प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
भारतवर्ष की वर्तमान लिपियां. १२६
१०० का चिह्न फिनिशियन् अंकों के १०० के चिह्न के ४ रूपों में से चौथे से मिलता हुआ है, केवल उसके
पूर्व एक की खड़ी लकीर अधिक लगी है. ऐसी दशा में इन चिह्नों में से ४ के चिह्न के सिवाय सब
का फिनिशियन् से निकला हुआ होना अनुमान होता है.
लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड.
इस खंड में ५ खड़ी पंक्तियां हैं जिनमें से पहिली और चौथी में वर्तमान नागरी अंक हैं
और दूसरी, तीसरी तथा पांचवीं में उन्हीं के सूचक खरोष्ठी अंक हैं. दूसरी पंक्ति में अशोक के शहबा-
ज़गढ़ी और मानसेरा के लेखों १ से और तीसरी तथा पांचवीं में शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों
के समय के संवत्वाले खरोष्ठी लेखों २ से अंक दिये गये हैं.
२१—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां.
( लिपिपत्र ७७ से ८१ ).
भारतवर्ष की समस्त वर्तमान आर्य लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि ही है. ये भिन्न भिन्न
लिपियां किन किन परिवर्तनों के बाद बनीं यह लिपिपत्र १ से ६४ तक में दी हुईं भिन्न भिन्न
लिपियों से मालूम हो सकता है. उन सब में नागरी सार्वदेशिक है और बहुधा सारे भारतवर्ष
में उसका प्रचार बना हुआ है इतना ही नहीं किंतु यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान आदि में जहां
जहां संस्कृत का पठनपाठन होता है वहां के संस्कृतज्ञ लोगों में भी उसका आदर है. हिंदी, मराठी
तथा संस्कृत के पुस्तक उसीमें छपते हैं. बाकी की लिपियां एकदेशिक हैं और भारतवर्ष के भिन्न
भिन्न विभागों में से किसी न किसी में उनका प्रचार है.
लिपिपत्र ७७ वां.
इस लिपिपत्र में शारदा ( कश्मीरी ), टाकरी और गुरुमुखी ( पंजाबी ) लिपियां तथा उनके
अंक दिये गये हैं.
शारदा लिपि—कश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी शारदा मानी जाती है जिससे वह देश
'शारदादेश' या 'शारदामंडल' कहलाता है और उसीपर से वहां की लिपि को 'शारदा लिपि'
कहते हैं. पीछे से उसको 'देवादेश' ३ भी कहते थे. मूल शारदा लिपि ई. स. की दसवीं शताब्दि के
आस पास 'कुटिल लिपि' से निकली और उसका प्रचार कश्मीर तथा पंजाब में रहा. उसीमें परि-
वर्तन होकर वर्तमान शारदा लिपि बनी जिसका प्रचार अब कश्मीर में बहुत कम रह गया है.
उसका स्थान बहुधा नागरी, गुरुमुखी या टाकरी ने ले लिया है.
टाकरी लिपि—यह शारदा का घसीट रूप है, क्योंकि इसके इ, ई, उ, ए, ग, घ, च, ञ,
ड, ढ, त, थ, द, ध, प, भ, म, य, र, ल और ह अक्षर वर्तमान शारदा के उक्त अक्षरों से मिलते
१. देखो, ऊपर पृ. १२८.
२. इन लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६ ; और पृ. ३३, टि. १, २.
३. फो; पँ. वं. स्टे; पृ. ४३, ४७.
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१३० प्राचीनलिपिमाला.
जुलते हैं. बाकी के अक्षरों में जो अंतर है वह विशेष कर त्वरा से तथा चलती कलम से पूरा अक्षर
लिखने से ही हुआ है. 'ख' के स्थान में 'ष' लिखा जाता है. जंबू तथा पंजाब के सारे उत्तरी
पहाड़ी प्रदेश में (शायद शिमला ज़िले को छोड़कर १) इसका प्रचार है और यह भिन्न भिन्न विभागों
में कुछ कुछ भिन्नता से लिखी जाती है. जो जंबू के इलाके में प्रचलित है उसको 'डोगरी'
और जो चंबा राज्य में लिखी जाती है उसको 'चमिआली' कहते हैं. जब महाजन आदि मामूली
पढ़े हुए लोग, जिनको स्वरों की मात्रा तथा उनके ह्रस्व दीर्घ का ज्ञान नहीं होता, इसको लिखते
हैं तब कभी कभी स्वरों की मात्राएं या तो नहीं लगाई जातीं या उनके स्थान पर मूल स्वर भी
लिख दिये जाते हैं. इसीसे टाकरी का पढ़ना बाहरवालों के लिये बहुत कठिन होता है और जो शिला-
लेख इस समय उसमैं खोदे जाते हैं उनका पढ़ना भी बहुधा कठिन होता है२. 'टाकरी' नाम
की उत्पत्ति का ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि 'ठाकुरी' (ठक्कुरी) शब्द से उसकी
उत्पत्ति हो अर्थात् राजपूत ठाकुरों (ठक्कुरों) की लिपि; अथवा टांक (लवाणा) जाति के व्यौपा-
रियों की लिपि होने के कारण इसका नाम टाकरी हुआ हो.
गुरुमुखी लिपि—पंजाब के महाजनों तथा अन्य मामूली पढ़े हुए लोगों में पहिले एक
प्रकार की 'लंडा' नाम की महाजनी लिपि प्रचलित थी, जिसमें सिंधी की नांई स्वरों की मात्राएं
लगाई नहीं जाती थीं और जो अब तक वहां पर कुछ कुछ प्रचलित है. ऐसा कहते हैं कि सिक्खों के
धर्मग्रंथ पहिले उसी लिपि में लिखे जाते थे जिससे वे शुद्ध पढ़े नहीं जाते थे, इसलिये गुरु अंगद
(ई. स. १५३८-५२) ने अपने धर्मग्रंथों की शुद्धता के लिये स्वरों की मात्रावाली नई लिपि, जिसमें
नागरी के समान शुद्ध लिखा और पढ़ा जावे, बनाई, जिससे उसको 'गुरुमुखी' अर्थात् 'गुरु के मुख
से निकली हुई' लिपि कहते हैं. इसके अधिकतर अक्षर उस समय की शारदा लिपि से ही लिये गये
हैं क्योंकि उ, ऋ, ओ, घ, च, छ, ट, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, भ, म, य, श, ष और स अक्षर अब तक
वर्तमान शारदा से मिलते जुलते हैं. इसके अंक नागरी से लिये गये हैं. सिक्खों के धर्मग्रंथ इसीमें
लिखे और छापे जाते हैं इतना ही नहीं किंतु नागरी के साथ साथ इसका प्रचार पंजाब में बढ़ रहा है.
लिपिपत्र ७८ वां.
इस लिपिपत्र में वर्तमान कैथी, बंगला और मैथिल लिपियां तथा उनके अंक दिये गये हैं.
कैथी लिपि—यह लिपि वास्तव में नागरी का किंचित् परिवर्तित रूप ही है. कायस्थ (कायथ)
अर्थात् अहलकार लोगों की त्वरा से लिखी जानेवाली लिपि होने से इसको 'कैथी' (कायथी) कहते
हैं. जैसे मामूली पढ़े हुए लोगों की लिपियों में संस्कृत की पूरी वर्णमाला का उपयोग नहीं होता
वैसे ही इसमें भी ऋ, ङ और ञ अक्षर नहीं है, और व तथा 'ब' में अंतर नहीं है. 'व' को 'ब' से
भिन्न बतलाने के लिये टाइप के अक्षरों में 'व' के नीचे एक बिंदी लगाई जाती है. अ, ख और झ
नागरी से भिन्न हैं जिनमें से 'अ' तो नागरी के 'श्र' को चलती कलम से लिखने में ऊपर ग्रंथि बन
जाने के कारण 'अ' सा बन गया है और 'ख' नागरी के 'ष' का विकार मात्र है. पहिले यह लिपि
गुजराती की नांई लकीर खींच कर लिखी जाती थी परंतु टाइप में सरलता के विचार से सिरखेंचक
लकीर मिटा दी गई है. बिहार की पाठशालाओं में नीचे की श्रेणियों में इस लिपि की छपी हुई पुस्तकें
पढ़ाई जाती हैं. देशभेद के अनुसार इसके मुख्य तीन भेद हैं अर्थात् मिथिला, मगध और भोजपुर
की कैथी.
२ फो; पैं. बं. स्टे; पृ. ४७.
बंगला लिपि—बंग ( बंगाल ) देश की लिपि होने के कारण इसको बंगला कहते हैं. प्राचीन
बंगला लिपि प्राचीन पूर्वी नागरी से निकली है (देखो, ऊपर पृ. ४३) और उसीमें परिवर्तन होते होते
वर्तमान बंगला लिपि बनी. इस लिपि में नागरी के समान अक्षर पूर्ण हैं और इसका साहित्य भारतवर्ष
की सब भाषाओं के साहित्य से बढ़ा हुआ है जिसका कारण यही है कि भारतवर्ष में सर्कार अंग्रेज़ी
का राज्य सब से पहिले बंगाल में हुआ जिससे विद्या का सूर्य वहां सबसे पहिले फिर उदय हुआ.
यह लिपि सारे बंगाल और आसाम में प्रचलित है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसमें छपने लग
गये थे परंतु अब वे बहुधा नागरी में ही छपते हैं. बंगभाषा के पुस्तक आदि ही इसमें छपते हैं.
मैथिल लिपि—मिथिला (तिरहुत) देश के ब्राह्मणों की लिपि, जिसमें संस्कृत ग्रंथ लिखे जाते हैं,
'मैथिल' कहलाती है. यह लिपि वस्तुतः बंगला का किंचित् परिवर्तित रूप ही है और इसका
बंगला के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि कैथी का नागरी से है. मिथिला प्रदेश के अन्य लोग
नागरी या कैथी लिखते हैं.
लिपिपत्र ७६ वां.
इस लिपिपत्र में उड़िया, गुजराती और मोडी ( मराठी ) लिपियां दी गई हैं.
उड़िया लिपि—उड्र ( उड़िया वा उड़ीसा ) देश की प्रचलित लिपि को उक्त देश के नाम
पर से उड़िया कहते हैं. यह लिपि पुरानी बंगला से निकली हो ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि
इसके अधिकतर अक्षर हन्नाकोल के लेख के अक्षरों से मिलते हुए हैं और ए, ऐ, ओ
और औ तो वर्तमान बंगला ही हैं. इस लिपि के अक्षर सरसरी तौर से देखनेवालों को विलक्षण
मालूम देंगे परंतु इस विलक्षणता का मुख्य कारण कुछ तो अक्षरों को चलनी कलम से लिखना
और कुछ उनके गोलाईदार लंबे सिर ही हैं जिनका दाहिनी ओर का अंश नीचे को झुका हुआ
रहता है. ये सिर भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पंडिघी और कामरूप के वैद्यदेव के दान-
पत्रों में मिलनेवाले ८ ऐसे सिरों ( देखो, लिपिपत्र ३३ ) के परिवर्द्धित रूप या विकास मात्र हैं. इन
सिरों को हटा कर देखा जावे तो मूल अक्षर बहुत ही सरल हैं. इस लिपि में स्वरों की मात्राओं के
चिह्न भी बंगला शैली के ही हैं.
गुजराती लिपि—गुजरात देश में प्रचलित होने के कारण इसको गुजराती कहते हैं. सारे
गुजरात, काठियावाड़ और कच्छ में इसका प्रचार है. काठियावाड़ के हालार विभाग के बहुत से
लोगों की भाषा कच्छी से मिलती हुई हालारी है और कच्छवालों की कच्छी है परंतु उन लोगों की
लिपि गुजराती ही है. यह लिपि भी कैथी की नांई नागरी का किंचित् विकृत रूप ही है. अ, इ,
ख, च, ज, झ, फ और ब ये आठ अक्षर त्वरा से लिखे जाने के कारण नागरी से अब भिन्न बन गये हैं.
उनमें से 'ख' तो 'ष' से बना है और 'इ' तथा 'झ' जैन शैली की नागरी से लिये हैं. इन आठों
अक्षरों का विकासक्रम नीचे बतलाये अनुसार है—
अ= अ अ अ અ. इ= इ इ ई ઈ. ख= ष ष ख ખ. च= च च च ચ.
ज= ज ज ज જ. झ= झ झ झ ઝ. फ= फ फ् फ્ ફ. ब= ब व ब બ.
गुजराती लिपि के अक्षर पहिले सिर की लकीर खींच कर लिखे जाते थे और व्यौपारी लोग
अब तक अपनी बहियों तथा पत्रों में वैसे ही लिखते हैं, परंतु टाइप बनानेवालों ने सरलता के लिये
सिरों के चिह्न मिटा दिये तब से वे बिना लकीर भी लिखे जाते हैं.
मोडी लिपि—इसकी उत्पत्ति के विषय में पूना की तरफ के कोई कोई ब्राह्मण ऐसां प्रसिद्ध
करते हैं कि हेमाडपंत अर्थात् प्रसिद्ध हेमाद्रि पंडित ने इसको लंका से लाकर महाराष्ट्र देश में प्रब-
लित किया, परंतु इस कथन में कुछ भी सत्यता नहीं पाई जाती क्योंकि प्रसिद्ध शिवाजी के पहिले
६१२ प्राचीनलिपिमाला
इसके प्रचार का कोई पता नहीं चलता. शिवाजी ने जब अपना नया राज्य स्थापित किया तब नागरी
को अपनी राजकीय लिपि बनाया परंतु उसके प्रत्येक अक्षर के ऊपर सिर की लकीर बनाने के कारण
कुछ कम त्वरा से वह लिखी जाती थी इस लिये उसको त्वरा से लिखी जाने के योग्य बनाने के
विचार से शिवाजी के 'चिटनीस' (मंत्री, सरिस्तेदार) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़
(तोड़ मरोड़) कर नई लिपि तय्यार की जिससे इसको 'मोड़ी' कहते हैं. पेशवाओं के समय में
बिवलकर नामक पुरुष ने उसमें कुछ और फेर फार कर अक्षरों को अधिक गोलाई दी२. यह लिपि
सिर के स्थान में लंबी लकीर खींच कर लिखी जाती है और बहुधा एक अथवा अधिक शब्द या
सारी पंक्ति चलती कलम से लिखी जाती है. इसमें 'इ', तथा 'ई' और 'उ' की मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है और न हलंत व्यंजन हैं. इसके अक्षरों में से 'इ' और 'ज' गुज-
राती के उक्त अक्षरों के समान हैं. 'ख', 'प', 'ब' और 'र' प्राचीन तेलुगु-कनड़ी के उक्त अक्षरों
से लिये हों ऐसा पाया जाता है. 'ट' और 'ठ' के रूप एकसा हैं; उनके बीच का भेद बतलाने के
लिये 'ठ' के बीच में एक बिंदी लगाई जाती है. अ, उ, क, ञ, य, ल, व, स और ह के रूपों में
नागरी से अधिक अंतर पड़ा है. बाक़ी के अक्षर नागरी से मिलते जुलते ही हैं. बंबई इहाते की
मराठी की प्रारंभिक पाठशालाओं में इसकी छपी हुई लिथो की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. इसका
प्रचार महाराष्ट्र देश की कचहरियों में है और मराठी बोलनेवाले बहुधा पत्रव्यवहार या हिसाब में
इसे काम में लाते हैं. बंबई इहाते के बाहर के मरहटों के राज्यों में भी इसका कुछ कुछ प्रचार है.
राजपूताने में इस लिपि में खुदे हुए दो शिलालेख भी देखने में आये जो मरहटों के समय के
ही हैं.
लिपिपत्र ८० वां.
इस लिपिपत्र में तेलुगु, कनड़ी और ग्रंथ लिपियां दी गई हैं.
तेलुगु और कनड़ी लिपियां—ये दोनों लिपिपत्र ४३ से ५१ में दी हुई प्राचीन तेलुगु-कनड़ी
लिपि से निकली हैं. इनके अधिकतर अक्षर परस्पर मिलते जुलते ही हैं. केवल उ, ऊ, ऋ, क, त, स
और ह में अंतर है. इन दोनों लिपियों में 'ए' और 'ओ' के ह्रस्व तथा दीर्घ, दो दो भेद हैं.
नागरी लिपि में यह भेद न होने से हमने दीर्घ 'ए' और दीर्घ 'ओ' के लिये नागरी के 'ए' और
'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनका भेद बतलाया है. तेलुगु लिपि का प्रचार मद्रास इहाते
के पूर्वी समुद्रतट के हिस्से, हैदराबाद राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों एवं मध्यप्रदेश के सब से
दक्षिणी हिस्से में है. कनड़ी लिपि का प्रचार बहुधा सारे मैसोर राज्य, कुर्ग, नीलगिरि प्रदेश, माइ-
सोर के निकट के पश्चिमी घाट प्रदेश और बंबई इहाते के दक्षिणी कोने (बीजापुर, बेलगांव तथा
धारवाड़ जिलों और उत्तरी कनड़ा प्रदेश) में है. 'तेलुगु' नाम की उत्पत्ति संभवतः 'त्रिलिंग'
( त्रिलिंग, तिलिंगाना) देश के नाम पर से हो; और कनड़ी की कन्नड (प्राचीन 'कर्णाट')
देश के नाम से है.
ग्रंथ लिपि—दक्षिण के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि, जिसमें अक्षरों की न्यूनता के कारण
संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, प्रचलित है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इस लिपि में लिखे जाते
हैं. इसीसे इसको ग्रंथ लिपि (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) कहते हैं. यह लिपि लिपिपत्र ५२ से
१ चिटणीस (चिटणवीस) =चिट्ठी नवीस, जैसे कि फडणीस (फडनवीस) =फर्द नवीस.
२ इं. ऐं.; जि. ३४, पृ. २७-८.
वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३३
५६ तक में दी हुई प्राचीन ग्रंथ लिपि से निकली है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसी लिपि में छपने लग
गये थे परंतु अब बहुधा नागरी में छपने लगे हैं.
लिपिपत्र ८१ वां.
इस लिपिपत्र में मलयाळम्, तुळु और तामिळ लिपियां दी गई हैं.
मलयाळम् लिपि—मलयाळम् अर्थात् केरल देश की लिपि होने से इसको मलयाळम् या केरल
लिपि कहते हैं. यह लिपि ग्रंथ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर घसीट रूप में
भी ग्रंथ लिपि से मिलते हुए हैं. इसका प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के दक्षिणी विभाग, सारे
मलबार और कोचीन एवं त्रावनकोर राज्य के अधिकतर हिस्से (त्रिचेंद्रम् से उत्तर के) में है.
तामिळ भाषा बोलनेवाले बहुधा संस्कृत पुस्तक लिखने में ग्रंथ लिपि की नांई इसका प्रयोग
करते हैं.
तुळु लिपि—ग्रंथ लिपि से निकली हुई मलयाळम् लिपि का ही यह किंचित् परिवर्तित रूप है.
इस लिपि का प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के तुळु भाषाभाषी लोगों में संस्कृत ग्रंथ लिखने में ही है.
तामिळ लिपि—यह लिपि लिपिपत्र ६०-६२ में दी हुई प्राचीन तामिळ लिपि से बनी है.
'तामिळ' शब्द की उत्पत्ति देश और जातिसूचक 'द्रमिळ' (द्रविड़) शब्द से हुई है. तामिळ
भाषा आर्य लोगों की संस्कृत भाषा से बिलकुल भिन्न है तो भी उसके अक्षर आर्य लिपियों से ही
लिये गये हैं (देखो, ऊपर पृ. ४४, ६५). इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ होने से संस्कृत भाषा इस
में लिखी नहीं जा सकती इसलिये संस्कृत शब्दों का जहां प्रयोग होता है वहां वे ग्रंथ लिपि में लिखे
जाते हैं. इसमें 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. ६१).
इसका प्रचार मद्रास इहाते के, मद्रास से कुछ ऊपर तक के, दक्षिणपूर्वी हिस्से अर्थात् उत्तरी आर्काट,
चिंग्लेपट, दक्षिणी आर्काट, सलेम्, कोईम्बाटोर, त्रिचिनापोली, तंजौर, मदुरा और तिन्नैवल्लि जिलों एवं
त्रावनकोर राज्य के दक्षिणी अंश (त्रिचेंद्रम् से नीचे नीचे) और पदुक्कोटा राज्य में है.
२२-भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति.
(लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक).
भारतवर्ष की नागरी, शारदा, बंगला, तेलुगु, कन्नड़ी, ग्रंथ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान
(उर्दू को छोड़ कर) लिपियों का मूल 'ब्राह्मी' लिपि है, परंतु ये लिपियां अपनी मूल लिपि से इतनी
भिन्न हो गई हैं कि जिनको प्राचीन लिपियों से परिचय नहीं है वे सहसा यह स्वीकार भी न करेंगे
कि ये सब लिपियां एक ही मूल लिपि से निकली हैं. लेखनप्रवाह सदा एक ही स्रोत में नहीं
बहता किंतु लेखकों की लेखनरुचि के अनुसार समय के साथ भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण करता रहता
है; इसीसे सब देशों की प्राचीन लिपियां पलटती रही हैं. हमारे यहां की भिन्न भिन्न लिपियां एक
ही मूल स्रोत की शाखा प्रशाखाएं हैं जिनके विकास के मुख्य कारण ये हैं—
(अ) अक्षरों को भिन्न भिन्न प्रकार से सुंदर बनाने का यत्न करना.
१३४ प्राचीनलिपिमला.
(आ) अक्षरों पर सिर की आड़ी लकीर लगाना.
(इ) कलम को उठाये बिना अक्षर को पूरा लिखना.
(ई) त्वरा से लिखना.
लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक में भारतवर्ष की ६ मुख्य लिपियों का
विकासक्रम बतलाया गया है जिसमें प्रत्येक अक्षर के जो रूपांतर दिये हैं उनमें से अधिकतर
लिपिपत्र १ से ६४ तक से ही लिये गये हैं.
लिपिपत्र ८२ वां.
इस लिपिपत्र में वर्तमान नागरी और शारदा (कश्मीरी) लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
नागरी लिपि की उत्पत्ति.
नागरी आदि जितनी लिपियों की उत्पत्ति लिपिपत्र ८२ से ८४ में दी है उनमें पहिले
वर्तमान लिपि का प्रत्येक अक्षर दे कर उसके बाद = चिह्न दिया है. उसके पीछे अशोक के समय से
लगा कर वर्तमान रूप बनने तक के सब रूपांतर दिये हैं. प्रत्येक रूप अनेक लेखादि में मिलता है
और प्रत्येक लेखादि का पता देने से विस्तार बहुत बढ़ जाता है अतएव केवल एक स्थल का पता
दिया जायगा.
अ—इसका पहिला रूप अशोक के गिरनार के पास के चट्टान के लेख (लिपिपत्र १) से लिया
गया है (बहुधा प्रत्येक लिपि के प्रत्येक अक्षर का पहिला रूप उसी लेख से लिया गया है इस लिये आगे
पहिले रूप का विवेचन केवल वहीं किया जायगा जहां वह रूप किसी दूसरे स्थल से लिया गया है).
दूसरा रूप मथुरा के लेखों (लिपिपत्र ६) से लिया है जिसमें 'अ' की बाईं ओर के नीचे के
अंश में दो बार कोण बनाये हैं. तीसरा रूप कोटा के लेख (लिपि पत्र २१) से है जिसमें 'अ' की
बाईं ओर के नीचे के अंश को अर्द्धवृत्त का सा रूप देकर मूल अक्षर से उसे विलग कर दिया है.
चौथा रूप देवल के लेख (लिपिपत्र २५) से और पांचवां चीरवा के लेख (लिपिपत्र २७) से लिया
गया है. छठा रूप वर्तमान नागरी है. (लिपिपत्र ८२ से ८४ तक में प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति
में अंतिम रूप वर्तमान अक्षर ही है इसलिये उसका भी आगे विवेचन न किया जायगा).
इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति का विवेचन करने से विस्तार बढ़ जाता है इस लिये
आगे 'पहिला रूप', 'दूसरा रूप' आदि के लिये केवल उनकी संख्या के पहिले अक्षर 'प', 'दू'
आदि लिखे जायंगे और उनके आगे जिस लिपिपत्र या लेख से वह रूप लिया है उसका अंक
या नाम मात्र दिया जायगा और जहां बहुत ही आवश्यकता होगी वहीं विवेचन किया जायगा.
प्रत्येक रूप में क्या अंतर पड़ा यह उक्त रूपों को परस्पर मिला कर देखने से पाठकों को मालूम
हो जायगा.
अ—'अ' का यह रूप दक्षिण में लिखा जाता है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के 'अ'
के समान हैं; चौ. १८ (इसमें बाईं ओर का नीचे का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल गया
है); पां. चौथे का रूपांतर ही है.
इ—दू. १७ (जयनाथ का दानपत्र—इसमें ऊपर की बिंदी के स्थान में सिर की आड़ी
लकीर, और नीचे की दोनों बिंदियों को भीतर से खाली बनाया है); ती. २६; चौ. २७; पां. चौथे
के समान.
वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३५
उ-दू. ६; ती. में नीचे के अंत को अधिक मोड़ा है; चौ. १८.
ए-दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. १६ (महानामन् का लेख); चौ. १७ (करंडांडा
का लेख); पां. २५ (कूर्भशतक).
क-दू. कुशनवंशियों के लेखों से; ती. ८; चौ. १६; पां. २३.
ख-प. २ (खालसी); दू. ६; ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २६ (जाजल्लदेव का लेख).
ग-दू. और ती. ६; चौ. १६.
घ-दू. ८; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. २५ (उदेपुर का लेख); पां. २५ (उज्जैन
का लेख).
ङ-प. बुद्धगया के स्तंभ से; दू. १८ ('ङ्ग्शो' में); ती. २५ (उज्जैन का लेख).
च-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख)
छ-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. तीसरे से बना.
ज-दू. ७; ती. २१ (झालरापाटन का लेख); चौ. २५ (उज्जैन का लेख.)
झ-'झ' का यह रूप जैन शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र
का लेख); ती. २१ (कोटा का लेख).
झ-'झ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है. इसके पहिले तीन रूप
पूर्व के 'झ' के समान हैं. चौ. २६ (हस्तलिखित पुस्तकों से); पां. चौथे से बना.
ञ-दू. ८; ती. १६ ('ञ्ज' में) ट-दू. १६; ती. २१ (झालरापाटन का लेख).
ठ-प. २ (अशोक का देहली का लेख); दू. ती. २५ (उज्जैन का लेख).
ड-'ड' का यह रूप जैन शैली की नागरी में प्रचलित है. दू. ८; ती. १६; चौ. १८; पां.
चौथे से बना; छ. २७ (सूंधा के लेख की पंक्ति के अंत में).
ड-पहिले तीन रूप पूर्व के 'ड' के समान; चौ. २७.
ढ-नागरी लिपि की वर्णमाला में केवल यही अक्षर ऐसा है जो अपने मूल रूप में बना
रहा है. केवल सिर की आड़ी लकीर बढ़ी है.
ण-दू. ६; ती. दूसरे से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में 'ण' का चौथा रूप); चौ. १८; पां.
१६ (उष्णीषविजयधारणी).
ण-'ण' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है और नागरी के 'ण' के 'ए'
जैसे अंश को चलती क़लम से मिलवां लिखने से बना है.
त-दू. पहिले का रूपांतर (देखो, लिपिपत्र ४); ती. २७.
थ-दू. ती. १८; चौ. २५ (उज्जैन का लेख).
द-दू. ५ ('पभोसा का लेख); ती. ५ (शोडास का मथुरा का लेख); चौ. ६; पां. १८;
छ. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
ध-दू. २०; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. २७ (ओरिशा का लेख).
न-दू. ६; ती. २०. प-दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६.
फ-दू. १८; ती. १७ (पाली का दानपत्र); चौ. सीयदॊनी के लेख से.
ब-दू. २०; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. १६; पां. चौलुक्य भीमदेव के दानपत्र से.
'व' और 'ब' में भेद न रहने से 'ब' को स्पष्ट बतलाने के लिये 'व' के भीतर बिंदी लगाई जाने
लगी जो पीछे से कुछ तिरछी लकीर के रूप में परिणत हो गई.
१३६ प्राचीनलिपिमाला.
भ—दू. ३ ( नानाघाट का लेख ); ती. ५ ( शोडास का लेख ); चौ. १६; पां. २६ ( जाजल्ल-
देव का लेख ).
भ—'भ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. पूर्व के 'भ' के
पांचवें रूप में बाईं ओर के अंश में ऊपर की तरफ़ ग्रंथि लगाने से यह बना है.
म—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. १६; चो. १८ ('म्' में).
य—दू. १; ती. दूसरे रूप को चलती कलम से पूरा लिखने से बना ( देखो, लिपिपत्र ६
में मथुरा के लेखों के 'र्थ्य' और 'श्य' में ); चौ. १६ ( बुद्धगया का लेख ).
र—दू. १८; ती. २०; चौ. २३ ( जोधपुर का लेख ).
ल—दू. ६; ती २१ ( दुर्गगण का लेख ); चो. २१ ( ओसिआ का लेख ).
व—दू. ती. ५ ( मथुरा के चार जैन लेख ); चौ. २३; पां. २४.
श—प. २ ( अशोक का खालसी का लेख ); दू. ६; ती. १८; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी );
पां. २०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के लेख के 'र्षे' में ); दू. ६; ती. १८; चौ. तोरमाण के लेख से.
स—दू. ५ ( मथुरा के जैन लेख ); ती. १७ ( करंडांडा का लेख ); चौ. बिलसद के लेख से;
पां. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ).
ह—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. ८; चौ. अप्सद के लेख से; पां. २५ ( उज्जैन का लेख ).
ळ—दू. ७; ती. दूसरे का रूपांतर ( देखो लिपिपत्र ५० में चेन्नोलू के लेख का 'ळ' ).
क्ष—प. ७; दू. ८; ती. १६; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ); पां. २७ ( चीरवा का लेख ).
ज्ञ—प. ८; दू. पहिले का रूपांतर ; ती. २१ ( ओसिआ का लेख ).
वर्तमान नागरी लिपि के ई, ॡ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर
नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ॡ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़
कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं.
'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा
पाया जाता है ( देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला
का 'ऋ' ). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का
रूपांतर है ( देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ' ), परंतु उज्जैन के
लेख के अंत की पूरी वर्णमाला ( लिपिपत्र २५ ) म 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे
अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के
स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग
गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.
शारदा ( कश्मीरी ) लिपि की उत्पत्ति.
शारदा लिपि नागरी की बहिन होने से उसके उत्पत्तिक्रम में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
रूपों में से कुछ ठीक वे ही हैं जो नागरी की उत्पत्ति में दिये हैं. इसलिये उन रूपों का वर्णन
१ नागरी में इस प्रकार के 'ई' की कल्पना का कुछ कुछ पता ई. स. की ६ ठी शताब्दी से लगता है. 'उष्णीषविजय-
धारणी' के अंत की वर्णमाला में 'इ' पर बिंदी ( लिपिपत्र १६ ) और राजा भोज के 'कूर्मशतक' में रेफ सा चिह्न
मिलता है ( लिपिपत्र २४ ).
वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३७
न कर बाकी का ही किया जायगा.
अ—चौ. तीसरे से बना (बाईं ओर का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल जाने से).
इ—दू. १८; ती. २४; चौ. तीसरे से बना (ऊपर की दोनों बिंदियों को चलती कलम से
लिखने से); पां. ३१ (अथर्ववेद).
ई—प. १० ('ई' से मिलता हुआ); दू १६ (आसीरगढ़ की मुद्रा); ती. ३० (बैजनाथ की
प्रशस्ति).
उ—नागरी के समान.
ए—ती. २८; चौ. ३१ (अथर्ववेद).
ओ—प. १; दू. ६; ती. दूसरे का रूपांतर; चौ. १७ (देखो, 'औ' में); पां. चौथे का
नीचे का अंश ऊपर की ओर अधिक बढ़ जाने से बना.
क—पां. २९. ख—चौ. २८. ग—नागरी के समान.
घ—ती. दूसरे से बना. ङ—दू. पहिले से बना. च—ती. चौ. २६.
छ—दू. ६. ज—ती. २८; चौ. २६. झ—चौ. तीसरे से बना; पां. ३१ (शाकुंतल).
ञ—ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे को चलती कलम से लिखने से नीचे गांठ बन गई.
ट—ती. २१ (दुर्गगण का लेख). ठ—मूल रूप में बना रहा.
ड—जैन शैली की नागरी के 'ङ' के समान.
ढ—दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. ३० (सोमवर्मन् का दानपत्र).
ण—चौ. २६. त—दू. ती. ८, चौ २८. थ—चौ. ३१. द—पां. १८.
ध—दू. ती. १६. न—नागरी के समान (प्रारंभ की ग्रंथि को छोड़ कर).
प—नागरी के समान. फ—दू. ३१ (शाकुंतल). ब—नागरी के समान.
भ—चौ. १८. म—नागरी के समान (सिररहित).
य, र, ल, व—चारों नागरी के समान. श—चौ तीसरे से बना.
ष—नागरी के समान. स—चौ. तीसरे से बना. ह—ती. दूसरे से बना.
वर्तमान शारदा लिपि के अक्षर अपने प्राचीन रूपों से नागरी की अपेक्षा अधिक मिलते
हुए हैं और उनमें पूरे स्वर वर्ण उनके प्राचीन चिह्नों से ही बने हैं.
लिपिपत्र ८३ वां.
इस लिपिपत्र में बंगला और कनड़ी लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
बंगला लिपि की उत्पत्ति.
बंगला लिपि प्राचीन नागरी की पुत्री है इस लिये उसकी उत्पत्ति में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
भिन्न भिन्न रूपों में से कितने एक नागरी के उक्त रूपों से मिलते हैं अत एव उनको छोड़ कर
बाकी का ही विवेचन किया जायगा और जो अक्षर नागरी के समान हैं वा जिनके वर्तमान
रूप के पूर्व के सब रूप नागरी की उत्पत्ति में बतलाये हुए रूपों के सदृश हैं उनको भी
नागरी के समान कहेंगे.
अ—दक्षिणी शैली की नागरी के समान (मध्य की आड़ी लकीर तिरछी).
इ—पां. जैन शैली से. उ—नागरी के समान.
ए—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ओ—चौ. १८.
क—पां. चौथे से बना.
१३८ प्राचीनलिपिमाला.
ख—ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्र से; पां. ३२
(देवपारा का लेख).
ग—ती. ६; चौ. ३२. घ—नागरी के समान. ङ—ती. १६ (उष्णीषविजय-
धारणी); चौ. ३५ (हस्राकोल का लेख).
च—ती. ३४. छ—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी). ज—नागरी के समान.
झ—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी); चौ. तीसरे का रूपांतर; पां. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
ञ—ती. ३५ (इस्राकोल का लेख). ट—ती. २३ (जोधपुर का लेख).
ठ—दू. १६ (उज्जैन का लेख). ड—नागरी के समान.
ढ—नागरी के समान. ण—पां. कन्हेरी के लेख से; छ. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
त—चौ. ३३ (तर्पंडिघी का दानपत्र); पां. ३४ (हस्तलिखित पुस्तकें).
थ—चौ. ३२. द—चौ. ३२. ध—नागरी के समान.
न—नागरी के समान. प—चौ. तीसरे से बना. फ—नागरी के समान.
ब—नागरी के समान. भ—ती. १८, चौ. २३ (जोधपुर के लेख के 'भू' में).
म—नागरी के समान. य—नागरी के समान.
र—ती. ३२ (देवपारा का लेख); चौ. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र). ल—नागरी के समान.
व—नागरी के समान. श—चौ. २५ (देवल का लेख); पां. ३२ (देवपारा का लेख).
ष—नागरी के समान. स—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ह—नागरी के समान.
वर्तमान बंगला लिपि के स्वर मूल स्वरों से बने हैं; केवल 'ई' नागरी की नांई 'इ' से बना है.
कन्नड़ी लिपि की उत्पत्ति.
अ—दू. ४५; ती. ४७; चौ. ४६; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
इ—दू. ४० (कर्कराज का दानपत्र); ती. ४५ (पुलुकेशिन् का दानपत्र); चौ. ४५. (चेंड-
लूर का दानपत्र).
ई—प. ३६ (मंदसौर का लेख); दू. पहिले से बना; ती. ४७; चौ. ५० (अनंकोँडा का लेख).
ए—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १५; चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ४८
(राजा अम्म का दानपत्र).
ओ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ५०.
क—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपल); चौ. ४७; पां. ५०
(चेब्रोलू का लेख).
ख—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १३; चौ. ४७
ग—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४३ (उरुकुपल्लि का दानपत्र).
घ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४५ (चेंडलूर
का दानपत्र); पां. ५० (अनंकोँडा का लेख).
ङ—दू. ४४ (काकुस्थवर्मन् के दानपत्र के 'ङ्गो' में); ती. दूसरे से बना.
च—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख), ती. ४६; चौ. ४८; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
छ—दू. ८; ती. ४०; चौ. ५० (चेब्रोलू का लेख).
ज—दू. ४३; ती. ४७; चौ. ४८ (राजा भीम का दानपत्र).
झ—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे से बना; पां. ५०.
वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३६
ज—दू. ७; ती. ४४ ( 'ज्ञा' में ) ; चौ. ४८ ( 'ज्ञा' में ).
ट—दू. ४५ ( बादामी का लेख ); ती. दूसरे से बना; चौ. ४८; पां. ५१ (दोनेपुंडी का दानपत्र ).
ठ—दू. ५१. ड—प. २ ( खालसी ); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५०.
ढ—दू. ती. ४७; चौ. ५०. ण—दू. १२; ती. ४५; चौ. ४८; पां. ४६.
त—दू. ६; ती. ४७; चौ. ४८. थ—दू. ४४ ( काकुस्थवर्मन् का दानपत्र ); ती. ४७.
द—प. २ ( जौगड़ ) ; दू. ७; ती. ४३ ( पिकिर का दानपत्र ); चौ. ४८; पां. ५०.
ध—दू. ६ ( गौतमीपुत्र शातकर्णी के लेख ) ; ती. १३ ; चौ. ४६; पां. ५०.
न—दू. ४३ ( उरुवुपल्लि का दानपत्र ) ; ती. ४५ ( चेंडलूर का दानपत्र ) ; चौ. ५०.
प—दू. ६ ( वासिष्ठीपुत्र के लेख) ; ती ४५ ; चौ. ५० ; पां. ५१ ( राजा गणदेव का दानपत्र ).
फ—दू. ८; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ५०.
ब—दू. ४३ ( विष्णुगोपवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४३ ( सिंहवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४७.
भ—दू. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४८; चौ. ४६; पां. ५०.
म—दू. ६; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४६; पां. ५०.
य—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४५; पां. ४८. र—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ४८.
ल—दू. ८; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४८. व—दू. ६; ती. १३; चौ ४६; पां. ५०.
श—प. २ ( खालसी ) ; दू. ७; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; चौ ४५; पां. ५०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के 'र्षं' में ) ; दू. ४४; ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१.
स—दू. ४७; ती. ४८. ह—दू. ७; ती. ४३; चौ. ५०; पां. ५१.
ळ—प. ७; दू. ४७; ती. ५०; चौ. ५१ ( वनपल्ली का दानपत्र ).
वर्तमान कनड़ी लिपि का 'उ' प्राचीन 'उ' से नहीं बना किंतु 'अ' के साथ 'उ' की मात्रा जोड़ने
से बना है. उसी 'उ' से 'ऊ' बना है. 'ऋ' का कोई प्राचीन रूप नहीं मिलता. संभव है कि उष्णी-
षविजयधारणी के अंत की वर्णमाला के 'ऋ' जैसे ही अक्षर में विकार हो कर वह बना हो. 'ऐ' और
'औ' उनके प्राचीन रूपों से ही बने हैं. 'ऐ' लिपिपत्र ३८ के 'ऐ' से, और 'औ' लिपिपत्र ४३ और
५० में मिलनेवाले 'औ' से बना है १.
लिपिपत्र ८४ वां.
इस लिपिपत्र में ग्रंथ और तामिळ लिपियों की उत्पत्ति दी गई है.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो कनड़ी
लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं, इस लिये ऐसे रूपों को छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन
किया जायगा.
अ—ती. ५२ ( मामल्लपुरम् के लेख ); चौ. ५४ ( उदयेंदिरम् का दानपत्र ) ; पां. ५६.
इ—पां. ५३ ( नंदिवर्मन् का दानपत्र ).
१. वर्तमान तेलुगु लिपि कनड़ी से बहुत मिलती हुई है. जिन अक्षरों में विशेष अंतर है वे उ, ऋ, क, त, श और
ह हैं. इनमें से 'उ' उसके प्राचीन रूप से बना है (विकासक्रम के लिये देखो, क्रमशः लिपिपत्र ४४, ४७ और ५० में मिलने
वाले उक्त अक्षर के रूप). 'क' कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षर के पांचवें रूप की आड़ी लकीर और नीचे के वृत्त
को चलती कलम से कुछ अंतर के साथ लिखने से बना है. 'त' के बाईं ओर के अंत में ग्रंथि और लगा दी है. 'श' और
'ह' भी कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षरों के उपांत्य रूपों के विकार मात्र हैं.
५३ (मावलीपुरम् का लेख ); पां. चौथे से बना."
Wait, "चौ. ५३" - yes, dot after चौ.
Line 20:
"त—ती. ५२; चौ. ५६."
Line 21:
"थ—दू. ११ (कार्ली के लेख ); ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख ); चौ. ५२ (कूरम् का दानपत्र ):"
Wait, colon or semicolon at the end of line 21?
It's a colon: : or semicolon ;? Looks like a colon :!
Line 22:
"पां. चौथे से बना."
Line 23:
"द—दू. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख ); ती. ५३; चौ. ५६."
Line 24:
"ध—ती. ४३ (पिकिर का दानपत्र ); चौ. ५२ (कांचीपुरम् का लेख )."
Line 25:
"न—दू. १२ (जग्गयपेट के लेख ); ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र ); चौ. ५४ (पृथ्वीपति का"
Line 26:
"दानपत्र ); पां. ५६."
Line 27:
"प—ती. ५४. फ—ती. ५३; चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख )."
Line 28:
"ब—दू. १३; ती. ४५
नागरी अंकों की उत्पत्ति. १३१
तामिळ लिपि की उत्पत्ति.
तामिळ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं; इस लिये उनको छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन किया
जायगा.
अ—चौ. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख); पां. ६० (कूरम् का दानपत्र).
इ—दू. ६; ती. १२ (जग्गय्यपेट के लेख); चौ. ६० (कूरम् का दानपत्र; दूसरे की तीनों वक्र
रेखाओं को चलती कलम से मिला कर लिखने से).
ई—प. ६२; दू. पहिले से बना. उ—ग्रंथ लिपि के समान.
ए—ती. १४; चौ. ६० (कशाकूडि का दानपत्र).
ऐ—दू. ३ (हाथीगुंफा का लेख); ती. ४५ ('ए' के साथ 'ऐ' की मात्रा जोड़ने से, लिपि-
पत्र ३८ के 'ऐ' की नांई).
ओ—ती. ६० (उदयेदिरम् का दानपत्र); चौ. ६२ (तिरुमलै के चट्टान का लेख).
क—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (वेल्लोर का लेख); चौ. ६२ (जंबुकेश्वर का लेख).
ङ—दू. पहिले से बना; ती. दूसरे से बना; चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
च—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
ञ—ती. ३८ (सिंहादित्य के दानपत्र के 'झा' में); चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
ट—दू. ६० (उदयेदिरम् का दानपत्र). ण—ग्रंथ लिपि के समान. त—ग्रंथ लिपि के समान.
न—चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र). प—दू. ७.
म—दू. ६; ती. ५८ (देवेंद्रवर्मन् का दानपत्र); चौ. तीसरे से बना.
य—ग्रंथ लिपि के समान. र—चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख).
ल—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख).
व—ग्रंथ लिपि के समान.
२३—वर्तमान नागरी अंकों की उत्पत्ति.
(लिपिपत्र ८४ के उत्तराई का द्वितीय खंड).
जैसे वर्तमान नागरी लिपि ब्राह्मी लिपि में परिवर्तन होते होते बनी है वैसे ही वर्तमान नागरी
के अंक भी प्राचीन ब्राह्मी के अंकों के परिवर्तन से बने हैं.
१—प. ७१ (नानाघाट का लेख); दू. ७१ (गुप्तों के लेख); ती. चौ. ७२ (बौद्ध पुस्तक);
पां. ७५ (प्रतिहार भोजदेव का दूसरा लेख).
२—प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ७१ (गुप्तों के लेख); ती. ७२ (मि. बावर के
पुस्तक).
३—प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ती. ७१ (गुप्तों के लेख); चौ. ७२ (मि. बावर
के पुस्तक; तीनों वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से).
४—प. ७१ (अशोक के लेख); दू. ७१ (नानाघाट का लेख); ती. ७१ (कुशनवंशियों के
लेख); चौ. ७१ (गुप्तों के लेख).
१४२ प्राचीनलिपिमाला.
५-प. दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. दूसरे से बना (बाईं ओर की खड़ी लकीर
को चलती कलम से दाहिनी ओर बनाने से).
६-प. ७१ (अशोक के लेख); दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख).
७-प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ७१ (क्षत्रपों के सिक्के); ती. ७१ (वलभी के
राजाओं के दानपत्र).
८-प. दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. ७१ (क्षत्रपों के सिक्के); चौ. ७१ (कुशन-
वंशियों के लेख); पां. ७१ (गुप्तों के लेख).
९-प. ७१ (नानाघाट का लेख); दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. ७१ (आंध्रों
के नासिक के लेख); चौ. ७५ (राष्ट्रकूट दंतिवर्मन् का दानपत्र); पां. चौथे के ऊपर की ग्रंथि को
उलटा लिखने से; छ. ७६ (कलचुरि कर्ण का लेख); सा. ७६ (चौलुक्य त्रिलोचनपाल का दानपत्र);
आ. ७६ (अजमेर का लेख).
६ के अंक के छठे, सातवें और आठवें रूपों में विशेष अंतर नहीं है.
२४-लेखनसामग्री.
ताड़पत्र.
ताड़पत्र—ताड़ (ताल, ताली) नामक वृक्ष की दो भिन्न जातियों के पत्ते हैं. ताड़ के वृक्ष
दक्षिण में तथा समुद्रतट के प्रदेशों में विशेष रूप से और राजपूताना, पंजाब आदि में कम होते
हैं. टिकाउ होने तथा थोड़े मूल्य में बहुत मिल आने के कारण प्रारंभिक काल से¹ ही ताड़ के पत्ते
पुस्तक आदि लिखने के काम में आते थे. ताड़ के पत्ते बहुत बड़े बड़े होते हैं; उन्हें संधियों में
से काट कर, अधिक लंबी परंतु चौड़ाई में एक से चार इंच तक की ही, पट्टियां निकाली जाती
हैं जिनमें से जितनी लंबाई का पन्ना बनाना हो उतना काट लेते हैं. पुस्तक लिखने के लिये जो
ताड़पत्र काम में आते थे उनको पहिले सुखा देते थे, फिर उनको पानी में उबालते या भिगो रखते
थे. पीछे उनको फिर सुखा कर शंख, कौड़े या चिकने पत्थर आदि से घोटते थे. मामूली कामों
के लिये जो पत्ते पहिले काम में लाये जाते थे या अब लाये जाते हैं वे इस तरह तय्यार नहीं
किये जाते. कश्मीर और पंजाब के कुछ अंश को छोड़ कर बहुधा सारे भारतवर्ष में ताड़पत्र का
बहुत प्रचार था. पश्चिमी और उत्तरी भारतवाले उनपर स्याही से लिखते थे परंतु दक्षिणवाले
१. बौद्धों की जातक कथाओं में 'पण्ण' (पत्र, पत्ता, पन्ना) का उल्लेख कई जगह मिलता है (देखो, ऊपर पृ. ५,
टिप्पण २, ३, ४) जो ताड़पत्र का ही सूचक होना चाहिये. हुएन्तसंग के जीवनचरित से, जो उसीके, शिष्य ह्वैली का बनाया
हुआ है, पाया जाता है कि बुद्ध के निर्वाण के वर्ष में बौद्धों का जो पहिला संघ एकत्र हुआ (देखो, ऊपर पृ. ४, टि-
प्पण ६) उसमें बौद्धों का 'त्रिपिटक' ताड़पत्रों पर प्रथम लिखा गया था (बील अनुवादित हुएन्तसंग का जीवनचरित, पृ.
११६-१७). ऐसा कह सकते हैं कि भारतवर्ष में लिखने के लिये सबसे पहिले ताड़पत्र ही काम में आया हो और प्रारंभ में
उसपर दक्षिणी शैली से लोहे की तीखे गोल मुंह की शलाका से अक्षर कुचरना ही प्रतीत होता है क्योंकि 'लिख' धातु का
मूल अर्थ कुचरना, रगड़ना या रेखा करना ही है. स्याही से लिखने के लिये 'लिप्' धातु (लीपना, रंग पोतना) अधिक
उपयुक्त है; अत एव संभव है कि ताड़पत्रों पर स्याही से लिखने की उत्तरी प्रथा पीछे की हो.
संस्कृत साहित्य के कई शब्द और मुहावरे सबसे प्राचीन पुस्तकों का ताड़पत्र पर ही होना सूचित करते हैं, जैसे कि
एक विषय का पुस्तक 'ग्रंथ' या 'सूत्र' कहलाता था जो ताड़पत्रों के एक गांठ या एक डोरी से बंधे हुए होने का स्मरण दि-
लाता है. वृक्ष के पत्तों के संबंध से ही पुस्तक के विषयों का विभाग स्कंध, कांड, शाखा, वल्ली आदि शब्दों से किया गया है.
पत्र (पन्ना) और पर्ण (पन्ना) शब्द भी वृक्षों के पत्तों के ही स्मारक हैं.
तीखे गोल मुख की शलाका को उनपर दबा कर अक्षर कुरेदते थे. फिर पत्रों पर कज्जल फिरा
देने से अक्षर काले बन जाते थे. कम लंबाई के पत्रों के मध्य में एक, और अधिक लंबाईवालों के
मध्य से कुछ अंतर पर दाहिनी और बांई ओर एक एक, छिद्र किया जाता था. पुस्तकों के नीचे
और ऊपर उसी अंदाज़ के सूराखवाली लकड़ी की पाटियां रहती थीं. इन सूराखों में डोरी डाली
जाने से एक माप की एक या अधिक पुस्तकें एकत्र बंध सकती थीं. पढ़ने के समय डोरी को
ढीला करने से प्रत्येक पन्ना दोनों ओर से आसानी के साथ उलटाया तथा पढ़ा जा सकता था. सुंदर सस्ते
कागज़ों के प्रचार के साथ ताड़पत्रों का प्रचार कम होता गया और अब तो बंगाल में कोई कोई 'दुर्गा-
पाठ' लिखने में ही उन्हें काम में लेते हैं. भारत के सब से दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी हिस्सों की
प्रारंभिक पाठशालाओं में विद्यार्थियों के लिखने में या रामेश्वर, जगदीश आदि के मंदिरों में जमा
कराये हुए रुपयों की रसीदें देने आदि में ताड़पत्र अब भी काम में आते हैं. दक्षिण की अधिक
उष्ण हवा में ताड़पत्र के पुस्तक उतने अधिक समय तक रह नहीं सकते जितने कि नेपाल आदि
शीत देशों में रह सकते हैं.
अब तक मिले हुए स्याही से लिखे ताड़पत्र के पुस्तकों में सब से पुराना एक नाटक का
कुछ त्रुटित अंश है जो ई. स. की दूसरी शताब्दी के आस पास का है १. मि. मॅकार्टने के काशगर से भेजे
हुए ताड़पत्रों के टुकड़े ई. स. की चौथी शताब्दी के हैं २. जापान के होरियूज़ि के मठ में रक्खे हुए
'प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र' तथा 'उष्णीषविजयधारणी' नामक बौद्ध पुस्तक ३, जो मध्य भारत से वहां पहुंचे
थे, ई. स. की ६ठी शताब्दी के आस पास के लिखे हुए हैं. नेपाल के ताड़पत्र के पुस्तक्संग्रह
में ई. स. की ७वीं शताब्दी का लिखा हुआ 'स्कंदपुराण' ४, कैंब्रिज के संग्रह में हर्ष संवत् २५२
(ई. स. ८५६) का लिखा हुआ 'परमेश्वरतंत्र' ५ और नेपाल के संग्रह में नेवार सं. २८ (ई. स.
६०६-७) ६ का लिखा हुआ 'लंकावतार' नामक पुस्तक हैं. ई. स. की ११ वीं शताब्दी और उसके पीछे के
तो अनेक ताड़पत्र के पुस्तक गुजरात, राजपूताना, नेपाल आदि के एवं यूरोप के कई पुस्तक्संग्रहों
में रक्खे हुए हैं. दक्षिणी शैली के अर्थात् लोहे की तीक्ष्ण अग्रभागवाली शलाका से दबा कर
बनाये हुए अक्षरवाले पुस्तक ई. स. की १५ वीं शताब्दी से पहिले के अब तक नहीं मिले जिसका
कारण दक्षिण की उष्ण हवा से उनका शीघ्र नष्ट होना ही है.
भूर्जपत्र (भोजपत्र).
भूर्जपत्र (भोजपत्र) — 'भूर्ज' नामक वृक्ष की, जो हिमालय प्रदेश में बहुतायत से होता है,
भीतरी छाल है. सुलभता तथा नाममात्र के मूल्य से बहुत मिलने के कारण प्राचीन काल में
वह पुस्तक, पत्र आदि के लिखने के काम में बहुत आता था. अलबेरूनी लिखता है कि 'मध्य
और उत्तरी भारत के लोग 'तूज़' (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं. उसको 'भूर्ज' कहते
हैं. वे उसके प्रायः एक गज़ लंबे और एक बालिश्त चौड़े पत्रे लेते हैं और उनको भिन्न भिन्न
प्रकार से तय्यार करते हैं. उनको मज़बूत और चिकना बनाने के लिये वे उनपर तेल लगाते हैं
और [घोट कर] चिकना करते हैं, फिर उनपर लिखते हैं*.' भूर्जपत्र लंबे चौड़े निकल आते हैं
जिनको काट कर लेखक अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पत्रे बनाते और
१. देखो, ऊपर पृ. २, टिप्पण २. २. ज. प. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१८; प्लेट ७, संख्या १, टुकड़े ६ (a से i तक).
३. ऐं. ऑ. (आर्यन सीरीज); प्लेट १-४.
४. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२, और अंत का प्लेट. ५. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२.
६. ह; कँ. पा; पृ. १४०. * सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७१.
१४४ प्राचीनलिपिरुमाला.
उनपर स्याही से लिखते थे. ताड़पत्रों का अनुकरण कर भूर्जपत्र की पुस्तकों के प्रत्येक पत्रे का मध्य
का हिस्सा खाली छोड़ा जा कर उसमें छेद किया जाता था. पुस्तक के ऊपर और नीचे रक्खी जाने-
वाली लकड़ी की पार्टियों में भी उसी अंदाज़ से छेद रहता था. इस प्रकार सब पत्रों के छेदों में
डोरी पोई जाकर पार्टियों पर लपेट ली जाती थी. मुगलों के समय से कश्मीरवाले भूर्जपत्र के
पुस्तकों पर वर्तमान किताबों की नांईं चमड़े की जिल्दें भी बांधने लगे. सस्ते और सुंदर कागज़ों
के प्रचार के साथ भूर्जपत्र पर पुस्तकें लिखने की प्रथा कम होती गई और अब तो केवल
हिंदुओं में तावीज़ों के लिये यंत्र लिखने के काम में उसका प्रचार रहा है जिससे हरेक बड़े शहर में
पंसारियों आदि की दुकानों पर वह मिल जाता है.
भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें विशेष कर कश्मीर में मिलती हैं और कुछ उड़ीसा आदि में.
हिंदुस्तान में पूना आदि के तथा यूरोप के कई प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकसंग्रहों में भूर्जपत्र पर
लिखी हुई पुस्तकें सुरक्षित हैं जो बहुधा कश्मीर से ही ली गई हैं. भूर्जपत्र पर लिखी हुई सब
से पुरानी पुस्तक, जो अब तक मिली है, खोतान से मिला हुआ खरोष्ठी लिपि के 'धंमपद' (प्राकृत)
का कुछ अंश है. वह ई. स. की दूसरी या तीसरी शताब्दी का लिखा हुआ होना चाहिये. 'संयुक्ता-
गमसूत्र' (संस्कृत) ई. स. की चौथी शताब्दी का लिखा हुआ मिला है१०. मि. बावर के पुस्तक
ई. स. की छठी शताब्दी के आस-पास के और बख्शाली का अंकगणित ई. स. की ८ वीं शताब्दी के
आस पास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. ये पुस्तक स्तूपों के भीतर रहने या पत्थरों के बीच
गड़े रहने से ही इतने दीर्घकाल तक बचने पाये हैं परंतु खुले रहनेवाले भूर्जपत्र के पुस्तक ई. स. की
१५ वीं शताब्दी के पूर्व के नहीं मिलते जिसका कारण यही है कि भूर्जपत्र, ताड़पत्र या कागज़
जितना टिकाउ नहीं होता.
कागज़.
यह माना जाता है कि पहिले पहिल चीनवालों ने ई. स. १०५९ में कागज़ बनाया, परंतु उससे
४३२ वर्ष पूर्व अर्थात् ई. स. पूर्व ३२७ में, निआर्कस, जो सिकंदर बादशाह के साथ हिंदुस्तान में
आया था, अपने व्यक्तिगत अनुभव से लिखता है कि 'हिंदुस्तान के लोग रुई को कूट कर लिखने
के लिये कागज़ बनाते हैं२०. इससे स्पष्ट है कि ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में भी यहांवाले रुई
या चीथड़ों से कागज़ बनाते थे, परंतु हाथ से बने हुए कागज़ सस्ते और सुलभ नहीं हो सकते. यहां
पर ताड़पत्र और भूर्जपत्र (भोजपत्र) की बहुतायत होने और नाममात्र के मूल्य से उनके बहुत मिल
जाने से कागज़ों का प्रचार कम ही होना संभव है. यूरोप के बने हुए सस्ते और सुंदर
कागज़ों के प्रचार के पहिले भी इस देश में चीथड़ों से कागज़ बनाने के कई कारखाने थे और अब
भी हैं परंतु यहां के बने कागज़ चिकने न होने से पुस्तक लिखने की पक्की स्याही उनमें और
पार फैल जाती थी. इस लिये उनपर गेहूं या चावल के आटे की पतली लेई लगा कर उनको सुखा
देते थे जिससे वे कड़े पड़ जाते थे. फिर शंख आदि से घोटने से वे चिकने और कोमल हो जाते
१० देखो, ऊपर पृष्ठ २, टिप्पण २.
२० बा; ए. इं; पृ. २२६.
- इस विषय में मैक्समुलर लिखता है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रुई से कागज़ बनाने की कला का जानना
प्रकट करता है' (देखो, ऊपर पृ. ३, टि. ७), और बूलर निआर्कस के कथन का आशय अच्छी तरह कूट कर तय्यार किये
हुए रुई के कपड़ों के 'पट' से होना मानता है (बू; इं. पे; पृ. ६८) जो भ्रमपूरित है क्योंकि 'पट' अब तक बनते हैं और वे
सर्वथा कूट कर नहीं बनाये जाते (उनका विवेचन आगे किया जायगा). निआर्कस् का अभिप्राय कागज़ों से ही है.
लेखनसामग्री. १४५
थे तभी उनपर पुस्तक लिखे जाते थे. जैन लेखकों ने कागज़ की पुस्तकें लिखने में ताड़पत्र पर
लिखी हुई पुस्तकों का अनुकरण किया है, क्यों कि उनकी लिखी हुई पुरानी पुस्तकों में ताड़पत्रों की
पुस्तकों की नांई प्रत्येक पत्ते का मध्य का हिस्सा, जहां डोरी डाली जाती थी, बहुधा खाली छोड़ा
हुआ मिलता है जिसमें कहीं हिंगलू का वृत्त और चतुर्मुख वापी आदि के रंगीन या खाली चित्र
मिलते हैं. इतना ही नहीं, ई. स. की १४ वीं शताब्दी की लिखी हुई पुस्तकों१ में प्रत्येक पत्ते
और ऊपर नीचे की पाटियों तक में छेद किये हुए भी देखने में आये हैं यद्यपि उन छेदों की कोई
आवश्यकता न थी.
भारतवर्ष के जलवायु में कागज बहुत अधिक काल तक नहीं रह सकता. काग़ज पर लिखी
हुई पुस्तकों में, जो अब तक इस देश में मिली हैं, सब से पुरानी ई. स. १२२३-२४ की बतलाई जाती है२,
परंतु मध्य एशिया में यारकंद नगर से ६० मील दक्षिण 'कुगियर' स्थान से ज़मीन में गड़े हुए
भारतीय गुप्त लिपि के ४ पुस्तक मि. वेबर को मिले जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी३ के आस पास
के होने चाहिये. इसी तरह मध्य एशिया के काशगर आदि से जो जो पुराने संस्कृत पुस्तक४
मिले हैं वे भी उतने ही पुराने प्रतीत होते हैं.
रूई का कपड़ा.
रूई का कपड़ा जिसको 'पट' कहते हैं प्राचीन काल से लिखने के काम में कुछ कुछ आता
था और अब तक भी आता है. उसे भी कागजों की तरह पहिले आटे की पतली लेई लगा कर
सुखाते हैं, फिर शंख आदि से घोट कर चिकना बनाते हैं तब वह लिखने के काम में आता है.
जैनों के मंदिरों की प्रतिष्ठा के समय अथवा उत्सवों पर रंगीन चावल आदि अन्नों से जो भिन्न
भिन्न मंडल बनाये जाते हैं उनके पटों पर बने हुए रंगीन नक्शों का संग्रह जैन मंदिरों या उपासरों
में पुस्तकों के साथ जगह जगह मिलता है५. ब्राह्मणों के यहां 'सर्वतोभद्र,' 'लिंगतोभद्र' आदि
१. अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां हस्तलिखित प्राचीन जैन एवं अन्य पुस्तकों का बड़ा संग्रह है. उसमें
ज्योतिषसंबंधी पुस्तकों तथा विषयों के संग्रह का २६२ पत्रों का एक पुस्तक है जिसके पत्रांक प्राचीन और नवीन शैली दोनों
तरह से दिये हुए हैं. उसके प्रारंभ में दो पत्रों में उक्त संग्रह की पत्रांकसहित विषयसूची भी लगी हुई है जो वि. सं. १४२६
(ई. स. १३७२) में उक्त संग्रह के लेखक श्रीलोकहिताचार्य ने ही तैयार की थी. उक्त पुस्तक के प्रत्येक पत्रे के मध्य के खाली
छोड़े हुए हिस्से में बने हुए हिंगलू के वृत्त में सूराख बना हुआ है और ऊपर नीचे की पाटियों में भी. वहीं के २३५ पत्रों के
एक दूसरे पुस्तक में, जिसमें भिन्न भिन्न पुस्तकों का संग्रह है और जो १४ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत
होता है (संवत् नहीं दिया), इसी तरह सूराख बने हुए हैं.
२. गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, सिंध और खानदेश के खानगी पुस्तकसंग्रहों की सूचियां, बूलर संगृहीत, भाग १,
पृ. २३८; पुस्तकसंख्या १४७.
३. देखो, ऊपर पृ. २, टि. ४.
४. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१३-२६०. इन पुस्तकों में से जो मध्य एशिया की गुप्तकाल की लिपि में हैं वे तो
मध्य एशिया के ही लिखे हुए हैं, परंतु कितने एक जो भारतीय गुप्त लिपि के हैं (सेट ७, संख्या ३ के a, b, c, e, f टुकड़े;
संख्या ५-८, ११. सेट १३, १५, १६) उनका भारतवर्ष से ही वहां पहुंचना संभव है जैसे कि होर्युज़ी के मठ के ताड़पत्र के
और मि० बावर के भोजपत्र के पुस्तक यहीं से गये हुए हैं. बूलर आदि कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने यूरोप की नांई
भारतवर्ष में भी काग़ज़ों का प्रचार मुसलमानों ने किया ऐसा अनुमान कर मध्य एशिया से मिले हुए भारतीय गुप्त लिपि
के पुस्तकों में से एक का भी यहां से वहां पहुंचना संदेहरहित नहीं माना परंतु थोड़े समय पूर्व डॉ० सर् ऑरल स्टाइन
को चीनी तुर्कस्तान से चींथड़ों के बने हुए ई. स. की दूसरी शताब्दी के जो काग़ज़ मिले उनके आधार पर डा० बार्नेट ने
लिखा है कि 'यह संभव है कि मुगलों (? मुसलमानों) के आने से बहुत पहिले हिंदुस्तान में काग़ज़ का प्रचार होगा परंतु
उसका उपयोग कम होता था (बा; ऐं. ई; पृ. २२६-३०).
५. अजमेर के बीसपंथी आम्नाय के बड़े धड़े के दिगंबर जैन मंदिर में २० से अधिक पट रक्खे हुए हैं, जिनपर ढाई
द्वीप, तीन लोक, तेरह द्वीप, जंबू द्वीप आदि के विवरणसहित रंगीन चित्र हैं. उनमें से कितने एक पुराने और कुछ नये हैं.
१४६ प्राचीनलिपिमाला.
मंडलों के पट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं
जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा
रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग
रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों
में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर
अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली
की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं
जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के
पुराने सैंकड़ों कड़िते शृंगेरी के मठ में मिले हैं, जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-
पत्तों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक
जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित,
१३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है१. कपड़े के पत्रे
बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.
लकड़ी का पाटा और पाटी.
भारतवर्ष में पत्थर की स्लेटों के प्रचार के पहिले प्राचीन काल से ही विद्यार्थी लोग पाटों पर
लिखना सीखते थे. ये पाटे लकड़ी के होते थे और चारों कोनों पर चार पाये उसी लकड़ी में से
निकाले हुए होते थे. पाटों पर मुलतानी मिट्टी या खड़िया पोत कर सुखा देते थे. फिर उनपर
ईंटों की सुरखी बिछा कर तीखे गोल मुख की लकड़ी की कलम से, जिसको राजपूताने में 'बरतना'
या 'बरथा' (वर्त्तक) कहते हैं, लिखते थे. अब पाटों के स्थान में स्लेटों का प्रचार हो गया है तो
भी कितने ही ग्रामीण पाठशालाओं के विद्यार्थी अब तक पाटों पर ही 'पहाड़े', 'हिसाब' आदि
लिखते हैं. ज्योतिषी लोग अब तक बहुधा जन्मपत्र और वर्षफल आदि का गणित ३ पाटों पर करने
के बाद कागजों पर उतारते हैं. बच्चों की जन्मकुंडलियां तथा विवाह के समय लग्नकुंडलियां
प्रथम पाटे पर गुलाल बिछा कर उसपर ही बनाई जाती हैं. फिर वे कागज़ पर लिखी जाकर
यजमानों को दी जाती हैं.
लकड़ी की बनी हुई पतली पाटी (फलक) पर भी प्राचीन काल में विद्यार्थी लिखते थे. बौद्धों
की जातक कथाओं में विद्यार्थियों के फलक का उल्लेख मिलता है ४. अब भी उसपर मुलतानी
मिट्टी या खड़िया पोतने बाद स्याही से लिखते हैं. अब तक राजपूताना आदि के बहुत से दुका-
नदार बिक्री या रोकड़ का हिसाब पहिले ऐसी पाटियों पर लिख लेते हैं, फिर अवकाश के समय
उसे बहियों में दर्ज करते हैं. विद्यार्थियों को सुंदर अक्षर लिखना सिखलाने के लिये ऐसी पाटियों
को बहुधा एक तरफ़ लाल और दूसरी ओर काली रंगवाते हैं. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाले से उन-
पर हरताल से वर्णमाला, बारहखड़ी (द्वादशाक्षरी) आदि लिखवा कर उनपर रोगन फिरा देते हैं
सब से छोटा १ फुट ५ १/२ इंच लंबा और उतना ही चौड़ा, और सबसे बड़ा १५ १/२ फुट लंबा और ५ फुट ७ १/२ इंच चौड़ा है.
कितने ही अन्य स्थानों में भी ऐसे अनेक पट देखने में आये हैं.
१. माइसोर राज्य की आर्किआलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट, ई. स. १६१६, पृ. १८.
२. पी. पीटर्सन की बंबई इहाते के संस्कृत पुस्तकों की खोज की पांचवीं रिपोर्ट, पृ. ११३.
३. इस प्रकार गणित करने की चाल को ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में 'धूलीकर्म' कहा है.
४. देखो, ऊपर पृ. ३, और उसी पृष्ठ का टिप्पण २.
लेखनसामग्री. १४७
जिससे उनपर के हरताल के अक्षर पक्के हो जाते हैं. फिर विद्यार्थी लोग खड़िया को पानी में
घोल कर नड (बरू) की कलम से उनपर लिखने का अभ्यास करते हैं जिसको 'पाटी घोटना'
कहते हैं. इस तरह कुछ समय तक उनपर लिखने से विद्यार्थियों के अक्षर सुंदर बनने लग जाते हैं.
प्राचीन पुस्तकों की नक़ल करनेवाले अर्थात् पुस्तकलेखक लकड़ी की सादी या रंगीन पाटी
पर, ऊपर से करीब ४ इंच छोड़ कर, डोरी लपेटते हैं और उसमें चार पांच इंच लंबी पतली लकड़ी
लगा देते हैं, जिससे मूल प्रति का पन्ना दबा रहता है. उस पाटी को घुटनों पर रख ज़मीन पर बैठ
कर पुस्तकों की नक़ल करते हैं.
रेशमी कपड़ा.
रेशमी कपड़ा भी सूती कपड़े की नांईं प्राचीन काल में लिखने के काम में लाया जाता था
परंतु उसके बहुत महंगे होने के कारण उसका उपयोग बहुत कम ही होता होगा. अलबेरुनी लिखता
है कि 'मैंने यह सुना कि रेशम पर लिखी हुई काबुल के शाहियावंशी हिंदू राजाओं की वंशावली
नगरकोट के क़िले में विद्यमान है. मैं उसे देखने को बहुत उत्सुक था परंतु कई कारणों से वह
न बन सका''. डॉ. बूलर ने जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में रेशम की
एक पट्टी पर स्याही से लिखी हुई जैन सूत्रों की सूची देखी थी२.
चमड़ा.
यूरोप तथा अरब आदि एशिया के देशों में प्राचीन काल में लेखनसामग्री की सुलभता न
होने से वहां क लोग जानवरों के चमड़ों को साफ़ कर उनपर भी लिखते थे परंतु भारतवर्ष में ताड़पत्र,
भोजपत्र आदि प्राकृतिक लेखनसामग्री की प्रचुरता तथा सुलभता एवं जैनों में चर्मपात्र, तथा वैदिक
काल के पीछे के ब्राह्मणों के मृगचर्म के अतिरिक्त और चमड़ा, अपवित्र माना जाने के कारण लिखने
में उसका उपयोग शायद ही होता हो. तो भी कुछ उदाहरण ऐसे मिल आते हैं जिनसे पाया जाता
है कि चमड़ा भी लिखने के काम में कुछ कुछ आता होगा. बौद्ध ग्रंथों में चमड़ा लेखनसामग्री में गिनाया
गया है३. सुबंधु ने अपनी 'वासवदत्ता' में अंधकारयुक्त आकाश में रहे हुए तारों को स्याही से काले
किये हुए चमड़े पर चंद्रमा रूपी खड़िया के टुकड़े से बनाये हुए शून्यबिंदुओं (बिंदियों) की उपमा दी
है४. जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में बिना लिखे हुए एक चर्मपत्र का
हस्तलिखित पुस्तकों के साथ मिलना डॉ. बूलर बतलाता है५.
पत्थर.
ताड़पत्र, भूर्जपत्र (भोजपत्र) या काग़ज़ पर लिखा हुआ लेख बहुत काल तक बचा नहीं रहता इस
लिये जिस घटना की यादगार चिरस्थायी करना होता उसको लोग पत्थर पर खुदवाते थे और अब
भी खुदवाते हैं. ऐसे लेख चट्टान, स्तंभ, शिला, मूर्तियों के आसन या पीठ, पत्थर के पात्रों या उन-
१. सं; अ. इं; जि. २, पृ ११. २. बूं; इं पे; पृ ६३. ३. कच्चायन की भूमिका, पृ. २७. बूं; इं. पे; पृ. ६५.
४. विश्वं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव नभसि संसारस्यातिशून्यत्वाच्छून्यबिन्दव इव (वासव-
दत्ता; हॉल का संस्करण, पृ. १८२).
५. बूं; इं. पे; पृ. ६५.
१४८ प्राचीनलिपिमाला.
के ढकनों पर खुदे हुए मिलते हैं. पत्थर पर खुदे हुए लेखों को 'शिलालेख,' और जिनमें
राजाओं आदि का प्रशंसायुक्त वर्णन होता है उनको 'प्रशस्ति' कहते हैं. जिस आधार पर लेख
खुदवाना होता वह यदि समान और चिकना न हो तो पहिले टांकियों से छील कर उसे समान बनाते
फिर पत्थर आदि से घोटकर वह चिकना बनाया जाता था १. जिस आशय का लेख लिखना होता
उसकी रचना कोई कवि, विद्वान्, राजकीय अधिकारी २ या अन्य पुरुष करता. फिर सुंदर अक्षर
लिखनेवाला लेखक ३ एक एक अथवा दो दो पंक्तियां स्याही से पत्थर पर लिखता और उनको कारी-
गर (सूत्रधार) खोदता जाता था. इस प्रकार क्रमशः सारा पत्थर खोदा जाता ४. इस प्रकार
से तैयार किये जाते हुए शिलालेख मैंने स्वयं देखे हैं. लिखने के पूर्व पंक्तियां सीधी लाने के लिये यदि
पत्थर अधिक लंबा होता तो सूत की पतली डोरी को गेरू में भिगो कर उससे पंक्तियों के
निशान बनाते, जैसे कि लकड़ी के लट्ठे को चीर कर तख्ते निकालनेवाले खाती लोग लट्ठे पर बनाते .
हैं, और पत्थर कम लंबाई का होता तो गज़ या लकड़ी की पट्टी रख कर उसके सहारे टांकी आदि
से लकीर का निशान बना लेते. मंदिर, बावडी आदि की भींतों में लगाये जानेवाले लेख पत्थर
की छोटी बड़ी पट्टियों (शिलाओं) पर खुदवाये जाकर बहुधा ताकों में, जो पहिले बना लिये जाते
थे, लगाये जाते थे. ऐसे लेखों के चारों ओर पुस्तकों के पत्रों की नांई हाशिआ छोड़ा जाता था.
कभी कभी खोदे जानेवाले स्थान के चारों ओर लकीरें ५ खुदी हुईं मिलती हैं. कभी वह स्थान
पाव इंच से एक इंच या उससे भी अधिक खोद कर हाशिये से नीचा ६ किया हुआ मिलता है.
अधिक सावधानी से खुदवाये हुए लेखों में कभी पत्थर की चटक उड़ गई तो उसमें पत्थर के रंग की
मिश्रधातु भर कर उस स्थान को समान बनाते थे और यदि अक्षर का कोई अंश चटक के साथ
उड़ जाता तो उसको पीछा उस धातु पर खोद लेते थे ७. बहुधा शिलालेखों के प्रारंभ में
और कभी अंत में कोई मंगल सूचक सांकेतिक चिह्न ८, शब्द ९ या किसी देवता के प्रणामसूचक
१. यह हाल सावधानी के साथ तय्यार किये हुए लेखों का है. कई लेख खरदरे पत्थरों पर बेपरवाही के साथ खोदे
हुए भी मिलते हैं.
२. जिन शिलालेखों में राजा की तरफ़ की किसी आज्ञा आदि का उल्लेख होता उन्हें राजकर्मचारी ही तय्यार करते थे.
३. लेखक बहुधा ब्राह्मण, कायस्थ, जैन साधु या सूत्रधार (सिलावट) लोग होते थे.
४. हिंदुओं के शिलालेखों के अक्षर पत्थर के भीतर खांदे जाते हैं परंतु मुसल्मानों के अरबी या फ़ारसी के लेखों के अक्षर
उभडे हुए होते हैं और पत्थर का वह अंश जहां पर अक्षर नहीं होता टांकियों से तोड़कर उड़ा दिया जाता है. कोई कोई हिंदू मुसल्-
मानों का अनुकरण कर उभड़े हुए अक्षरवाले लेख भी बनाने लग गये परंतु ऐसे लेख बहुत ही कम मिलते हैं. अब तक ऐसे केवल दो
ही लेख मेरे देखने में आये हैं. एक तो मथुरा के म्यूज़िअम में और दूसरा बाड़ी(धौलपुर राज्य में) में. ये दोनों मुसल्मानों के समय के हैं.
५. अशोक के गिरनार के लेख की १४ धर्माज्ञाओं में से प्रत्येक के चारों ओर लकीरें खुदी हुई हैं. वि. सं. १३७३
(ई. स. १३१६) के लाडनू (जोधपुर राज्य में) से मिले हुए लेख (जो राजपूताना म्यूज़िअम, अजमेर, में रक्खा हुआ है)
के चारों ओर लकीरें हैं (पें. इं; जि. १२, पृ. २४ के पास का प्लेट)
६. वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ (ई. स. १०४२) के लेख का, जो
राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खा हुआ है, खुदा हुआ अंश हाशिये से करीब पाव इंच नीचा है और वहीं रक्खे हुए अर्थूणा (बांसवाड़ा
राज्य में) के दो शिलालेखों का खुदा हुआ अंश प्रायः एक इंच नीचा है. उनमें से एक (खंडित) परमार राजा चामुंडराज के समय
का वि. सं. ११५७ (ई. स. ११०१) का और दूसरा परमार राजा विजयराज के समय का वि. सं. ११६६ (ई. स. १११०) का है.
७. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) रचित 'हरकेलिनाटक',
की तथा सोमेश्वर पंडितरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो दो शिलाएं रक्खी हुई हैं. इन चारों शिलाओं में कई जगह
धातु भरी हुई है और कहीं उसपर अक्षर का अंश भी खुदा हुआ है.
८. चिह्नों में स्वस्तिक (आ. स. स. ई; जि. १, प्लेट ६६; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ५, ६, ७, ८, ११,
१३, १४ आदि), चक्र (धर्मचक्र) पर रहा हुआ त्रिशूल (त्रिरत्न; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ८, १०, १५ आदि),
'ओं' का सांकेतिक चिह्न (देखो, लिपिपत्र १६, २१, २३ आदि के साथ दी हुई मूल पंक्तियों के आरंभ में) तथा कई अन्य
चिह्न मिलते हैं जिनका आशय ठीक ठीक ज्ञात नहीं हुआ (आ. स. वे. इं; जि ४, सेट ४४, भाजा का लेख ७; प्लेट ४५, कूडा
के लेख १, ६, १६; सेट ४६, कुड (के लेख २०, २२, २७, २६).
९. शब्दों में 'सिद्धम्' (पें. इं; जि. १२, पृ. ३२० के पास का सेट. लिपिपत्र ७, ८, ११, १२, १५ आदि के साथ दी हुई