प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १६३
'भारत युद्ध के समयसंबंधी ऊपर उद्धृत किये हुए भिन्न भिन्न मतों' पर से यही कहा जा
सकता है कि पहिले के कितने एक लेखकों ने कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् को एक माना है
परंतु भारत का युद्ध कलियुग के प्रारंभ में नहीं हुआ.
३-वीरनिर्वाण संवत्.
जैनों के अंतिम तीर्थंकर महावीर (वीर, वर्द्धमान) के निर्वाण (मोक्ष) से जो संवत् माना
जाता है उसको 'वीरनिर्वाण संवत्' कहते हैं. उसका प्रचार बहुधा जैन ग्रंथों में मिलता है तो
भी कभी कभी उसमें दिये हुए वर्ष शिलालेखों में भी मिल आते हैं.
(अ) श्वेतांबर मेरुतुंगसूरि ने अपने 'विचारश्रेणि' नामक पुस्तक में वीरनिर्वाण संवत् और
विक्रम संवत् के बीच का अंतर ४७० दिया है १. इस हिसाब से विक्रम संवत् में ४७०, शक संवत् में
६०५ और ई. स. में ५२७ मिलाने से वीरनिर्वाण संवत् आता है.
(आ) श्वेतांबर अंबदेव उपाध्याय के शिष्य नेमिचंद्राचार्य रचित 'महावीरचरियं' नामक प्राकृत
काव्य में लिखा है कि 'मेरे (महावीर के) निर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बीतने पर शक
राजा उत्पन्न होगा २. इससे भी वीरनिर्वाण संवत् और शक संवत् के बीच ठीक वही अंतर आता
है जो ऊपर लिखा गया है.
(इ) दिगंबर संप्रदाय के नेमिचंद्र रचित 'त्रिलोकसार' नामक पुस्तक में भी वीरनिर्वाण से
६०५ वर्ष और ५ महीने बाद शक राजा का होना लिखा है ३. इससे पाया जाता है कि दिगंबर
संप्रदाय के जैनों में भी पहिले वीरनिर्वाण और शक संवत् के बीच ६०५ वर्ष का अंतर होना स्वीकार
किया जाता था जैसा कि श्वेतांबर संप्रदायवाले मानते हैं, परंतु 'त्रिलोकसार' के टीकाकार माधव-
चंद्र ने त्रिलोकसार में लिखे हुए 'शक' राजा को भूल से 'विक्रम'४ मान लिया जिससे कितने एक
पिछले दिगंबर जैन लेखकों ने विक्रम संवत् से ६०५ ५ (शक संवत् से ७४०) वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण
होना मान लिया जो ठीक नहीं है. दिगंबर जैन लेखकों ने कहीं शक संवत् से ४६१, कहीं ६७६५
और कहीं १४७६३ ६ वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना भी लिखा है परंतु ये मत स्वीकार योग्य नहीं हैं.
पुत्र महापद्म (नंद) था. इस गणना के अनुसार महाभारत के युद्ध से लगा कर महापद्म की गद्दीनशीनी तक ३७ राजा
होते हैं जिनके लिये १०५० वर्ष का समय कम नहीं किंतु अधिक ही है क्योंकि औसत हिसाब से प्रत्येक राजा का राजत्व-
काल २८ वर्ष से कुछ अधिक ही आता है.
१. विक्रमरज्जारंभा परउ सिरिवीरनिव्वुई भणिया । सुन्न मुणिवेअयजुतो विक्रमकालउ जिणकालो ॥ विक्रमकालाज्जिनस्य वीरस्य कालो
जिनकालः शून्यमुनिबेदयुक्तः चत्वारिशतानि सप्तत्यधिकवर्षारिण श्रीमन्महावीरविक्रमादित्ययोरंतरमित्यर्थः (विचारश्रेणि). यह पुस्तक ई. स.
१३१० के आसपास बना था.
२. छहैं वासाणासएहिं पंचहिं वासेहिं पंचमासेहिं। मम निव्वुगोगयस्स उ उप्पज्जिस्सइ सगो राया ॥ (महावीरचरियं). यह पुस्तक
वि. सं. ११४१ (ई. स. १०८४) में बना था.
३. पणछस्सयवस्सं पंचामासजुदं गमित्र वीरनिव्वुइदो सगराजो० (त्रिलोकसार, श्लो. ८३८). यह पुस्तक वि. सं. की ११ वीं
शताब्दी में बना था. हरिवंशपुराण में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष बीतने पर शक राजा का होना लिखा है और मेघर्नादि
के श्रावकाचार में भी ऐसा ही लिखा है (इं. पूँ; जि. १२ पृ. २२).
४. श्रीवीरनाथनिर्वृत्तेः सकाशात् पञ्चोत्तरषट्छतवर्षाणि पञ्चमासयुतानि गत्वा पश्चात् विक्रमाङ्कशकराजोऽजायत (त्रिलोकसार के उप-
र्युक्त श्लोक की टीका).
५. दिगंबर जैनों के प्रसिद्ध तीर्थस्थान श्रवणबेल्गोला के एक लेख में वर्धमान(वीर) निर्वाण संवत् २४६३ में विक्रम
संवत् १८८८ और शक संवत् १७५२ होना लिखा है जिसमें वीरनिर्वाण संवत् और विक्रम संवत् का अंतर ६०५ आता है
(इं. एँ; जि. २५, पृ. ३४६). इस अशुद्धि का कारण माधवचंद्र की अशुद्ध गणना का अनुसरण करना ही हो.
६. वीरजिणं सिद्धिगदे चउसदइगिसडिवासपरिमाणो। कालंमि अदिक्कंतें उप्पणो एत्थ सगराओ ॥ अथवा वीरे सिद्धे सहस्सणवक्कंमि
सग(त)सयभहिये । पणसीदिंमि येतादे पचामासे सगशिओ जादा (पाठान्तरं) ॥ चोद्दससहस्ससग (त) सयतेणउदीवासकालविच्छेदे । वीरेसर-