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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 318 में से

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पृष्ठ 193

१६४ प्राचीनलिपिमाला.
४-बुद्धनिर्वाण संवत्.
बौद्धों में बुद्ध (शाक्यमुनि) के निर्वाण से जो संवत् माना जाता है उसको 'बुद्धनिर्वाण
संवत्' कहते हैं. यह बौद्ध ग्रंथों में लिखा मिलता है और कभी कभी शिलालेखों १ में भी. बुद्ध का
निर्वाण किस वर्ष में हुआ इसका यथार्थ निर्णय अब तक नहीं हुआ. सीलोन २ (सिंहलद्वीप, लंका),
ब्रह्मा और स्याम में बुद्ध का निर्वाण ई. स. से ५४४ वर्ष पूर्व होना माना जाता है और ऐसा ही आसाम
के राजगुरु मानते हैं ३. चीनवाले ई. स. पूर्व ६३८ में उसका होना मानते हैं. ४ चीनी यात्री फाहियान
ने, जो ई. स. ४०० में यहां आया था, लिखा है कि इस समय तक निर्वाण से १४६७ वर्ष व्यतीत हुए हैं ४.
इससे बुद्ध के निर्वाण का समय ई. स. पूर्व (१४६७-४००=) १०६७ के आस पास मानना पड़ता
है. चीनी यात्री हुएन्ट्सांग ने निर्वाण से १०० वें वर्ष में राजा अशोक (ई. स. पूर्व २६६ से २२७
तक) का राज्य दूर दूर फैलना बतलाया है ५. जिससे निर्वाणकाल ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के
बीच आता है. डॉ. बूलर ने ई. स. पूर्व ४८३-२ और ४७२-१ के बीच ६, प्रोफ़ेसर कर्न ७ ने ई. स.
पूर्व ३८८ में, फ़र्गसन ° ने ४८१ में, जनरल कनिंगहाम् ने ८ ४७८ में, मॅक्समूलर ९ ने ४७७ में,
पंडित भगवानलाल इंद्री ने १० ६३८ में (गया के लेख के आधार पर), मिस् डफ़ने ११ ४७७ में,
डॉ. बार्नेट ने १२ ४८३ में, डॉ. फ्लीट ने १३ ४८२ में और वी. ए. स्मिथ १४ ने ई. स. पूर्व ४८७ या ४८६ में
निर्वाण होना अनुमान किया है. बुद्धनिर्वाण संवत्वाले अधिक लेख न मिलने तथा विद्वानों में
इसके प्रारंभ के विषय में मतभेद होने पर भी अभी तो इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ४८७ के आस
पास होना स्वीकार करना ठीक जचता है, परंतु वही निश्चित है ऐसा नहीं कहा जा सकता.
५-मौर्य संवत्.
उदयगिरि (उडीसे में कटक के निकट) की हाथी गुंफा में जैन राजा खारवेल (महामेघवाहन)
का एक लेख है जो मौर्य संवत् (मुरियकाल) १६५ का है १५. उक्त लेख को छोड़ कर और कहीं
सिद्धीदो उप्पणगो सगणिओ अहवा (पाठान्तरं) ॥ (त्रिलोकप्रज्ञप्ति-देखो, 'जैनहितैषी मासिक पत्र', भाग १३, अंक १२, दिसंबर
१६१७, पृ. ५३३).
१. भगवति परिनिर्वृते सम्वत् १८१३ कार्तिकवदि १ बुधे (गया का लेख. इं. पैं; जि. १०, पृ. ३४३).
२. कॉर्पस् इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् (जनरल् कनिंगहाम संपादित), जि. १, भूमिका, पृ. ३.
३. प्रि; पैं; जि. २, यूसफुल् टेवल्स, पृ. १६४. ४. बी; बु. रे. वे. व; जि. १ की भूमिका, पृ. ७५.
५. बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५०. ६. इं. पैं; जि. ६, पृ. १४७. ७. साइक्लोपीडिआ ऑफ़ इंडिया, जि. १, पृ. ४६२.
८. कॉर्पस इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् जि. १ की भूमिका, पृ. ६. ९. मॅ; हि. ए. सं. लि; पृ. २६८.
१०. इं. पैं; जि. १०, पृ. ३४६. ११. ड; क्रॉ. ई; पृ. ६.
१२. बा; पैं. ई; पृ. ३७. १३. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८०६, पृ. ६६७.
१४. स्मि; आ. हि. इं; पृ. ४७ (तीसरा संस्करण).
१५. पनंतरीयसठिवससते राजमुरियकाले वोछिन्ने च चोयठअग्रसतिकुतरियं (पंडित भगवानलाल इंद्री संपादित 'दी हाथी
गुफा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स). डॉक्टर स्टैन कॉनो ने ई. स. १६०५-६ की आर्किआलाजिकल सर्वे की रिपोर्ट में
लिखा है कि 'इस वर्ष कलिंग के राजा खारवेल के प्रसिद्ध हाथी गुंफा के लेख की नकल (प्रतिकृति) तय्यार की गई...
वह लेख मौर्य संवत् १६५ का है' (पृ. १६६). उक्त पुस्तक की समालोचना करते हुए डॉक्टर फ्लीट ने उक्त लेख के संवत्
संबंधी अंश के विषय में लिखा कि 'उक्त लेख में कोई संवत् नहीं है किंतु वह यह बतलाता है कि खारवेल ने कुछ मूल
पुस्तक और ६४ वें अध्याय अथवा [जैनों के] सात अंगों के किसी अन्य विभाग का पुनरुद्धार किया, जो मौर्य काल से
उच्छिन्न हो रहा था' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१०, पृ. २४३-४४). डॉ. फ्लीट के इस कथनानुसार प्रो. लूडर (ऐं. इं; जि.
१०, ब्राह्मी लेखों की सूची, पृ. १६१) और वी. ए. स्मिथ ने (स्मि; आ. हि. इं; पृ. २०७, टि. २) उक्त लेख में कोई संवत् न
होना मान लिया है, परंतु थोड़े ही समय पूर्व पश्चिमी भारत के आर्किआलॉजिकल् विभाग के विद्वान् सुपरिंटेंडेंट राखाल-
दास बेनर्जी ने उक्त लेख को फिर प्रसिद्ध करने के लिये उसकी प्रतिकृति तय्यार कर पढ़ा है. उनके कथन से पाया गया
कि उसमें मौर्य संवत् १६५ होना निर्विवाद है. ऐसी दशा में डा. फ्लीट आदि का कथन ठीक नहीं कहा जा सकता.