प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ प्राचीनलिपियाला.
प्रारंभ कृष्ण के स्वर्गारोहण १ से अर्थात् भारत के युद्ध के पीछे माना है परंतु उसको पिछले विद्वानों
ने स्वीकार नहीं किया. वराहमिहिर लिखता है कि युधिष्ठिर के राज्यसमय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर
थे और उस राजा का शककाल ( संवत् ) २५२६ वर्ष रहा २ अर्थात् उसके संवत् के २५२६ वर्ष बीतने
पर शक संवत् चला. इससे महाभारत के युद्ध का द्वापर के अंत में नहीं किंतु कलियुग संवत् के
(३१७६-२५२६=) ६५३ वर्ष व्यतीत होने पर होना मानना पड़ता है. कल्हण पंडित कश्मीर के
राजाओं के राज्यसमय के विषय में लिखते हुए कहता है कि 'द्वापर के अंत में भारत [ युद्ध ] हुआ
इस दंतकथा से विमोहित हो कर कितने एक [विद्वानों] ने इन राजाओं का राज्यकाल गलत मान
लिया है.......जब कलि के ६५३ वर्ष व्यतीत हुए तब कुरुपांडव हुए ३' अर्थात् भारत का युद्ध हुआ.
यह कथन वराहमिहिर के उपर्युक्त कथन के अनुसार ही है.
पुराणों में परीक्षित के जन्म ४ ( महाभारत के युद्ध) से लगा कर महापद्म (नंद) के राज्या-
भिषेक तक १०५० ५ वर्ष होना भी लिखा मिलता है. महापद्म (नंद) के वंश का राज्य १०० वर्ष
तक रहा जिसके पीछे मौर्य चंद्रगुप्त ने राज्य पाया. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक ई. स. पूर्व ३२१ के
आसपास होना निश्चित है अतएव पुराणों के उपर्युक्त कथनानुसार भारत युद्ध का ई. स. पूर्व
(३२१+१००+१०५०=) १४७१ के आस पास होना मानना पड़ता है. पुराणों में दी हुई भारत के
युद्ध से लगा कर महापद्म (नंद) तक की वंशावलियों में मिलनेवाली राजाओं की संख्या ६ देखते
हुए भी यह समय ठीक प्रतीत होता है.
१. यदैव भगवद्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैव कलिरागतः (विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५५).
विष्णुर्भगवतो भानुः कृष्णाख्योऽसौ दिवं गतः । तदा विशत्कलिर्लोकं पाप यद्रमते जनः (भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २६.)
महाभारत से पाया जाता है कि पांडवों ने विजयी होने के बाद १५ वर्ष तक तो राजा (धृतराष्ट्र) की आज्ञा के अनुसार
सब कार्य किया. फिर भीम के वाग्बाण से खिन्न हो कर राजा विरक्त हुआ तब युधिष्ठिर स्वतंत्र राजा बना. फिर ३६ वें वर्ष
कृष्ण और यादवों के स्वर्गवास की खबर आई तब परीक्षित को राज्यसिंहासन पर बिठाला कर पांडवों ने द्रोपदी सहित
महाप्रस्थान किया' (इं. पं; जि. ४०, पृ. १६३-६४). इस हिसाब से तो कृष्ण का स्वर्गारोहण, पांडवों का महाप्रस्थान, एवं
पुराणों का कलियुग का प्रारंभ भारतयुद्ध से (१५+३६=) ५१ वर्ष बाद होना चाहिये.
२. आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य (वाराही संहिता, सप्त-
र्षिचार, श्लोक ३).
३. भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसङ्ख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४८ ॥....॥ शतेषु षट्सु सार्द्धेषु त्र्यधि-
केषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन्कुरुपांडवाः ॥ ५१ ॥ (राजतरंगिणी, तरंग १).
४. भारत का युद्ध हुआ उस समय परीक्षित गर्भ में था इसलिये उसका जन्म भारत के युद्ध की समाप्ति से कुछ ही
महीनों बाद हुआ होगा.
५. महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरं (मत्स्यपुराण, अध्याय २७३, श्लोक ३६. वायु-
पुराण, अ. ६६, श्लो. ४१५. ब्रह्मांडपुराण, मध्यम भाग, उपोद्घात पाद ३, अ. ७४, श्लो. २२७). यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषे-
चनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचदशोत्तरं (विष्णुपुराण, अंश ४, अ. २४, श्लो. ३२). आरभ्य भवतो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्ष-
सहस्रं तु शतं पंचदशोत्तरम् (भागवत, स्कंध १२, अ. २, श्लो. २६). इस प्रकार परीक्षित के जन्म से लगा कर महापद्म (नंद)
के राज्याभिषेक तक के वर्षों की संख्या मत्स्य, वायु और ब्रह्मांडपुराण में १०५०, विष्णु में १०१५ और भागवत में १११५ दी है.
अधिकतर पुराणों में १०५० ही है जिसको हमने स्वीकार किया है.
६. चंद्रवंशी अजमीढ के पुत्र ऋक्ष का वंशज और जरासंध का पुत्र सहदेव भारत के युद्ध में मारा गया. फिर उसका
पुत्र (या उत्तराधिकारी) सोमाधि (सोमापि) गिरिव्रज का राजा हुआ जिसके पीछे २१ और राजा हुए. ये २२* राजा
बार्हद्रथवंशी कहलाये. इस वंश के अंतिम राजा रिपुंजय को मार कर उसके मंत्री शौनक (पुलिक) ने अपने पुत्र प्रद्योत को
राजा बनाया. प्रद्योत के वंश में ५ राजा हुए जिनके पीछे शिशुनाग वंश के १० राजा हुए. जिनमें से १०वें राजा महानंदी का
- ब्रह्मांडपुराण में बार्हद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ और मत्स्य तथा वायु में ३२ दी है. विष्णु और भागवत में
संख्या नहीं दी. किसी पुराण में २२ से अधिक राजाओं की नामावली नहीं मिलती इसीसे हमने बार्हद्रथवंशी राजाओं की
संख्या २२ मानी है.