प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ प्राचीनलिपिमाला
इसके प्रचार का कोई पता नहीं चलता. शिवाजी ने जब अपना नया राज्य स्थापित किया तब नागरी
को अपनी राजकीय लिपि बनाया परंतु उसके प्रत्येक अक्षर के ऊपर सिर की लकीर बनाने के कारण
कुछ कम त्वरा से वह लिखी जाती थी इस लिये उसको त्वरा से लिखी जाने के योग्य बनाने के
विचार से शिवाजी के 'चिटनीस' (मंत्री, सरिस्तेदार) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़
(तोड़ मरोड़) कर नई लिपि तय्यार की जिससे इसको 'मोड़ी' कहते हैं. पेशवाओं के समय में
बिवलकर नामक पुरुष ने उसमें कुछ और फेर फार कर अक्षरों को अधिक गोलाई दी२. यह लिपि
सिर के स्थान में लंबी लकीर खींच कर लिखी जाती है और बहुधा एक अथवा अधिक शब्द या
सारी पंक्ति चलती कलम से लिखी जाती है. इसमें 'इ', तथा 'ई' और 'उ' की मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है और न हलंत व्यंजन हैं. इसके अक्षरों में से 'इ' और 'ज' गुज-
राती के उक्त अक्षरों के समान हैं. 'ख', 'प', 'ब' और 'र' प्राचीन तेलुगु-कनड़ी के उक्त अक्षरों
से लिये हों ऐसा पाया जाता है. 'ट' और 'ठ' के रूप एकसा हैं; उनके बीच का भेद बतलाने के
लिये 'ठ' के बीच में एक बिंदी लगाई जाती है. अ, उ, क, ञ, य, ल, व, स और ह के रूपों में
नागरी से अधिक अंतर पड़ा है. बाक़ी के अक्षर नागरी से मिलते जुलते ही हैं. बंबई इहाते की
मराठी की प्रारंभिक पाठशालाओं में इसकी छपी हुई लिथो की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. इसका
प्रचार महाराष्ट्र देश की कचहरियों में है और मराठी बोलनेवाले बहुधा पत्रव्यवहार या हिसाब में
इसे काम में लाते हैं. बंबई इहाते के बाहर के मरहटों के राज्यों में भी इसका कुछ कुछ प्रचार है.
राजपूताने में इस लिपि में खुदे हुए दो शिलालेख भी देखने में आये जो मरहटों के समय के
ही हैं.
लिपिपत्र ८० वां.
इस लिपिपत्र में तेलुगु, कनड़ी और ग्रंथ लिपियां दी गई हैं.
तेलुगु और कनड़ी लिपियां—ये दोनों लिपिपत्र ४३ से ५१ में दी हुई प्राचीन तेलुगु-कनड़ी
लिपि से निकली हैं. इनके अधिकतर अक्षर परस्पर मिलते जुलते ही हैं. केवल उ, ऊ, ऋ, क, त, स
और ह में अंतर है. इन दोनों लिपियों में 'ए' और 'ओ' के ह्रस्व तथा दीर्घ, दो दो भेद हैं.
नागरी लिपि में यह भेद न होने से हमने दीर्घ 'ए' और दीर्घ 'ओ' के लिये नागरी के 'ए' और
'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनका भेद बतलाया है. तेलुगु लिपि का प्रचार मद्रास इहाते
के पूर्वी समुद्रतट के हिस्से, हैदराबाद राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों एवं मध्यप्रदेश के सब से
दक्षिणी हिस्से में है. कनड़ी लिपि का प्रचार बहुधा सारे मैसोर राज्य, कुर्ग, नीलगिरि प्रदेश, माइ-
सोर के निकट के पश्चिमी घाट प्रदेश और बंबई इहाते के दक्षिणी कोने (बीजापुर, बेलगांव तथा
धारवाड़ जिलों और उत्तरी कनड़ा प्रदेश) में है. 'तेलुगु' नाम की उत्पत्ति संभवतः 'त्रिलिंग'
( त्रिलिंग, तिलिंगाना) देश के नाम पर से हो; और कनड़ी की कन्नड (प्राचीन 'कर्णाट')
देश के नाम से है.
ग्रंथ लिपि—दक्षिण के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि, जिसमें अक्षरों की न्यूनता के कारण
संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, प्रचलित है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इस लिपि में लिखे जाते
हैं. इसीसे इसको ग्रंथ लिपि (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) कहते हैं. यह लिपि लिपिपत्र ५२ से
१ चिटणीस (चिटणवीस) =चिट्ठी नवीस, जैसे कि फडणीस (फडनवीस) =फर्द नवीस.
२ इं. ऐं.; जि. ३४, पृ. २७-८.