सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189
१६०प्राचीनलिपिमला.

के २५ वर्ष पूरे होने पर १ (२६ वें वर्ष से) मानने हैं परंतु पुराण तथा ज्योतिष के ग्रंथों में इस
का प्रचार कलियुग के पहिले से होना माना गया है २.
(अ). 'राजतरंगिणी' में कल्हण पंडित लिखता है कि 'इस समय लौकिक [संवत्] के
२४ वें (वर्तमान) वर्ष में शक संवत् के १०७० वर्ष बीत चुके हैं' ३. इस हिसाब से वर्तमान ४
लौकिक संवत् और गत शक संवत् के बीच का अंतर (१०७०-२४=) १०४६=४६ है. अर्थात्
शताब्दी के अंकराहित सप्तर्षि संवत् में ४६ जोड़ने से शताब्दीरहित शक (गत), ८१ जोड़ने से
चैत्रादि विक्रम (गत), २५ जोड़ने से कलियुग (गत) और २४ या २५ जोड़ने से ई. स. (वर्तमान)
आता है.
(आ). चंबा से मिले हुए एक लेख में विक्रम संवत् (गत) १७१७, शक संवत् १५८२
(गत) और शास्त्र संवत् ३६ वैशाख वति (वदि) ५ १३ बुधवार ६ लिखा है. इससे भी वर्तमान
शास्त्र संवत् और [गत] विक्रम संवत् (१७१७-३६=१६८१=८१) तथा शक संवत् (१५८२-३६=
१५४६=४६) के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार ही आता है.
(इ). पूना के दक्षिण कॉलेज के पुस्तकालय में शारदा (कश्मीरी) लिपि का 'काशि-
कावृत्ति' पुस्तक है जिसमें गत विक्रम संवत् १७१७ और सप्तर्षि संवत् ३६ पौष वति (वदि)


१. कालेर्गतेः सायकनेत्र(२५)वर्षैः सप्तर्षिवर्यास्त्रिदिवं प्रयाताः । लोके हि संवत्सरपत्रिकायां सप्तर्षिमानं प्रवदन्ति सन्तः ॥ (डॉ.
वूलर की कश्मीर की रिपोर्ट; पृ. ६०).
२. क; इं; ई; पृ. ४.
३. लौकिकाब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः (राजतरंगिणी, तरंग १, श्लोक ५२).
४. सप्तर्षि संवत् के वर्ष वर्तमान और कलियुग, विक्रम तथा शक संवतों के वर्ष पंचांगों में गत लिखे रहते हैं.
ता० १२ एप्रिल ई. स. १९१८ को जो चैत्रादि विक्रम संवत् १९७५ और शक संवत् १८४० प्रवेश हुआ उसको लोग वर्तमान
मानते हैं. परंतु ज्योतिष के हिसाब से वह गत है, न कि वर्तमान. मद्रास इहाते के दक्षिणी विभाग में अबतक शक संवत्
के वर्तमान वर्ष लिखे जाते हैं तो वहां का वर्ष बंबई इहाते तथा उत्तरी भारतवर्ष के पंचांगों के शक संवत् से एक वर्ष आगे
रहता है.
५. 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव
में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों
के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में
संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त
रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १४६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या
'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब';
'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त
रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल'
के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को मिला कर लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से)
बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और
'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख
खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५.
ई. पं; जि. १६, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही
उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि
पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'बदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप-
र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे
कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्ठिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत
रूप) का 'उ०' (इं. पं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है
और कहीं नहीं भी.
६. श्रीमन्नृपतिविक्रमादित्यसंवत्सरे १७१७ श्रीशालिवाहनशके १५८२ श्रीशास्त्रसंवत्सरे ३६ वैशाष(ख)वदि त्रयोदश्यां दु(बु)धवासरे
मेषेर्कसंक्रान्तौ (इं. पं; जि. २०, पृ. १५२ ).