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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 318 में से

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पृष्ठ 158

भारतवर्ष की वर्तमान लिपियां. १२६
१०० का चिह्न फिनिशियन् अंकों के १०० के चिह्न के ४ रूपों में से चौथे से मिलता हुआ है, केवल उसके
पूर्व एक की खड़ी लकीर अधिक लगी है. ऐसी दशा में इन चिह्नों में से ४ के चिह्न के सिवाय सब
का फिनिशियन् से निकला हुआ होना अनुमान होता है.
लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड.
इस खंड में ५ खड़ी पंक्तियां हैं जिनमें से पहिली और चौथी में वर्तमान नागरी अंक हैं
और दूसरी, तीसरी तथा पांचवीं में उन्हीं के सूचक खरोष्ठी अंक हैं. दूसरी पंक्ति में अशोक के शहबा-
ज़गढ़ी और मानसेरा के लेखों १ से और तीसरी तथा पांचवीं में शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों
के समय के संवत्वाले खरोष्ठी लेखों २ से अंक दिये गये हैं.
२१—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां.
( लिपिपत्र ७७ से ८१ ).
भारतवर्ष की समस्त वर्तमान आर्य लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि ही है. ये भिन्न भिन्न
लिपियां किन किन परिवर्तनों के बाद बनीं यह लिपिपत्र १ से ६४ तक में दी हुईं भिन्न भिन्न
लिपियों से मालूम हो सकता है. उन सब में नागरी सार्वदेशिक है और बहुधा सारे भारतवर्ष
में उसका प्रचार बना हुआ है इतना ही नहीं किंतु यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान आदि में जहां
जहां संस्कृत का पठनपाठन होता है वहां के संस्कृतज्ञ लोगों में भी उसका आदर है. हिंदी, मराठी
तथा संस्कृत के पुस्तक उसीमें छपते हैं. बाकी की लिपियां एकदेशिक हैं और भारतवर्ष के भिन्न
भिन्न विभागों में से किसी न किसी में उनका प्रचार है.
लिपिपत्र ७७ वां.
इस लिपिपत्र में शारदा ( कश्मीरी ), टाकरी और गुरुमुखी ( पंजाबी ) लिपियां तथा उनके
अंक दिये गये हैं.
शारदा लिपि—कश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी शारदा मानी जाती है जिससे वह देश
'शारदादेश' या 'शारदामंडल' कहलाता है और उसीपर से वहां की लिपि को 'शारदा लिपि'
कहते हैं. पीछे से उसको 'देवादेश' ३ भी कहते थे. मूल शारदा लिपि ई. स. की दसवीं शताब्दि के
आस पास 'कुटिल लिपि' से निकली और उसका प्रचार कश्मीर तथा पंजाब में रहा. उसीमें परि-
वर्तन होकर वर्तमान शारदा लिपि बनी जिसका प्रचार अब कश्मीर में बहुत कम रह गया है.
उसका स्थान बहुधा नागरी, गुरुमुखी या टाकरी ने ले लिया है.
टाकरी लिपि—यह शारदा का घसीट रूप है, क्योंकि इसके इ, ई, उ, ए, ग, घ, च, ञ,
ड, ढ, त, थ, द, ध, प, भ, म, य, र, ल और ह अक्षर वर्तमान शारदा के उक्त अक्षरों से मिलते
१. देखो, ऊपर पृ. १२८.
२. इन लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६ ; और पृ. ३३, टि. १, २.
३. फो; पँ. वं. स्टे; पृ. ४३, ४७.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri