज्यकाल गलत मान
लिया है.......जब कलि के ६५३ वर्ष व्यतीत हुए तब कुरुपांडव हुए ३' अर्थात् भारत का युद्ध हुआ.
यह कथन वराहमिहिर के उपर्युक्त कथन के अनुसार ही है.
पुराणों में परीक्षित के जन्म ४ ( महाभारत के युद्ध) से लगा कर महापद्म (नंद) के राज्या-
भिषेक तक १०५० ५ वर्ष होना भी लिखा मिलता है. महापद्म (नंद) के वंश का राज्य १०० वर्ष
तक रहा जिसके पीछे मौर्य चंद्रगुप्त ने राज्य पाया. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक ई. स. पूर्व ३२१ के
आसपास होना निश्चित है अतएव पुराणों के उपर्युक्त कथनानुसार भारत युद्ध का ई. स. पूर्व
(३२१+१००+१०५०=) १४७१ के आस पास होना मानना पड़ता है. पुराणों में दी हुई भारत के
युद्ध से लगा कर महापद्म (नंद) तक की वंशावलियों में मिलनेवाली राजाओं की संख्या ६ देखते
हुए भी यह समय ठीक प्रतीत होता है.
१. यदैव भगवद्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैव कलिरागतः (विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५५).
विष्णुर्भगवतो भानुः कृष्णाख्योऽसौ दिवं गतः । तदा विशत्कलिर्लोकं पाप यद्रमते जनः (भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २६.)
महाभारत से पाया जाता है कि पांडवों ने विजयी होने के बाद १५ वर्ष तक तो राजा (धृतराष्ट्र) की आज्ञा के अनुसार
सब कार्य किया. फिर भीम के वाग्बाण से खिन्न हो कर राजा विरक्त हुआ तब युधिष्ठिर स्वतंत्र राजा बना. फिर ३६ वें वर्ष
कृष्ण और यादवों के स्वर्गवास की खबर आई तब परीक्षित को राज्यसिंहासन पर बिठाला कर पांडवों ने द्रोपदी सहित
महाप्रस्थान किया' (इं. पं; जि. ४०, पृ. १६३-६४). इस हिसाब से तो कृष्ण का स्वर्गारोहण, पांडवों का महाप्रस्थान, एवं
पुराणों का कलियुग का प्रारंभ भारतयुद्ध से (१५+३६=) ५१ वर्ष बाद होना चाहिये.
२. आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य (वाराही संहिता, सप्त-
र्षिचार, श्लोक ३).
३. भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसङ्ख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४८ ॥....॥ शतेषु षट्सु सार्द्धेषु त्र्यधि-
केषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन्कुरुपांडवाः ॥ ५१ ॥ (राजतरंगिणी, तरंग १).
४. भारत का युद्ध हुआ उस समय परीक्षित गर्भ में था इसलिये उसका जन्म भारत के युद्ध की समाप्ति से कुछ ही
महीनों बाद हुआ होगा.
५. महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरं (मत्स्यपुराण, अध्याय २७३, श्लोक ३६. वायु-
पुराण, अ. ६६, श्लो. ४१५. ब्रह्मांडपुराण, मध्यम भाग, उपोद्घात पाद ३, अ. ७४, श्लो. २२७). यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषे-
चनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचदशोत्तरं (विष्णुपुराण, अंश ४, अ. २४, श्लो. ३२). आरभ्य भवतो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्ष-
सहस्रं तु शतं पंचदशोत्तरम् (भागवत, स्कंध १२, अ. २, श्लो. २६). इस प्रकार परीक्षित के जन्म से लगा कर महापद्म (नंद)
के राज्याभिषेक तक के वर्षों की संख्या मत्स्य, वायु और ब्रह्मांडपुराण में १०५०, विष्णु में १०१५ और भागवत में १११५ दी है.
अधिकतर पुराणों में १०५० ही है जिसको हमने स्वीकार किया है.
६. चंद्रवंशी अजमीढ के पुत्र ऋक्ष का वंशज और जरासंध का पुत्र सहदेव भारत के युद्ध में मारा गया. फिर उसका
पुत्र (या उत्तराधिकारी) सोमाधि (सोमापि) गिरिव्रज का राजा हुआ जिसके पीछे २१ और राजा हुए. ये २२* राजा
बार्हद्रथवंशी कहलाये. इस वंश के अंतिम राजा रिपुंजय को मार कर उसके मंत्री शौनक (पुलिक) ने अपने पुत्र प्रद्योत को
राजा बनाया. प्रद्योत के वंश में ५ राजा हुए जिनके पीछे शिशुनाग वंश के १० राजा हुए. जिनमें से १०वें राजा महानंदी का
- ब्रह्मांडपुराण में बार्हद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ और मत्स्य तथा वायु में ३२ दी है. विष्णु और भागवत में
संख्या नहीं दी. किसी पुराण में २२ से अधिक राजाओं की नामावली नहीं मिलती इसीसे हमने बार्हद्रथवंशी राजाओं की
संख्या २२ मानी है.
भारतीय संवत्. १६३
'भारत युद्ध के समयसंबंधी ऊपर उद्धृत किये हुए भिन्न भिन्न मतों' पर से यही कहा जा
सकता है कि पहिले के कितने एक लेखकों ने कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् को एक माना है
परंतु भारत का युद्ध कलियुग के प्रारंभ में नहीं हुआ.
३-वीरनिर्वाण संवत्.
जैनों के अंतिम तीर्थंकर महावीर (वीर, वर्द्धमान) के निर्वाण (मोक्ष) से जो संवत् माना
जाता है उसको 'वीरनिर्वाण संवत्' कहते हैं. उसका प्रचार बहुधा जैन ग्रंथों में मिलता है तो
भी कभी कभी उसमें दिये हुए वर्ष शिलालेखों में भी मिल आते हैं.
(अ) श्वेतांबर मेरुतुंगसूरि ने अपने 'विचारश्रेणि' नामक पुस्तक में वीरनिर्वाण संवत् और
विक्रम संवत् के बीच का अंतर ४७० दिया है १. इस हिसाब से विक्रम संवत् में ४७०, शक संवत् में
६०५ और ई. स. में ५२७ मिलाने से वीरनिर्वाण संवत् आता है.
(आ) श्वेतांबर अंबदेव उपाध्याय के शिष्य नेमिचंद्राचार्य रचित 'महावीरचरियं' नामक प्राकृत
काव्य में लिखा है कि 'मेरे (महावीर के) निर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बीतने पर शक
राजा उत्पन्न होगा २. इससे भी वीरनिर्वाण संवत् और शक संवत् के बीच ठीक वही अंतर आता
है जो ऊपर लिखा गया है.
(इ) दिगंबर संप्रदाय के नेमिचंद्र रचित 'त्रिलोकसार' नामक पुस्तक में भी वीरनिर्वाण से
६०५ वर्ष और ५ महीने बाद शक राजा का होना लिखा है ३. इससे पाया जाता है कि दिगंबर
संप्रदाय के जैनों में भी पहिले वीरनिर्वाण और शक संवत् के बीच ६०५ वर्ष का अंतर होना स्वीकार
किया जाता था जैसा कि श्वेतांबर संप्रदायवाले मानते हैं, परंतु 'त्रिलोकसार' के टीकाकार माधव-
चंद्र ने त्रिलोकसार में लिखे हुए 'शक' राजा को भूल से 'विक्रम'४ मान लिया जिससे कितने एक
पिछले दिगंबर जैन लेखकों ने विक्रम संवत् से ६०५ ५ (शक संवत् से ७४०) वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण
होना मान लिया जो ठीक नहीं है. दिगंबर जैन लेखकों ने कहीं शक संवत् से ४६१, कहीं ६७६५
और कहीं १४७६३ ६ वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना भी लिखा है परंतु ये मत स्वीकार योग्य नहीं हैं.
पुत्र महापद्म (नंद) था. इस गणना के अनुसार महाभारत के युद्ध से लगा कर महापद्म की गद्दीनशीनी तक ३७ राजा
होते हैं जिनके लिये १०५० वर्ष का समय कम नहीं किंतु अधिक ही है क्योंकि औसत हिसाब से प्रत्येक राजा का राजत्व-
काल २८ वर्ष से कुछ अधिक ही आता है.
१. विक्रमरज्जारंभा परउ सिरिवीरनिव्वुई भणिया । सुन्न मुणिवेअयजुतो विक्रमकालउ जिणकालो ॥ विक्रमकालाज्जिनस्य वीरस्य कालो
जिनकालः शून्यमुनिबेदयुक्तः चत्वारिशतानि सप्तत्यधिकवर्षारिण श्रीमन्महावीरविक्रमादित्ययोरंतरमित्यर्थः (विचारश्रेणि). यह पुस्तक ई. स.
१३१० के आसपास बना था.
२. छहैं वासाणासएहिं पंचहिं वासेहिं पंचमासेहिं। मम निव्वुगोगयस्स उ उप्पज्जिस्सइ सगो राया ॥ (महावीरचरियं). यह पुस्तक
वि. सं. ११४१ (ई. स. १०८४) में बना था.
३. पणछस्सयवस्सं पंचामासजुदं गमित्र वीरनिव्वुइदो सगराजो० (त्रिलोकसार, श्लो. ८३८). यह पुस्तक वि. सं. की ११ वीं
शताब्दी में बना था. हरिवंशपुराण में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष बीतने पर शक राजा का होना लिखा है और मेघर्नादि
के श्रावकाचार में भी ऐसा ही लिखा है (इं. पूँ; जि. १२ पृ. २२).
४. श्रीवीरनाथनिर्वृत्तेः सकाशात् पञ्चोत्तरषट्छतवर्षाणि पञ्चमासयुतानि गत्वा पश्चात् विक्रमाङ्कशकराजोऽजायत (त्रिलोकसार के उप-
र्युक्त श्लोक की टीका).
५. दिगंबर जैनों के प्रसिद्ध तीर्थस्थान श्रवणबेल्गोला के एक लेख में वर्धमान(वीर) निर्वाण संवत् २४६३ में विक्रम
संवत् १८८८ और शक संवत् १७५२ होना लिखा है जिसमें वीरनिर्वाण संवत् और विक्रम संवत् का अंतर ६०५ आता है
(इं. एँ; जि. २५, पृ. ३४६). इस अशुद्धि का कारण माधवचंद्र की अशुद्ध गणना का अनुसरण करना ही हो.
६. वीरजिणं सिद्धिगदे चउसदइगिसडिवासपरिमाणो। कालंमि अदिक्कंतें उप्पणो एत्थ सगराओ ॥ अथवा वीरे सिद्धे सहस्सणवक्कंमि
सग(त)सयभहिये । पणसीदिंमि येतादे पचामासे सगशिओ जादा (पाठान्तरं) ॥ चोद्दससहस्ससग (त) सयतेणउदीवासकालविच्छेदे । वीरेसर-
१६४ प्राचीनलिपिमाला.
४-बुद्धनिर्वाण संवत्.
बौद्धों में बुद्ध (शाक्यमुनि) के निर्वाण से जो संवत् माना जाता है उसको 'बुद्धनिर्वाण
संवत्' कहते हैं. यह बौद्ध ग्रंथों में लिखा मिलता है और कभी कभी शिलालेखों १ में भी. बुद्ध का
निर्वाण किस वर्ष में हुआ इसका यथार्थ निर्णय अब तक नहीं हुआ. सीलोन २ (सिंहलद्वीप, लंका),
ब्रह्मा और स्याम में बुद्ध का निर्वाण ई. स. से ५४४ वर्ष पूर्व होना माना जाता है और ऐसा ही आसाम
के राजगुरु मानते हैं ३. चीनवाले ई. स. पूर्व ६३८ में उसका होना मानते हैं. ४ चीनी यात्री फाहियान
ने, जो ई. स. ४०० में यहां आया था, लिखा है कि इस समय तक निर्वाण से १४६७ वर्ष व्यतीत हुए हैं ४.
इससे बुद्ध के निर्वाण का समय ई. स. पूर्व (१४६७-४००=) १०६७ के आस पास मानना पड़ता
है. चीनी यात्री हुएन्ट्सांग ने निर्वाण से १०० वें वर्ष में राजा अशोक (ई. स. पूर्व २६६ से २२७
तक) का राज्य दूर दूर फैलना बतलाया है ५. जिससे निर्वाणकाल ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के
बीच आता है. डॉ. बूलर ने ई. स. पूर्व ४८३-२ और ४७२-१ के बीच ६, प्रोफ़ेसर कर्न ७ ने ई. स.
पूर्व ३८८ में, फ़र्गसन ° ने ४८१ में, जनरल कनिंगहाम् ने ८ ४७८ में, मॅक्समूलर ९ ने ४७७ में,
पंडित भगवानलाल इंद्री ने १० ६३८ में (गया के लेख के आधार पर), मिस् डफ़ने ११ ४७७ में,
डॉ. बार्नेट ने १२ ४८३ में, डॉ. फ्लीट ने १३ ४८२ में और वी. ए. स्मिथ १४ ने ई. स. पूर्व ४८७ या ४८६ में
निर्वाण होना अनुमान किया है. बुद्धनिर्वाण संवत्वाले अधिक लेख न मिलने तथा विद्वानों में
इसके प्रारंभ के विषय में मतभेद होने पर भी अभी तो इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ४८७ के आस
पास होना स्वीकार करना ठीक जचता है, परंतु वही निश्चित है ऐसा नहीं कहा जा सकता.
५-मौर्य संवत्.
उदयगिरि (उडीसे में कटक के निकट) की हाथी गुंफा में जैन राजा खारवेल (महामेघवाहन)
का एक लेख है जो मौर्य संवत् (मुरियकाल) १६५ का है १५. उक्त लेख को छोड़ कर और कहीं
सिद्धीदो उप्पणगो सगणिओ अहवा (पाठान्तरं) ॥ (त्रिलोकप्रज्ञप्ति-देखो, 'जैनहितैषी मासिक पत्र', भाग १३, अंक १२, दिसंबर
१६१७, पृ. ५३३).
१. भगवति परिनिर्वृते सम्वत् १८१३ कार्तिकवदि १ बुधे (गया का लेख. इं. पैं; जि. १०, पृ. ३४३).
२. कॉर्पस् इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् (जनरल् कनिंगहाम संपादित), जि. १, भूमिका, पृ. ३.
३. प्रि; पैं; जि. २, यूसफुल् टेवल्स, पृ. १६४. ४. बी; बु. रे. वे. व; जि. १ की भूमिका, पृ. ७५.
५. बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५०. ६. इं. पैं; जि. ६, पृ. १४७. ७. साइक्लोपीडिआ ऑफ़ इंडिया, जि. १, पृ. ४६२.
८. कॉर्पस इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् जि. १ की भूमिका, पृ. ६. ९. मॅ; हि. ए. सं. लि; पृ. २६८.
१०. इं. पैं; जि. १०, पृ. ३४६. ११. ड; क्रॉ. ई; पृ. ६.
१२. बा; पैं. ई; पृ. ३७. १३. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८०६, पृ. ६६७.
१४. स्मि; आ. हि. इं; पृ. ४७ (तीसरा संस्करण).
१५. पनंतरीयसठिवससते राजमुरियकाले वोछिन्ने च चोयठअग्रसतिकुतरियं (पंडित भगवानलाल इंद्री संपादित 'दी हाथी
गुफा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स). डॉक्टर स्टैन कॉनो ने ई. स. १६०५-६ की आर्किआलाजिकल सर्वे की रिपोर्ट में
लिखा है कि 'इस वर्ष कलिंग के राजा खारवेल के प्रसिद्ध हाथी गुंफा के लेख की नकल (प्रतिकृति) तय्यार की गई...
वह लेख मौर्य संवत् १६५ का है' (पृ. १६६). उक्त पुस्तक की समालोचना करते हुए डॉक्टर फ्लीट ने उक्त लेख के संवत्
संबंधी अंश के विषय में लिखा कि 'उक्त लेख में कोई संवत् नहीं है किंतु वह यह बतलाता है कि खारवेल ने कुछ मूल
पुस्तक और ६४ वें अध्याय अथवा [जैनों के] सात अंगों के किसी अन्य विभाग का पुनरुद्धार किया, जो मौर्य काल से
उच्छिन्न हो रहा था' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१०, पृ. २४३-४४). डॉ. फ्लीट के इस कथनानुसार प्रो. लूडर (ऐं. इं; जि.
१०, ब्राह्मी लेखों की सूची, पृ. १६१) और वी. ए. स्मिथ ने (स्मि; आ. हि. इं; पृ. २०७, टि. २) उक्त लेख में कोई संवत् न
होना मान लिया है, परंतु थोड़े ही समय पूर्व पश्चिमी भारत के आर्किआलॉजिकल् विभाग के विद्वान् सुपरिंटेंडेंट राखाल-
दास बेनर्जी ने उक्त लेख को फिर प्रसिद्ध करने के लिये उसकी प्रतिकृति तय्यार कर पढ़ा है. उनके कथन से पाया गया
कि उसमें मौर्य संवत् १६५ होना निर्विवाद है. ऐसी दशा में डा. फ्लीट आदि का कथन ठीक नहीं कहा जा सकता.
भारतीय संवत्. १६५
इस संवत् का उल्लेख १ नहीं मिलता. नंद वंश को नष्ट कर राजा चंद्रगुप्त ने ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास
मौर्य राज्य की स्थापना की थी अत एवं अनुमान होता है कि यह संवत् उसी घटना से चला हो.
यदि यह अनुमान ठीक हो तो इस संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास होना चाहिये.
६—सेल्युकिवि संवत्.
ई. स. पूर्व ३२३ में यूनान के बादशाह सिकंदर ( अलेक्जेंडर ) का देहांत होने पर उसके
सेनापति राज्य के लिये आपस में लड़ते रहे. अंत में तीन राज्य मकदूनिआ (मसिडानिआ,
ग्रीस में ), मिसर और सीरिआ ( बाबीलन् ) कायम हुए. सीरिआ का स्वामी सेल्युकस् निकाटोर
बना जिसके अधीन बाक्ट्रिआ आदि एशिया के पूर्वी देश भी रहे. सेल्युकस् के राज्य पाने के
समय अर्थात् ता. १ अक्टोबर ई. स. पूर्व ३१२ से उसका संवत् (सन्) चला जो बाक्ट्रिआ में
भी प्रचलित हुआ. हिंदुस्तान के काबुल तथा पंजाब आदि हिस्सों पर बाक्ट्रिआ के ग्रीकों (यूना-
नियों) का आधिपत्य होने के बाद उक्त संवत् का प्रचार भारतवर्ष के उन हिस्सों में कुछ कुछ
हुआ हो यह संभव है. यद्यपि अब तक कोई ऐसा लेख नहीं मिला कि जिसमें इस संवत् का
लिखा जाना निश्चयात्मक माना जा सके तो भी इस संवत् के साथ लिखे जानेवाले मसीडोनि-
अन् (यूनानी) महीने २ शक तथा कुशन वंशियों के समय के कितने एक खरोष्ठी लेखों में
मिल आते हैं. जिन लेखों में ये विदेशी महीने मिले हैं वे विदेशियों के खुदवाये हुए हैं. उनमें
दिये हुए वर्ष किस संवत् के हैं इसका अब तक ठीक निर्णय नहीं हुआ तो भी संभव है कि जो लोग
विदेशी मसीडोनिअन् (यूनानी) महीने लिखते थे वे संवत् भी विदेशी ही लिखते होंगे चाहे वह सेल्यु-
किडि (शताब्दियों के अंकसहित), पार्थिअन् ३ या कोई अन्य (शक) संवत् हो.
७—विक्रम संवत्.
विक्रम संवत् को मालव संवत् (मालव काल ४) भी कहते हैं. इसके संबंध में यह प्रसिद्धि चली
आती है कि मालवा के राजा विक्रम या विक्रमादित्य ने शकों का पराजय कर अपने नाम का संवत्
चलाया. धौलपुर से मिले हुए चाहमान (चौहान) चंडमहासेन के विक्रम संवत् ८६८ (ई. स. ८४१)
१. लोरिअन् तंगाई (स्वात ज़िले में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर खुदे हुए सं. ३१८ के खरोष्ठी लेख
(स ३१८ प्रोठवदस दि २७....आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, पृ. २५१) तथा हश्तनगर (पुष्कलावती) से मिली हुई बुद्ध की
(अपने शिष्यों सहित) मूर्ति के आसन पर खुदे सं. ३८४ (सं ३८४ प्रोठवदस मसस दिवसंमि पंचमि ५—ऍ. इं; जि. १२, पृ.
३०२) के लेख में दिया हुआ संवत् कौनसा है यह अनिश्चित है. संभव है कि उनका संवत् मौर्य संवत् हो.
२. मसीडोनिअन् महीनों के नाम क्रमशः हाइपर्बेरेटिअस् (Hyperberetæus), डिअस् (Dius), ऍपेलिअस्
(Apellæus), ॲॉडिनिअस् (Audynæus), पेरिटिअस् (Peritius), डिस्ट्स् (Dystrus), झाँथिकस (Xanthicus),
आर्टेमिसिअस् (Artemisius), डेसिअस् (Dæsius), पनेमस् (Panemus), लोअस्र् (Lous) और गॉर्पिण्अस्
(Gorpiæus) हैं. इनमें से पहिला हाइपर्बेरेटिअस् अंग्रेज़ी ऑक्टोबर के और अंतिम गॉर्पिण्अस् सेप्टेंबर के स्थानापन्न
है. अब तक इन मैसीडोनिअन् महीनों में से ४ महीने—ऍपेलिअस् (क; ई. इं; पृ. ४१), आर्टेमिसिअस् (हुविष्क के समय
के सं. ५१ के वर्डेक से मिले हुए पात्र पर के लेख में; ऍ. इं; जि. ११, पृ. २१०), डेसिअस् (दइसिक, कनिष्क के समय के
सं. ११ के सुएविहार के ताम्रलेख में; इं. ऍ; जि. १०, पृ. ३२६; जि. ११, पृ. १२८) और पनेमस् (क्षत्रप पतिक के तक्षशिला
से मिले हुए सं. ७८ के ताम्रलेख में; ऍ. इं; जि. ४, पृ. ५५)—लेखों में मिले हैं.
३. पार्थिअन् संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व २४७ के मध्य के आस पास होना माना जाता है (क; ई. इं; पृ. ४६).
४. मालवालाच्चरदां षड्विंशत्युतेष्वतीतेषु नवसु शतेषु (ग्यारिसपुर का लेख; क; आ. स. रि; जि. १०, शेट ११).
१६६ प्राचीनलिपिमाला.
के शिलालेख में पहिले पहिल १ इस संवत् के साथ विक्रम का नाम जुड़ा हुआ मिलता है २. उसके
पहिले के अब तक के मिले हुए लेखों में विक्रम का नाम तो नहीं मिलता किंतु संवत् नीचे लिखे
अनुसार भिन्न भिन्न रीति से दिया हुआ मिलता है—
(१) मंदसौर से मिले हुए नरवर्मन् के समय के लेख में—'श्रीर्म्माळवगणाम्नाते प्रशस्ते कृत-
संज्ञिते [।] एकषष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये [॥] प्रावृक्का(ट्का)ले शुभे प्राप्ते' ३, अर्थात् 'मालवगण के
प्रचलित किये हुए प्रशस्त कृत संज्ञावाले ४६१ वें वर्ष के लगने पर वर्षा ऋतु में'.
(२) राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए नगरी (मध्यमिका, उदयपुर राज्य में)
के शिलालेख में—'कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वेकाशीत्युत्तरेष्वस्यां मालवपूर्वायाँ [४००] ८० १ कार्त्तिकशुक्ल-
पञ्चम्याम्', अर्थात् 'कृत [नामक] ४८१ [वें] वर्ष (संवत्) में इस मालवपूर्वा कार्तिक शुक्ल पंचमी
के दिन'.
(३) मंदसौर से मिले हुए कुमारगुप्त (प्रथम) के समय के शिलालेख में—'मालवानां
गणस्थित्या याते शतचतुष्टये । त्रिनवत्यधिकेब्दान्त्रि(मृ)तौ सेव्यघनस्तने ॥ सहस्यमासशुक्लस्य
प्रशस्तेह्नि त्रयोदशे' ४, अर्थात् 'मालवों के गण (जाति) की स्थिति से ४६३ वर्ष बीतने पर पौष
शुक्ल १३ को.'
(४) मंदसौर से मिले हुए यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के समय के शिलालेख में—'पञ्चसु
शतेषु शरदां यातेष्वेकान्नवतिसहितेषु । मालवगणस्थितिवशात्कालज्ञानाय लिखितेषु' ५ अर्थात् 'मालव
गण (जाति) की स्थिति के वश से कालज्ञान के लिये लिखे हुए ५८६ वर्षों के बीतने पर'.
(५) कोटा के पास के कणस्वा के शिव मंदिर में लगे हुए शिलालेख में—'संवत्सरशतैर्यातैः
सपञ्चनवत्यर्गलैः [।] सप्तभिर्म्माळवेशानां' ६, अर्थात् 'मालवा या मालव जाति के राजाओं (राजा)७ के
७६५ वर्ष बीतने पर'.
इन सब अवतरणों से यही पाया जाता है कि—
(अ) मालव गण (जाति) अथवा मालव (मालवा) के राज्य या राजा की स्वतंत्र
स्थापना के समय से इस संवत् का प्रारंभ होता था.
(आ) अवतरण १ और २ में दिये हुए वर्षों की संज्ञा 'कृत' ८ भी थी.
१. ध्रितिकि गांव (काठिआवाड़) से मिले हुए दानपत्र में विक्रम संवत् ७६४ कार्तिक कृष्णा अमावास्या, आदि-
त्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण लिखा है (इं. पं; जि. १२, पृ. १५५) परंतु उक्त तिथि को आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र
और सूर्यग्रहण न होने, और उसकी लिपि इतनी प्राचीन न होने से डॉ. फ़्लीट और कीलहॉर्न ने उसको जाली ठहराया है.
२. वसु नव [अ]ष्टौ वर्षा गतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य [।] वैशाखस्य सिताया(यां) रविवारयुतद्वितीयायां (इं. पं.; जि. १६, पृ. ३५.)
३. एं. इं; जि. १२, पृ. ३२०.
४. फ़्ली; गु. इं; पृ. ८३. ५. फ़्ली; गु. इं; पृ. १५४. ६. इं. पं; जि. १६, पृ. ५६.
७. मैनालगढ़ (उदयपुर राज्य में) से मिले हुए अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वीभट) के समय के लेख
के संवत् १२२६ को मालवा के राजा का संवत् कहा है (मालवेशगतवत्सर(रैः) शतैः द्वादशैश्च षट्(ड्रि)विंशपूर्वकैः) (ज. ए. सो;
बंगा. जि. ५५, भाग १, पृ. ४६).
८. संवत् के साथ 'कृत' शब्द अब तक केवल ४ शिलालेखों में मिला है. डॉ. फ़्लीट ने इसका अर्थ 'गत' अर्थात्
गुजरे हुए [वर्ष] अनुमान किया था परंतु गंगधार के शिलालेख में 'कृतेषु' और 'यातेषु' (=गत) दोनों शब्द होने से
उस अनुमान को ठीक न माना. मंदसौर के लेख में 'कृतसंज्ञिते' लिखा है (देखो, ऊपर अवतरण १) उसमें 'कृत' वर्ष का
नाम होना पाया जाता है. जैसे प्राचीन लेखों में १२ वर्ष (महाचैत्रादि) और ६० वर्ष (प्रभवादि) के दो भिन्न भिन्न
बार्हस्पत्यमान (चक्र) मिलते हैं वैसे ही वैदिक काल में ४ वर्ष का एक युगमान (चक्र) भी था (देखो, आर. शाम-
शास्त्री का 'गवामयन' पृ. ३, १३८). इस युगमान के वर्षों के नाम वैदिक काल के जुए के पासों की नांई (देखो, ऊपर
पृ. २१ और उसी के टिप्पण ३-५) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि थे, और उनकी रीति के विषय में यह अनुमान होता है
कि जिस गत वर्ष में ४ का भाग देने से कुछ न बचे उस वर्ष की 'कृत', ३ बचे उसकी 'त्रेता', २ बचे उसकी 'द्वापर',
और १ बचे उसकी 'कलि' संज्ञा होती हो. जैनों के 'भगवतीसूत्र' में युगमान का ऐसा ही उल्लेख मिलता है. उसमें
लिखा है कि 'थुगं चार हे कयजुम्म (कृत), व्योज (त्रेता), दावरजुम्म (द्वापर) और कलिजुग (कलि). जिस संख्या
रिमाणे दुपज्जवसिसे से तं दावरजुम्मे । जेणं रासी
चयुक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे एकपज्जवसिसे से तं कलिजुगे । से तेणट्टेणं गोयम (१३७१-७२, भगवती सूत्र, 'गवामयन', पृ. ७२).
Wait! In the transcription, check line 36:
"अवहारेणं अवहरिमाणे दुपज्जवसिसे" - wait, in line 36, is it 'अवहरिमाणे'? Yes, "अवहरिमाणे".
† कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वष्टाविंशेषु ४०० २० ८ फाल्गुणा (न) बहुलस्य पंचदश्यामेतस्यां पूर्वांयां (फ्ली; गु. इं; पृ. २५३).
‡ शिलालेखादि में विक्रम संवत् के वर्ष बहुधा गत लिखे जाते हैं (ऐ. इं; जि. १, पृ. ४०६) वर्तमान बहुत कम. जब
कभी वर्तमान वर्ष लिखा जाता है तब एक वर्ष अधिक लिखा रहता है.
§ यातेषु चतुर्षु त्रि (कृ) तेषु शतेषु सौम्ये (म्ये) ष्वा (ष्ट्रा)शीतसोत्तरपदेष्विह वत्स [रेषु] । शुक्ले त्रयोदशदिने भुवि कार्त्तिक
की दूसरी शताब्दि से इधर का नहीं माना जा सकता. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि या
१० 'गाथासप्तशति' के अंत में सातवाहन को कुंतल देश का राजा, प्रतिष्ठान (पैठण) नगर का अधीश, शतकर्ण
(शातकर्णि) उपनामवाला, द्वीपिकर्ण का पुत्र, मलयवती का पति और हालादि उपनामवाला लिखा है (प्रो. पीटर्सन की
ई. स. १८८४-८६ तक की रिपोर्ट, पृ. ३४६). शिलालेखों में आंध्र (आंध्रभृत्य) वंश के लिये सातवाहन नाम का प्रयोग
मिलता है. नानाघाट के लेख में उक्त वंश के मूल पुरुष सिमुक को सातवाहन कहा है और उक्तवंश के राज्य का अंत ई. स.
२२५ के आस पास होना (स्मिथ; अ. हि. इं; पृ. २१८ के पास का नक्शा) माना जाता है. ऐसी दशा में 'गाथासप्तशति'
का समय उक्त सन से पूर्व का ही होना चाहिये. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने विक्रम संवत्संबंधी अपने लेख में
'गाथासप्तशति' के राजा विक्रम के विषय में लिखते हुए उक्त पुस्तक के रचनाकाल के संबंध में लिखा है कि 'क्या
गाथासप्तशति वास्तव में उतना पुराना ग्रंथ है जितना कि माना जाता है?......बाण के हर्षचरित के प्रारंभ के १३ वें श्लोक
में सातवाहन के द्वारा गीतों के 'कोश' के बनाये जाने का उल्लेख अवश्य है परंतु इस 'कोश' को हाल की सप्तशति मानने
के लिये कोई कारण नहीं है जैसा कि प्रो. वेबर ने अच्छी तरह बतलाया है. उसी पुस्तक में मिलनेवाले प्रमाण उसकी
रचना का समय बहुत पीछे का होना बतलाते हैं. यहां पर केवल दो बातों का विचार किया जाता है. एक तो उस
(पुस्तक) में कृष्ण और राधिका का (१।८६) और दूसरा मंगलवार (३।६१) का उल्लेख है. राधिका का सब से
पुराना उल्लेख जो मुझे मिल सका वह पंचतंत्र में है जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी का बना हुआ है. ऐसे ही तिथियों के
साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति ६ वीं शताब्दी से प्रचलित हुई, यद्यपि उसका सब से पुराना उदाहरण
बुधगुप्त के ई. स. ४८४ के एरण के लेख में मिलता है. यदि हम गाथासप्तशति के हाल का समय छठी शताब्दी का प्रारंभ
मानें तो अधिक अनुचित न होगा' (आर. जी. भंडारकर कोम्मेमोरेशन वॉल्यम, पृ. १८८-८६). हम उक्त विद्वान् के इस
कथन से सर्वथा सहमत नहीं हो सकते क्योंकि बाणभट्ट सातवाहन के जिस सुभाषितरूपी उज्ज्वलरत्नों के कोश (संग्रह,
खज़ाने) की प्रशंसा करता है (अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः। विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३) वह 'गाथास-
प्तशति' ही है, जिसमें सुभाषित रूपी रत्नों का ही संग्रह है. यह कोई प्रमाण नहीं कि प्रो. वेबर ने उसे गाथासप्तशति नहीं
माना इस लिये वह उससे भिन्न पुस्तक होना चाहिये. वेबर ने ऐसी ऐसी कई प्रमाणशून्य कल्पनाएं की हैं जो अब मानी
नहीं जातीं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉक्टर सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी वेबर के उक्त कथन के विरुद्ध बाणभट्ट के उपर्युक्त
श्लोक का संबंध हाल की सप्तशति से होना ही माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१). ऐसा ही डॉ० फ्लीट ने (ज.
रॉ. ए. सो; ई. स. १६१२, पृ. ८२०) और 'प्रबंधचिंतामणि' के कर्ता मेरुतुंग ने माना है (प्रबंधचिंतामणि, पृ. २६). पांचवीं
शताब्दी के बने हुए 'पंचतंत्र' में कृष्ण और राधिका का उल्लेख होना तो उलटा यह सिद्ध करता है कि उस समय कृष्ण और
राधिका की कथा लोगों में भलीभांति प्रसिद्ध थी अर्थात् उक्त समय के पहिले से चली आती थी. यदि ऐसा न होता तो
पंचतंत्र का कर्ता उसका उल्लेख ही कैसे करता? ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति
का ६ वीं शताब्दी में प्रचलित होना बतलाना भी ठीक नहीं हो सकता, क्यों कि कच्छ राज्य के अंधौ गांव से मिले हुए
क्षत्रप रुद्रदामन् के समय के [शक] संवत् ५२ (ई. स. १३०) के ४ लेखों में से एक लेख में 'गुरुवार' लिखा है (वर्षे द्विपंचाशे
५० २ फागुणबहुलस द्वितीया वी २ गुरुवास[रे] सिंहलपुरस ओपशतस गोत्रस० स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की
तय्यार की हुई उक्त लेख की छाप से) जिससे सिद्ध है कि ई. स. की दूसरी शताब्दी में वार लिखने की रीति
परंपरागत प्रचलित थी. राधिका और बुधवार के उल्लेख से ही 'गाथासप्तशति' का छठी शताब्दी में बनना किसी प्रकार
सिद्ध नहीं हो सकता. डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी गाथासप्तशति के कर्ता हाल को आंध्रभृत्य वंश के
राजाओं में से एक माना है (बंब. गं; जि. १, भा. २, पृ. १७१) जिससे भी उसका आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंशियों के
राजत्वकाल में अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी में बनना मानना पड़ता है.
केवल 'गाथासप्तशति' से ही चंद्रगुप्त (दूसरे) से पूर्व के राजा विक्रम का पता लगता है इतना ही नहीं किंतु राजा
सातवाहन (हाल) के समय के महाकवि गुणाढ्य रचित पैशाची (कश्मीर तरफ की प्राकृत) भाषा के 'बृहत्कथा' नामक ग्रंथ
से भी, जिसकी प्रशंसा बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित के प्रारंभ के १७ वें श्लोक (समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव
नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा) में की है. वह पुस्तक अब तक नहीं मिला परंतु उसके संस्कृत अनुवाद रूपी सोमदेव भट्ट के 'कथा-
सरित्सागर' में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह (लंबक ६, तरंग १), पाटलीपुत्र के राजा विक्रमतुंग (लंबक ७, तरंग १) आदि
विक्रम नाम के राजाओं की कई कथाएं मिलती हैं. इस पुस्तक को भी वेबर ने ई. स. की छठी शताब्दी का माना है परंतु
डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने उपर्युक्त सातवाहन के समय का अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी का
माना है (बंब. गं; जि. १ भा. २, पृ. १७०-७१) और काव्यमाला के विद्वान संपादक स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं. दुर्गाप्रसाद
और पांडुरंग परब ने उसका ई. स. की पहिली शताब्दी में बनना बतलाया है इतना ही नहीं किंतु वेबर के माने हुए उसके
समय के विषय में लिखा है कि "वेबर पंडित 'हिस्टरी ऑव संस्कृत लिटरेचर' नामक पुस्तक में गुणाढ्य का ई. स. की
छठी शताब्दी में होना बतलाता है और दशकुमारचरित के रचयिता आचार्य दंडी का भी छठी शताब्दी में होना स्वीकार
करता है. किंतु आचार्य दंडी काव्यदर्श में 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भूतार्थां बृहत्कथाम्' में 'प्राहुः' पद से बृहत्कथा का अपने से बहुत
भारतीय संवत्. १६६
तो विक्रम १, जिसका नाम इस संवत् के साथ जुड़ा है, मालव जाति का मुखिया या राजा हो, अथवा
चंद्रगुप्त (दूसरे) से पहिले का उससे भिन्न कोई राजा हो.
विक्रम संवत् का प्रारंभ कलियुग संवत् के (५०१६-१६७५=) ३०४४ वर्ष व्यतीत होने पर
माना जाता है जिससे इसका गत वर्ष १ कलियुग संवत् ३०४५ के बराबर होता है. इस
संवत् में से ५७ या ५६ घटाने से ईसवी सन् और १३५ घटाने से शक संवत् आता है. इसका
प्रारंभ उत्तरी हिंदुस्तान में चैत्र शुक्ला १ से और दक्षिण में कार्तिक शुक्ला १ से होता है जिससे
उत्तरी (चैत्रादि) विक्रम संवत् दक्षिणी (कार्तिकादि२) विक्रम संवत् से ७ महीने पहिले
प्रारंभ होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में महीनों का प्रारंभ कृष्णा १ से और अंत शुक्ला १५ को
होता है, परंतु दक्षिण में महीनों का प्रारंभ शुक्ला १ से और अंत कृष्णा अमावास्या को होता है.
इस लिये उत्तरी विक्रम संवत् के महीने पूर्णिमांत और दक्षिणी के अमांत (दर्शांत) कहलाते
हैं. शुक्ल पक्ष तो उत्तरी और दक्षिणी हिंदुस्तान में एक ही होता है परंतु उत्तरी हिंदुस्तान का कृष्ण
पक्ष दक्षिणी से १ महीना पहिले रहता है अर्थात् जिस पक्ष को हम उत्तरी हिंदुस्तानवाले वैशाख
कृष्ण कहते हैं उसीको दक्षिणेवाले चैत्र कृष्ण लिखते हैं. काठियावाड़, गुजरात तथा राजपुताने
के कुछ अंश में विक्रम३ संवत् का प्रारंभ आषाढ शुक्ला १ (अमांत) से भी होता था जिससे उसको
प्राचीन होना प्रकट करता है. इस लिये दंडी और गुणाढ्य दोनों छठी शताब्दी में हुए ऐसा वेबर पंडित ने किस आधार
पर माना यह मालूम नहीं होता. अथवा प्रायः यूरोपियन विद्वानों का यह स्वभाव ही है कि भारतवर्ष के प्राचीनतम
ग्रंथों एवं उनके रचयिताओं को अर्वाचीन सिद्ध करने का जहां तक हो सके वे यत्न करते हैं और उनका प्राचीनत्व सिद्ध
करने का दृढ प्रमाण मिल भी जावे तो उसको 'प्रक्षिप्त' कह कर अपने को जो अनुकूल हो उसीको आगे करते हैं (अर्थात्
ठीक बतलाते हैं) (बंबई के निर्णयसागर प्रेस का छुपा हुआ 'कथासरित्सागर', तीसरा संस्करण, भूमिका, पृ. २).
१. 'ज्योतिर्विदाभरण' का कर्त्ता कालिदास नामक ज्योतिषी उक्त पुस्तक के २२ वें अध्याय में अपने को उज्जैन के
राजा विक्रम का मित्र (श्लोक १६) और 'रघुवंश' आदि तीन काव्यों का कर्ता बतला कर (श्लो. २०) गत कलियुग
संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) के वैशाख में उक्त पुस्तक का प्रारंभ और कार्तिक में उसकी समाप्ति होना (श्लो. २१) लिखता है.
उसमें विक्रम के विषय में यह भी लिखा है कि 'उसकी सभा में शंकु, वररुचि, मणि, अंशु, जिष्णु, त्रिलोचन, हरि, घटखर्पर
और अमरसिंह आदि कवि (श्लो. ८); सत्य, वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ और कुमारसिंह आदि ज्योतिषी
थे (श्लो. ६). धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि ये नव
विक्रम की सभा के रत्न थे. उसके पास ३००००००० पैदल, १०००००००० सवार, २४३०० हाथी और ४००००० नाव थीं
(श्लो. १२). उसने ६५ शक राजाओं को मार कर अपना शक अर्थात् संवत् चलाया (श्लो. १३) और रूम देश के शक
राजा को जीत कर उज्जैन में लाया परंतु फिर उसको छोड़ दिया' (श्लो. १७). यह सारा कथन मनघडंत ही है क्यों कि
'ज्योतिर्विदाभरण' की कविता मामूली है और रघुवंश आदि के कर्त्ता कविशिरोमणि कालिदास की अलौकिक सुंदरता-
वाली कविता के आगे तुच्छ है. ऐसे ही गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) में उक्त पुस्तक की रचना करने का
कथन भी कृत्रिम ही है क्यों कि उसी पुस्तक में अयनांश निकालने के लिये यह नियम दिया है कि 'शक संवत् में से ४४५
घटाकर शेष में ६० का भाग देने से अयनांश आते हैं' (शाकः शराम्भोधियुगो नितो हृते मानं खतर्कैरयनांशकाः स्मृताः । १२ । १८).
विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला था अत एव यदि वह पुस्तक वि. सं. २४ में बना होता तो उसमें
शक संवत् का नाम भी नहीं होना चाहिये था. वास्तव में वह पुस्तक श. सं. ११९४ (वि. संं. १२६६=ई. स. १२०२) के
आसपास का बना हुआ है (देखो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित का 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र', पृ. ४७६). ऐसी दशा में उक्त
पुस्तक का विक्रमसंबंधी सारा कथन कल्पित ही मानना पड़ता है.
२. वास्तव में विक्रम संवत् का प्रारंभ कार्तिक शुक्ला १ से और शक संवत् का चैत्र शुक्ला १ से है. उत्तरी
हिंदुस्तान के भी पंचांग शक संवत् के आधार पर बनने से उनमें वर्ष चैत्र शुक्ला १ से प्रारंभ होता है, जिससे वहांवालों
ने पीछे से विक्रम संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से भी मानना शुरू कर दिया हो. उत्तरी भारत के लेखों में संवत् दोनों तरह
से (कार्तिकादि और चैत्रादि) मिल आते हैं. ई. स की १२ वीं शताब्दी तक के लेखों में कार्तिकादि संवत् अधिक परंतु
१३ वीं से १६ वीं शताब्दी तक के लेखों में चैत्रादि अधिक मिलते हैं (इं. ऐं; जि. २०, पृ. ३६६).
३. 'पृथ्वीराजरासे' में दिये हुए कितनी एक घटनाओं के अशुद्ध संवतों का ठीक होना सिद्ध करने की खींचतान में
स्वर्गीय पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने पृथ्वीराज के जन्म संवत् संबंधी दोहे (एकादस सै पंच दह विक्रम साक
अनंद । तिहि रिपु जय पुर हरन कौं भय प्रथिराज नरिंद। मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या संपादित 'पृथ्वीराजरासा' आदिपर्व,
पृ. १३८), के 'अनंद' शब्द पर से 'अनंद विक्रम शक' (संवत्) की कल्पना कर लिखा है कि 'विक्रम साक अनन्द कौ
१७० प्राचीनलिपिमला.
'आषाढादि संवत्' कहते थे. राजपुताने के उदयपुर आदि राज्यों में राजकीय विक्रम संवत् अब
श्रावण कृष्णा (पूर्णिमांत) से प्रारंभ होता है.
८-शक संवत्.
शक संवत् के प्रारंभ के विषय में ऐसी प्रसिद्धि है कि दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के राजा
शालिवाहन (सातवाहन, हाल) ने यह संवत् चलाया. कोई इसका प्रारंभ शालिवाहन के जन्म से २
मानते हैं. जिनप्रभसूरि अपने 'कल्पप्रदीप' ३ नामक पुस्तक में लिखता है कि प्रतिष्ठानपुर (पैठण)
में रहनेवाले एक विदेशी ब्राह्मण की विधवा बहिन से सातवाहन (शालिवाहन) नामक पुत्र उत्पन्न
हुआ. उसने उज्जैन के राजा विक्रम को परास्त किया. जिसके पीछे उसने प्रतिष्ठानपुर का राजा बन
कर तापी नदी तक का देश अपने अधीन किया और वहां पर अपना संवत् प्रचलित किया४.
क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनंद साक करके उसका अर्थ करे कि नव-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम
का नव-रहित शक अर्थात् १००-६=६० । ६१ अर्थात् विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ६० । ६१ से प्रारंभ हुआ
है। यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा (?) करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैंकड़ों वर्षों से यह
कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तो अब तक प्रचलित है
और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह अब अप्रचलित हो गया है... अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं।
एक तो सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है' (पृथ्वीराजरासा आदि
पर्व, पृ. १३६). पं. मोहनलाल पंड्या का यह सारा कथन सर्वथा स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि रासे के 'अनंद' शब्द
का अर्थ 'आनंददायक' या 'शुभ' ही है जैसा कि भाषा के अन्य काव्यों में मिलता है*. उसको वास्तविक अर्थ में न
ले कर 'विक्रम के राज्य के ६० वे या ६१ वे वर्ष से चलनेवाला अनंद विक्रम संवत्' अर्थ निकालना हठधर्मी से खाली नहीं
है; ज्योतिषियों ने विक्रम के दो संवतों का होना कभी नहीं माना और न किसी वृद्ध पुरुष को ऐसा कहते हुए सुना.
पं. मोहनलाल की यह कल्पना भी ठीक वैसी ही है जैसी कि 'राजप्रशस्ति' में खुदे हुए 'भापारासापुस्तकेस्य' के 'भाव-
नगर प्राचीनशोधसंग्रह' में छपे हुए अशुद्ध पाठ 'भीपारासापुस्तकेस्य' पर से 'भीमरासा' नामक ऐतिहासिक पुस्तक
की सृष्टि खड़ी कर दी गई. पं. मोहनलाल पंड्या के इस मनघडंत कथन के आधार पर डॉ. ग्रीअर्सन (स्मि; अ. हि. इं;
पृ. ४२, टिप्पण २), वी. ए. स्मिथ (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ३८७, टिप्पण २) और डॉ. बार्नेट ने (वा; एं. इं; पृ. ६५) 'अनंद
विक्रम संवत्' का ई. स. ३३ से चलना माना है परंतु हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि राजपुताने में विक्रम के दो
संवतों का होना कभी माना नहीं गया, न वहां से मिले हुए शिलालेखों, दानपत्रों, हस्तलिखित पुस्तकों, भाटों तथा चारणों
के लिखे हुए भाषा कविता के ग्रंथों या ख्यातों में कहीं भी अनंद विक्रम संवत् का उल्लेख मिलता है, न 'पृथ्वीराजरासे' के
उपर्युक्त दोहे में 'अनंद विक्रम संवत्' की कल्पना पाई जाती है और न 'पृथ्वीराजविजय' महाकाव्य से, जो चौहानों के इतिहास
का प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तक है, वि. सं. १२२० (ई. स. ११६३) के पूर्व पृथ्वीराज का जन्म होना माना जा सकता है.
१ आषाढादि विक्रम संवत् शिलालेखों तथा पुस्तकों में मिलता है. अडालिज (अहमदाबाद से १२ मील पर)
की बावड़ी के लेख में 'श्रीमन्नृपविक्रमसमयातीता (त) आषाढादिसंवत १५५५ वर्ष शाके १४२०.... माघमासे पंचम्यां तिथौ बुधवासरे'
(इं. पं; जि. १८, पृ. २४१). डुंगरपुर राज्य के डेसां गांव के पास के शिवमंदिर के लेख में-'श्रीमन्नृ (न्नृ) पविक्रमार्क (र्क) राज्यसम-
यातीतसंवत् १६ आषादादि २३ वर्षे शाके १४८८ प्रवर्त्तमाने । युवराव्यनाम्नि संवत्सरे.... वैशाखमासे । कृष्णापक्षे । प्रतिपति (ति) या । गुरुवारसरे.'
डुंगरपुर राज्य से मिले हुए कई शिलालेखों में 'आषाढादि' संवत् लिखा मिलता है. 'प्रभातक्षेत्रतीर्थयात्राक्रम' नामक
पुस्तक के अंत में-'संवत् १५ आषाढादि ३४ वरणे (वर्षे) श्रावणशुदि ५ बु(धौ) मे'-लिखा मिला है (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१).
२ त्र्यंकेन्द्र (१४६३) प्रमिते वर्षे शालिवाहनजन्मतः । कृतस्तपसि मार्तंडोऽयमलं जयतुद्गतः (मुहूर्त्त मार्तंड, अलंकार, श्लोक ३).
३ यह पुस्तक ई. स. १३०० के आस पास बना था. ४ ज. ए. सो. बंब; जि. १०, पृ. १३२-३३.
- गगन पाणि पुनि द्वीप ससि (१७२०) हिम रुत मंगसर मास । शुक्ल पच्छ तेरस दिने बुध वासर दिन जाम ॥ २६६ ॥
मरदानो अरु महा बली अवरंग शाह नरिंद । तासु राज महिं हरखसूं रच्यो शास्त्र अनंद ॥ २६७ ॥ (पद्मराग के शिष्य
रामचंद्र रचित 'रामविनोद' नामक पुस्तक).
भारतीय संवत्. १७१
अलबेरूनी लिखता है कि 'विक्रमादित्य ने शक राजा को परास्त कर यह संवत् चलाया' १. इस
प्रकार इसके प्रचलित किये जाने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं.
पहिले पहिल यह संवत् काठियावाड़ तथा कच्छ से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के [ शक ]
संवत् ५२ से १४३ तक के शिलालेखों २ में तथा उन्हीं के सिक्कों में, जो [ शक ] संवत् १०० (ई. स.
१७८) के आस पास से लगा कर ३१० (ई. स. ३८८) से कुछ पीछे तक के हैं, मिलता है. उक्त
शिलालेखों में केवल 'वर्षे' (=संवत्सरे) लिखा मिलता है, 'शक' आदि कोई नाम 'वर्षे' (संवत्)
के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, और सिक्कों में तो अंक ही मिलते हैं ('वर्षे' भी नहीं.)
संस्कृत साहित्य में इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ (=शककाल) पहिले पहिल ३
वराहमिहिर की 'पंचसिद्धांतिका' में शक संवत् ४२७ ४ (ई. स. ५०५) के संबंध में मिलता है, और
शक संवत् ५०० (ई. स. ५७८) से लगा कर १२६२ (ई. स. १३४०) तक के शिलालेखों और
दानपत्रों में 'शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सर' ५, 'शकनृपतिसंवत्सर' ६, 'शकनृपसंवत्सर' ७, शकनृप-
काल' ८, शक्संवत्' ९, 'शकवर्ष' १०, 'शककाल' ११, 'शककालसंवत्सर' १२, 'शक' १३ और 'शाक' १४
शब्दों का प्रयोग इस संवत् के वास्ते किया हुआ मिलता है जिससे पाया जाता है कि ई. स. ५०० के
आस पास से लगा कर शक संवत् १२६२ (ई. स. १३४०) तक तो यह संवत् किसी शक राजा के,
राज्याभिषेक से चला हुआ या किसी शक राजा अथवा शकों का चलाया हुआ माना जाता था और
उस समय तक शालिवाहन का नाम इसके साथ नहीं जुड़ा था.
१. आ. स. इं; जि. २, पृ. ६.
२. राज्ञो चष्टनस घ्समोतिकपुत्रस राज्ञो रुद्रदामस जयदामपुत्रस वर्षे द्विपंचाशे ५२ २ फागुणबहुल्स द्वितीयं वी २ मदनेन सिंहलपुत्रेण ०
कच्छराज्य के अंधौ गांव से मिले हुए क्षत्रपों के लेखों की स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई छापों पर से.
राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ (महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले
चट्टान पर के लेख से. ऐ. इं; जि. ८, पृ. ४२ ).
३. सिंहसूरिरचित 'लोकविभाग' नामक संस्कृत जैन ग्रंथ में उक्त पुस्तक का शकाब्द (शक संवत्) ३८० में बनना
लिखा है (संवत्सरे तु द्वात्रिंशे कांचीशसिंहवर्मणः । अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ (मोक्षविभाग नामक ११ वें प्रकरण के
अंत की प्रशस्ति, श्लोक ४) परंतु यह मूल ग्रंथ नहीं किंतु सर्वंनंदि नामक मुनि के बनाये हुए प्राकृत ग्रंथ का परिवर्द्धित संस्कृत
अनुवाद है और ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पीछे का बना हुआ है क्यों कि इसमें यतिवृषभरचित 'तिलोयपण्णत्ति,'
राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय के अर्थात् ई. स. की ९ वीं शताब्दी के बने हुए 'उत्तरपुराण' तथा ई. स. की ११ वीं
शताब्दी के आस पास के बने हुए नेमिचंद्ररचित 'त्रिलोकसार' से भी श्लोक उद्धत किये हुए मिलते हैं. संभव है
कि सर्वंनंदि का मूल प्राकृत ग्रंथ शक संवत् ३८० में बना हो, परंतु उसमें इस संवत् के साथ 'शक' नाम जुड़ा हुआ था
या नहीं इसका जब तक मूल ग्रंथ न मिल आवे तब तक निश्चय नहीं हो सकता. ऐसी दशा में ११ वीं शताब्दी के पीछे के
बने हुए 'लोकविभाग' के 'शकाब्द' को शक संवत् का सब से प्राचीन उल्लेख नहीं कह सकते.
४. सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका १।८. देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण *.
५. शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सरेष्वतिक्रांतेषु पंचसु शतेषु (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास का सेट ).
६. शकनृपतिसंवत्सरेषु चतुस्त्रिंशाधिकेषु पंचस्वतीतेषु भाद्रपदामावास्यायां सूर्य्यग्रहणनिमित्तं (इं. ऐं; जि. ६, पृ ७३ ).
७. शकनृपसंवत्सरेषु शरशिखिमुनिषु व्यतीतेषु ज्ये(ज्ये)ष्ठमासशुक्लपंचदश्यां पुष्यनक्षत्रे चंद्रवारे (इं. ऐं; जि. १२, पृ. १६ ).
८. शकनृपकालातीतसंवत्सरस(श)तेषु सप्तसु(सु) जे(षो)डशोत्तरेषु वैशाखब(व)हुलामावास्यामादित्यग्रहणपर्व्वणि (ऍ. इं; जि. ३,
पृ १०६).
९. शक्संवत् ८३२ वैशाखशुद्धपौरर्णमास्यां महावैशाख्यां (ऐं. इं; जि. १, पृ. ५६ ).
१०. एकादशोत्तरषट्छतेषु शकवर्षेष्वतीतेषु....कार्तिकपौर्णमास्यां (इं. ऐं; जि. ६, पृ. ८६ ).
११. सप्तस(श)त्या नवत्या च समायुक़्तेसु(षु) सप्तसु [।] स(श)ककाले(ले) श्व(ष्व)तीतेषु मन्मथाह्वयवत्सरे (ज. ए. सो. बंब; जि. १०,
पृ. १६५ ).
१२. पंचसप्तत्यधिकशककालसंवत्सरशतषट्के व्यतीते संवत(त्) ६७५....माघमासरथसप्तम्यां (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११२ ).
१३. शक ११५७ मन्मथसंवत्सरे श्रावणबहुले ३० गुरौ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६३, लेखसंख्या ३४८).
१४. शाके ११२८ प्रभवसंवत्सरे श्रावणमासे पौर्णमास्यां (ऍ. इं; जि. १, पृ. ३४३ ).
१७२ प्राचीनलिपिमाला.
इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ शालिवाहन (सातवाहन) का नाम संस्कृत साहित्य में ई. स.
की १४वीं शताब्दी के प्रारंभ १ के आस पास से और शिलालेखादि में पहिले पहिल हरिहर गांव
से मिले हुए विजयनगर के यादव राजा बुक्कराय (प्रथम) के शक संवत् १२७६ (ई. स. १३५४)
के दानपत्र २ में मिलता है; जिसके पीछे शालिवाहन का नाम लिखने का प्रचार बढ़ता गया. विद्वान्
राजा सातवाहन (शालिवाहन) का नाम 'गाथासप्तशती' और 'बृहत्कथा' से सान्चरवर्ग में प्रचलित था
अत एव संभव है कि ई. स. की १४वीं शताब्दी के आस पास दक्षिण के विद्वानों ने उत्तरी हिंदुस्तान
में चलनेवाले संवत् के साथ जुड़े हुए राजा विक्रम के नाम का अनुकरण कर अपने यहां चलने-
वाले 'शक' (शक संवत्) के साथ दक्षिण के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) का नाम जोड़
कर 'नृपशालिवाहनशक' ३, 'शालिवाहनशक,' ४ 'शालिवाहनशकवर्ष,' ५ 'शालिवाहनशकाब्द' ६ आदि
से इस संवत् का परिचय देना प्रारंभ किया हो.
शालिवाहन, सातवाहन नाम का रूपांतर ७ मात्र है और सातवाहन (पुराणों के 'आंध्रभृत्य')
वंश के राजाओं का राज्य दक्षिण पर ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी से ई. स. २२५ के आस पास
तक रहा था, उनकी राजधानियों में से एक प्रतिष्ठान नगर (पैठण, गोदावरी पर) भी थी और उनमें
सातवाहन (शातकर्णि, हाल) राजा बहुत प्रसिद्ध भी था अतएव संभव है कि दक्षिण के विद्वानों ने
उसीका नाम इस संवत् के साथ जोड़ा हो, परंतु यह निश्चित है कि सातवाहनवंशियों में से किसीने
यह संवत् नहीं चलाया क्यों कि उनके शिलालेखों में यह संवत् नहीं मिलता किंतु भिन्न भिन्न राजाओं
के राज्यवर्ष (सन् जुलूस) ही मिलते हैं और सातवाहन वंश का राज्य अस्त होने के पीछे अनुमान
११०० वर्ष तक शालिवाहन का नाम इस संवत् के साथ नहीं जुड़ा था. इस लिये यही मानना उचित
होगा कि यह संवत् शक जाति के किसी विदेशी राजा या शक जाति का चलाया हुआ है.
यह संवत् किस विदेशी राजा ने चलाया इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न
अटकलें लगाई हैं. कोई तुरुष्क (तुर्क, कुशन) वंश के राजा कनिष्क को, कोई क्षत्रप नहपान को,
१. देखो, ऊपर पृ. १७० और टिप्पणी ३, ४.
२. नृपशालिवाहनशक १२७६ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ७८, लेखसंख्या ४५४). इससे पूर्व के थाणा से मिले हुए
देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के समय के शक संवत् १२१२ (ई. स. १२६०) के दानपत्र की छपी हुई प्रति में (की; लि.
इं. स. ई; पृ. ६७, लेखसंख्या ३७६) में 'शालिवाहनशके १२१२' छपा है परंतु डॉ. फ्लीट का कथन है कि उक्त ताम्रपत्र का
अब पता नहीं है और नउसकी कोई प्रतिकृति प्रसिद्धि में आई और जैसे थाणा से मिले हुए ई. स. १२७२ के दानपत्र में शालि-
वाहन का नाम न होने पर भी नक़ल में जोड़ दिया गया वैसा ही इसमें भी हुआ होगा (ज. रॉ ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८१३).
ऐसी दशा में उक्त ताम्रपत्र को शालिवाहन के नामवाला सब से पहिला लेख मान नहीं सकते.
३. देखो, इसी पृष्ठ का टि. २. ४. शालिवाहनशक १४७६ (इं. पॅ; जि. १०, पृ. ६४).
५. शालिवाहनशकवर्ष १४३०........ माघशु १४ (पॅ. इं; जि. १, ३६६).
६. शकाब्दे शालिवाहस्य सहस्त्रेण चतुःशतैः। चतुस्त्रिंशत्समैर्युक्ते संख्याते गणितक्रमात् ॥ श्रीमुखवत्सरे श्लाध्ये माघे चासितपञ्चके । शिव-
रात्रा महातिथ्यां पुं(पु)ण्यकाले शुभे दिने (ज; ए. सो; बंब. जि. १२, पृ. ३८४).
७. सातवाहन=सालवाहन=शालिवाहन. 'शालो हाले मत्स्यभेदे'; हालः सातवाहनपार्थिवे (हैम अनेकार्थकोश).
सालाहणम्मि हालो (देशीनाममाला वर्ग ८, श्लोक ६६). शालिवाहन, शालवाहन, सालवाहण, सालवाहन, सालाहण, सातवाहन,
हालेत्येकस्य नामानि (प्रबंधचिन्तामणि, पृ. २८ का टिप्पण). गाथासप्तशती के अंत के गद्यभाग में सातवाहन राजा को
शातकर्ण (शातकर्णि) भी कहा है (डॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८३-८६ की रिपोर्ट, पृ. ३४८). पुराणों में मिलनेवाली
आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंश के राजाओं की नामावली में शातकर्णि, शातकर्ण, यज्ञश्रीशातकर्णि, कुंतलशातकर्ण आदि
नाम मिलते हैं. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में शातकर्णि सातवाहन का कर्तरी (कैंची) से महादेवी मलयवती को मारना
लिखा है-कर्तर्या कुंतलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीं [जघान] (निर्णयसागर प्रेस का छपा हुआ 'कामसूत्र',
पृ. १७४). नासिक से मिले हुए वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के लेख में उसके पिता गौतमीपुत्र शातकर्णि का शक,
यवन और पह्लवों को नष्ट करना तथा खखरात वंश (अर्थात् क्षत्रप नहपान के वंश) को निरवशेष करना लिखा
है (पॅ. इं; जि. ८, पृ. ६०). उसी लेख से यह भी पाया जाता है कि उसके अधीन दूर दूर के देश थे. गौतमीपुत्र
शातकर्णि सातवाहन वंश में प्रबल राजा हुआ था अतएव संभव है कि शक संवत के साथ जो शालिवाहन (सातवाहन)
का नाम जुड़ा है वह उसीका सूचक हो और 'गाथासप्तशती', 'बृहत्कथा', तथा 'कामसूत्र' का सातवाहन भी वही हो.
कोई शक राजा वेननस् को और कोई शक राजा अय (अज़=Azes) को इसका प्रवर्त्तक मानते हैं
परंतु ये सब अनुमान ही हैं, निश्चित रूप से इसके प्रचारक का नाम अब तक ज्ञात नहीं हुआ.
गत शक संवत् में ३१७९ जोड़ने से कलियुग संवत्, १३५ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम
संवत् और ७८ (अंत के करीब तीन महीनों में ७९) जोड़ने से ई. स. आता है. यह संवत् बहुधा
सारे दक्षिण में (तिन्नेवेल्लि और मलबार प्रदेशों को छोड़ कर) प्रचलित है. उत्तरी हिंदुस्तान में पंचांग,
जन्मपत्र और वर्षफल आदि में विक्रम संवत् के साथ यह भी लिखा जाता है और वहां के शिला-
लेखादि में भी कभी कभी इसके वर्ष लिखे मिलते हैं. इसका प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है.
इसके महीने उत्तरी हिंदुस्तान में पूर्णिमांत, और दक्षिण में अमांत माने जाते हैं. दक्षिण के जिन
हिस्सों में सौर मान का प्रचार है वहां इसका प्रारंभ मेष संक्रांति से होता है. करण ग्रंथों के आधार
पर पंचांग बनानेवाले सारे भारतवर्ष के ज्योतिषी इसी संवत् का आश्रय लेते हैं. पंचांगों में इसके
वर्ष गत ही लिखे रहते हैं. शिलालेख और दानपत्रों में
१७४ प्राचीनलिपिमला.
आश्विन शुक्ला १ १ से इसका प्रारंभ होना निश्चय किया है जिससे वर्तमान चेदि संवत् में
२४८-४६ २ जोड़ने से ईसवी सन्, और ३०५-६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् आता है.
इस संवत्वाला सब से पहिला लेख कलचुरि संवत् २४५ ३ ( ई. स. ४६४ ) का और अंतिम
६५८ ४ ( ई. स. १२०७) का मिला है, जिसके पीछे यह संवत् अस्त हो गया. इसके वर्ष बहुधा
वर्तमान ५ लिखे मिलते हैं.
१०—गुप्त संवत्.
इस संवत् के लिये शिलालेखादि में ‘गुप्तकाल’, ‘गुप्तवर्ष’ ६ आदि शब्द लिखे मिलते हैं जिस-
से पाया जाता है कि यह संवत् गुप्तवंशी किसी राजा ने चलाया हो. इस विषय का लिखित प्रमाण
तो अब तक नहीं मिला, परंतु समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के लेख में गुप्त वंश के पहिले दो राजाओं
(गुप्त और घटोत्कच ) के नामों के साथ केवल ‘महाराज’ ७ विरुद्ध और घटोत्कच के पुत्र चंद्रगुप्त
(पहिले) के नाम के साथ ‘महाराजाधिराज’ विरुद्ध लिखा रहने तथा चंद्रगुप्त (प्रथम) के पौत्र
और समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय के गुप्त सं. ८२ ८ से ६३ ९ तक के शिलालेखों १० के
मिलने से विद्वानों का यह अनुमान है कि गुप्तवंश में पहिले पहिल चंद्रगुप्त (पहिला) प्रतापी राजा हुआ
हो और उसके राज्य पाने के समय से यह संवत् चला हो. गुप्तों के पीछे काठियावाड़ में वलभी के
१. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५. पँ. इं; जि. २, पृ. २६६.
२ आश्विन शुक्ला १ से लगा कर माघ के प्रारंभ के आसपास तक अर्थात् जनवरी मास के लगने से पहिले के कुछ
महीनों में ही ई. स. और वर्तमान कलचुरि संवत् का अंतर २४८ रहता है बाकी अधिकतर महीनों में २४६ रहता है.
३. कन्हेरी से मिला हुआ ताम्रपत्र (केवंटेंपल्स ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८).
४. क; आ. स. रि; जि. २१, पृ. १०२, सेंट २७. ५. ई. ऐं; जि. १७, पृ. २१५, टिप्पण ५.
६. संवत्सराणामधिके शते तु त्रिंशद्भिंरन्यैरपि षड्भिरेव । रात्रौ दिने प्रौष्ठपदस्य षष्ठे गुप्तप्रकाले गणनां विधाय ॥.......वर्षशतेष्टाविंशे
गुप्तानां काल....(गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चटान पर खुदे हुए स्कंदगुप्त के समय के लेख से. फ्ली; गु.
इं; पृ. ६०, ६१). मोरबी (काठियावाड़ में) से मिले हुए गुप्त संवत् ५८५ के दानपत्र में ‘पंचाशीत्या युतेतीते समानां
शतपंचके । गोप्ते ददावदो नृपः सोपरागार्कंमंडले’ (ई. ऐं; जि. २, पृ. २५८). वर्षशते गुप्तानां सचतुःपंचाशदुत्तरे भूमिम् । शासति कुमा-
रगुप्ते मासे ज्येष्ठे द्वितीयायाम् (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). गुप्तानां
समतिक्रांते सप्तपंचाशदुत्तरे । शते समानां पृथिवीं बुधगुप्ते प्रशासति (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का
लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६१ के दानपत्र में ‘एकनवत्युत्तरेब्दशते
गुप्तनृपराज्यभुक्तौ श्रीमति प्रवर्द्धमानमहाचैत्रसंव(त्)त्सरे माघमासबहुलपंचतुत्तीयायाम्’ (फ्ली; गु. इं; पृ. १०७) लिखा मिलता है,
और अलबेरूनी अपने मूल अरबी पुस्तक में गुप्तकाल, या ‘गुवितकाल’ (=गुप्तकाल) ही लिखता है (फ्ली; गु. इं;
भूमिका, पृ. २६, ३०).
७. ‘विरुद्ध’ महाराज’ का प्रयोग सामंत के लिये होता था. मेवाड़ के गुहिल राजा अपराजित के समय के वि. सं.
७१८ के लेख में उसको ‘राजा’ और उसके सेनापति वराहसिंह को ‘महाराज’ लिखा है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ३१), परंतु
कन्नौज के प्रतिहारों के दानपत्रों में यही विरुद्ध उन प्रबल स्वतंत्र राजाओं के नामों के साथ लगा हुआ भी मिलता है (इं. पैँ;
जि. १५, पृ. ११२, १४०; ऐं. इं; जि. ५, पृ. २११-१२).
८. फ्ली; गु. इं; पृ. २५. ९. फ्ली; गु. इं; पृ. ३१-३२.
१० चंद्रगुप्त (दूसरे) का सब से पिछला शिलालेख गुप्त संवत् ६३ का और उसके पुत्र कुमारगुप्त (पहिले) का
सब से पहिला शिलालेख गुप्त संवत् ६६ का मिला है, जिससे चंद्रगुप्त (दूसरे) के राज्य की समाप्ति गुप्त संवत् ६५ के आसपास
होनी चाहिये. गुप्त संवत् का प्रारंभ चंद्रगुप्त (पहिले) के राज्य पाने के समय से मानने से उन तीन राजाओं (चंद्रगुप्त,
समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त दूसरे) का राजत्वकाल करीब ६५ वर्ष मानना पड़ता है जो सरसरी तौर से देखनेवालों को अधिक
प्रतीत होगा परंतु तीन राजाओं के लिये वह समय अधिक नहीं है क्योंकि अकबर, जहांगीर और शाहजहां इन तीन बादशाहों
का राजत्वकाल १०२ (ई. स. १५५६-१६५८) वर्ष होता है.
भारतीय संवत्. १७५
राज्य का उदय हुआ जिसके अस्त होने के पीछे वहांवालों ने गुप्त संवत् का ही नाम 'वलभी
संवत्'१ रक्खा.
अल्बेरूनी लिखता है कि 'वलभीपुर के राजा वलभ२ के नाम से उसका संवत् वलभी संवत्
कहलाया. यह संवत् शक संवत् के २४१ वर्ष पीछे शुरू हुआ है. शक संवत् में से ६ का घन और
५ का वर्ग ( २१६+ २५=२४१ ) घटाने से वलभी संवत् रह जाता है. गुप्तकाल के विषय में लोगों
का कथन है कि गुप्त लोग दुष्ट [और] पराक्रमी थे और उनके नष्ट होने पर भी लोग उनका संवत्
लिखते रहे. अनुमान होता है कि वलभ उन (गुप्तों) में से अंतिम था क्यों कि वलभी संवत् की
नांई गुप्त संवत् का प्रारंभ भी शक काल से २४१ वर्ष पीछे होता है. श्रीहर्ष संवत् १४८८, विक्रम
संवत् १०८८, शककाल ९५३ और वलभी तथा गुप्तकाल ७१२ ये सब परस्पर समान हैं'३. इससे
विक्रम संवत् और गुप्तकाल का अंतर (१०८८-७१२=) ३७६ आता है अर्थात् गुप्त संवत् में ३७६ मिलाने
से चैत्रादि विक्रम संवत्, २४१ मिलाने से शक संवत् और ३१६-२० मिलाने से ई. स. आता है.
गुजरात के चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के वेरावल (काठियावाड़ में) के एक शिलालेख में
रसूल महंमद संवत् (हिजरी सन्) ६६२, विक्रम संवत् १३२०, वलभी संवत् ९४५ और सिंह संवत्
१५१ आषाढ़ कृष्णा १३ रविवार लिखा है४. इस लेख के अनुसार विक्रम संवत् और वलभी (गुप्त)
संवत् के बीच का अंतर ( १३२०-९४५ = ) ३७५ आता है परंतु यह लेख काठियावाड़ का होने के
कारण इसका विक्रम संवत् १३२० कार्तिकादि५ है जो चैत्रादि १३२१ होता है जिससे चैत्रादि
विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर ३७६ ही आता है जैसा कि ऊपर लिखा गया है.
चैत्रादि पूर्णिमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर सर्वदा ३७६ वर्ष का और
कार्तिकादि अमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर चैत्रशुक्ला १ से आश्विन
कृष्णा अमावास्या तक ३७५ वर्ष का और कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन कृष्णा अमावास्या तक
३७६ वर्ष का रहता है.
गुप्त संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से और महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा
गत लिखे मिलते हैं और जहां वर्तमान लिखा रहता है वहां एक वर्ष अधिक६ रहता है.
१. काठियावाड़ में गुप्त संवत् के स्थान में 'वलभी संवत्' लिखे जाने का पहिला उदाहरण ऊना गांव (जूनागढ़
राज्य में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल के चालुक्यवंशी सामंत बलवर्मन् के वलभी संवत् ५७४ (ई. स.
८६४) माघ शुद्ध ६ के दानपत्र में मिलता है (एं. इं; जि. ६, पृ. ६).
२. अल्बेरूनी ने 'वलभी संवत्' को वलभीपुर के राजा वलभ का चलाया हुआ माना है और उक्त राजा को गुप्त वंश
का अंतिम राजा बतलाया है परंतु ये दोनों कथन ठीक नहीं हैं क्योंकि उक्त संवत् के साथ जुड़ा हुआ 'वलभी' नाम उक्त
नगर का सूचक है न कि वहां के राजा का, और न गुप्त वंश का अंतिम राजा वलभ था. संभव है कि गुप्त संवत् के प्रारंभ से
७०० से अधिक वर्ष पीछे के लेखक अल्बेरूनी को 'वलभी संवत्' कहलाने का ठीक ठीक हाल मालूम न होने के कारण
उसने ऐसा लिख दिया हो अथवा उसको लोगों ने ऐसा ही कहा हो.
३. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ७. फ़्ली; गु. इं; भूमिका, पृ. ३०-३१.
४. रसुलमहमदसवत् ६६२ तथा श्रीनृप[वि]क्रमसं १३२० तथा श्रीमद्वलभिसं ९४५ तथा श्रीसिंहसं १५१ वर्षे आषाढवदि १३ रखौ
( इं. ऐं; जि. ११, पृ. २४२ ).
५. वेरावल के उक्त लेख के विक्रम संवत् को कार्तिकादि मानने का यह भी कारण है कि उसमें लिखा हुआ हिजरी
सन् ६६२ चैत्रादि विक्रम संवत् १३२० मार्गशीर्ष शुक्ला २ को प्रारंभ हुआ था, अतएव हि. स. ६६२ में जो आषाढ़ मास आया
वह चैत्रादि वि. सं. १३२१ ( कार्तिकादि १३२०) का ही था.
६. खेड़ा से मिले हुए वलभी के राजा धरसेन (चौथे) के गुप्त संवत् ३३० के दानपत्र में उक्त संवत् में मार्गशिर मास
अधिक होना लिखा है ( सं. ३०० ३० द्विमागीशिरशु २. इं. ऐं. जि. १५, पृ. ३४० ). गत गुप्त संवत् ३३० गत विक्रम
संवत् ( ३३०+३७६= ) ७०६ के मुताबिक होता है. गत विक्रम संवत् ७०६ में कोई अधिक मास नहीं था परंतु वि. स. ७०५
में मध्यम मान से मार्गशिर मास अधिक आता है इस लिये उक्त ताम्रपत्र का गुप्त संवत् ३३० वर्तमान ( ३२९ गत ) होना
चाहिये.
१९१८ के पत्र में"!
Look at the second digit of 1918: it looks identical to the digit in line 18!
And 1918 is obviously ১৯১৮ / १९१८ (April 2, 1918)!
So that digit IS ९ (nine)!
Wait, why did I think it was ६? Because in this font, ९ is shaped like a reverse curve or modern 9: a curve, loop at top, or curved like 9!
Wait, in line 30, it is "ई. स. १९१८" (1918)!
Wait, what about line 15: "ई. स. ६६३"?
Wait! In line 15, is it "६६३" or "६६३"? The first two digits are ६, ६! They are shaped like ६.
In line 30: "१९१८" -> first digit is १, second is ९, third is १, fourth is ८!
So that second digit is ९!
And in line 18: "८७ और ९१ के" -> the digit in ९१ is identical to the ९ in १९१८!
So it is definitely ९१ (91)!
Wait, what about line 19: "ई. स. ६६३ ६ के"?
Wait, is line 15 "ई. स. ६६३" or "ई. स. ६६३"?
Wait, Indra-bhattaraka died in
भारतीय संवत्. १७७
ऐसा पाया नहीं जाता. इस लिये उपर्युक्त ई. स. ६६३ की घटना गांगेय संवत् ८७ से कुछ पूर्व
की होनी चाहिये. यदि ऊपर के दोनों अनुमान ठीक हों तो गांगेय संवत् का प्रारंभ ई. स.
(६६३-८७ =) ५७६ से कुछ पूर्व अर्थात् ई. स. ५७० के आस पास होना चाहिये, परंतु जब तक
अन्य प्रमाणों से इस संवत् के प्रारंभ का ठीक निर्णय न हो तब तक हमारा अनुमान किया हुआ
इस संवत् के प्रारंभ का यह सन् भी अनिश्चित ही समझना चाहिये.
गांगेय संवत्वाले दानपत्रों में सबसे पहिला गांगेय संवत् ८७ का और सबसे पिछला
३५१ का है. यह संवत् ३५० वर्ष से कुछ अधिक समय तक प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
१२- हर्ष संवत्.
यह संवत् थानेश्वर के बैसवंशी राजा हर्ष (श्रीहर्ष, हर्षवर्द्धन, शीलादित्य) के राज्यसिंहासन
पर बैठने के समय से चला हुआ माना जाता है परंतु किसी लेख में इस संवत् के साथ हर्ष का नाम
जुड़ा हुआ अब तक नहीं मिला. स्वयं राजा हर्ष के दोनों दानपत्रों में भी केवल 'संवत्' ही लिखा है १.
अलबेरूनी लिखता है कि 'मैने कश्मीर के एक पंचांग में पढ़ा है कि श्रीहर्ष विक्रमादित्य से
६६४ वर्ष पीछे हुआ २. यदि अलबेरूनी के इस कथन का अर्थ ऐसा समझा जावे कि विक्रम संवत्
६६४ से हर्ष संवत् का प्रारंभ हुआ है तो हर्ष संवत् में ६६३ जोड़ने से विक्रम संवत् तथा ६०६-७
जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख में संवत् ३४ प्रथम पौष शुक्ला २ लिखा है ३. संभव है कि
उक्त लेख का संवत् हर्ष संवत् हो. केंब्रिज के प्रोफेसर ऐडम्स और विएना के डॉक्टर थाम ने हर्ष संवत्
० = ई. स. ६०६ (वि. सं. ६६३) मान कर गणित किया तो 'ब्रह्मसिद्धांत' के अनुसार ई. स. ६४०
अर्थात् वि. सं. ६६७ में पौष मास अधिक आता है ४. इससे भी वि. सं. और हर्ष संवत् के बीच का
अंतर (६६७-३४=) ६६३ तथा ई. स. और हर्ष संवत् का अंतर ६०६ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया
गया है. यह संवत् बहुधा संयुक्त प्रदेश तथा नेपाल में करीब ३०० वर्ष प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
अलबेरूनी ने विक्रम संवत् १०८८ के मुताबिक जिस श्रीहर्ष संवत् १४८८ का होना लिखा है
(देखो, ऊपर पृ. १७५) वह इस हर्ष संवत् से भिन्न होना चाहिये परंतु उसका प्रचलित होना किसी
शिलालेख, दानपत्र या पुस्तक से पाया नहीं जाता.
का एक होना अब तक कहीं लिखा नहीं मिला. दूसरी आपत्ति यह है कि उक्त दानपत्र में लिखे हुए राज्यवर्ष २० वें को
डॉ. फ्लीट ने उक्त सामंत का राज्यवर्ष मानकर उसके राज्य (शासन) का प्रारंभ शक संवत् (५३२-२०=) ५१२ अर्थात्
ई. स. ५६० से होना स्थिर कर वहीं से गांगेय संवत् का प्रारंभ मान लिया है, परंतु रेवती द्वीप मंगलीश्वर ने ही विजय
किया था (गौ; सो. प्रा. इ; पृ. २३) इस लिये उक्त दानपत्र का राज्यवर्ष उक्त सामंत का नहीं किंतु उसके स्वामी मंग-
लीश्वर का ही होना चाहिये जैसा कि डॉ० सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर का मानना है. तीसरी बात यह है कि उक्त
सामंत का कोंकण से गंजाम ज़िले में जाकर नवीन राज्य स्थापित करना मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसी
दशा में डॉ. फ्लीट का गांगेय संवत्संबंधी कथन स्वीकार नहीं किया जा सकता.
१. बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष के दान पत्र में 'संवत् २० २ (=२२) कात्ति[क]वदि १' (एं. इं; जि ४, पृ. २११)
और मधुवन से मिले हुए दानपत्र में 'संवत् २० ५ (=२५) मार्गशीर्षवदि ६' (एं. इं; जि. १, पृ. ७२) लिखा है.
२. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ५.
३. संवत् ३० ४ (=३४) प्रथमपौषशुक्लद्वितीयायाम् (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ७३, लेखसंख्या ५३०).
४. इं. ऐं; जि. १५, पृ. ३३८.
१७८ प्राचीनलिपिमाला.
१३-भाटिक (भट्टिक) संवत्.
भाटिक (भट्टिकं) संवत् जैसलमेर के दो शिलालेखों में मिला है. भट्टि या भटिक (भाटी)
नामक राजा जैसलमेर के राजाओं का प्रसिद्ध पूर्वज था जिसके नाम से उसके वंशज भाटी कहलाये.
यह संवत् राजा भटिक (भाटी) का चलाया हुआ होना चाहिये१. जैसलमेर के लक्ष्मीनारायण के
मंदिर के शिलालेख में, जो वहां के राजा वैरिसिंह के समय का है, वि. सं. १४६४ और भाटिक संवत्
८१३ लिखा है२ जिससे वि. सं. और भाटिक संवत् का अंतर (१४६४-८१३=) ६८१ आता है. वहीं
के महादेव के मंदिर के लेख में, जो रावल भीमसिंह के समय का है, वि. सं. १६७३, शक संवत्
१५३८ और भाटिक संवत् ६६३ मार्गशीर्ष मास लिखा है३. इस हिसाब से वि. सं. और भाटिक
संवत् के बीच का अंतर (१६७३-६६३=) ६८० आता है. इन दोनों लेखों से पाया जाता है
कि भाटिक संवत् में ६८०-८१ मिलाने से विक्रम संवत् और ६२३-२४ मिलाने से ई. स.
आता है.
अभी तक जैसलमेर राज्य के प्राचीन लेखों की खोज बिलकुल नहीं हुई जिससे यह पाया
नहीं जाता कि कब से कब तक इस संवत् का प्रचार रहा.
१४-कोल्लम् (कोलंव) संवत्.
इस संवत् को संस्कृत लेखों में कोल्लंभ४ संवत् (वर्ष) और तमिळ में 'कोल्लम् आंडु'
(कोल्लम्=पश्चिमी, और आंडु=वर्ष) अर्थात् पश्चिमी [भारत का] संवत् लिखा है. यह संवत्
किसने और किस घटना की यादगार में चलाया इस विषय में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता.
इसके वर्षों को कभी 'कोल्लम् वर्ष' और कभी 'कोल्लम के उद्भव से वर्ष' लिखते हैं, जिससे
अनुमान होता है कि भारत के पश्चिमी तट पर के मलबार प्रदेश के कोल्लम् (किलोन, त्रावनकोर राज्य
१. चारण रामनाथ रत्नू ने अपने 'इतिहास राजस्थान' में भाटीजी (भट्टिक. भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२
दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं
देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रति-
हार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष
शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था.
यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब
से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय
भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव,
मजमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्रस्किन का जैसलमेर का गज़ेटिअर, पृ. ६-१०, और
टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की
गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का
चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय
की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.
२. संवत् श्रीविक्रमार्कसमयातीतसंवत् १४६४ वर्षे भाटिके संवत् ८१३ प्रवर्तमाने महामांगल्य........चंद्रे (प्रो. श्रीधर आर.
भंडारकर की संस्कृत पुस्तकों की तलाश की ई. स. १९०४-५ और १९०५-६ की रिपोर्ट, पृ. ६५).
३. स्वस्ति श्रीनृपविक्रमादिता (त्य) समयातात (तीत) संवत् १६७३ रामाश्र्वभूपतौ वर्षे शाके १५३८ वसुरामशरैके प्रवृत्तमन (र्तमाने)
भाटिक ६६३ मार्ग (र्गि) शिर....(उपर्युक्त रिपोर्ट, पृ. ६८).
४. श्रीमत्कोलंभवर्षे भवति गुणखणिश्रेणिश्रादित्यवर्मा वञ्चीपालो (इं. पँ; जि. २, पृ. ३६०).
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