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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 318 में से

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पृष्ठ 190

भारतीय संवत् . १६१
३ रवि वार और तिष्य ( पुष्य ) नक्षत्र लिखा है. १ इससे भी सप्तर्षि और विक्रम संवत् के बीच का
अंतर ऊपर लिखे अनुसार ( १७१७-३६ = १६८१ = ८१ ) ही आता है.
सप्तर्षि संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है और इसके महीने पूर्णिमांत हैं. इस
संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान २ ही लिखे जाते हैं. प्राचीन काल में इस संवत् का प्रचार कश्मीर
और पंजाब में था परंतु अब कश्मीर तथा उसके आस पास के पहाड़ी इलाकों में ही, विशेष कर
ज्योतिषियों में, रह गया है.
२-कलियुग ३ संवत्.
कलियुग संवत् को भारतयुद्ध संवत् और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं. इस संवत् का विशेष
उपयोग ज्योतिष के ग्रंथों तथा पंचांगों में होता है तो भी शिलालेखादि में भी कभी कभी इसमें
दिये हुए वर्ष मिलते हैं ४. इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ३१०२ तारीख १८ फरवरी के प्रातःकाल से
माना जाता है. चैत्रादि विक्रम संवत् १९७२ ( गत ) और शक संवत् १८४० ( गत ) के पंचांग में गत
कलि ५०१६ लिखा है. इस हिसाब से चैत्रादि गत विक्रम संवत् में ( ५०१६-१९७२ = ) ३०४४,
गत शक संवत् में ( ५०१६-१८४० = ) ३१७६, और ई. स. में ३१०१ जोड़ने से गत कलियुग संवत्
आता है.
दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशि ( दूसरे ) के समय के, एहोले की पहाड़ी पर के
जैन मंदिर के शिलालेख में भारतयुद्ध से ३७३५ और शक राजाओं ( शक संवत् ) के ५५६ वर्ष
बीतने पर उक्त मंदिर का बनना बतलाया है ५. उक्त लेख के अनुसार भारत के युद्ध ( भारत-
युद्ध संवत् ) और शक संवत् के बीच का अंतर ( ३७३५-५५६ = ) ३१७९ वर्ष आता है. ठीक यही
अंतर कलियुग संवत् और शक संवत् के बीच होना ऊपर बतलाया गया है, अतएव उक्त लेख के
अनुसार कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् एक ही हैं. भारत के युद्ध में विजयपाने से राजा युधि-
ष्ठिर को राज्य मिला था जिससे इस संवत् को युधिष्ठर संवत् ६ भी कहते हैं. पुराणों में कलियुग का

१. श्रीनृपविक्रमादित्यराज्यस्य गताब्दाः १७१७ श्रीसप्तर्षिमते संवत् ३६ पौ [व]ति ३ रवौ तिष्यनक्षत्रे ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५२ ).
२. कभी कभी गत वर्ष भी लिखे मिलते हैं, जैसे कि कय्यटरचित 'देवीशतक' की टीका के अंत में यह श्लोक है-
वसुमुनिगगनोदधिसमकाले याते कलेस्तथा लोके ।
द्वापञ्चाशे वर्षे रचितेयं भीमगुप्तनृपे ॥ ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५४ ).
यहां पर गत कलियुग संवत् ४०७८ और लौकिक संवत् ५२ दिया है जो गत है ('याते' दोनों के साथ लगता है)
क्योंकि वर्तमान ५३ में ही गत कलियुग संवत् ४०७८ आता है. परंतु ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
३. हिंदुओं की कालगणना के अनुसार कलियुग एक महायुग का १० वां अंश मात्र है. महायुग में ४ युग माने जाते हैं
जिनको कृत, त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं. कलियुग ४३२००० वर्ष का, द्वापर उससे दुगुना अर्थात् ८६४००० वर्ष का,
त्रेता तिगुना अर्थात् १२९६००० वर्ष का और कृत चौगुना अर्थात् १७२८००० वर्ष का माना जाता है. इस प्रकार एक
महायुग, जिसको चतुर्युगी भी कहते हैं, कलियुग से १० गुना अर्थात् ४३२०००० वर्ष का माना जाता है. ऐसे ७१ महायुग
का एक मन्वंतर कहलाता है. १४ मन्वंतर और ६ महायुग अर्थात् १००० महायुग (=४३२००००००० वर्ष ) को एक कल्प
या ब्रह्मा का दिन कहते हैं और उतने ही वर्षों की रात्री भी मानी गई है.
४. अष्टाचत्वारिंशदधिकत्रिशतो [त्त] रेषु चतुःसहस्रेषु कलियुगसंवत्सरेषु परावृत्तेषु सत्सु । स्वराज्यानुभवकाले पंचमे साधारणसंवत्सरे
( गोवा के कदंबवंशी राजा शिवचित्त [ षष्ठदेव दूसरे ] के समय के दानपत्र से. इं. ऍ; जि. १४, पृ. २९० ).
५. त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः [ । ] सप्ताब्दशतयुक्तेषु श(ग)तेष्वब्देषु पंचसु [ ॥ ] पंचाशत्सु कलौ काले षट्सु पंचशतासु
च [ । ] समासु समतीतासु शकानामापि भूभुजाम् ( ऍ. ई.; जि. ६, पृ. ७ ).
६. डॉ० कीलहॉर्न संगृहीत दक्षिण के लेखों की सूची, पृ. १६२, लेखसंख्या १०१७.