प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ प्राचीनलिपिमाला.
के शिलालेख में पहिले पहिल १ इस संवत् के साथ विक्रम का नाम जुड़ा हुआ मिलता है २. उसके
पहिले के अब तक के मिले हुए लेखों में विक्रम का नाम तो नहीं मिलता किंतु संवत् नीचे लिखे
अनुसार भिन्न भिन्न रीति से दिया हुआ मिलता है—
(१) मंदसौर से मिले हुए नरवर्मन् के समय के लेख में—'श्रीर्म्माळवगणाम्नाते प्रशस्ते कृत-
संज्ञिते [।] एकषष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये [॥] प्रावृक्का(ट्का)ले शुभे प्राप्ते' ३, अर्थात् 'मालवगण के
प्रचलित किये हुए प्रशस्त कृत संज्ञावाले ४६१ वें वर्ष के लगने पर वर्षा ऋतु में'.
(२) राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए नगरी (मध्यमिका, उदयपुर राज्य में)
के शिलालेख में—'कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वेकाशीत्युत्तरेष्वस्यां मालवपूर्वायाँ [४००] ८० १ कार्त्तिकशुक्ल-
पञ्चम्याम्', अर्थात् 'कृत [नामक] ४८१ [वें] वर्ष (संवत्) में इस मालवपूर्वा कार्तिक शुक्ल पंचमी
के दिन'.
(३) मंदसौर से मिले हुए कुमारगुप्त (प्रथम) के समय के शिलालेख में—'मालवानां
गणस्थित्या याते शतचतुष्टये । त्रिनवत्यधिकेब्दान्त्रि(मृ)तौ सेव्यघनस्तने ॥ सहस्यमासशुक्लस्य
प्रशस्तेह्नि त्रयोदशे' ४, अर्थात् 'मालवों के गण (जाति) की स्थिति से ४६३ वर्ष बीतने पर पौष
शुक्ल १३ को.'
(४) मंदसौर से मिले हुए यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के समय के शिलालेख में—'पञ्चसु
शतेषु शरदां यातेष्वेकान्नवतिसहितेषु । मालवगणस्थितिवशात्कालज्ञानाय लिखितेषु' ५ अर्थात् 'मालव
गण (जाति) की स्थिति के वश से कालज्ञान के लिये लिखे हुए ५८६ वर्षों के बीतने पर'.
(५) कोटा के पास के कणस्वा के शिव मंदिर में लगे हुए शिलालेख में—'संवत्सरशतैर्यातैः
सपञ्चनवत्यर्गलैः [।] सप्तभिर्म्माळवेशानां' ६, अर्थात् 'मालवा या मालव जाति के राजाओं (राजा)७ के
७६५ वर्ष बीतने पर'.
इन सब अवतरणों से यही पाया जाता है कि—
(अ) मालव गण (जाति) अथवा मालव (मालवा) के राज्य या राजा की स्वतंत्र
स्थापना के समय से इस संवत् का प्रारंभ होता था.
(आ) अवतरण १ और २ में दिये हुए वर्षों की संज्ञा 'कृत' ८ भी थी.
१. ध्रितिकि गांव (काठिआवाड़) से मिले हुए दानपत्र में विक्रम संवत् ७६४ कार्तिक कृष्णा अमावास्या, आदि-
त्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण लिखा है (इं. पं; जि. १२, पृ. १५५) परंतु उक्त तिथि को आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र
और सूर्यग्रहण न होने, और उसकी लिपि इतनी प्राचीन न होने से डॉ. फ़्लीट और कीलहॉर्न ने उसको जाली ठहराया है.
२. वसु नव [अ]ष्टौ वर्षा गतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य [।] वैशाखस्य सिताया(यां) रविवारयुतद्वितीयायां (इं. पं.; जि. १६, पृ. ३५.)
३. एं. इं; जि. १२, पृ. ३२०.
४. फ़्ली; गु. इं; पृ. ८३. ५. फ़्ली; गु. इं; पृ. १५४. ६. इं. पं; जि. १६, पृ. ५६.
७. मैनालगढ़ (उदयपुर राज्य में) से मिले हुए अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वीभट) के समय के लेख
के संवत् १२२६ को मालवा के राजा का संवत् कहा है (मालवेशगतवत्सर(रैः) शतैः द्वादशैश्च षट्(ड्रि)विंशपूर्वकैः) (ज. ए. सो;
बंगा. जि. ५५, भाग १, पृ. ४६).
८. संवत् के साथ 'कृत' शब्द अब तक केवल ४ शिलालेखों में मिला है. डॉ. फ़्लीट ने इसका अर्थ 'गत' अर्थात्
गुजरे हुए [वर्ष] अनुमान किया था परंतु गंगधार के शिलालेख में 'कृतेषु' और 'यातेषु' (=गत) दोनों शब्द होने से
उस अनुमान को ठीक न माना. मंदसौर के लेख में 'कृतसंज्ञिते' लिखा है (देखो, ऊपर अवतरण १) उसमें 'कृत' वर्ष का
नाम होना पाया जाता है. जैसे प्राचीन लेखों में १२ वर्ष (महाचैत्रादि) और ६० वर्ष (प्रभवादि) के दो भिन्न भिन्न
बार्हस्पत्यमान (चक्र) मिलते हैं वैसे ही वैदिक काल में ४ वर्ष का एक युगमान (चक्र) भी था (देखो, आर. शाम-
शास्त्री का 'गवामयन' पृ. ३, १३८). इस युगमान के वर्षों के नाम वैदिक काल के जुए के पासों की नांई (देखो, ऊपर
पृ. २१ और उसी के टिप्पण ३-५) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि थे, और उनकी रीति के विषय में यह अनुमान होता है
कि जिस गत वर्ष में ४ का भाग देने से कुछ न बचे उस वर्ष की 'कृत', ३ बचे उसकी 'त्रेता', २ बचे उसकी 'द्वापर',
और १ बचे उसकी 'कलि' संज्ञा होती हो. जैनों के 'भगवतीसूत्र' में युगमान का ऐसा ही उल्लेख मिलता है. उसमें
लिखा है कि 'थुगं चार हे कयजुम्म (कृत), व्योज (त्रेता), दावरजुम्म (द्वापर) और कलिजुग (कलि). जिस संख्या