प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १६५
इस संवत् का उल्लेख १ नहीं मिलता. नंद वंश को नष्ट कर राजा चंद्रगुप्त ने ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास
मौर्य राज्य की स्थापना की थी अत एवं अनुमान होता है कि यह संवत् उसी घटना से चला हो.
यदि यह अनुमान ठीक हो तो इस संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास होना चाहिये.
६—सेल्युकिवि संवत्.
ई. स. पूर्व ३२३ में यूनान के बादशाह सिकंदर ( अलेक्जेंडर ) का देहांत होने पर उसके
सेनापति राज्य के लिये आपस में लड़ते रहे. अंत में तीन राज्य मकदूनिआ (मसिडानिआ,
ग्रीस में ), मिसर और सीरिआ ( बाबीलन् ) कायम हुए. सीरिआ का स्वामी सेल्युकस् निकाटोर
बना जिसके अधीन बाक्ट्रिआ आदि एशिया के पूर्वी देश भी रहे. सेल्युकस् के राज्य पाने के
समय अर्थात् ता. १ अक्टोबर ई. स. पूर्व ३१२ से उसका संवत् (सन्) चला जो बाक्ट्रिआ में
भी प्रचलित हुआ. हिंदुस्तान के काबुल तथा पंजाब आदि हिस्सों पर बाक्ट्रिआ के ग्रीकों (यूना-
नियों) का आधिपत्य होने के बाद उक्त संवत् का प्रचार भारतवर्ष के उन हिस्सों में कुछ कुछ
हुआ हो यह संभव है. यद्यपि अब तक कोई ऐसा लेख नहीं मिला कि जिसमें इस संवत् का
लिखा जाना निश्चयात्मक माना जा सके तो भी इस संवत् के साथ लिखे जानेवाले मसीडोनि-
अन् (यूनानी) महीने २ शक तथा कुशन वंशियों के समय के कितने एक खरोष्ठी लेखों में
मिल आते हैं. जिन लेखों में ये विदेशी महीने मिले हैं वे विदेशियों के खुदवाये हुए हैं. उनमें
दिये हुए वर्ष किस संवत् के हैं इसका अब तक ठीक निर्णय नहीं हुआ तो भी संभव है कि जो लोग
विदेशी मसीडोनिअन् (यूनानी) महीने लिखते थे वे संवत् भी विदेशी ही लिखते होंगे चाहे वह सेल्यु-
किडि (शताब्दियों के अंकसहित), पार्थिअन् ३ या कोई अन्य (शक) संवत् हो.
७—विक्रम संवत्.
विक्रम संवत् को मालव संवत् (मालव काल ४) भी कहते हैं. इसके संबंध में यह प्रसिद्धि चली
आती है कि मालवा के राजा विक्रम या विक्रमादित्य ने शकों का पराजय कर अपने नाम का संवत्
चलाया. धौलपुर से मिले हुए चाहमान (चौहान) चंडमहासेन के विक्रम संवत् ८६८ (ई. स. ८४१)
१. लोरिअन् तंगाई (स्वात ज़िले में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर खुदे हुए सं. ३१८ के खरोष्ठी लेख
(स ३१८ प्रोठवदस दि २७....आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, पृ. २५१) तथा हश्तनगर (पुष्कलावती) से मिली हुई बुद्ध की
(अपने शिष्यों सहित) मूर्ति के आसन पर खुदे सं. ३८४ (सं ३८४ प्रोठवदस मसस दिवसंमि पंचमि ५—ऍ. इं; जि. १२, पृ.
३०२) के लेख में दिया हुआ संवत् कौनसा है यह अनिश्चित है. संभव है कि उनका संवत् मौर्य संवत् हो.
२. मसीडोनिअन् महीनों के नाम क्रमशः हाइपर्बेरेटिअस् (Hyperberetæus), डिअस् (Dius), ऍपेलिअस्
(Apellæus), ॲॉडिनिअस् (Audynæus), पेरिटिअस् (Peritius), डिस्ट्स् (Dystrus), झाँथिकस (Xanthicus),
आर्टेमिसिअस् (Artemisius), डेसिअस् (Dæsius), पनेमस् (Panemus), लोअस्र् (Lous) और गॉर्पिण्अस्
(Gorpiæus) हैं. इनमें से पहिला हाइपर्बेरेटिअस् अंग्रेज़ी ऑक्टोबर के और अंतिम गॉर्पिण्अस् सेप्टेंबर के स्थानापन्न
है. अब तक इन मैसीडोनिअन् महीनों में से ४ महीने—ऍपेलिअस् (क; ई. इं; पृ. ४१), आर्टेमिसिअस् (हुविष्क के समय
के सं. ५१ के वर्डेक से मिले हुए पात्र पर के लेख में; ऍ. इं; जि. ११, पृ. २१०), डेसिअस् (दइसिक, कनिष्क के समय के
सं. ११ के सुएविहार के ताम्रलेख में; इं. ऍ; जि. १०, पृ. ३२६; जि. ११, पृ. १२८) और पनेमस् (क्षत्रप पतिक के तक्षशिला
से मिले हुए सं. ७८ के ताम्रलेख में; ऍ. इं; जि. ४, पृ. ५५)—लेखों में मिले हैं.
३. पार्थिअन् संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व २४७ के मध्य के आस पास होना माना जाता है (क; ई. इं; पृ. ४६).
४. मालवालाच्चरदां षड्विंशत्युतेष्वतीतेषु नवसु शतेषु (ग्यारिसपुर का लेख; क; आ. स. रि; जि. १०, शेट ११).