प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट.
भारतीय संवत् १.
भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों में समय समय पर भिन्न भिन्न संवत् चलते रहे जिनके प्रारंभ
आदि का हाल जानना प्राचीन शोध के अभ्यासियों के लिये आवश्यक है, इस लिये उनका संक्षेप
से विवेचन किया जाता है.
१- सप्तर्षि २ संवत्.
सप्तर्षि संवत् को लौकिककाल, लौकिक संवत् ३, शास्त्र संवत् ४, पहाड़ी संवत् ५ या कच्चा
संवत् ६ भी कहते हैं. यह संवत् २७०० वर्ष का कल्पित चक्र है जिसके विषय में यह मान लिया
गया है कि सप्तर्षि नाम के सात तारे अश्विनी से रेवती पर्यंत २७ नक्षत्रों में से प्रत्येक पर
क्रमशः सौ सौ वर्ष तक रहते हैं ७. २७०० वर्ष में एक चक्र पूरा हो कर दूसरे चक्र का
प्रारंभ होता है. जहां जहां यह संवत् प्रचलित रहा या है वहां नक्षत्र का नाम नहीं
लिखा जाता, केवल १ से १०० तक के वर्ष लिखे जाते हैं. १०० वर्ष पूरे होने पर शताब्द्दी का
अंक छोड़ कर फिर एक से प्रारंभ करते हैं. कश्मीर के पंचांग ८ तथा कितने एक पुस्तकों ९ में
कभी कभी प्रारंभ से भी वर्ष लिखे हुए मिलते हैं. कश्मीरवाले इस संवत् का प्रारंभ कलियुग
१. 'संवत्' शब्द 'संवत्सर' शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ 'वर्ष' है. कभी कभी इसके और भी संक्षिप्त
रूप 'संव', 'सं,' या 'स्व' और 'स' (प्राकृत लेखों में) मिलते हैं. संवत् शब्द को कोई कोई विक्रम संवत् का ही सूचक
मानते हैं परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह शब्द केवल 'वर्ष' का सूचक होने से विक्रम संवत्, गुप्त संवत् आदि प्रत्येक
संवत् के लिये आता है और कभी कभी इसके पूर्व उक्त संवतों के नाम भी (विक्रम संवत्, वलभी संवत् आदि) लिखे
मिलते हैं. इसके स्थान में वर्ष, अब्द, काल, शक आदि इसी अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग होता है.
२. सप्तर्षि नामक ७ तारों की कल्पित गति के साथ इसका संबंध माना गया है जिससे इसको 'सप्तर्षि संवत्'
कहते हैं.
३. कश्मीर आदि में शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर ऊपर के वर्षों के अंक लिखने का लोगों में प्रचार होने के
कारण इसको 'लौकिक संवत्' या 'लौकिक काल' कहते हैं.
४. विद्वानों के शास्त्रसंबंधी ग्रंथों तथा ज्योतिःशास्त्र के पंचांगों में इसके लिखने का प्रचार होने से ही इसको
शास्त्र संवत् कहते हैं.
५. कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी प्रदेश में प्रचलित होने से इसको पहाड़ी संवत् कहते हैं.
६. इस संवत् के लिखने में शताब्दियों को छोड़ कर ऊपर के ही वर्ष लिखे जाने से इसे कच्चा संवत् कहते हैं.
७. एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते (मुनयः) चरन्ति वर्षाणाम् (वाराही संहिता, अध्याय १३, श्लोक ४). सप्तर्षीणां तु यौ
पूर्वी दृश्येते उदितौ दिवि । तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते तत्समं निशि ॥ तेनैत ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् (भागवत, स्कंध १२,
अध्याय २, श्लोक २७-२८. विष्णुपुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५३-५४). पुराण और ज्योतिष के संहिताग्रंथों में
सप्तर्षियों की इस प्रकार की गति लिखी है वह कल्पित है. 'सिद्धांततत्वविवेक' का कर्त्ता कमलाकर भट्ट भी ऐसी गति को
स्वीकार नहीं करता (अद्यापि कैरपि नरैर्गतिराश्चर्यैर्द्दृष्टा न यात्र कथिता किल संहितासु । तत्काव्यमेव हि पुराणवदत्र तज्ज्ञास्तेनैव तत्व-
विषयं गदितुं प्रवृत्ताः ॥ (सिद्धांततत्वविवेक, भग्रहयुत्यधिकार, श्लोक ३२).
८. श्रीसप्तर्षिचारानुमतेन संवत् ४९६६ तथा च संवत् ६६ चैत्रसुति १ श्रीशाकाः १७१५ करणागताब्दा(ब्दाः) १०२८ दिनगणाः
४१२०१० श्रीविक्रमादित्यसंवत् १८५० कल्पगताब्दा(ब्दाः) १९७२९४८८६४ शेषाब्दा(ब्दाः) २३४७०५११३६....कलौ गतवर्षाणि
४८९४ शेषवर्षाणि ४२७१०६ (विक्रम संवत् १८५० का पंचांग, इं. ऐ.; जि. २०, पृ. १५०).
९. सप्तर्षिः(र्षि)संवत् ४६५१ आ[१]श्व[यु]जकृष्णसप्तमी मंगलं(ल)वासरं(रे) (हस्तलिखित 'ध्वन्यालोक'; इं. ऐ.; जि. २०,
पृ. १५१).